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Wednesday, February 11, 2026

12 फरवरी की देश-व्यापी हड़ताल को लेकर तरफ सरगर्मियां तेज़

Sent on Wednesday 11th February 2026 at 16:25 Regarding Strike on 12th February 2026

मोल्डर एण्ड स्टील वर्करज यूनियन की ओर से ज़ोरदार अपील 


लुधियाना
: 11 फरवरी 2026: (कामरेड हरजिंदर सिंह/ /मीडिया लिंक टीम/ /कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

12 फरवरी को हो रही हड़ताल की तैयारियां अंतिम स्वरूप में हैं।  इस बार की हड़ताल नए रिकॉर्ड कायम करेगी।  सबसे पहले मज़दूरों को नमन स्वीकार करें। 

जिसका हर लम्हा किसी जंग से आसान नहीं होता,

वो मजदूर ही होता है जो कभी बेईमान नहीं होता।


*यूनियन ने अपील की समस्त उद्योगिक मजदूरों, शहरी गरीबों एवं मेहनतकश‌ लोगों को जोरदार अपील 

*केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर संयुक्त किसान मोर्चा के समर्थन से हो रही हड़ताल 

*12 फरवरी की देश-व्यापी हड़ताल को सफल बनाने के अभियान 

*12 फरवरी को सुबह 10:30 बजे चतर सिंह पार्क में पहुँचने की अपील 

*फिर वहां से मार्च करके बस स्टैंड में सांझी रैली में शामिल होने की अपील 

*क्यों की जा रही है यह हड़ताल? 

*यह हड़ताल केंद्र की भाजपा आर एस एस की मोदी सरकार एवं राज्य सरकारों के खिलाफ हो रही है। 

*जनता में रोष है क्यूंकि देश के उत्पादन स्रोतों को बेचने का जान विरोधी काम किया गया है। 

*इसके साथ ही सस्ती श्रमिक शक्ति को लूटने का अपराध भी किया गया है। 

*निजीकरण के तेज किए हमलों के खिलाफ भी तीखा आक्रोश है 

*अपनी रोटी-रोजी और सम्मान की जिंदगी जीने का अधिकार बचाने के लिए हो रही है यह हड़ताल। 

सांझी मांगें / मुद्दे क्या हैं ?

1)- बिजली बिल -2003 एवं 2025 रद्द किया जाए। स्मार्ट मीटर लगाने बंद किए जाएं।  पावर सैक्टर में निगमीकरण निजीकरण करने के उठाए सभी कदम वापिस लिए जाएं। सभी की पहुंच में आने वाली सब्सिडी आधारित बिजली एक्ट -1948 लागू किया जाए।  

2)-मजदूरों के कार्य घंटे बढ़ाने, यूनियन बनाने , संघर्ष / हड़ताल करने, रक्त निचोडू ठेका भर्ती करने, हायर एण्ड फायर की नीती‌ को पूंजीपति मालिकों के पक्ष में लागू करने वाले 4 श्रम कोड़ों /कानूनों को रद्द किया जाए। 

3)-"  मगनरेगा  " कानून को बदल कर केंद्रीय कब्जे वाला "वी बी जी राम जी" कानून को रद्द किया जाए। मनरेगा मजदूरोंको साल भर उत्पादक काम दिया जाए। कम से कम प्रति दिन 700 रूपए दिहाड़ी दी जाए। 

4)- केंद्र व राज्य के सरकारी विभागों के निजीकरण/ पंचायती करण की नीति बंद की जाए।

5)- ' आप ' की भगवंत मान सरकार द्वारा पावर कॉम, ट्रांसपोर्ट, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी समेत सभी सरकारी

विभागों की संपतियों को कारपोरिटों को बेचने की नीति को तुरंत रद्द किया जाए।

6)- ठेका / आऊटसोर्सिंग भर्ती की बजाए पक्की भर्ती की जाए

एवं समस्त ठेका / आऊटसोर्सिंग श्रमिकों को रैगूलर किया जाए। नियमों मुताबिक वेतन- भत्ते व पेंशन दी जाए।

7)- मोदी सरकार द्वारा किसानों को उजाड़ने वाला प्रस्तावित  " बीज बिल -2025 वापिस लिया जाए। 

8) देश विरोधी भारत-अमरीका मुक्त व्यापार समझौता रद्द किया जाए।

9)- केंद्र की भाजपा सरकार व

पंजाब सरकार द्वारा कुचले जा रहे लिखने , बोलने , संघर्ष करने

के अधिकारों को बहाल किया जाए। यू ए पी ए , देश द्रोही , अफस्पा , एन एस ए जैसे

काले कानून रद्द किए जाएं। 

10)- मजदूरों किसानोंं के कर्जे माफ किए जाएं।

11)- पिछले 10 महीनों से झूठे केसों में बठिंडा जेल में बंद अपने 2 किसान आगूओं की रिहाई व रोष - प्रदर्शन करने बठिंडा जा रहे भारतीय किसान यूनियन ( एकता ऊगराहां) पर भगवंत मान सरकार द्वारा अंधाधुंध लाठीचार्ज, अश्रु गैस के गोले दागने, सैंकडे किसानों पर नाजायज़ मामले दर्ज करने के अत्याचार , अंदोलनकारी पनबस एवं पी आर टी सी के कंटरेकट मुलाजिमों पर पुलिस दमन , जेलों में बंद किसान , मजदूर ,मुलाजिमों की रिहाई की आवाज बुलंद करें।    

-मज़दूर, किसान , मुलाजिम , नौजवान , छोटे कारोबारियों से जुड़ी सांझी मांगों संबंधी 12 फरवरी की देश - वयापी हड़ताल के साथ -साथ 22 फरवरी 2026 , रविवार को भाजपा केंद्र सरकार एवं पंजाब सरकार के मंत्रियों /प्रमुख नेताओं के घरों /दफ्तरों के आगे विशाल धरनों - प्रदर्शनों में शामिल हों।                       

-संसद में बिजली संसोधन बिल पेश होने के विरोध में अगले दिन

पंजाब में काले दिन के तौर पर टोल पलाजे मुक्त किए जाएंगे। इस एक्शन में भी मोल्डर एण्ड स्टील वर्करज यूनियन के साथियों ने शामिल होना है।

साथियों, उपरोक्त सांझे मुद्दों पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की संयुक्त किसान मोर्चा के समर्थन से 12 फरवरी की महत्वपूर्ण हड़ताल को पंजाब में 90 संगठनों द्वारा भी सफल करने, 22 फरवरी के एक्शन प्रोग्राम के बाद भी इन जन-दुशमन नीतियों के खिलाफ लगातार ज़ोरदार संघर्ष जारी रखना है। 

सांझी एकता को और भी मजबूत करना है। याद रखो इन जन-दुशमन नीतियों को सभी  केंद्र व राज्य सरकारों ने डंडे के बल पर लोगों के विरोध के बावजूद लागू किया है। इन नीतियों को अब विकास के नाम पर भाजपा की मोदी सरकार एवं पंजाब में आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार तेजी से लागू कर रही है। इस समय शासकीय वर्गीय पार्टीयों की सरकारों की अदला-बदली के चुनावी चक्रव्यूह में फसने की बजाय इन जन-विरोधी नीतीयों को रद्द करवाने के लिए सांझे मुद्दों पर विशाल एकता एवं सांझे संघर्ष पर पूरा ज़ोर लगा कर रखें। 

अपील‌ करता  :- मोल्डर एण्ड स्टील वर्करज यूनियन ( रजि:)

लुधियाना।

संपर्क : हरजिंदर‌ सिंह प्रधान 

( 9464360755)

Wednesday, February 4, 2026

मज़दूरों के दिल दिमाग में बसा रहता है यह नारा

बॉलीवुड से भी गहरा रिश्ता है इस नारे का 

लुधियाना: 3 फरवरी 2026: (मीडिया लिंक टीम//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::


"हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है"
बहुत दिलचस्प कहानी है इस नारे की भी। इस नारे ने कई बार इतिहास रचा है। वास्तव में यह नारा मशहूर शायर जनाब शैलेंद्र द्वारा रचित एक क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन का नारा है। बुझ गए निराश दिलों में यह नारा एक नया जोश भर देता है। यह नारा दमन, शोषण और मँहगाई के खिलाफ एकजुटता और संघर्ष का एक ऐसा ज़ोरदार प्रतीक भी है जिसे संघर्षशील लोगों ने हमेशां याद रखा। जब जब भी आंदोलन चले और हड़तालें हुईं तब तब इस नारे को अक्सर मज़दूरों, युवाओं और राजनीतिक प्रदर्शनों में हक़ की आवाज़ उठाने के लिए बड़े उत्साह और जोशोखरोश के साथ बुलंद किया।  

इस नारे की मुख्य बातें सीधा मज़दूर हित की बात करती हैं शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करती हैं। नारे में कोई चल नहीं - -कोई भविष्य में वाली बात भी नहीं। शोषण के खिलाफ यह नारा सीधी उंगली उठा कर आंख से आंख मिलाकर बात करता है। मज़दूरों और उनकी मेहनत पर होते हमलों को बड़ी बेबाकी से बेनकाब भी करता है यह नारा।  

इसी नारे को कुछ और गहराई से देखें तो यह नारा पूंजीवादी शोषण, छँटनी, और सरकारी वादों के टूटने के खिलाफ मज़दूर वर्ग की बहुत ही ज़बरदस्त ललकार भी है। आपको हैरानी होगी कि जानेमाने शोमैन राजकपूर और जानेमाने शायर शैलेन्द्र के नज़दीक आने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। वाम विचारधारा और शोषण का विरोध इन्हें नज़दीक ले कर आया। इन्होने मिल कर फिल्म संसार को उन विचारों और गीतों से बेहद अमीर बना दिया। वाम विचारधारा का ज़ोरदार प्रचार कम्युनिस्ट वर्करों और नेताओं से ज़्यादा तो ऐसे गीतों ने किया।  इस तरह के गीतों और कहानियों के चलते ही लेफ्ट के विचारों ने उस जनता में ज़ोरदार ज़मीन पकड़ ली जहां अत्यधिक बौद्धिकता के चलते लीडरों के भाषण आम जनता के सिर के ऊपर से गुज़र जाते थे। गीतों के बोल जनता के दिल दिमाग में घर कर जाते थे। 

शैलेंद्र और राज कपूर की ऐतिहासिक जोड़ी 1940 के दशक के अंत में एक मुशायरे में बनी, जब राज कपूर ने शैलेंद्र की कविता 'जलता है पंजाब' सुनी और प्रभावित हुए। शुरू में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर शैलेंद्र ने फिल्म में लिखने से इनकार किया, लेकिन बाद में आर्थिक तंगी के कारण 'बरसात' (1949) फिल्म के लिए 'बरसात में तुमसे मिले' व 'पतली कमर है' जैसे गानों से उन्होंने करियर की शुरुआत की। 

इस प्रसिद्ध जोड़ी की कहानी के मुख्य पहलू न केवल शायरी बल्कि समाज के नवनिर्माण से जुड़े अभियान के संबंध में भी बहुत कुछ बताते हैं। विचारों का मिलना ही इस जोड़ी के लिए उम्र भर महत्वपूर्ण रहा। दबे कुचले लोगों के दर्द की बात दोनों के दिल में थी। इसके साथ ही राजकपूर साहिब के इश्क और प्रेम ने भी एक नया रंग उभारा। यहां याद आता है कि शुरुआती मुलाकात भी बहुत ख़ास थी लेकिन शैलेन्द्र ने फिल्मों के लिए गत्त लिखने से साफ़ इंकार कर दिया था। उनदिनों गंभीर लोग फिल्मों वाले काम को अच्छा नहीं समझते तहे। शैलेन्द्र साहिब के इस इनकार के बावजूद राज कपूर साहिब ने न कोशिश छोड़ी है और न ही इस सोच को का ही अपने दिमाग से निकाला। वह एक ऐतिहासिक वक़्त कहा जा सकता है जब राजकपूर साहिब ने शैलेंद्र को अपनी पहली फिल्म आग (1948) के लिए गाने लिखने का प्रस्ताव दिया था। शोमैन राजकपूर के प्रस्ताव को ठुकराना भी सबके बस में नहीं होता लेकिन शैलेन्द्र अपने आदर्श के साथ प्रतिबद्ध रहे कि फिल्मों के लिए नहीं लिखना। लेकिन प्रकृति हमें वहीं ले जाती है जहां हम नहीं जाना चाहते। 

ज़िंदगी के रंग बदलते रहते हैं। शैलेन्द्र साहिब के हालात और ज़िंदगी भी गर्दिश में आ गए। परिवार में एक बहुत बड़ी मजबूरी उनकी न टाले जा सकने वाली आर्थिक जरूरत भी बन गई। ऐसे में शैलेन्द्र को राजकपूर ही याद आए। जब शैलेंद्र को पैसों की तंगी हुई तब वह स्वयं राज कपूर साहिब के पास गए। सुना है की वह तो उधार मांगने गए थे उस समय बरसात (1949) फिल्म बन रही थी।

सफल सफर: 'बरसात' के गानों की सफलता के बाद, राज कपूर ने शैलेंद्र को अपनी फिल्मों का मुख्य गीतकार बना लिया।

सदाबहार गाने: इस जोड़ी ने आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी, और अनारी जैसी फिल्मों में 'आवारा हूं', 'प्यार हुआ इकरार हुआ', और 'मेरा जूता है जापानी' जैसे अमर गीत दिए।

गहरी दोस्ती: राज कपूर उन्हें 'कविराज' या 'पुष्किन' कहकर बुलाते थे। शैलेंद्र की मौत (14 दिसंबर 1966) पर राज कपूर ने कहा था, "मेरी आत्मा मुझसे बिछड़ गई"। 

तीसरी कसम (1966) जैसी फिल्मों में उनके बीच के रचनात्मक तालमेल का भी गहरा असर दिखा। 

ज़िंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जिसे शैलेन्द्र जी ने अपनी कलम से कवर न किया हो। यही कारण है कि उनके गीत आज भी लोगों के दिल दिमाग में बसते हैं।

Tuesday, October 21, 2025

CPI स्टेट सेक्रेटरी ने युवा लीडरशिप की कमान संभाली

WhatsApp Received on Tuesday 21st October 2025 at 21:21 Regarding CPI Kerala Screen 

कॉमरेड गुज्जू ला ईश्वरैया आंध्र प्रदेश CPI स्टेट सेक्रेटरी चुने गए

A Report From Kerala CPI Unit 21st October 2025: (Kerala Screen Desk)


एक स्टूडेंट लीडर से...एक गरीब बच्चा जो कम्युनिस्ट पार्टी स्टेट सेक्रेटरी के लेवल तक पहुंचा

.......आंध्र प्रदेश स्टेट CPI पार्टी में एक नए दौर की शुरुआत हुई है। इसने देश की मौजूदा पॉलिटिकल, मॉडर्नाइजेशन और बदलते समय के हिसाब से युवा लीडरशिप का स्वागत किया है। नेशनल मीटिंग्स के बाद लीडरशिप चेंज पर लिए गए फैसलों को लागू करने में इसने बहुत तेज़ी से कदम उठाए हैं। स्टेट पार्टी, जिसने लीडरशिप चेंज पर कंफ्यूजन के कारण पहले ही काउंसिल मीटिंग पोस्टपोन कर दी थी, ने आखिरकार आज हुई राष्ट्र समिति की मीटिंग में नई लीडरशिप का ऐलान कर दिया। जी. ईश्वरैया, कडप्पा जिले के थोंदूर मंडल के भद्रम पल्ले में गुज्जूला बलम्मा और ओबन्ना कपल की छठी संतान हैं। बहुत गरीब परिवार से होने के कारण, उन्होंने भूख का दर्द खुद महसूस किया। उन्हें अपनी स्कूल की पढ़ाई के दौरान मजदूरी करनी पड़ी। वह एक अनाथालय (बाला सदन) में रहे और वहीं खाना खाते हुए पढ़ाई की। प्राइमरी स्कूल पूरा करने के बाद, उन्हें हायर एजुकेशन के लिए पटनम (कडप्पा) आना पड़ा। वहाँ से उनकी ज़िंदगी में नए दरवाज़े खुले। वे सातवीं क्लास के दिनों में AISF में शामिल हो गए। मिट्टी गूंथने वाले उनके हाथों ने AISF का झंडा अपने कंधों पर उठा लिया। दसवीं क्लास के बाद, उन्होंने कडप्पा आर्ट्स कॉलेज में पढ़ाई की और BA ग्रुप की डिग्री हासिल की। ​​"लड़ो" के मोटो को नज़रअंदाज़ किए बिना, उन्होंने एक तरफ पढ़ाई की और दूसरी तरफ, अपने कॉलेज में स्टूडेंट्स की समस्याओं के लिए लड़े। उन्होंने स्टूडेंट स्कॉलरशिप के लिए बिना थके संघर्ष शुरू किया। ईश्वरैया गारू की लड़ाई की भूमिका ने कई ऐसे स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप दिलाने में अहम भूमिका निभाई, जिन्हें स्कॉलरशिप नहीं मिली थी। उस लड़ाई की भावना को पहचानते हुए, कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें कडप्पा जिले का AISF डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी चुना। अपनी डिग्री पूरी करने के तुरंत बाद, उन्होंने पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए श्री वेंकटेश्वर यूनिवर्सिटी (SVU) से MA किया। यह कहा जा सकता है कि SV यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट मूवमेंट को लीड करने में ईश्वरैया की भूमिका बहुत अहम थी। अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए, उन्होंने आसानी से स्टूडेंट मूवमेंट को लीड किया। .... उन्होंने स्टूडेंट और यूथ ऑर्गनाइज़ेशन को ज़िंदगी दी:

उन्होंने यूनाइटेड आंध्र प्रदेश (तेलंगाना) में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन (AISF) और ऑल इंडिया यूथ फ़ेडरेशन (AIYF) के स्टेट सेक्रेटरी के तौर पर काम किया। उन्होंने हैदराबाद को सेंटर बनाकर उस समय के 26 ज़िलों में स्टूडेंट मूवमेंट को तेज़ किया। उन्होंने उस समय के कांग्रेस चीफ़ मिनिस्टर नेदुरुमल्ले जनार्दन रेड्डी सरकार के ख़िलाफ़ एक ज़बरदस्त मूवमेंट चलाया, जिसने B.Ed. कर चुके कैंडिडेट्स को B.Ed. करने की इजाज़त नहीं दी थी, और JVO कैंसल करवा दिया था। उसके बाद, उन्होंने यूथ विंग में भी एक्टिवली काम किया। उन्होंने उस समय की कांग्रेस सरकार के इंजीनियरिंग कॉलेजों को बिना सोचे-समझे परमिशन देने और इंजीनियरिंग एजुकेशन को करप्ट करने के रवैये पर सवाल उठाते हुए एक अख़बार में आर्टिकल भी लिखा। उन्होंने यूथ यूनियन द्वारा बेरोज़गारों और युवाओं की कई समस्याओं को लेकर निकाली गई साइकिल यात्रा की सफलता के लिए बहुत मेहनत की। नतीजतन, हैदराबाद में हुई साइकिल यात्रा की आखिरी मीटिंग बहुत सफल रही। इस तरह, उन्होंने अकेले ही स्टूडेंट और यूथ यूनियन को लीड किया।

बहुत कम समय में, वह कम्युनिस्ट पार्टी के नेता के पद तक पहुँच गए...

स्टूडेंट और यूथ की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद, उन्होंने कडप्पा CPI डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी का पद संभाला। पद संभालने के बहुत कम समय में ही, उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के सभी मंडलों में कम्युनिस्ट पार्टी को फिर से खड़ा किया। उन्होंने पुराने RIMS हॉस्पिटल के लिए बहुत मेहनत की और हॉस्पिटल की सर्विस लोगों तक पहुँचाने में कामयाब रहे। कडप्पा स्टील प्लांट मूवमेंट को आगे लाने का क्रेडिट सिर्फ़ CPI पार्टी के डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी के तौर पर गुज्जला ईश्वरैया को जाता है। इसी तरह, उन्होंने गरीबों को घर के प्लॉट देने की माँग की, दी गई ज़मीनों पर झंडे लगाए और रेवेन्यू मशीनरी पर सवाल उठाए। इस वजह से, उन्हें लगभग दस से पंद्रह दिन जेल में बिताने पड़े। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने पार्टी ऑफिस को अपना घर बनाया और हमेशा वर्कर्स और गरीबों के लिए मौजूद रहे और काम किया। कडप्पा डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी के तौर पर तीन टर्म काम करने के बाद, पार्टी ने उन्हें स्टेट मूवमेंट की ज़रूरतों के लिए विजयवाड़ा बुलाया। विजयवाड़ा को अपना हेडक्वार्टर बनाकर, उन्होंने स्टेट सेक्रेटरी कैटेगरी के मेंबर के तौर पर पूरे स्टेट का दौरा किया। उन्हें जिस भी ज़िले का इंचार्ज बनाया गया, उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारियों को ठीक से निभाने के लिए बहुत मेहनत की। कहा जा सकता है कि पार्टी के लिए उनके जुनून और पार्टी बनाने की उनकी कड़ी मेहनत ने उन्हें राज्य की गद्दी पर बिठाया है!!

**एक बाल मज़दूर से.. कम्युनिस्ट पार्टी के स्टेट सेक्रेटरी के लेवल तक....

कडप्पा ज़िले के एक दूर-दराज़ के गाँव में एक गरीब परिवार में जन्मे, बचपन में कई मुश्किलों का सामना किया, रोज़ाना के काम करके गुज़ारा किया, अनाथालयों में पढ़ाई की, और गरीबी को करीब से महसूस किया। आज, ईश्वरैया गारू आंध्र प्रदेश के स्टेट सेक्रेटरी चुने गए हैं। यह आज के युवाओं, CPI के स्टेट वर्कर्स और राज्य के गरीब लोगों के लिए गर्व की बात है... उनकी एक्टिविज़्म वाली ज़िंदगी युवाओं के लिए एक आदर्श है।!! उम्मीद है कि वे गरीबों और कमज़ोरों के साथ खड़े रहेंगे और राज्य के पब्लिक मुद्दों पर बिना थके संघर्ष के लिए तैयार रहेंगे.... इसके लिए, आइए हम उन्हें एक बार फिर "क्रांतिकारी बधाई" दें!!

एम साई कुमार,

AISF स्टेट वाइस प्रेसिडेंट

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Wednesday, February 26, 2025

क्रांति के लिए लेनिन के विचार आज भी प्रासंगिक हैं

वोह सुबह ज़रूर आएगी और बहुत जल्द आएगी !


इंटरनेट की दुनिया
:26 फरवरी 2025

(Post with AI with some input by कामरेड स्क्री डेस्क//Images by Meta AI)::

लेनिन का एक कथन इंटरनेट कुछ अरसे से पर घूम रहा है कि आप सफ़ेद दस्ताने में क्रांति नहीं ला सकते---लेनिन का यह कथन कब और कहां कहा गया और किस पुस्तक में है इसके बारे पट अलगाने के प्रयास जारी हैं। आज के वामपंथ में इसे लेकर क्या सोचा जाता है--इस संबंध में भी हमारी टीम कोशिशों में सक्रिय है। 

AI अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भी इसे लेकर संक्षिप्त सी बात की गई।  AI ने लेनिन के इस कथन को लेकर कहा है कि यह कथन कि "आप सफ़ेद दस्ताने पहनकर क्रांति नहीं कर सकते" एक प्रसिद्ध कथन है जो उनकी विचारधारा और क्रांति के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह कथन उन्होंने कब और किस पुस्तक में कहा, इसका निश्चित रूप से पता लगाना मुश्किल है, लेकिन यह उनके लेखों और भाषणों के समग्र संदर्भ में समझा जा सकता है।

लेनिन का यह कथन संभवतः उस समय के संदर्भ में कहा गया था जब रूस में क्रांति की तैयारी चल रही थी। उस समय कई लोग थे जो क्रांति के समर्थक थे, लेकिन वे केवल ऊपरी तौर पर बदलाव चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि समाज में कोई गहरा परिवर्तन हो। लेनिन का मानना था कि ऐसे लोग क्रांति को सफल नहीं बना सकते। क्रांति के लिए जरूरी है कि लोग अपने पुराने विचारों और आदतों को छोड़ दें और एक नए समाज के निर्माण के लिए तैयार रहें।

लेनिन के इस कथन को आज के वामपंथ में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। वामपंथी मानते हैं कि क्रांति केवल तभी सफल हो सकती है जब लोग पूरी तरह से बदलाव के लिए तैयार हों। उन्हें अपने पुराने विचारों और आदतों को छोड़ना होगा और एक नए समाज के निर्माण के लिए एकजुट होना होगा।

लेनिन का यह कथन आज भी प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि क्रांति केवल तभी सफल हो सकती है जब लोग पूरी तरह से बदलाव के लिए तैयार हों। उन्हें अपने पुराने विचारों और आदतों को छोड़ना होगा और एक नए समाज के निर्माण के लिए एकजुट होना होगा।

अब जबकि कॉर्पोरेट का प्रभाव शिखरों पर है चीन और रूस भी इससे अछूते नहीं रहे तब क्या आज के दौर में लेनिनवाद और वाम का प्रभाव कम हो रहा है क्या

यह एक जटिल प्रश्न है जिसका सीधा जवाब देना मुश्किल है। यह सच है कि कॉर्पोरेट का प्रभाव आज दुनिया भर में बढ़ रहा है, और चीन और रूस भी इससे अछूते नहीं हैं।

लेनिनवाद और वामपंथ पर प्रभाव को स्वीकार तो किया जाता है कि यह प्रभाव कम हुआ है। प्रभाव कम होने के कारण भी चर्चा में हैं। 

इन कारणों में से एक कारण है वैश्वीकरण: वैश्वीकरण के कारण दुनिया भर में पूंजीवाद का प्रभाव बढ़ा है। अब करीब हर कोने में पहुँच चुका है वैश्वीकरण। 

एक और बड़ा कारण रहा है सोवियत संघ का पतन: सोवियत संघ के पतन के बाद लेनिनवाद और वामपंथ की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है। इसे दुनिया भर में नोट भी किया गया है। 

इसके साथ ही आर्थिक विकास भी वाम के प्रभाव को कम करने मेंसहायक रहा।  कई देशों में आर्थिक विकास होने के कारण लोगों का ध्यान गरीबी और असमानता जैसे मुद्दों से हट गया है।

इस सब के बावजूद वाम का प्रभाव बिलकुल खत्म नहीं हुआ है। यह प्रभाव अभी भी मौजूद है।  इसे मानने वाले और इसे चाहने वाले अभी भी बहुत बड़ी संख्या  में हैं। 

वाम को लगातार बढ़ती हुई असमानता मज़बूती भी दे रही है। जब तक असमनत है तब तक वाम की ज़रूरत महसूस की जाती रहेगी। इसे हटाने के लिए शायद और कोई रास्ता भी नहीं है। दुनिया भर में बढ़ती असमानता के कारण वामपंथ के विचारों को अभी भी समर्थन मिल रहा है। असमानता के खिलाफ वाम ही रास्ते दिखा रहा है। 

वाम का ज़ोर और प्रभाव अब भी दिखता  है सामाजिक आंदोलनों पर।  कई सामाजिक आंदोलनों में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव अभी भी आम देखा जा सकता है।

जहां तक चीन और रूस का सवाल है तो चीन और रूस में अभी भी कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में हैं।

कुल मिला कर अभी भी लोगों को वाम और वाम की विचारधारा से आशाएं बनी हुई हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि लेनिनवाद और वामपंथ का प्रभाव पूरी तरह से कम हो गया है। आज भी कई लोग हैं जो वामपंथी विचारधारा में विश्वास करते हैं और सामाजिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं। हालांकि, यह भी सच है कि कॉर्पोरेट के बढ़ते प्रभाव के कारण वामपंथ को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

वाम में कई गुट होने के बावजूद मार्क्स और लेनिन में उनकी आस्था पूरी तरह से मज़बूत है। वे अभी भी मार्गदर्शन के लिए कार्ल  व्लादिमीर लेनिन के विचारों की ही चर्चा और अध्ययन करते हैं। कुछ गट माओवाद, स्टालिन  ट्रॉटस्की से भी प्रेरणा लेते हैं लेकिन इन सभी को इस बात का अटूट विश्वास है कि क्रान्ति आ कर रहेगी। 

वाम की एकता और मार्गदर्शन  सभी वामपंथी संगठनों के  बौद्धिक प्रतिनिधियों को आगे आना ही चाहिए। आप सभी के विचारों की इंतज़ार इस मंच पर भी रहेगी। 

Saturday, August 24, 2024

कॉरपोरेट-बिल्डर गठजोड़ हड़पना चाहता है मुंबई की झुग्गियों से ज़मीन

समकालीन लोकयुद्ध//17-23 अगस्त 2024

झुग्गी-झोपड़ियों की ज़मीन पर अडानी के कब्जे के विरुद्ध तीखा जनप्रतिरोध

-अजित पाटिल बता रहे हैं सारा मामला है क्या? 

हमने पहले धारावी पुनर्विकास परियोजना के बारे में एक लेख प्रस्तुत किया था, जिसमें मुंबई के  झुग्गी-झोपड़ियों के नये मालिक अडानी को एक विशेष कंपनी के जरिये 80:20 के अनुपात में अडानी और महाराष्ट्र सरकार के संयुक्त हिस्सेदारी में सौंपने की बात थी। तब से धारावी से होकर बहने वाली दूषित मीठी नदी से बहुत सारा पानी बह चुका है। कॉरपोरेट-बिल्डर गठजोड़ मुंबई की झुग्गियों से जमीन हड़पना चाहता है, जो वर्तमान में मुंबई के पूरे जमीन के टुकड़े का 10% हिस्सा है। यह वृहत एमएमआरडीए को छोड़ कर है, जिसमें लगभग 60% लोग रहते हैं, और वे इस बेशकीमती भूमि का मुद्रीकरण करना चाहते हैं। 

गरीब विरोधी और कॉरपोरेट समर्थक भाजपा के पीयूष गोयल ने खुलेआम घोषणा की है कि वे चुनाव जीतने के बाद मुंबई को ‘झोपड़ी मुक्त’ बनाना चाहते हैं. यह तब हुआ जब भाजपा ने मुंबई के सबसे बड़े बिल्डरों में से एक मंगलप्रसाद लोढ़ा को संरक्षक मंत्रा के रूप में नामित किया, जिनका कार्यालय मुंबई निगम भवन में है, जहां निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में नौकरशाह शासन चलाते हैं। 

डीआरडीपीएल के खुलासे से अडानी की दुर्भावनापूर्ण महत्वाकांक्षाओं और मुंबई के नए कॉर्पारेट झुग्गी भूस्वामी बनने की गतिविधियों का पता चला है. अडानी ने धारावी की लगभग 600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है, जिसमें दिलचस्प बात यह है कि इको-सेंसिटिव जान से नामित माहिम का पक्षी और समुद्री जीव अभयारण्य भी शामिल है, जो मुंबई और नवी मुंबई के तटीय इलाकों के खारे पानी में पनपने वाली बाढ़ प्रतिरोधी मैंग्रोव की घनी झाड़ियों से घिरी है। ‘धारावी बचाओ समिति’ के अनुसार महानगर के भीतर धारावी की जीवंत बसावट की पूरी मौजूदा आबादी को बसाने के लिए केवल 300 एकड़ जमीन ही पर्याप्त है। शेष 300 एकड़ का उपयोग अडानी द्वारा बिक्री के लिए बिल्डिंगों के निर्माण के लिए किया जा सकता है। एसआरए अधिनियम किसी भी झुग्गी निवासी को कुछ तयशुदा मानकों के साथ उसी भूमि पर स्थानांतरित करने की अनुमति देता है। अडानी 10,000 करोड़ वर्ग फीट का टीडीआर का निर्माण करेगा! टीडीआर का मतलब है ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स, जिसे विकसित करने के नाम पर  बाजार में फिर से बेचा जा सकता है और यह अब तक प्रत्येक क्षेत्र में भूमि की सर्कल रेट से जुड़ा हुआ है। यह सब इस तथ्य के बावजूद हो रहा है कि अडानी का सर्वेक्षण अभी तक पूरा नहीं हुआ है और धारावी के लोगों, उद्योगों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के पुनर्वास के लिए कोई निश्चित विकास योजना मौजूद नहीं है। धारावी के निवासियों ने अडानी द्वारा बाउंसरों, पूर्व पुलिस अधिकारियों और एनकाउंटर विशेषज्ञों की मदद से किये जा रहे सर्वेक्षण का विरोध किया है। अब अडानी और उनके नियंत्रण में राज्य तंत्रा की भूमिका का असली खेल शुरू होता है। 

अडानी समूह को विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं, लेकिन यही तक सीमित नहीं हैं:

  1. अनुबंध की एक शर्त में कहा गया है कि अडानी द्वारा किए गए किसी भी अनुरोध या प्रावधान का 15 दिनों के भीतर जवाब दिया जाना चाहिए, अन्यथा उन्हें स्वीकार किया गया माना जाएगा.
  2. झुग्गीवासियों को उसी भूमि पर बसाने के बजाय, उन्हें 10 किलोमीटर के दायरे में बसाया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, इसे आगे समायोजित करके अपात्र व्यक्तियों को 2.5 लाख रुपये और मासिक किराया देकर 20 किलोमीटर दूर साल्ट पैन लैंड पर बसाया जा सकता है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह साल्ट पैन लैंड वर्तमान में नमक आयुक्त के स्वामित्व में है और इसका उपयोग अभी भी नमक को बनाने के लिए किया जा रहा है। इस भूमि ने, आस-पास के मैंग्रोव के साथ 26 जुलाई की जलप्रलय के दौरान मुंबई को बाढ़ के पानी से बचाने और उसे अवशोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
  3. अडानी अब पुनर्वास उद्देश्यों के लिए विभिन्न भूमि देने का अनुरोध कर रहा है, जिसमें रेलवे भूमि (45 एकड़), मुलुंड में ऑक्ट्रोई पोस्ट भूमि (18 एकड़), मुलुंड डंपिंग ग्राउंड (46 एकड़) की भूमि, साल्ट पैन भूमि (283 एकड़), डंपिंग ग्राउंड की मानखुर्द लैंडफिल भूमि (823 एकड़), बांद्रा-कुर्ला परिसर में जी ब्लॉक भूमि (17 एकड़), और कुर्ला में हजारों पेड़ों के साथ मदर डेयरी भूमि (21 एकड़), कुल मिलाकर 1253 एकड़ धारावी के अतिरिक्त है। इन अनुरोधों के पीछे इरादे बिल्कुल स्पष्ट हैं। धारावी को बीकेसी-II (अडानी) में बदलने की तैयारी है, जो बीकेसी (अंबानी) के बगल में स्थित है, जिसमें दोनों क्षेत्रों के लिए बुलेट ट्रेन स्टेशन होगा जो मुंबई और सूरत के हीरा व्यापारियों को सेवा प्रदान करेगा। शेष भूमि का उपयोग मुंबई के सभी क्षेत्रों से झुग्गी निवासियों को उनके प्राकृतिक वातावरण से अलग करके उन्हें स्थानांतरित करने के लिए किया जाएगा। कपड़ा श्रमिकों के साथ भी यही व्यवहार किया गया है। मिलों के बंद होने के बाद उपलब्ध भूमि के एक हिस्से पर उन्हें आवास देने का आश्वासन दिया गया था। धीरे-धीरे और धोखे से, उन्हें भूमि के अपने उचित हिस्से से वंचित कर दिया गया है और अब उन्हें मुंबई के बाहरी इलाके में एमएमआरडीए क्षेत्र में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो उनके पिछले घरों से 50 किलोमीटर से अधिक दूर है, जहां वे जीविकोपार्जन करते थे और श्रमिक वर्ग की संस्कृति को विकसित करते थे। इस बीच, भ्रष्ट राजनीतिक समूह के सहयोग से पूरी ज़मीन बिल्डर लॉबी को सौंप दी गई है। 

मुलुंड में एमसीजीए एक छोटा सा भूखंड विकसित कर रहा है, जिसमें आमतौर पर 1500 परिवार रह सकते हैं, जिसमें 45 मंजिलों वाली 5 इमारतें होंगी। इन इमारतों में सड़क चौड़ीकरण और इसी तरह की परियोजनाओं से प्रभावित 7500 परिवार रहेंगे।  यह विकास अत्यधिक फ्लोर स्पेस इंडेक्स का निर्माण कर रहा है और निवासियों को आवश्यक खुली जगहों से वंचित कर रहा है. मुलुंड ईस्ट की आबादी 1.5 लाख है, और मौजूदा बुनियादी ढांचा इतनी ही आबादी को सहारा देने के लिए बनाया गया है. निवासियों का तर्क है कि इस विकास से बुनियादी ढांचे पर दबाव पड़ेगा. वे सवाल करते हैं कि जब केवल 1500 परिवार ही प्रभावित हैं, तो परियोजना 7500 परिवारों को क्यों समायोजित कर रही है? पूरी परियोजना को रोकने की मांग में गरीबों के खिलाफ स्पष्ट पूर्वाग्रह है। 

कुछ लोग पूरी आबादी के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए प्रभावित परिवारों के लिए रहने योग्य विकल्प खोजने का सुझाव दे रहे हैं। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि योजना अडानी के स्वामित्व वाले हवाई अड्डे के पास झुग्गीवासियों को स्थानांतरित करने की है। कुर्ला ईस्ट में, मुख्य रूप से कामकाजी वर्ग के परिवारों, अल्पसंख्यकों और निम्न-मध्यम वर्ग के निवासियों द्वारा बसाए गए उपनगर ने अडानी को डेयरी भूमि को आवंटित करने का विरोध किया है। वे चाहते हैं कि इस ज़मीन पर, जिसमें बहुत सारे पेड़ हैं, एक बगीचा और खेल का मैदान बनाया जाए, एक ऐसी सुविधा जो उन्हें और उनके बच्चों को लंबे समय से नहीं दी गई है। भांडुप, कांजुरमार्ग, विक्रोली और घाटकोपर के पर्यावरण कार्यकर्ता नमक क्षेत्र की जमीन अडानी को देने के फैसले का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनकी मुख्य चिंता मैंग्रोव की सुरक्षा करना है जो विभिन्न समुद्री और प्रवासी पक्षियों के लिए आवास प्रदान करते हैं, साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि मुंबई में आबादी के समग्र लाभ के लिए बाढ़ का पानी प्रभावी ढंग से निकल सके। 

इन सभी परियोजनाओं की सबसे खास बात है कि मुंबई के नए स्लम भूमि-स्वामी अडानी हैं। हालांकि, प्रत्येक परियोजना को विभिन्न समूहों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ‘धारावी बचाओ समिति’ ने मुलुंड निवासियों की मांग को अभिजात्य और बहिष्कारवादी माना, जो अन्य बातों के अलावा, नमक की भूमि पर धारावी झुग्गी निवासियों को बसाने का विरोध कर रहे थे। 

मुलुंड निवासियों का मानना था कि इतनी बड़ी आबादी को ज़मीन की एक संकरी पट्टी में बसाने से उन्हें भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। संघर्षों को अलग रखने के लिए निहित स्वार्थों द्वारा इन मतभेदों का फायदा उठाया गया। हालांकि, जब ‘धारावी बचाओ समिति’ ने स्पष्ट किया कि वे भी नियोजित उजाड़ का विरोध करते हैं और धारावी में उसी भूमि पर पुनर्वास चाहते हैं, तो एक आम दुश्मन, अडानी के खिलाफ व्यक्तिगत संघर्षों को एकजुट करने के प्रयास शुरू हुए।  

विभिन्न इलाकों का प्रतिनिधित्व करने वाले 50 कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक हुई, और वे ‘मुंबई बचाओ समिति’ बनाने और प्रत्येक समूह की मुख्य मांगों को शामिल करके एक साथ लड़ने के लिए आम सहमति पर पहुंचे. वे संयुक्त आंदोलन के लिए चरण-दर-चरण योजना विकसित करने के लिए मिलकर काम करेंगे। 

Monday, December 12, 2022

पंजाब में उद्योगपतियों के खिलाफ लंबित 500 से अधिक आपराधिक मामले

 सोमवार 12 दिसंबर 2022 अपराह्न 03:04 बजे 

श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन का मुद्दा फिर गरमाया 

चंडीगढ़: 12 दिसंबर 2022: (कार्तिका सिंह//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

राजनीतिक दल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और दुसरे सरमाएदारों से अक्सर चंदा लेते रहते हैं। कभी छुप कर कभी किसी तरह बता कर भी। इस तरह के चंदे से चलने वाले दलों और इस तरह के चंदे से बनी सरकारों और दलों से  आम गरीबों और श्रमिकों के कल्याण की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस तरह के अमीरों और सेठों को भी रवीश कुमार ने एनडीटीवी छोड़ने के बाद आड़े हाथों लेते हुए गोदी सेठ का नाम दिया है जो सरकार की गोदी में बैठ कर अपने कारोबार चलाते हैं। ऐसे गोदी सेठ पंजाब में भी देखे जा सकते हैं। 

राजनीतिक दलों का यह दोहरा चरित्र लंबे समय से चला आ रहा है। ऐसी पार्टियां और ऐसी सरकारें किसी न किसी बहाने से केवल पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का ही पक्ष लेती हैं। मज़दूरों का खून निचोड़ कर अमीर बनने वाले इन पूंजीपतियों के खिलाफ मज़दूरों का गुस्सा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। इस गुस्से को नियंत्रित रखने में भी ट्रेड यूनियन लहर काफी कुछ सकारत्मक करती है। मज़दूरों के प्रति ईमानदार ट्रेड यूनियनों ने कई बार इस अन्याय के प्रति गंभीरता भी दिखाई है और साहसिक कदम उठाए हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर जन कार्रवाई के बिना यह सब न कभी बेनकाब होगा और न ही कभी पूरी तरह बंद होगा।

सबसे पुराने ट्रेड यूनियन संगठन "एटक" यानी "ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काउंसिल" की पंजाब स्टेट कमेटी ने इस तरह का चलन जारी रहने का गंभीर नोटिस लिया है और इस पर गहरी चिंता भी व्यक्त की है। एटक की राज्य कमेटी ने मांग की है कि इस चलन पर तुरंत रोक लगाई जाए और उद्योगपतियों के खिलाफ लंबित मामलों का तुरंत फैसला किया जाए। इसके साथ ही एटक ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि ऐसे लोगों को कानून का उल्लंघन करने पर सख्त सजा दी जानी चाहिए और वह भी बिना किसी देरी के।

एटक ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन के कारण पंजाब के उद्योगपतियों के खिलाफ विभिन्न अदालतों में 500 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। फैक्ट्रीज एक्ट 1948, ईएसआईसी (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) और कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) जैसे विभिन्न कानूनों की धज्जियां उड़ाकर श्रमिकों की लूट के कारण फंसे उद्योगपतियों ने पंजाब सरकार से अब माफी का अनुरोध किया है। 

भारतीय उद्योग मंडल पंजाब राज्य परिषद के अध्यक्ष अमित थापर ने पंजाब के मुख्यमंत्री से इन सभी आपराधिक मामलों से उद्योगपतियों को बरी करने के लिए पहल करने की अपील की है। उद्योगपतियों के इस कदम का पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़ और महासचिव निर्मल सिंह धालीवाल ने तीखा विरोध किया है। 

कामरेड निर्मल सिंह धालीवाल ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए इस साज़िशी मांग को आड़े हाथों लिया है और मांग की है कि सरकार अपने श्रम विभाग का प्रयोग कर के कानूनों की धज्जियां उड़ाने वाले इन लोगों के खिलाफ प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करे। एटक ने स्पष्ट कहा कि इन लोगों की बेइंसाफी भरी हरकतों का शिकार बने भोले-भाले मजदूरों को न्याय दिया जाए। 

दोनों ट्रेड यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया है कि पिछली सरकारों की मज़दूर  विरोधी नीतियों के चलते इन लोगों ने श्रम विभाग के साथ मिलकर पूरी तरह से मज़दूरों को लूटा है और पिछले 10 सालों से न्यूनतम वेतन में भी कोई बढ़ोतरी नहीं की है। एटक के दोनों नेताओं ने कहा है कि अब उद्योगपति केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिता का सहारा लेकर आरोपों से माफी की मांग कर रहे हैं। 

उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की है कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कदम उठाना है तो सबसे पहले मज़दूरों का शोषण करने वालों के खिलाफ सख्त निर्णय लेकर कर्मचारियों व कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान किया जाए। सरकार को उन्हें रियायतें देने के किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए। 

अब देखना होगा कि एटक की इस जोरदार मांग का पंजाब सरकार पर क्या असर पड़ता है?पंजाब  सरकार पीड़ित मजदूरों को न्याय देती है या उद्योगपतियों को माफी, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा। अमीरों का धन और गरीबों का वोट दोनों ही राजनीतिक दलों के लिए सदा से ही आवश्यक रहे हैं। क़ज़ा आज के आधुनिक युग में यही सब चलेगा?

तमाम दबावों के बावजूद मज़दूर श्रमिक और अन्य कार्यकर्ता आज भी साहिर लुधियाना साहिब के इस गीत के प्रति समर्पित हैं।

हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे!

इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!

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Friday, January 7, 2022

मोदी की सुरक्षा-इतना हो हल्ला क्यों?--*पावेल कुस्सा

6th January 2022 at 23.56 PM

यह सारा मसला एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश है


मोदी के पंजाब से बेरंग वापस जाने पर
खड़ा किया जा रहा हो-हल्ला, भाजपा की तरफ से मुद्दों को प्रतिगामी रंगत देने का प्रचलित चलन है। प्रधानमंत्री की राजनीतिक नमोशी को देश की सुरक्षा का मसला बनाने की भरकस कोशिश की जा रही है, और ऐसा हमेशा की तरह पूरी बेशर्मी से किया जा रहा है। भाजपाई प्रवक्ता देश के टी वी चैनलों पर चिंघाड़ रहे हैं- देश के अपमान की बातें कर रहे हैं और पंजाब में राष्ट्रपति राज लगाने का आह्वान कर रहे हैं। यह सारा मसला एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश है।
लेखक पावेल कुस्सा 
सबसे पहले तो यह मोदी की बुरी तरह विफल हुई रैली को ढकने का प्रयत्न है।
प्रधानमंत्री के लिए चुनावों में सहानुभूति बटोरने का प्रयास है। 'मोदी ही राष्ट्र है' के दम्भी वृतांत को मजबूत करने की कोशिश है। अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी-पंजाब कांग्रेस को मात देने की कोशिश है।
हालांकि यह हकीकत जग जाहिर है कि प्रधानमंत्री को किसी ने पूर्वन्योजित फैसला करके नहीं घेरा, बल्कि खुद उसकी अपनी तरफ से ही ऐन मौके पर सड़क मार्ग का च्यन किया गया था। जिस कारण उसे मार्ग में हो रहे प्रदर्शनों के समीप 10 मिनट के लिए रुकना पड़ा। किसी ने प्रधानमंत्री के नजदीक जाने की कोशिश तक भी नहीं की। फिर भी अगर प्रधानमंत्री को अपने ही लोगों से इतना खतरा महसूस होता है तो यह उसके के लिए सचमुच ही सोच विचार का मसला बनना चाहिऐ।
इस 10 मिनट की रुकावट को सुरक्षा दृष्टि से बहुत ही खतरनाक घटना बनाकर पेश किया जा रहा है ताकि बुरी तरह विफल रही रैली की तस्वीर को इस सारे दृश्य से ओझिल किया जा सके। मोदी के वापस जाने का फैसला उसकी रैली को पंजाब के लोगों द्वारा नाकार दिए जाने के कारण करना पड़ा| पर उसने जाते-जाते अपनी घोर प्रतिगामी प्रवृत्ति के चलते नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। शरीरक तौर पर तो किसी ने उसे छुआ तक भी नहीं है और ना ही ऐसा करने की किसी की तरफ से कोई मंशा व्यक्त हुई है।
सही बात तो यह है कि मोदी अपनी राजनीतिक पिछाड़ को सहन नहीं कर पा रहा। इस सारी बहस में प्रधानमंत्री की सुरक्षा के तकनीकी नुक्तों के अलग-अलग पहलुओं पर जवावदेही तय करने का अपना स्थान है| पर यह लोगों के रोष प्रदर्शन के लोकतान्त्रिक अधिकार से ऊपर नहीं है| सबसे पहले लोगों के रोष प्रदर्शन के लोकतान्त्रिक अधिकार को बुलंद किया जाना चाहिए।
देश के प्रधानमंत्री के आगे अपना रोष व्यक्त करना लोगों का बुनियादी लोकतान्त्रिक अधिकार है। अगर लोग पूर्वन्योजित कार्यक्रम के तहित भी 2 घंटे मोदी की कार को घेरकर नारेबाजी कर देते तो भी कोई आसमानी बिजली नहीं गिर जाने वाली थी। लोग अपने लोकतान्त्रिक अधिकार को ही लागू कर रहे होते।
किसान आंदोलन अभी स्थगित किया गया है, खत्म नहीं हुआ। किसान दिल्ली के बॉर्डर से उठ गए हैं यद्यपि एम.एस.पी. और केसों को रद्द किए जाने सहित सारे मुद्दे अभी भी उसी तरह खड़े हैं और इन मसलों पर कोई भी बात ना सुनने वाली मोदी सरकार का रवैया सामने आ चुका है।
इस तरह की स्थिति में अगर किसान अपना रोष ना व्यक्त करें तो और क्या करें। यह बात प्रधानमंत्री को पंजाब में आने से पहले सोचनी चाहिए थी पर वह तो आया ही 'पंजाब विजय' के लिए था। वह तो केंद्रीय कोष पर काबिज होने के अहंकार के रथ पर सवार हो पंजाबियों को खरीदने आया था।
यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मसला नहीं है, बल्कि उसकी लोगों के प्रति जवाबदेही का मसला है। अगर वह पंजाब के लोगों को सचमुच की खुशहाल जिंदगी के पैकेज देने के ऐलान करने आ रहा था तो क्यों वही लोग उसके विरोध में सड़कों पर थे। तो उसको प्रश्न अपनी सुरक्षा के मसले में नहीं, बल्कि उसके लोगों के साथ रिश्ते के मामले में उठना चाहिए था। जब प्रधानमंत्री मोदी फिरोजपुर की तरफ जा रहा था, ठीक उसी समय पंजाब के शहरों और कस्बों में उसके पुतलो को फूंका का जा रहा था। गांव देहात के सीधे साधे लोगों को बसों में भर कर फिरोज़पुर ले जाना भाजपाइयों के लिए मुश्किल क्यों हो गया था!
प्रधानमंत्री की रैली बुरी तरह खाली रही।
जो कुछ हुआ वह-
कारपोरेटों से उसकी वफादारी का नतीजा है।
लखीमपुर खीरी में कुचल दिए गए किसानों की शहादतों का नतीजा है।
साल भर किसानों को दिल्ली की सड़कों पर परेशान करने का नतीजा है।
700 से ऊपर किसानों की जान लेने का नतीजा है।
अभी तक भी कारपोरेटों को मुल्क लुटाने की नीतियों को लागू करते रहने का नतीजा है।
लोगों को झूठे सुहावने ख़ुआब दिखाकर पंजाब विजय कर लेने की ख्वायिशें पालने का नतीजा है।
भाजपा की इस हाहाकार के दरमियान हमें डटकर कहना चाहिए कि यह धरती और इसके मार्ग हमारे हैं। हमारी जिन्दगीओं में तबाही मचाने वाले हाकिमों को इन रस्तों पर रोकना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।
हमारी इज्जत और प्रधानमंत्री की इज्जत एक नहीं है। इसमें हमेशा से टकराव है। उसने तो हमेशा ही देश के लोगों की शान-इज्जत को अपने पैरों तले रौंदा है। और इस इज्जत को पैरों तले रौंदे जाने के बारे में सवाल करने के लिए लोग उसके सामने भी आएंगे और उसके मार्ग भी रुकेंगे। सभी इंसाफ पसंद और जागृत देशवासियों को भाजपा की इस झल्लाई महिम का डटकर विरोध करना चाहिए। लोगों के विरोध वयक्त करने के लोकतान्त्रिक अधिकार को डट कर बुलंद करना चाहिए। और इस को सुरक्षा मसले में प्रवर्तित कर भटकाने की कोशिशों का पर्दाफाश करना चाहिए। किसान संघर्ष की जय-जय कार करनी चाहिए, और इसकी हमायत करनी चाहिए।

*पावेल कुस्सा वाम लहर में काफी समय से सक्रिय हैं और सुर्ख लीह नामक पत्रिका से जुड़े हुए भी हैं
इसे सोशल मीडिया पर 6th January 2022 at 23.56 PM को पोस्ट किया गया।

Thursday, June 17, 2021

निडरता, प्रतिबद्धता और सादगी की मूर्ती थे कामरेड डांग

 जब पंजाब के मुख्यमंत्री को हराकर मंत्री बना था एक कामरेड

जब पंजाब में गोली का राज था उन दिनों सरकारी आतंकवाद और पुलिसिया जबर की खुलकर मुखालफत करना आसान नहीं था लेकिन कामरेड सत्यपाल डांग ने लगातार यह दलेरी भरा किया। इस विरोधता को  खुल कर व्यक्त करने वाले कामरेड डांग को उनकी बरसी पे याद करते हुए साथी  रौशन सुचान ने ऐसी बातें सामने रखीं हैं जो अब कहीं नज़र ही नहीं आतीं। आखिरी सांस तक न कामरेड डांग ने सादगी छोड़ी और न ही सिद्धांत। देखिए उन्होंने कितनी बड़ी मिसाल कायम की। 

कामरेड सत्यपाल डांग का जन्म 4 अक्टूबर 1920 को गुजरांवाला, संयुक्त पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ। अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई लाहौर में पूरी की। सत्यपाल डांग भारत के स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और कम्युनिस्ट नेता थे। पंजाब राज्य विधान सभा के चार बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी CPI की ओर से विधायक चुने गए। पंजाब में संयुक्त मोर्चा की सरकार में जस्टिस गुरनाम सिंह मुख्यमंत्री बने तो कामरेड सत्यपाल खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री बने। जो लोग आतंकग्रस्त पंजाब के उस दौर के अवाम की तरफ खड़ी शख्सियतों से रत्ती भर भी वाकिफ हैं, यकीनन उन्हें कॉमरेड सतपाल डांग का नाम बिलकुल नहीं भूला होगा। 

उन्होंने फिरकपरस्ती,आतंकवाद और सरकारी आतंकवाद के बीच अडिग खड़े रहकर निर्भीकता से अथाह संघर्ष किया। बेशक वो सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के कार्ड होल्डर थे लेकिन धुर दक्षिणपंथी आरएसएस, भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के दिग्गज भी उनका गहरा सम्मान करते थे और उनके तर्कों में आस्था रखते पाए जाते थे। भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी शामिल होकर ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) का नेतृत्व किया। सन 1998 में समाज में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया। यूं तो कामरेड डांग सम्मानों  ऊंचे उठ चुके थे।  उनका एक वशिष्ठ स्थान लोगों के दिलों में बन चुका था। फिर भी पद्म भूषण का सम्मान उनके कार्यों की शासकीय एक स्वीकृति था। 

कामरेड डांग अपने छात्र जीवन के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन  में शामिल हुए। उन्होंने शुरू में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वामपंथी विंग में काम किया लेकिन बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की बॉम्बे शाखा में 1940 में  एक सक्रिय कार्यकर्ता बनकर आज़ादी आंदोलन में भी भाग लिया।  केवल 25 वर्ष की युवा आयु में मुंबई में 1943 को देश के प्रथम छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव बने और प्रथम पार्टी कांग्रेस में भाग लिया। सन 1952 में AISF की छात्रा नेत्री बिमला से शादी की। 

भारतीय स्वतंत्रता के बाद कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जब प्रतिबंध हटा लिया गया तो डांग दंपति को पार्टी ने अमृतसर क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी। सत्यपाल डांग अमृतसर के पास एक गांव छेहरटा साहिब में बस गए और 1953 में हुए पहले स्थानीय चुनाव में छेहरटा नगर पालिका के अध्यक्ष बने। लोगों के साथ जुड़ कर लोगों के लिए सत्ता के सदुपयोग का यह महत्वपूर्ण पायदान था।  

अगले डेढ़ दशक तक डांग छेहरटा साहिब की स्थानीय राजनीति से जुड़े रहे, कई बार नगरपालिका का नेतृत्व करते हुए एक मॉडल टाउन की तरह विकसित करने के लिए काम किया। सन 1967 में उन्हें पार्टी द्वारा राज्य विधानसभा के चुनावों में भाग लेने के लिए कहा गया और उन्होंने अमृतसर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से सफलतापूर्वक चुनाव लड़कर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर को भारी मतों से हराया। 

संयुक्त मोर्चे को पंजाब में बहुमत मिला और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार में शामिल हुई। जस्टिस गुरनाम सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने तो डांग खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री  बने।  उन्होंने मंत्री के बंगले का उपयोग करने से इनकार कर दिया और मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान एमएलए छात्रावास में रहना पसंद किया। उन्होंने 1969, 1972 और 1977 में हुए अगले तीन विधान सभा चुनावों में इस सीट को बरकरार रखा लेकिन 1980 के चुनाव में सेवा राम अरोड़ा से हार गए, लेकिन उनकी पत्नी बिमला डांग 1982 में फिर से सीट हासिल कर सकीं।

वर्ष 1980 के दशक में पंजाब में खालिस्तान आंदोलन हुआ तो डांग अलगाववाद और सरकारी ज़ुल्म दोनों का बराबर विरोध करते रहे। आतंकवादियों ने उन्हें अपनी हत्यारी हिटलिस्ट में शिखर पर रखा तो हुकूमत भी उनसे खौफज़दा रहती थी। ऐसे रहनुमा विरले ही हुए हैं जिनका समूचा जीवन सियासतदानों के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने दो पुस्तकें भी प्रकाशित कीं, पंजाब में आतंकवाद, राज्य धर्म और राजनीति। पंजाब और कश्मीर की राजनीति के संदर्भ में धर्म और राजनीति पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट। सतपाल डांग आतंकवाद के काले साए वाले पंजाब के सही मायनों में लोकनायक थे। साहस की अद्भुत जिंदा इबारत। 

इसी बीच सूबे में हिंसक अलगाववादियों ने पैर पसारने शुरू किए थे तो उसी वक्त सतपाल डांग ने उन्हें बेखौफ ललकारना शुरू किया था और पंजाबी समाज पर भविष्य में आने वाले खतरों से आगाह करना भी ज़रूरी समझा। वह पहले सियासतदान थे जिन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि हत्या, असहिष्णुता और सांप्रदायिकता की नीतियों पर चलने वालों को तत्काल नहीं रोका गया तो यह भस्मासुर बन जाएंगे और भारतीय राज्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती। इतिहास गवाह है कि ऐसा ही हुआ। आतंकियों ने उन्हें अपनी हिटलिस्ट में तभी शुमार कर लिया था।

खतरे के मद्देनजर पुलिस और सुरक्षाबलों ने उन्हें तगड़ी सुरक्षा-छतरी मुहैया करवाई लेकिन वह इस सबसे बेपरवाह रहे। अलबत्ता इन पंक्तियों को लिखने वाले पत्रकार से बातचीत में उन्होंने इतना जरूर कहा था कि जानबूझकर फिरकापरस्त तत्वों के हाथों मर जाना समझदारी नहीं है बल्कि ज़िंदा रह कर और मस्तिष्क का इस्तेमाल करके लोकहित में उनका मुकाबला अपरिहार्य है। 

बहुतेरे राजनेता तब भी हासिल सुरक्षाा व्यवस्था को घमंडी तमाशे तथा रौब-दाब का जरिया माना करते थे। जीवन भर कॉमरेड डांग के पास खुद का कोई वाहन नहीं रहा। कभी था तो एक साइकिल। बावजूद इसके कि पंजाब सरकार में प्रभावशाली महकमे के मंत्री रहे और दशकों नगर पालिका की अगुवाई की। पहले-पहल उनकी हिफाजत सुनिश्चित करने का ऑर्डर लेकर उनके यहां गए सुरक्षाकर्मी हैरान रह गए कि जिस शख्स को उन्हें ‘गॉर्ड’ करना है, उसके पास अपना कोई निजी वाहन तक नहीं।

बाद में उन्हें समझ आया कि कॉमरेड ‘अति विशिष्ट’ तो हैं लेकिन सरकारी अर्थों वाले ‘वीवीआइपी’ कतई नहीं। सतपाल डांग और उनकी पत्नी कॉमरेड विमला डांग पहले से अंतिम दिन तक सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी जीप में पीछे बैठते रहे। तब भी जब उन्हें रोजाना सौ के करीब जानलेवा धमकियों की चिट्ठियां मिलती थीं और बीसियों फोन आते थे। फोन के करीब होने पर हर कॉल वह खुद सुनते थे। हर धमकी के जवाब में वह कहा करते थे कि खौफजदा करके उन्हें खामोश करना नामुमकिन है। हर खत का जवाब देना उनकी फितरत थी। लेकिन धमकी-पत्रों का जवाब इसलिए नहीं दे पाते थे कि प्रेषक-पता गायब होता था। हालांकि ऐसे बेनामी पत्रों का जवाब वह अखबारों मे लेख लिखकर या सार्वजनिक मंचों से भाषणों के जरिए दिया करते थे। 
सतपाल डांग ऐसे विलक्षण नेता थे जो हर हत्याकांड के बाद मौके पर सपत्नीक पहुंचते थे। खतरा और मौसम कैसा भी हो। दिन हो या रात। यह सिलसिला नहीं टूटा। कभी-कभी एक घटनास्थल से लौटकर छर्हटा, अमृतसर स्थित अपने आवास पहुंचते तो दूसरी किसी वारदात की खबर मिल जाती। उसी वक्त उधर के लिए कूच कर देते। शेव का समय नहीं मिल पाता था, इसलिए दाढ़ी रख ली। पंजाब में आतंकवाद के दौर में सामुदायिक तनाव नहीं फैला तो इसके पीछे डांग दंपति की इन ‘शोक-यात्राओं’ का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसा कोई दूसरा सियासतदान न तब था, न अब है जो पीड़ित लोगों के बीच इतना ज्यादा विचरा हो। जख्मों पर मरहम लगाने के लिए।

उन्होंने सरकारी आतंकवाद और पुलिसिया जबर की भी खुलकर मुखालफत की। जमकर बोले और लिखा। उनका मानना था कि आतंकवाद किसी भी लिबास में हो, निंदनीय और अस्वीकार्य है। सीपीआई की एक कार्यकर्ता अमृतसर के करीब ग्रामीण इलाके के सरकारी अस्पताल में नर्स थी। पुलिस एक नौजवान की देह लेकर आई कि यह आतंकवादी है, मुठभेड़ में मारा गया, पोस्टमार्टम किया जाए। एसएचओ दो घंटे के बाद रिपोर्ट लेने आने की बात कहकर चला गया। मौके के डॉक्टर ने पाया कि नौजवान की सांसें चल रही थीं। पोस्टमार्टम की बजाए इलाज शुरू हो गया। सीपीआई कार्यकर्ता नर्स ने अस्पताल के फोन से कॉमरेड डांग को घटना की बाबत बताया।

उसी वक्त डांग साहब ने टेलीग्राम और फोन के जरिए अपनी इस आशंका के साथ राज्यपाल (पंजाब में तब राष्ट्रपति शासन था), हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अमृतसर के पुलिस- प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित किया कि कहीं पुलिस उस नौजवान को मार न दे। आधी रात का समय था। किसी ने तत्काल गौर नहीं किया और उधर थानेदार अस्पताल में पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा ‘शव’ लेने आ गया। कथित आतंकी नौजवान को जिंदा पाकर उसने उसी वक्त अपनी रिवाल्वर की तमाम गोलियां जिंदा बचे नौजवान की छाती में उतार दीं और अस्पताल स्टाफ से पोस्टमार्टम करने को कहा। यह एक हौलनाक असाधारण घटना थी। सतपाल डांग ने ‘सिस्टम’ के खिलाफ मोर्चा खोला और कई ख्यात अखबारों में इस प्रकरण पर लिखा।

अंग्रेजी दैनिक ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित उनकी टिप्पणी का हाईकोर्ट ने गंभीर संज्ञान लिया और न्यायिक आदेश की हिदायत जारी की। शायद देश में यह अपने किस्म का पहला मामला था कि किसी अखबारी लेख या रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च अदालत कार्यवाही करे। बाद में ऐसे कितने ही मामले हुए। सतपाल डांग जहां विपथगा आतंकवादियों के मुकाबिल थे वहीं सरकारी आतंकवाद का भी उन्होंने डटकर विरोध किया। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के लिए दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि, ‘एक किस्म का आतंकवाद दूसरे किस्म के आतंकवाद बल देता है।’ उन दिनों पंजाब में इतनी तार्किकता और मुखरता से बोलने वाले इक्का-दुक्का ही थे।

डांग दंपति ने लोक प्रतिबद्धता के चलते संतान उत्पत्ति नहीं की। निजी जायदाद नहीं बनाई। सतपाल डांग पंजाब की संयुक्त सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री थे। राजधानी चंडीगढ़ से अमृतसर आने-जाने के लिए बस में सफर करते थे। वह खुद और उनकी पत्नी कई बार विधायक रहीं। दोनों को जो वेतन, भत्ते और पेंशन मिलती थी, उसे वे पार्टी (सीपीआई) को दे देते थे। फिर पार्टी उस पैसे में से उन्हें गुजारा-भत्ता देती थी, जिसे वामपंथी पार्टियों में ‘मिनिमम वेज’ कहा जाता है। इस दंपति को यों ही ‘दरवेश सियासतदान’ नहीं कहा जाता!                                   

सतपाल डांग महज सियासतदान ही नहीं थे बल्कि आला दर्जे के चिंतक, विद्वान और लेखक भी थे। भारत सरकार ने उन्हें नागरिक सम्मान पद्म भूषण से 1998 में सम्मानित किया।   15 जून 2013 को 92 साल की उम्र में उनके भतीजे के अमृतसर घर में निधन हो गया

-रोशन सुचान

यदि आपके पास भी  इसी तरह की यादें संभाली हुई हों तो उन्हें आज  प्रकाशनार्थ प्रेषित करें। 

Email इस प्रकार है- medialink32@gmail.com


Monday, April 19, 2021

मई दिवस मनाने की तैयारियों का अभियान जोरों पर

 मई दिवस की स्मृति फिर जगाएगी नया जादू  

Sketch Courtesy: Chicago May Day 

1 मई 2021 को ‘मज़दूर दिवस सम्मेलनों में पहुंचने के निमंत्रण 

कारख़ाना मज़दूर यूनियन और टेक्सटाइल हौज़री कामगार यूनियन द्वारा पर्चा और पोस्टर भी जारी 

लुधियाना: 19 अप्रैल 2021: (कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

पूँजीवाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद! के नारे को एक बार बुलंद करता हुआ श्रमिक वर्गों आज के इस नाज़ुक दौर में एक बार फिर मई दिवस शहीदों की कुर्बानियों को याद दिलाने के लिए सक्रिय है। ये वही शहीद हैं जिन्हों ने निराशा के वक़्त बहुत बड़ी आशा जगाते हुए ऐतिहासिक संघर्ष  किया था। मज़दूर जमात के हाथों में अपने  विजय पताका  इन्हीं शहीदों ने थमाई थी। 

इस बार 136वां अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस उस वक़्त मनाया जा रहा है जब श्रमिक वर्ग के अधिकारों पर डाका डाला जा रहा है। उनके संविधानिक  रहे हैं। उन्हें इंसान से जानवर समझने की  भूल एक बार फिर की जा रही है। श्रमिक वर्ग हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने  फिर से कमरकस कर तैयार है।  

मई  दिवस पर श्रमिक शक्ति याद दिला रही है कि आज घोषणा करने का दिन है कि हम भी हैं इंसान। हमें भी चाहिए बेहतर दुनिया करते हैं ऐलान। इसके साथ ही खुला निमंत्रण है कि 1 मई 2021 को ‘मज़दूर दिवस सम्मेलन’  में पहुँचो। 

 सभी श्रमिकों से विशेष तौर पर कहा गया है कि हमारी सभी मज़दूर भाई-बहनों से अपील है कि 1 मई को काम पर न जाकर मज़दूर पुस्तकालय, #4135, ई.डब्ल्यू.एस. कालोनी, ताजपुर रोड, लुधियाना पर पहुंचे। सुबह 9 बजे शुरू  होने वाले कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर शामिल होना होगा। मज़दूर दिवस सम्मेलन में अधिक से अधिक संख्या में पहुँचो तांकि लुटेरे  बताया जा सके कि हम जाग रहे हैं और इस नए संघर्ष के लिए भी तैयार हैं। 

इस सम्मेलन में क्रांतिकारी नाटक-गीतों का कार्यक्रम भी जोशो खरोश से होगा। इस बार भी 1 मई को मज़दूरों का सबसे बड़ा त्योहार अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस ज़ोरशोर से मनाया जाना है। पहली मई का दिन हर वर्ष मज़दूर वर्ग के लिए नया जोश लेकर आता है। वहीं शोषक पूँजीपतियों के लिए यह दिन ख़ौफ़ बनकर आता है। इस दिन दुनिया के कोने-कोने में मज़दूर क्रांतिकारी लाल झंडे लेकर सड़कों पर उतरते हैं। अपने मज़दूर शहीदों को याद करते हैं, समागम करते हैं, रैलियाँ-जुलूस निकालते हैं, पूँजीवादी लूट, शोषण के खि़लाफ़ मज़दूर वर्ग का संघर्ष आगे बढ़ाने के क्रांतिकारी संकल्प लेते हैं। मज़दूर दिवस की यह शिक्षा है कि मज़दूरों को आज तक एकजुट संघर्ष के जरिए ही सभी हक़-अधिकार मिले हैं, कि राष्ट्र, रंग, धर्म, जाति, भाषा आदि के भेदभाव मिटाकर संगठित संघर्ष के जरिए पूँजीवादी शोषण का खात्मा संभव है। एक दिन यह खत्म हो कर ही रहेगा। 

Courtesy Photo Chicago May Day 
मज़दूरों के ख़ून से लिखी ‘मज़दूर दिवस’ की कहानी एक बार फिर हर दिल और दिमाग में ताज़ा  आवश्यक हो गया है। मज़दूरों का त्योहार अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस आठ घंटे काम का दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आंदोलन से पैदा हुआ था। उन दिनों मज़दूर चौदह से लेकर सोलह-सोलह घंटे तक खटते थे। सारी दुनिया में इस माँग को लेकर मज़दूर जगह-जगह आंदोलन कर रहे थे। भारत में भी 1862 में इस माँग को लेकर कामबंदी हुई थी। 1886 में अमरीका के कई मज़दूर संगठनों ने मिलकर इस माँग पर एक विशाल आंदोलन खड़ा करने का फ़ैसला लिया। यह एक ऐतिहासिक गाथा है। 

एक मई 1886 को अमरीका के लाखों मज़दूरों ने ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे मनोरंजन’ की माँग पर एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 कार$खानों के करीब 4 लाख मज़दूर शामिल थे। शिकागो शहर और आसपास का लगभग सारा काम ठप्प हो गया। इस हड़ताल को कुचलने के लिए पूँजीवादी हुकूमत ने नेताओं को पैसों का लालच दिया। डराया-धमकाया लेकिन कोई हथकंडा काम न आया। फिर 3-4 मई को मज़दूरों के जुटान पर गोलियाँ चलाई गईं, बम फेंके गए। चार मई को हुए बम हमले के दोष में 8 मज़दूर नेताओं पर झूठा मुक़द्दमा चलाया गया। 11 नवंबर 1887 को पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फिशर को फाँसी दी गई। 13 नवंबर को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा में छह लाख से भी ज्य़ादा लोग अपने नायकों को आखिऱी सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े।

मज़दूरों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘दूसरे इंटरनेशनल’  के आह्वान पर सन् 1890 से पहली मई का दिन अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के तौर पर दुनिया के विभिन्न देशों में मनाया जाने लगा। शिकागो के शहीद हुए मज़दूरों और उनके नेताओं ने अपना बलिदान देकर सारी दुनिया के मज़दूरों को पूँजीवादी शोषण-उत्पीडन के खि़लाफ़ संघर्ष के लिए नई प्रेरणा दी। शिकागो के शहीद अमर हो गए।

मज़दूर वर्ग की आवाज़ दबाने के सारे हथकंडे धराशाही हो गए। संघर्ष बढ़ता ही गया। अमरीका ही नहीं, बल्कि दुनिया के कोने-कोने में आठ घंटे कार्यदिवस की माँग मानने के लिए लुटेरे हुक्मरानों को मजबूर होना पड़ा। इतना ही नहीं दुनिया के मज़दूरों के अपने संघर्ष की बदौलत न्यूनतम वेतन, रोज़गार की गारंटी, कार्यस्थलों पर सुरक्षा इंतज़ाम आदि संबंधी अनेकों श्रम अधिकार प्राप्त किए। रूस, चीन जैसे बहुत से देशों में मज़दूरों ने अन्य मेहनतकश जनता के साथ मिलकर शोषणकारी राज ख़त्म करके मज़दूरों का राज कायम करने में भी कामयाबी हासिल की। भले ही आगे बढऩे की समझ की कमी के चलते मज़दूरों के राज वाले ये समाजवादी समाज कायम नहीं रह सके, लेकिन इतना तय है कि मज़दूर वर्ग तमाम जीतों-हारों से सबक़ लेकर फिर से समाजवादी समाज कायम करेगा।

ऐसा है मज़दूर वर्ग के संघर्षों का महान, गौरवमयी इतिहास। मई दिन का इतिहास, शहीदों की क़ुर्बानी और लहू से बना लाल झंडा दुनिया के मज़दूरों को पूँजीवादी लूट, शोषण, अन्याय के बेहद मुश्किल हालातों में, तमाम हमलों, हारों की निराशाजनक हालातों में आगे बढने की प्रेरणा देता रहेगा।

हमें पूँजीवादी हुक्मरानों के नए हमलों के खि़लाफ़ ज़ोरदार संघर्ष छेडना होगा। इस बार मई दिवस का मुख्य मकसद भी यह हम इस बार पहली मई का दिन ऐसे हालातों में मना रहे हैं, जब देशी-विदेशी पूँजीपतियों की भारत की अब तक की सबसे बड़ी दलाल मोदी सरकार ने आठ घंटे कार्यदिवस के क़ानूनी श्रम अधिकार पर बड़ा हमला कर दिया है। यही नहीं न्यूनतम वेतन, यूनियन बनाने, हड़ताल करने के अधिकार समेत अन्य बहुत से क़ानूनी श्रम अधिकारों को छीना जा रहा है। ऐसा मोदी सरकार ने 29 पुराने श्रम क़ानूनों की जगह 4 नए श्रम क़ानून (कोड) लाकर किया है। अगर मज़दूर वर्ग ने नए श्रम क़ानूनों के खि़लाफ़ निर्णायक संघर्ष छेडऩे में कामयाबी हासिल न की, तो ये काले क़ानून लागू हो जाएँगे और मज़दूर वर्ग की पहले से भी अधिक ग़ुलामी के एक नए दौर की शुरुआत होगी।

अर्थव्यवस्था से सरकारी निवेश निकालकर जनता को मुनाफे के भूखे भेडिय़ों के सामने परोसा जा रहा है। इसी नीति के अंतर्गत अनाज ख़रीद, रेलवे, बिजली बोर्ड, सरकारी कार$खानों, बैंकों का निजीकरण हो रहा है। कृषि क़ानून निजीकरण की इसी नीति का हिस्सा हैं। जनविरोधी नीतियों के चलते महँगाई आसमान छू रही है। पंजाब और अन्य राज्यों की विभिन्न पार्टियों की सरकारें भी ऐसी ही नीतियों धड़ाधड़ लागू कर रही हैं।

पंजाब सरकार ने पूँजीपतियों को 479 नियम-शर्तें लागू करने से छुटकारा दिला दिया है। इससे न सिर्फ मज़दूरों की आर्थिक लूट बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक हादसे भी बढ़ेंगे।

पिछले साल से लगातार हुक्मरानों का कोरोना ड्रामा जारी है। जनता को गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, मानसिक परेशानियों के और भी गहरे गढ्ढे में धकेला जा रहा है। कोरोना के बहाने लॉकडाउन और अन्य नाजायज़ पाबंदियाँ थोपकर जनता के अधिकारों को बर्बरतापूर्वक कुचला जा रहा है।

अब देश के मज़दूरों-मेहनतकशों को बड़े स्तर पर समझ आने लगा है कि भाजपा-आर.एस.एस. ने जो धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाई है, उसका असल मक़सद क्या है! ‘मुँह में राम-राम, बग़ल में छुरी’  वाली इस मोदी हुकूमत की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति सबके सामने है। इसका पूँजीपरस्त घिनौना चेहरा अब एकदम नंगा हो चुका है। अब तो ये सी.ए.ए., एन.पी.आर., एन.आर.सी. लाकर करोड़ों ग़रीबों (जिसमें सभी धर्मों के ग़रीब शामिल होंगे) की नागरिकता छीनने की तैयारी कर चुके हैं। भारत की तमाम इंसाफ़पसंद जनता को, मज़दूरों-मेहनतकशों के दुश्मन, इंसानीयत के दुश्मन, जनता के जनवादी अधिकारों, आज़ादी के दुश्मन इन फासीवादी हुक्मरानों का तख़्तापलट करने के लिए आगे आना होगा। दुनिया के मज़दूर आंदोलन का यह सबक़ है कि संसद-विधानसभा के चुनावी खेल से पूँजीवादी हुक्मरानों का कुछ बिगडऩे वाला नहीं। इतिहास का सबक़ है कि एकजुट संघर्ष के ज़रिए ही ऐसा संभव है।

ऐसे समय में जब पूँजीवादी हुक्मरान जनता के मुँह से रोटी का आखिऱी निवाला भी छीन लेने पर आमादा है चुप रहना, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना बेहद घातक सिद्ध होगा। इसलिए आओ, मज़दूर दिवस के शहीदों का थमाया संघर्षों का झंडा बुलंद करें। पूँजीवादी हुक्मरानों को निर्णायक शिकसत देने की ज़ोरदार तैयारियों में जुट जाएँ।

इंक़लाबी सलाम करते हुए कारख़ाना मज़दूर यूनियन और टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन सभी को इस सम्मेलन में पहुंचने  निमंत्रण देती है। 

इस संबंध में और विवरण लिया जा सकता है इन नंबरों पर सम्पर्क करके: 9888655663, 9646150249

Saturday, March 27, 2021

मज़बूती के लिए गीत संगीत के जादू को दोबारा जगायेगा वाम

झारखंड में लिए गए अहम फैसले को अन्य राज्य भी शीघ्र अपनाएंगे 

रामगढ़ (झारखंड): 27 मार्च 2021: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

वाम आंदोलन को मज़बूत करने और इस जन काफिले में नए लोगों को एक बार फिर तेज़ी से लाने के लिए गीत, संगीत, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों का उल्लेखनीय योगदान रहा है। मैक्सिम गोर्की के मां को पढ़ कर न जाने कितने ही युवा  वाम आंदोलन की तरफ खिंचे चले आए थे।
पंजाबी में प्रीतलड़ी नामक पत्रिका ने भी युवाओं को वाम लहर से परिचित भी कराया और।  अमरजीत गुरदासपुरी साहिब के गीतों ने भी  सादगी  एक गहरी चेतना जगाई और इसे विकसित भी किया। जनाब तेरा सिंह चन्न ने तो एक तूफ़ान  किया। इसी तरह चुंबकीय शख्सियत शीला दीदी और उनका परिवार भी इसी क्षेत्र में जुटा रहा। अब भी संजीवन, इंद्रजीत रूपोवाली,अमन भोगल और बहुत से अन्य लोग इस परम्परा को बहुत सी कठिनाईओं के बावजूद आगे बढ़ा रहे हैं।
गीत संगीत का जादू अभी तक वाम आंदोलन के विभिन्न अभियानों का एक सक्रिय हिस्सा है। आयोजन देश भगत हाल जालंधर में हो या फिर टिकरी या सिंघु बॉर्डर पर गीत संगीत वहां मौजूद श्रोताओं और दर्शकों को अपने  विचारों के साथ बाँधने में पूरी तरह सफल रहता है। अब एक बार फिर अभियान को तेज़ करने का निर्णय लिया गया है झारखंड में। निश्चय ही इस निर्णय अन्य हिस्सों में भी फैलाया जायेगा। झारखंड में वाम के सक्रिय नेता सुशील स्वतंत्र इसे लेकर बेहद उत्साह में भी हैं।
रामगढ़ (झारखण्ड) से आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मंजूर भवन, रामगढ़ में जनवादी गीत कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का उद्देश्य पार्टी के कार्यकर्ताओं को क्रांतिकारी और जनवादी गीतों का प्रशिक्षण देना और सांस्कृतिक मंडली की स्थापना करना था। इससे स्थानीय प्रतिभाओं पहचान भी होगी। कला के क्षेत्र में सक्रिय कलाकारों को जहां  एकजुट होने का सशक्त मंच मिलेगा वहीँ उनकी रोज़ी रोटी के  संसाधन भी बढ़ाये जा सकेंगे।
रामगढ़ वाले इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भाकपा राज्य सहायक सचिव महेंद्र पाठक ने की। कार्यशाला को मुख्य वक्ता के तौर पर संस्कृतिकर्मी उमेश नजीर, सुशील स्वतंत्र, फरजाना, गौतम चौधरी ने संबोधित किया। कार्यशाला को संबोधित करते हुए भाकपा राज्य परिषद के सदस्य सुशील स्वतंत्र ने स्वागत भाषण में कहा कि कम्युनिस्ट आंदोलन में जनवादी गीतों का विशेष महत्व रहा है। कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक जनसंगठन इप्टा से जुड़े कलाकारों की तरफ से आम लोगों से जुड़े हुए गीतों के माध्यम से कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूत किया जाएगा।  सुशील स्वतंत्र ने बताया कि इस मामले में भी  विचारधारा से   कलाकारों का स्वर्णिम इतिहास रहा है। रामगढ़ की धरती कम्युनिस्टों के संघर्ष और शहादत की धरती रही है। इस धरती पर इंकलाब का तराना गाने वालों की मंडली का होना बहुत आवश्यक है। आज का दिन रामगढ़ के लिए ऐतिहासिक दिन है क्योंकि आज के ही दिन 19 मार्च 1940 में रामगढ़ में ‘अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन‘ हुआ था जिनमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में नेताजी ने ऐलान किया था कि ‘सम्पूर्ण आजादी के लिए कोई समझौता नहीं।‘ रामगढ़ की इसी संघर्ष की ज़मीन पर आज के ऐतिहासिक दिन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सांस्कृतिक आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास जरूर सफल होगा। असर अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा।
संस्कृतिकर्मी एवं भाकपा राज्य परिषद सदस्य उमेश नजीर ने कहा कि क्रांतिकारी शायर मखदूम मोहिउद्दीन की याद में आयोजित इस जनवादी गीत कार्यशाला रामगढ़ के कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूती देगी। क्रांतिकारी गीतों ने देश की आजादी में बहुत महत्वपूर्ण योगदान निभाया है। इंकलाबी के होंठों पर तराना न हो तो वो क्रांतिकारी हो ही नहीं सकता। गौतम चौधरी ने कहा कि नाटक और गीतों के माध्यम से जनता के नजदीक पहुंचा जा सकता है। फरजाना ने कहा कि सांस्कृतिक मोर्चे को मजबूत बनाकर हम महिलाओं, नौजवानों और गरीबों को आसानी से लामबंद कर सकते हैं।
अध्यक्षीय भाषण में बोलते हुए महेंद्र पाठक ने कहा कि रामगढ़ भाकपा से जुड़े संस्कृतिकर्मियों का केंद्र बनेगा। रामगढ़ में सांस्कृतिक आंदोलन को साथ लेकर कम्युनिस्ट आंदोलन आगे बढ़ेगा। नए गीत लिखे जाएंगें, स्थानीय समस्याओं पर नाटक तैयार किये जायेंगे और लोगों को जागरूक बनाया जाएगा। लइयो इप्टा के साथियों ने कार्यशाला में जनवादी गीतों का प्रशिक्षण उपस्थित साथियों को दिया। इप्टा के साथियों दुर्गा, राजू, प्रह्लाद ने क्रांतिकारी गीत गाये और प्रशिक्षण दिया। कार्यशाला में इंकलाबी शायर मखदूम मोहिउद्दीन के जीवन और उनके मशहूर गजलों पर एक घण्टे की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गई। इस अवसर पर बबलू उराँव, कय्यूम मलिक, मेवालाल प्रसाद, महेंद्र पाठक, सुशील स्वतंत्र, गौतम चौधरी, उमेश नजीर, फरजाना, रोहन, किशोरी गुप्ता, नेमन यादव, रविकांत प्रसाद, संजू गोयनका, चन्द्रभानु मुन्ना, सईद अंसारी, तेजन महतो सहित अन्य साथी उपस्थित थे। 

Wednesday, November 25, 2020

लुधियाना के मज़दूर-नौजवान संगठनों का समराला चौक पर रोष प्रदर्शन कल

25th November 2020 at 10:42 AM

 मोदी सरकार की मज़दूर-मेहनतकश विरोधी नीतियों के खिलाफ़ अभियान तेज़ 

लुधियाना: 25 नवंबर 2020:(कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

कल (26 नवंबर) देश भर में मज़दूरों के संगठन मोदी सरकार की देशी-विदेशी पूँजीपतियों के पक्ष में जोर-शोर से लागू की रहीं मज़दूर विरोधी नीतियों के खिलाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं। इसी दिन किसानों के संगठन कृषि कानूनों को रद्द करवाने के लिए दिल्ली कूच कर रहे हैं। नौजवानों-छात्रौं व अन्य तबकों को संगठनों ने भी देश भर के मज़दूरों-मेहनतकशों की आवाज़ में आवाज मिलाने का ऐलान किया है। कारखाना मज़दूर यूनियन, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्ज यूनियन, नौजवान भारत सभा, टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन, लोक एकता संगठन, जमहूरी अधिकार सभा द्वारा लुधियाना के समराला चौक पर 1 से 3 बजे तक संयुक्त रोष प्रदर्शन करके मज़दूर-मेहनतकशों को अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद की जाएगी।
गौरतलब है कि 26 नवंबर को बहुत से संगठन मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने अपने स्टेशनों पर भी रोष प्रदर्शन कर रहे हैं और किसानों के दिल्ली चलो कार्यक्रम में भी सक्रिय हैं। किसानों के साथ मज़दूरों का यह सहयोग संघर्षों की दुनिया में एक नया इतिहास रच रहा है। लॉक डाउन में मज़दूरों का विशाल पलायन भी बहुत बड़ी घटना थी जिसे पारम्परिक मीडिया ने उस तरह नहीं उठाया जिस तरह उठाना चाहिए था। 
उस पलायन के बाद अब संघर्षों के मैदान मैं मज़दूरों का किसानों के साथ कंधे से कंधा मिला कर डट जाना भी एक नया इतिहास रच रहा है।        
26 के रोष प्रदर्शन के बारे में प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कारखाना मज़दूर यूनियन के अध्यक्ष लखविंदर सिंह और इंकलाबी मज़दूर केंद्र के नेता सुरिंदर सिंह ने कहा है कि मोदी सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों के कारण मज़दूरों को भयानक मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं। उनके पास सड़कों पर उतर कर संघर्ष करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। उन्होंने कहा कि 26 को रोष प्रदर्शन के ज़रिए उनके संगठन मज़दूरों की कम से कम तनख्वाह 25 हज़ार करने, कोरोना के बहाने तनख्वाह में नाजायज कटौती रद्द करने, श्रम क़ानूनों में संशोधन रद्द करने, मज़दूर-मेहनतकश विरोधी नये कृषि क़ानून रद्द करने, सरकारी संस्थाओं-सुविधाओं का नीजिकरण बंद करने, बेरोजगारों को रोजगार देने, सब को मुफ़्त खुराक, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए ज़ोरदार तरीके से मांग करेंगे। संगठनों की माँग है कि सरकार उदारीकरण-निजीकरण-संसारीकरण की समूची नीति रद्द करे। इसके साथ ही कृषि क़ानूनों विरोधी जनांदोलन को कुचलने के लिए पंजाब में की गई आर्थिक नाकाबंदी बंद करने, राज्यों के हक बहाल करने, राष्ट्रों का दमन बंद करने, खुदमुख्त्यारी देने की मांग ज़ोरदार ढंग से उठाई जाएगी। सी.ए.ए., एन.पी.आर., एन.आर.सी. रद्द करने, जनवादी अधिकारों के लिए जूझने वाले कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की रिहाई के लिए ज़ोरदार अवाज बुलंद की जाएगी।

          इन सभी जननेताओं ने तमाम मज़दूरों, मेहनतकशों, नौजवानों व अन्य इंसाफपसंद लोगों को 26 नवंबर को रोष प्रदर्शनों में बड़ी से बड़ी संख्या में शामिल होने का आह्वान किया है।

इस प्रेस विज्ञप्ति को जारी किया कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब के अध्यक्ष लखविंदर सिंह और इंकलाबी मज़दूर केंद्र, पंजाब के सुरिंदर सिंह ने। 


Monday, August 10, 2020

ताजपुर रोड पर भी गूंजे मज़दूरों के जोशीले नारे

Monday: 10th August 2020 at 6:26 PM
 टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन ने भी किया रोष प्रदर्शन 
लुधियाना: 9 अगस्त 2020: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::  
आज मज़दूर पुस्तकालय, ताजपुर रोड पर टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन की तरफ से ज़ोरदार रोष प्रदर्शन किया गया। केंद्र सरकार की मज़दूर विरोधी जन विरोधी नीतियों के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के तहत आज रोष प्रदर्शन के उपरांत ई. डब्ल्यू. एस. कॉलोनी, लुधियाना में पैदल मार्च करके पर्चा वितरित किया। इस रोष सभा को संबोधित करते हुए यूनियन अध्यक्ष राजविंदर ने कहा कि भाजपा की हुकूमत में मज़दूरों से श्रम अधिकार छीने जा रहे हैं, जन सुविधाओं को छीना जा रहा है, देश के अंदर बड़े पैमाने पर धार्मिक नफरत फैलाकर लोगों का ध्यान बांट कर देश के सार्वजनिक उपक्रमों को पूंजीपतियों के हाथ कौड़ियों के दाम बेचा जा रहा है, निजीकरण किया जा रहा है, आज समाज का हर तबका केंद्र व राज्य सरकारों की जनविरोधी नीतियों की मार झेल रहा है। पहले ही देश की अर्थव्यवस्था भयंकर मंदी से गुजर रही थी और अब बची खुची कसर कोरोना समय में जबरदस्ती का लॉकडाउन लगाकर लोगों को घरों में बंद कर काम धंधे चौपट कर दिए गए हैं। इस मुसीबत के वक्त भी केंद्र व राज्य सरकार ने मज़दूरों और मेहनतकशों की कोई सार नहीं ली, ऊपर से जनता पर टैक्सों का बोझ बढ़ाया जा रहा है, महंगाई बढ़ रही है। कारखानों में मज़दूरों के साथ मालिक गुंडागर्दी कर रहे हैं।  वेतन पीस रेट घटाने की खबरें आ रही हैं। और बीमारियों के दवा इलाज के लिए कोई पुख्ता प्रबंध नहीं है जिसके चलते मजदूर वक्त से पहले ही डीएम तोड़ रहे हैं। सत्ता उनको मौत बांट रही है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर निजीकरण करके रही सही जन सुविधाओं को छीना जा रहा है, महंगा किया जा रहा है। पक्की नौकरियां खत्म की जा रही हैं ठेका प्रथा लागू की जा रही है। देशी-विदेशी पूंजीपतियों के दबाव के आगे मज़दूरों के हक में बने श्रम कानूनों को पूंजीपतियों के फायदे में बदला जा रहा है। देश में मज़दूरों मेहनतकशों की आवाज़ उठाने वाले, संप्रदायिक सौहार्द कायम करने की बात करने वाले जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूसा जा रहा है। वक्ता ने आगे कहा कि हम मांग करते हैं सरकार लॉकडाउन के समय मज़दूरों-मेहनतकशों के हुए नुकसान की  भरपाई करे, लॉकडाउन के समय का मज़दूरों को पूरा वेतन दिया जाए, कोरोना की आड़ लेकर सरकारी उपक्रमों को बेचना बंद किया जाए, कच्चे कर्मचारियों को पक्का किया जाए, श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी संशोधन रद्द किए जाएं, सभी कारखानों में श्रम कानून लागू किए जाएं, जनता पर टैक्सों का बोझ कम किया जाए और पूंजीपतियों पर महामारी टैक्स लगाया जाए, तीन नए खेती ऑर्डिनेंस वापस लिए जाएं, बिजली विभाग को पूंजीपतियों के हाथ में सौंपने वाला बिजली बिल वापस लिया जाए, जेलों में बंद किए गए जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए और जनता की आवाज दबाने वाले काले कानून रद्द किए जाएं। आगे सभा को संबोधित करते हुए कामरेड जगदीश ने कहा कि सरकार सिर्फ बड़े पूंजीपतियों के इशारों पर काम कर रही है और देश के मज़दूरों-मेहनतकशों की तबाही और बर्बादी के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार है। कोरोना महामारी का भय खड़ा करके लोगों को घरों में बंद करके सरकार लगातार जनविरोधी नीतियां लागू कर रही है। इसलिए लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए और सरकार के जनविरोधी कदमों को वापस हटाने के लिए सड़कों पर उतरना होगा। साथी ताज मोहम्मद ने कविता पाठ किया और सरकार के फासीवादी जातिवादी कदमों का विरोध करने का आह्वान किया। अंत में कॉलोनी में जोरदार नारों के साथ पैदल मार्च किया।

Sunday, August 9, 2020

सबसे सख्त और दमनकारी लॉकडाउन हमारे देश में हुआ

Sunday: 9th August 2020 at 3:51 PM
 कारखाना मज़दूर यूनियन ने किया रोषपूर्ण प्रदर्शन 
लुधियाना: 9 अगस्त 2020: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो):: 
अगर कोरोना की आड़ में मज़दूरों और संघर्षशील संगठनों के दमन की साज़िशों का सिलसिला शुरू है तो उसके तीखे प्रतिरोध ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। आज कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब ने फोकल प्वाइंट, लुधियाना में जोरशोर से इस जन सत्य को साबित किया। मज़दूरों मेहनतकशों ने आज फिर अपने जन्मसिद्ध अधिकारों के लिए आज दिखाया कि वे लोग कोरोना की आड़ में लगाई पाबंदियों से दबने वाले नहीं।  कोरोना की आड़ में केंद्र व राज्य सरकारों की पूँजीपति वर्ग के पक्ष में लागू की जा रही जनद्रोही नीतियों के खिलाफ़  बहुत ही जबर्दस्त रोष प्रदर्शन किया गया। आज पूरे देश में मज़दूर संगठनों के आह्वान पर इसी तरह के ज़ोरदार रोष प्रदर्शन हुए हैं। 
कारखाना मज़दूर यूनियन द्वारा रोष प्रदर्शन को संबोधित करते हुए यूनियन के अध्यक्ष लखविंदर, यूनियन नेताओं जसमीत, विमला, धर्मवीर, तेजू प्रसाद, नौजवान भारत सभा के नवजोत ने केंद्र की मोदी सरकार व पंजाब की कैप्टन सरकार द्वारा कोरोना की आड़ में पूँजीपति वर्ग के पक्ष में लागू की जा रही दमनकारी आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक नीतियों की सख्त आलोचना की। वक्ताओं ने कहा कि कोरोना उतनी बड़ी बीमारी ही नहीं निकली जितना कि दावा किया गया था। कोरोना के बहाने लगाए गए लॉकडाउन से तबाह बर्बाद की गई अर्थव्यवस्था का सारा बोझ मज़दूरों-मेहनतकशों पर ही पड़ा है। भारत के हुक्मरानों ने तो दमन और बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए दुनिया का सबसे सख्त और दमनकारी लॉकडाउन किया जिसके जरिए जनता के जनवादी अधिकारों को ही कुचला गया।
      कारखाना मज़दूर यूनियन ने श्रम क़ानूनों में संशोधनों को रद्द करने, श्रम अधिकार लागू कराने, श्रम क़ानूनों का उल्लंघन करने वाले पूँजीपतियों को सख़्त सज़ाएं देने, लॉकडाउन के कारण मज़दूरों के हुए नुकसान के लिए मुआवज़ा, छंटनियों पर रोक लगाने, बंद और मंदी के समय की पूरी तनख़्वाह देने, बेरोज़गारों को बेरोज़गारी भत्ता देने, सभी बीमारियों के मुफ़्त इलाज, कच्चे स्वास्थ्य कर्मियों को पक्का करने, सभी स्वास्थ्य सुविधाओं के सरकारीकरण, सभी मज़दूरों को मुफ़्त अनाज देने, जन-वितरण प्रणाली का प्रसार करने, कोरोना के बहाने पूँजीपतियों को राहत पैकेज के नाम पर मेहनतकश जनता का पैसा लुटाना बंद करने और उन पर भारी टेक्स लगाकर मज़दूरों-मेहनतकशों को सुविधाएँ देने, महँगाई पर लगाम लगाने, निजीकरण की नीति रद्द करने, रेलवे, बिजली महकमों का निजीकरण तुरंत रद्द करने, तीन कृषि अध्यादेश व प्रस्तावित बिजली संशोधन बिल रद्द करने की माँग की है। जनवादी अधिकारों का हनन बंद करने, झूठे पुलिस मामलों में जेलों में बंद किए गए जनवादी कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों को तुरंत रिहा करने, नाजायज गिरफ़्तारियाँ बंद करने की माँग भी की गई।