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Monday, April 19, 2021

मई दिवस मनाने की तैयारियों का अभियान जोरों पर

 मई दिवस की स्मृति फिर जगाएगी नया जादू  

Sketch Courtesy: Chicago May Day 

1 मई 2021 को ‘मज़दूर दिवस सम्मेलनों में पहुंचने के निमंत्रण 

कारख़ाना मज़दूर यूनियन और टेक्सटाइल हौज़री कामगार यूनियन द्वारा पर्चा और पोस्टर भी जारी 

लुधियाना: 19 अप्रैल 2021: (कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

पूँजीवाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद! के नारे को एक बार बुलंद करता हुआ श्रमिक वर्गों आज के इस नाज़ुक दौर में एक बार फिर मई दिवस शहीदों की कुर्बानियों को याद दिलाने के लिए सक्रिय है। ये वही शहीद हैं जिन्हों ने निराशा के वक़्त बहुत बड़ी आशा जगाते हुए ऐतिहासिक संघर्ष  किया था। मज़दूर जमात के हाथों में अपने  विजय पताका  इन्हीं शहीदों ने थमाई थी। 

इस बार 136वां अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस उस वक़्त मनाया जा रहा है जब श्रमिक वर्ग के अधिकारों पर डाका डाला जा रहा है। उनके संविधानिक  रहे हैं। उन्हें इंसान से जानवर समझने की  भूल एक बार फिर की जा रही है। श्रमिक वर्ग हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने  फिर से कमरकस कर तैयार है।  

मई  दिवस पर श्रमिक शक्ति याद दिला रही है कि आज घोषणा करने का दिन है कि हम भी हैं इंसान। हमें भी चाहिए बेहतर दुनिया करते हैं ऐलान। इसके साथ ही खुला निमंत्रण है कि 1 मई 2021 को ‘मज़दूर दिवस सम्मेलन’  में पहुँचो। 

 सभी श्रमिकों से विशेष तौर पर कहा गया है कि हमारी सभी मज़दूर भाई-बहनों से अपील है कि 1 मई को काम पर न जाकर मज़दूर पुस्तकालय, #4135, ई.डब्ल्यू.एस. कालोनी, ताजपुर रोड, लुधियाना पर पहुंचे। सुबह 9 बजे शुरू  होने वाले कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर शामिल होना होगा। मज़दूर दिवस सम्मेलन में अधिक से अधिक संख्या में पहुँचो तांकि लुटेरे  बताया जा सके कि हम जाग रहे हैं और इस नए संघर्ष के लिए भी तैयार हैं। 

इस सम्मेलन में क्रांतिकारी नाटक-गीतों का कार्यक्रम भी जोशो खरोश से होगा। इस बार भी 1 मई को मज़दूरों का सबसे बड़ा त्योहार अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस ज़ोरशोर से मनाया जाना है। पहली मई का दिन हर वर्ष मज़दूर वर्ग के लिए नया जोश लेकर आता है। वहीं शोषक पूँजीपतियों के लिए यह दिन ख़ौफ़ बनकर आता है। इस दिन दुनिया के कोने-कोने में मज़दूर क्रांतिकारी लाल झंडे लेकर सड़कों पर उतरते हैं। अपने मज़दूर शहीदों को याद करते हैं, समागम करते हैं, रैलियाँ-जुलूस निकालते हैं, पूँजीवादी लूट, शोषण के खि़लाफ़ मज़दूर वर्ग का संघर्ष आगे बढ़ाने के क्रांतिकारी संकल्प लेते हैं। मज़दूर दिवस की यह शिक्षा है कि मज़दूरों को आज तक एकजुट संघर्ष के जरिए ही सभी हक़-अधिकार मिले हैं, कि राष्ट्र, रंग, धर्म, जाति, भाषा आदि के भेदभाव मिटाकर संगठित संघर्ष के जरिए पूँजीवादी शोषण का खात्मा संभव है। एक दिन यह खत्म हो कर ही रहेगा। 

Courtesy Photo Chicago May Day 
मज़दूरों के ख़ून से लिखी ‘मज़दूर दिवस’ की कहानी एक बार फिर हर दिल और दिमाग में ताज़ा  आवश्यक हो गया है। मज़दूरों का त्योहार अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस आठ घंटे काम का दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आंदोलन से पैदा हुआ था। उन दिनों मज़दूर चौदह से लेकर सोलह-सोलह घंटे तक खटते थे। सारी दुनिया में इस माँग को लेकर मज़दूर जगह-जगह आंदोलन कर रहे थे। भारत में भी 1862 में इस माँग को लेकर कामबंदी हुई थी। 1886 में अमरीका के कई मज़दूर संगठनों ने मिलकर इस माँग पर एक विशाल आंदोलन खड़ा करने का फ़ैसला लिया। यह एक ऐतिहासिक गाथा है। 

एक मई 1886 को अमरीका के लाखों मज़दूरों ने ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे मनोरंजन’ की माँग पर एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 कार$खानों के करीब 4 लाख मज़दूर शामिल थे। शिकागो शहर और आसपास का लगभग सारा काम ठप्प हो गया। इस हड़ताल को कुचलने के लिए पूँजीवादी हुकूमत ने नेताओं को पैसों का लालच दिया। डराया-धमकाया लेकिन कोई हथकंडा काम न आया। फिर 3-4 मई को मज़दूरों के जुटान पर गोलियाँ चलाई गईं, बम फेंके गए। चार मई को हुए बम हमले के दोष में 8 मज़दूर नेताओं पर झूठा मुक़द्दमा चलाया गया। 11 नवंबर 1887 को पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फिशर को फाँसी दी गई। 13 नवंबर को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा में छह लाख से भी ज्य़ादा लोग अपने नायकों को आखिऱी सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े।

मज़दूरों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘दूसरे इंटरनेशनल’  के आह्वान पर सन् 1890 से पहली मई का दिन अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के तौर पर दुनिया के विभिन्न देशों में मनाया जाने लगा। शिकागो के शहीद हुए मज़दूरों और उनके नेताओं ने अपना बलिदान देकर सारी दुनिया के मज़दूरों को पूँजीवादी शोषण-उत्पीडन के खि़लाफ़ संघर्ष के लिए नई प्रेरणा दी। शिकागो के शहीद अमर हो गए।

मज़दूर वर्ग की आवाज़ दबाने के सारे हथकंडे धराशाही हो गए। संघर्ष बढ़ता ही गया। अमरीका ही नहीं, बल्कि दुनिया के कोने-कोने में आठ घंटे कार्यदिवस की माँग मानने के लिए लुटेरे हुक्मरानों को मजबूर होना पड़ा। इतना ही नहीं दुनिया के मज़दूरों के अपने संघर्ष की बदौलत न्यूनतम वेतन, रोज़गार की गारंटी, कार्यस्थलों पर सुरक्षा इंतज़ाम आदि संबंधी अनेकों श्रम अधिकार प्राप्त किए। रूस, चीन जैसे बहुत से देशों में मज़दूरों ने अन्य मेहनतकश जनता के साथ मिलकर शोषणकारी राज ख़त्म करके मज़दूरों का राज कायम करने में भी कामयाबी हासिल की। भले ही आगे बढऩे की समझ की कमी के चलते मज़दूरों के राज वाले ये समाजवादी समाज कायम नहीं रह सके, लेकिन इतना तय है कि मज़दूर वर्ग तमाम जीतों-हारों से सबक़ लेकर फिर से समाजवादी समाज कायम करेगा।

ऐसा है मज़दूर वर्ग के संघर्षों का महान, गौरवमयी इतिहास। मई दिन का इतिहास, शहीदों की क़ुर्बानी और लहू से बना लाल झंडा दुनिया के मज़दूरों को पूँजीवादी लूट, शोषण, अन्याय के बेहद मुश्किल हालातों में, तमाम हमलों, हारों की निराशाजनक हालातों में आगे बढने की प्रेरणा देता रहेगा।

हमें पूँजीवादी हुक्मरानों के नए हमलों के खि़लाफ़ ज़ोरदार संघर्ष छेडना होगा। इस बार मई दिवस का मुख्य मकसद भी यह हम इस बार पहली मई का दिन ऐसे हालातों में मना रहे हैं, जब देशी-विदेशी पूँजीपतियों की भारत की अब तक की सबसे बड़ी दलाल मोदी सरकार ने आठ घंटे कार्यदिवस के क़ानूनी श्रम अधिकार पर बड़ा हमला कर दिया है। यही नहीं न्यूनतम वेतन, यूनियन बनाने, हड़ताल करने के अधिकार समेत अन्य बहुत से क़ानूनी श्रम अधिकारों को छीना जा रहा है। ऐसा मोदी सरकार ने 29 पुराने श्रम क़ानूनों की जगह 4 नए श्रम क़ानून (कोड) लाकर किया है। अगर मज़दूर वर्ग ने नए श्रम क़ानूनों के खि़लाफ़ निर्णायक संघर्ष छेडऩे में कामयाबी हासिल न की, तो ये काले क़ानून लागू हो जाएँगे और मज़दूर वर्ग की पहले से भी अधिक ग़ुलामी के एक नए दौर की शुरुआत होगी।

अर्थव्यवस्था से सरकारी निवेश निकालकर जनता को मुनाफे के भूखे भेडिय़ों के सामने परोसा जा रहा है। इसी नीति के अंतर्गत अनाज ख़रीद, रेलवे, बिजली बोर्ड, सरकारी कार$खानों, बैंकों का निजीकरण हो रहा है। कृषि क़ानून निजीकरण की इसी नीति का हिस्सा हैं। जनविरोधी नीतियों के चलते महँगाई आसमान छू रही है। पंजाब और अन्य राज्यों की विभिन्न पार्टियों की सरकारें भी ऐसी ही नीतियों धड़ाधड़ लागू कर रही हैं।

पंजाब सरकार ने पूँजीपतियों को 479 नियम-शर्तें लागू करने से छुटकारा दिला दिया है। इससे न सिर्फ मज़दूरों की आर्थिक लूट बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक हादसे भी बढ़ेंगे।

पिछले साल से लगातार हुक्मरानों का कोरोना ड्रामा जारी है। जनता को गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, मानसिक परेशानियों के और भी गहरे गढ्ढे में धकेला जा रहा है। कोरोना के बहाने लॉकडाउन और अन्य नाजायज़ पाबंदियाँ थोपकर जनता के अधिकारों को बर्बरतापूर्वक कुचला जा रहा है।

अब देश के मज़दूरों-मेहनतकशों को बड़े स्तर पर समझ आने लगा है कि भाजपा-आर.एस.एस. ने जो धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाई है, उसका असल मक़सद क्या है! ‘मुँह में राम-राम, बग़ल में छुरी’  वाली इस मोदी हुकूमत की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति सबके सामने है। इसका पूँजीपरस्त घिनौना चेहरा अब एकदम नंगा हो चुका है। अब तो ये सी.ए.ए., एन.पी.आर., एन.आर.सी. लाकर करोड़ों ग़रीबों (जिसमें सभी धर्मों के ग़रीब शामिल होंगे) की नागरिकता छीनने की तैयारी कर चुके हैं। भारत की तमाम इंसाफ़पसंद जनता को, मज़दूरों-मेहनतकशों के दुश्मन, इंसानीयत के दुश्मन, जनता के जनवादी अधिकारों, आज़ादी के दुश्मन इन फासीवादी हुक्मरानों का तख़्तापलट करने के लिए आगे आना होगा। दुनिया के मज़दूर आंदोलन का यह सबक़ है कि संसद-विधानसभा के चुनावी खेल से पूँजीवादी हुक्मरानों का कुछ बिगडऩे वाला नहीं। इतिहास का सबक़ है कि एकजुट संघर्ष के ज़रिए ही ऐसा संभव है।

ऐसे समय में जब पूँजीवादी हुक्मरान जनता के मुँह से रोटी का आखिऱी निवाला भी छीन लेने पर आमादा है चुप रहना, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना बेहद घातक सिद्ध होगा। इसलिए आओ, मज़दूर दिवस के शहीदों का थमाया संघर्षों का झंडा बुलंद करें। पूँजीवादी हुक्मरानों को निर्णायक शिकसत देने की ज़ोरदार तैयारियों में जुट जाएँ।

इंक़लाबी सलाम करते हुए कारख़ाना मज़दूर यूनियन और टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन सभी को इस सम्मेलन में पहुंचने  निमंत्रण देती है। 

इस संबंध में और विवरण लिया जा सकता है इन नंबरों पर सम्पर्क करके: 9888655663, 9646150249

Wednesday, November 25, 2020

लुधियाना के मज़दूर-नौजवान संगठनों का समराला चौक पर रोष प्रदर्शन कल

25th November 2020 at 10:42 AM

 मोदी सरकार की मज़दूर-मेहनतकश विरोधी नीतियों के खिलाफ़ अभियान तेज़ 

लुधियाना: 25 नवंबर 2020:(कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

कल (26 नवंबर) देश भर में मज़दूरों के संगठन मोदी सरकार की देशी-विदेशी पूँजीपतियों के पक्ष में जोर-शोर से लागू की रहीं मज़दूर विरोधी नीतियों के खिलाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं। इसी दिन किसानों के संगठन कृषि कानूनों को रद्द करवाने के लिए दिल्ली कूच कर रहे हैं। नौजवानों-छात्रौं व अन्य तबकों को संगठनों ने भी देश भर के मज़दूरों-मेहनतकशों की आवाज़ में आवाज मिलाने का ऐलान किया है। कारखाना मज़दूर यूनियन, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्ज यूनियन, नौजवान भारत सभा, टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन, लोक एकता संगठन, जमहूरी अधिकार सभा द्वारा लुधियाना के समराला चौक पर 1 से 3 बजे तक संयुक्त रोष प्रदर्शन करके मज़दूर-मेहनतकशों को अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद की जाएगी।
गौरतलब है कि 26 नवंबर को बहुत से संगठन मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने अपने स्टेशनों पर भी रोष प्रदर्शन कर रहे हैं और किसानों के दिल्ली चलो कार्यक्रम में भी सक्रिय हैं। किसानों के साथ मज़दूरों का यह सहयोग संघर्षों की दुनिया में एक नया इतिहास रच रहा है। लॉक डाउन में मज़दूरों का विशाल पलायन भी बहुत बड़ी घटना थी जिसे पारम्परिक मीडिया ने उस तरह नहीं उठाया जिस तरह उठाना चाहिए था। 
उस पलायन के बाद अब संघर्षों के मैदान मैं मज़दूरों का किसानों के साथ कंधे से कंधा मिला कर डट जाना भी एक नया इतिहास रच रहा है।        
26 के रोष प्रदर्शन के बारे में प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कारखाना मज़दूर यूनियन के अध्यक्ष लखविंदर सिंह और इंकलाबी मज़दूर केंद्र के नेता सुरिंदर सिंह ने कहा है कि मोदी सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों के कारण मज़दूरों को भयानक मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं। उनके पास सड़कों पर उतर कर संघर्ष करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। उन्होंने कहा कि 26 को रोष प्रदर्शन के ज़रिए उनके संगठन मज़दूरों की कम से कम तनख्वाह 25 हज़ार करने, कोरोना के बहाने तनख्वाह में नाजायज कटौती रद्द करने, श्रम क़ानूनों में संशोधन रद्द करने, मज़दूर-मेहनतकश विरोधी नये कृषि क़ानून रद्द करने, सरकारी संस्थाओं-सुविधाओं का नीजिकरण बंद करने, बेरोजगारों को रोजगार देने, सब को मुफ़्त खुराक, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए ज़ोरदार तरीके से मांग करेंगे। संगठनों की माँग है कि सरकार उदारीकरण-निजीकरण-संसारीकरण की समूची नीति रद्द करे। इसके साथ ही कृषि क़ानूनों विरोधी जनांदोलन को कुचलने के लिए पंजाब में की गई आर्थिक नाकाबंदी बंद करने, राज्यों के हक बहाल करने, राष्ट्रों का दमन बंद करने, खुदमुख्त्यारी देने की मांग ज़ोरदार ढंग से उठाई जाएगी। सी.ए.ए., एन.पी.आर., एन.आर.सी. रद्द करने, जनवादी अधिकारों के लिए जूझने वाले कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की रिहाई के लिए ज़ोरदार अवाज बुलंद की जाएगी।

          इन सभी जननेताओं ने तमाम मज़दूरों, मेहनतकशों, नौजवानों व अन्य इंसाफपसंद लोगों को 26 नवंबर को रोष प्रदर्शनों में बड़ी से बड़ी संख्या में शामिल होने का आह्वान किया है।

इस प्रेस विज्ञप्ति को जारी किया कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब के अध्यक्ष लखविंदर सिंह और इंकलाबी मज़दूर केंद्र, पंजाब के सुरिंदर सिंह ने। 


Monday, August 10, 2020

ताजपुर रोड पर भी गूंजे मज़दूरों के जोशीले नारे

Monday: 10th August 2020 at 6:26 PM
 टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन ने भी किया रोष प्रदर्शन 
लुधियाना: 9 अगस्त 2020: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::  
आज मज़दूर पुस्तकालय, ताजपुर रोड पर टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन की तरफ से ज़ोरदार रोष प्रदर्शन किया गया। केंद्र सरकार की मज़दूर विरोधी जन विरोधी नीतियों के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के तहत आज रोष प्रदर्शन के उपरांत ई. डब्ल्यू. एस. कॉलोनी, लुधियाना में पैदल मार्च करके पर्चा वितरित किया। इस रोष सभा को संबोधित करते हुए यूनियन अध्यक्ष राजविंदर ने कहा कि भाजपा की हुकूमत में मज़दूरों से श्रम अधिकार छीने जा रहे हैं, जन सुविधाओं को छीना जा रहा है, देश के अंदर बड़े पैमाने पर धार्मिक नफरत फैलाकर लोगों का ध्यान बांट कर देश के सार्वजनिक उपक्रमों को पूंजीपतियों के हाथ कौड़ियों के दाम बेचा जा रहा है, निजीकरण किया जा रहा है, आज समाज का हर तबका केंद्र व राज्य सरकारों की जनविरोधी नीतियों की मार झेल रहा है। पहले ही देश की अर्थव्यवस्था भयंकर मंदी से गुजर रही थी और अब बची खुची कसर कोरोना समय में जबरदस्ती का लॉकडाउन लगाकर लोगों को घरों में बंद कर काम धंधे चौपट कर दिए गए हैं। इस मुसीबत के वक्त भी केंद्र व राज्य सरकार ने मज़दूरों और मेहनतकशों की कोई सार नहीं ली, ऊपर से जनता पर टैक्सों का बोझ बढ़ाया जा रहा है, महंगाई बढ़ रही है। कारखानों में मज़दूरों के साथ मालिक गुंडागर्दी कर रहे हैं।  वेतन पीस रेट घटाने की खबरें आ रही हैं। और बीमारियों के दवा इलाज के लिए कोई पुख्ता प्रबंध नहीं है जिसके चलते मजदूर वक्त से पहले ही डीएम तोड़ रहे हैं। सत्ता उनको मौत बांट रही है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर निजीकरण करके रही सही जन सुविधाओं को छीना जा रहा है, महंगा किया जा रहा है। पक्की नौकरियां खत्म की जा रही हैं ठेका प्रथा लागू की जा रही है। देशी-विदेशी पूंजीपतियों के दबाव के आगे मज़दूरों के हक में बने श्रम कानूनों को पूंजीपतियों के फायदे में बदला जा रहा है। देश में मज़दूरों मेहनतकशों की आवाज़ उठाने वाले, संप्रदायिक सौहार्द कायम करने की बात करने वाले जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूसा जा रहा है। वक्ता ने आगे कहा कि हम मांग करते हैं सरकार लॉकडाउन के समय मज़दूरों-मेहनतकशों के हुए नुकसान की  भरपाई करे, लॉकडाउन के समय का मज़दूरों को पूरा वेतन दिया जाए, कोरोना की आड़ लेकर सरकारी उपक्रमों को बेचना बंद किया जाए, कच्चे कर्मचारियों को पक्का किया जाए, श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी संशोधन रद्द किए जाएं, सभी कारखानों में श्रम कानून लागू किए जाएं, जनता पर टैक्सों का बोझ कम किया जाए और पूंजीपतियों पर महामारी टैक्स लगाया जाए, तीन नए खेती ऑर्डिनेंस वापस लिए जाएं, बिजली विभाग को पूंजीपतियों के हाथ में सौंपने वाला बिजली बिल वापस लिया जाए, जेलों में बंद किए गए जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए और जनता की आवाज दबाने वाले काले कानून रद्द किए जाएं। आगे सभा को संबोधित करते हुए कामरेड जगदीश ने कहा कि सरकार सिर्फ बड़े पूंजीपतियों के इशारों पर काम कर रही है और देश के मज़दूरों-मेहनतकशों की तबाही और बर्बादी के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार है। कोरोना महामारी का भय खड़ा करके लोगों को घरों में बंद करके सरकार लगातार जनविरोधी नीतियां लागू कर रही है। इसलिए लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए और सरकार के जनविरोधी कदमों को वापस हटाने के लिए सड़कों पर उतरना होगा। साथी ताज मोहम्मद ने कविता पाठ किया और सरकार के फासीवादी जातिवादी कदमों का विरोध करने का आह्वान किया। अंत में कॉलोनी में जोरदार नारों के साथ पैदल मार्च किया।

Friday, July 10, 2020

कॉमरेड जीके जोशी: मेरा साथी मेरा दोस्त

 आज जन्मदिन पर कॉमरेड जोशी को याद करते हुए एम एस भाटिया 
लुधियाना: 9 जुलाई 2020: (*एम एस भाटिया//कामरेड स्क्रीन):: 
हमारे दिलों में कामरेड जोशी की यादें उसकी ज़िंदगी के उन अनमोल दिनों के कारण हैं जो उसने बैंकिंग मुलाज़िमों के संघर्षों को मज़बूत बनाने में लगाए। अपनी जवानी का सुनहरी हिस्सा उसने अपने साथी मुलाज़िमों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कुर्बान कर दिया। जो लोग इन संघर्षों से वाकिफ नहीं हैं उनको तो दुनियादारी की भाषा में ही बताना पड़ेगा कि वह कौन हमारा ह साथी कौन था?
कॉमरेड जीके जोशी का जन्म 10 जुलाई 1958 को अमृतसर जिले के राधा स्वामी डेरा ब्यास के पास वड़ैच गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री राम सरूप जोशी और उनकी माता श्रीमती पार्वती देवी था। उन्होंने 27 जुलाई 1981 को सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की खडूर साहिब शाखा में ज़िंदगी के एक नए पड़ाव की शुरुआत की।
मेरा ह साथी मुझसे तीन महीने छोटा था और लगभग साढ़े तीन साल बाद नौकरी पर आया। सीखने और काम करने के समर्पण ने उसे संगठन के सभी पदों को प्रदान किया, जो एक संगठन नेता की इच्छा होती है। उसने  अपनी सेवा के पहले साल खडूर साहिब और फिर ब्यास शाखा में बिताए और 1988 में वह अपने गृहनगर जालंधर लौट आया। उसी वर्ष रोहतक में आयोजित सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया इम्प्लाइज़ यूनियन (पंजाब) के एक सम्मेलन में उसे संगठन सचिव बनाया गया था।
उस समय मैं संघ में कोषाध्यक्ष था। संघ के महासचिव कामरेड एन के जैन थे और प्रधान कामरेड एच एस ग्रेवाल थे। चूंकि लुधियाना हमारे संगठन का पंजीकृत कार्यालय था, इसलिए संगठन की गतिविधियों का केंद्र, निज़ाम रोड शाखा में कामरेड एचएस ग्रेवाल का यूनियन कार्यालय, हुआ करता था। इस बीच, कामरेड जोशी ने CAIIB और MBA कर लिया। उसके पिता स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में थे और उसके चाचा ज्योति सरूप जोशी न्यू बैंक ऑफ इंडिया में यूनियन लीडर थे। कॉमरेड जोशी ने जिम्मेदारी को सहर्ष स्वीकार कर लिया। यही कारण है कि 1992 में संघ के जालंधर सम्मेलन में उन्हें सहायक सचिव के रूप में पदोन्नत किया गया था।
बैंक संगठन और विशेष रूप से पंजाब राज्य में, उन्होंने कॉमरेड दर्शन सिंह रीहल के नेतृत्व में हमारे साथ कड़ी मेहनत की और मुलाज़िम संघ की सदस्यता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसे 1995 में अंबाला सम्मेलन में सचिव और फिर 2003 के अंबाला सम्मेलन में महासचिव नियुक्त किया गया था।
वह सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया एम्प्लाइज़ यूनियन (नॉर्थ ज़ोन) के महासचिव होने के अलावा, पंजाब बैंक कर्मचारी महासंघ में सचिव और अखिल भारतीय केंद्रीय बैंक कर्मचारी महासंघ में सचिव के रूप में भी काम कर रहा था। कोचीन में इसके सम्मेलन में उसे अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ की केंद्रीय समिति का सदस्य चुना गया। वह पंजाब बैंक कर्मचारी महासंघ की जालंधर इकाई का अध्यक्ष भी था।
यह यूनियन के लिए एक बड़ा सम्मान था, जब उसे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के बोर्ड में एक वर्करमैन के रूप में नियुक्त किया गया था और 2013 से 2016 तक वह इस पद पर रहा। इससे पहले, कामरेड ग्रेवाल ने 1980 से 1986 तक बैंक के बोर्ड में पंजाब का प्रतिनिधित्व किया था। ट्रेड यूनियन विचारधारा का एकमात्र प्रभाव यह था कि यह अंधविश्वास और कट्टरता के विरोध में था। लोगों के लिए काम करना उसका स्वभाव बन गया। उसके  दिमाग में अक्सर नए विचार आते थे और जो कोई भी अच्छी चीज देखता था वह उसे गले लगा लेता था। यही कारण था कि जब उन्होंने लुधियाना में हमारे द्वारा चलाए गए एम्प्लॉइज कोऑपरेटिव सोसाइटी के कामकाज को देखा, तो उन्होंने जालंधर में सेंट्रल बैंक एम्प्लाइज कोऑपरेटिव सोसाइटी भी बनाई और अंत तक इसके अध्यक्ष पद पर बना रहा। कॉमरेड जोशी ने जो मील का पत्थर हासिल किया है, उनमें से एक यह था कि उसके  कार्यकाल में पंजाब राज्य में संघ की सदस्यता 100 प्रतिशत थी और दूसरी चीज जो उसके नाम के साथ हमेशा जुड़ी रहेगी, वह थी अधिकारियों की यूनियन और वर्कर्स यूनियन ने कंधे से कंधा मिलाकर काम करना शुरू कर दिया और यहां तक ​​कि बैंक के साथ संयुक्त विचार-विमर्श भी किया। यह सच है कि कॉमरेड जोशी से पहले, कर्मचारियों और अधिकारियों की यूनियनों ने अपने दम पर काम किया। वह प्रबंधन द्वारा कर्मचारियों के खिलाफ दायर की गई चार्जशीट से लड़ने में एक विशेषज्ञ था। उसे सभी दांवपेंच मालूम थे। 
मैंने अक्सर उसे  पूछताछ में कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए कड़ी मेहनत करते और उनके मामलों का गहराई से अध्ययन करते हुए देखा है। मुझे याद है कि उसने शुरू में कामरेड दर्शन सिंह रीहल से पूछताछ की पेचीदगियों को कैसे सीखा। वह सामूहिक नेतृत्व में विश्वास करता था और प्रत्येक निर्णय में दूसरों को भी शामिल किया करता था। सन 2005 में संघ के स्तंभ कामरेड एचएस ग्रेवाल की मृत्यु के बाद कॉमरेड एनके जैन संघ के अध्यक्ष बने। लेकिन उसी साल, संगठन के एक दौरे पर, कॉमरेड एनके जैन की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। इस प्रकार, दो वरिष्ठ नेताओं के जाने के बाद, कॉमरेड जोशी की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई थी।
कॉमरेड जेपी अग्रवाल को 2015 तक अध्यक्ष का पद दिया गया था और 2015 में लुधियाना में आयोजित यूनियन कॉन्फ्रेंस में प्रधान का पद युवा नेता कामरेड राजेश वर्मा को दिया गया और दोनों ने मिलकर इस संगठन को और अधिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया। अखिल भारतीय केंद्रीय बैंक कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष, कॉमरेड सीएच वेंकटचलम और महासचिव, कॉमरेड राम बाबू उनके समर्पण और कड़ी मेहनत के लिए उन्हें बहुत प्यार किया करते थे। इसी तरह 2018 में लुधियाना में आयोजित सम्मेलन में, कॉमरेड राजेश वर्मा को महासचिव और कॉमरेड सुरेश भाटिया अध्यक्ष चुने गए। हालाँकि यह सच है कि कॉमरेड जोशी के जाने के बाद, कॉमरेड राजेश वर्मा और कॉमरेड सुरेश भाटिया ने कॉमरेड जोशी की कमी को इस संघ के काम में महसूस नहीं होने दिया, लेकिन फिर भी कॉमरेड जोशी अभी भी हमारे दिलों में ज़िंदा हैं। मुझे याद है कि जब भी मैं और जोशी जी संगठन की बैठकों में एक साथ मिलते थे, बैठक के बाद, जोशी अक्सर मुझसे पूछते थे कि मैं कब रिटायर हो जाऊंगा, और मैं मजाक में कहता कि, "तुझसे तीन महीने पहले"। लेकिन कॉमरेड जोशी अपनी बात पर नहीं टिके और 5 दिसंबर, 2017 को अपनी सेवानिवृत्ति से आठ महीने पहले, उसने हमें DMC Hospital लुधियाना में अकेला छोड़ दिया। वह अपनी पत्नी चंचल जोशी (बैंक ऑफ इंडिया) और बेटियों अदिति जोशी और आशु जोशी को भी छोड़ कर चले गए। उसके साथ बिताए पल हमेशा याद किए जाएंगे। वह दोस्तों का दोस्त था

* कामरेड  एमएस भाटिया बैंकिंग मुलाज़िमों के संघर्ष में अक्सर सक्रिय रहते हैं और सेंट्रल बैंक आफ इंडिया में काररत भी रहे हैं। इस सम सीपीआई की लुधियाना इकाई के वित्त सचिव भी हैं और पंजाबी दैनिक नवना ज़माना के स्थानीय ब्यूरो चीफ भी हैं। उनसे सम्पर्क के लिए उनका मोबाईल नंबर है: मो: 9988491002

Saturday, June 20, 2020

CPI ने बजाया तीखे जनआंदोलनों का बिगुल

20th June 2020 at 5:52 PM
 भाकपा की राज्य कार्यकारिणी के बैठक में लिए गए कई अहम फैसले 
चंडीगढ़//लुधियाना: 20 जून 2020: (एम एस भाटिया//कार्तिका सिंह//कामरेड स्क्रीन)::
कोरोना और लॉक डाउन के चलते छाई सहम भरी ख़ामोशी को सफलता पूर्वक तोड़ने के बाद अन तीखे जन आंदोलनों का बिगुल भी बजा दिया है। पैट्रोल डीज़ल की कीमतों में गत 13 दिनों से हो रही वृद्धि, यूपी सरकार की तरफ से पंजाबी किसानों को उजाड़ने का दमनचक्र, भाजपा सरकार की फाशीवादी नीतियों के अंतर्गत बढ़ रहे हमले, लोकतान्त्रिक और मानवी अधिकारों की बात करने वाले कार्यकर्ताओं की ग्रिफ्तारियां इत्यादि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर बोलना आम लोग भूल चुके हैं। स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या शिक्षा का हालत बेहद बुरी है। देश की प्रभुसत्ता और अखंडता की रक्षा का मुद्दा, शहीद हुए बहादुर सैनिकों का मुद्दा, किसान विरोधी तीन आर्डिनेंस वापिस करवाने का संघर्ष, मनरेगा क्षेत्र की समस्याएं और मांगे और ऐसे बहुत से मुद्दे जिन  आवाज़ बुलंद करने की बात एक साजिश के अंतर्गत सपना बन चुकी है उन सभी मुद्दों को उठाएगी अब सीपीआइ। पूरा सप्ताह चलेगा रोष एक्श्नों का यह सिलसिला जो दमन का सहारा लिए चल रही सत्ता को हिला कर रख देगा। 
सीपीआई की पंजाब इकाई के सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ भी इस बैठक में शामिल होने के लिए विशेष तौर लुधियाना स्थि पार्टी कार्यालय में पहुंचे। अध्यक्षता की पूर्व विधायक कामरेड हरदेव अर्शी ने। गौरतलब है की कोरोना संकट और लॉक डाउन के चलते यह बैठक साढ़े तीन महीनों के बाद हो सकी। शहीद करनैल सिंह ईसड़ू भवन में इस बैठक को बाकायदा सैनेटाईज़र का इस्तेमाल करने के बाद आयजित किया गया। सोशल डिस्टेंस  
के नियम की पालना भी की गई।  इस बैठक के फैसले कामरेड बंत सिंह बराड़ ने मीडिया को जारी किये। कामरेड डीपी मौड़ ने बैठक शुरू होने से पहले ही अपनी देखरेख में हाल को पूरी तरह सैनेटाईज़ किया।  
पार्टी के प्रांतीय सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ ने इस बैठक में राष्ट्रिय मुद्दों के साथ साथ पंजाब की गंभीर साथी पर भी चिंता व्यक्त की। कोविड-19 को लेकर स्थिति और भी भयानक हुई। उन्होंने कहा कि इस बेहद नाज़ुक स्थिति के बावजूद प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए सीपीआई के सभी यूनिटों ने जो सक्रियता दिखाई उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। ह वह स्थिति थी जब ज़िंदगी जीना कठिन हो गया था। इस तरह की भयानक स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों ने जो मुजरमाना लापरवाही दिखाई उसे हमेशां काळा अक्षरों में लिखा जाएगा। इस पर तुरंत और तीव्र प्रतिक्रिया करते हुए 9 वाम दलों ने ज़ोरदार रोष प्रदर्शन किये। ट्रेड यूनियन और श्रमिक अधिकारों पर किये गए हमलों का मुँहतोड़ उत्तर दिया जिसने सारे संसार को दिखा दिया की कोरोना और लॉक डाउन की आड़ में यह सरकार श्रमिकों के साथ क्या क्या करने की हद तक जा सकती है। इसके साथ ही उन लोकतान्त्रिक कार्यकर्ताओं की रिहाई की भी आवाज़ उठाई गई जिन को मानवी अधिकारों की बात करने पर जेलों में ठूंस दिया गया। सड़कों पर पैदल चलते मज़दूरों के साथ साथ अपने गांव जाने को तरस रहे मज़दूरों के दर्द पर भी सीपीआई खुल कर सामने आई। 
 इसी बैठक में लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी को लेकर हुए घटनाक्रम पर भी चर्चा हुई। देश की प्रभुसत्ता और अखंडता की रक्षा के शहीद हुए 20 सैनिकों को भी श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए।  गौरतलब है की इन २० सैनिकों में से चार सैनिक पंजाब के मानसा, संगरूर, पटियाला और गुरदासपुर के हैं। 
सीपीआई ने इस बात को गंभीरता से लिया है कि इन सैनिकों को बिना हथियारों के सीमा पर चीन किसने से लड़ने के लिए भेजा गया। फिर इस बात कई दिनों तक दबाया गया छुपाया गया। सीपीआई ने इस सारे निंदनीय घटनाक्रम की तीखे शब्दों में आलोचना की है। सीपीआई ने कहा कि पूरी हालत जनता  रखी जाये। साथ ही भारत और चीन दोनों सरकारों से मांग की गई कि सीमा के झगड़ों का समाधान बातचीत के ज़रिये निकाला जाये। 
इन सभी मुद्दों पर चर्चा करते हुए सीपीआई की एग्ज़ेक्युटिव कमेटी मीटिंग ने मीडिया को भी अड़े हाथों लिया। पार्टी ने कहा देश में गोदी मीडिया जिस तरह तीसरी विश्व जंग को भड़काने के मकसद की खबरें और रिपोर्टें दिखा रहा है वह एक गहरी साज़िश है। हम इस मानवता विरोधी साज़िश पर भी नज़र रख रहे हैं।  
कार्यकारिणी की बैठक में मौजूद वाम नेतायों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बुलाई गई सर्व दलीय बैठक में शामिल होने को लेकर जो मतभेद दिखाया है वह निंदनीय है। यह बेहद दुखद है कि चार सांसदों दिल्ली की सरकार के मुख्य मंत्री पर काम करती आम आदमी पार्टी को आमंत्रित ही नहीं किया गया। इसी तरह चार सांसदों वाली आर जे डी को भी नहीं बुलाया गया। तीन सांसदों और केरल सरकार में भागीदार सीपीआई को भी नहीं बुलाया गया। लेकिन दूसरी रफ चार सांसदों वाली पार्टी अकाली दाल को बुलाया गया। (सुखदेव ढींडसा पार्टी से बाहर हैं) सीपीआई ने कहा कि हमें इस बात का एतराज़ नहीं अकाली दाल को क्यों बुलाया गया। हमें ेराज़ यह है कि देश की दहलीज़ पर खड़ी दस्तक दे रही जंग, 20 सैनिओं के शहीद होने और 10 के कैदी बने होने के नाज़ुक सवालों पर भी महत्वपूर्ण दलों को विचार विमर्श से बाहर रखा गया।साफ़ ज़ाहिर है कि इतनी बड़ी बहुसंख्या होने के बावजूद केंद्र सरकार सैद्धांतिक स्टैंड लेने वाली पार्टियों के विरोधी सुर से डरती है और इस तरह के वक़्त में भी निमंत्रण देने में मतभेद का काम लेती है। यह पक्षपात पूरी दुनिया ने देखा और इसे भारत की जनता याद भी रखेगी। 
बिना कोई योजना बनाये लॉक डाउन और कर्फ्यू जैसे आदेशों को भी सीपीआई ने निशाने पर रखा। करोड़ों मज़दूरों को बेरोज़गार करने, उन्हें घर से बेघर करने, उन्हें सड़कों पर हज़ारों मील पैदल चलने को मजबूर करने, उन्हें भूखों मारने और्व राहत के नाम पर सारा धन मज़दूरों का नाम ले कर अपने लोगों के हवाले करने के सारे घटनाक्रम की उच्च सत्रीय जांच की भी मांग की। 
 इसके आलावा यूपी में उजाड़े जा रहे पंजाबी किसानों का मुद्दा भी मीटिंग में गहनता से  विचारा गया। ये वही पंजाबी किसान हैं जिन्होंने बंजर ज़मीनों को दशकों तक मेहनत करके उपजाऊ बनाया। बेहद दुखद है कि इस अतिमहत्वपूर्ण मुद्दे पर भी अकालीदल अपनी कुर्सियों से चिपका हुआ है और इस मामले पर लोलो पोपो करके बेहद निंदनीय भूमिका निभा रहा है। 
किसान विरोधी आर्डिनेंसों की भी इस भाकपा बैठक में तीखी आलोचना हुई। सीपीआई ने कहा कि एम एस पी से पीछे हटने के कुप्रासों का हम विरोध करते हैं और करते रहेंगे। बैठक ने कहा कि यह आर्डिनेंस किसानों को कार्पोरेटी मगरमच्छ के मुँह में डाल देंगें। ऐसे में एम एस पी  का मिलना नामुमकिन हो जायेगा। इस बैठक में किसान संगठनों के संघर्ष का समर्थन भी किआ गया। 
इसी कार्यकारिणी बैठक में 8 जुलाई को पंजाब के 9 वाम दलों के संघर्ष का भी ज़ोरदार समर्थन किया। सीपीआई ने अपने सभी यूनिटों से कहा कि मौके की नज़ाकत को देखते हुए कोविड-19 की शर्तों का भी पालन करें। सभी पहलुओं को देखते हुए अन्य पार्टियों के सम्पर्क और सहयोग में रहते हुए अपने अपने एक्शन करें। 
इसी बैठक में 3 जुलाई को अखिल भारतीय स्तर की ट्रेड यूनियनों की तरफ से श्रमिक अधिकारों की रक्षा के लिए, ठेका प्रबंधों को समाप्त करने के लिए, न्यूनतम वेतन में वृद्धि, मनरेगा वर्करों के अधिकारों की रक्षा, आशा वर्करों स्कीम वर्करों के वेतन बढ़ाने के लिए हर वर्कर के कहते में 7500/- रूपये डालने के लिए और अन्य मांगों के लिए किये जा रहे अखिल भारतीय स्तर के रोष एक्शन का भी समर्थन किया। इन रोष प्रदर्शनों में भाग लेने को भी कहा गया। 
इसी कार्यकारिणी बैठक में कहा गया कि माइक्रो फाईनांस कम्पनीआं जो गरीबों को क़र्ज़ देने के मामले में अब गड़बड़गहताला कर रही हैं। इस धक्केशाही को बंद कराया जाये। नीले कार्डों के मुद्दे पर लोगों के साथ हो रहे मतभेद को भी बंद करने की मांग की गई। बिजली के बढ़ाये गए रेट भी वापिस लेने की बात कही गई। डीज़ल-पैट्रोल के हर रोज़ बढ़ रहे भावों पर भी चिंता व्यक्त की गई और इसकी निंदा हुई। इनके खिलाफ जन अभियान की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिए गया। 
बैठक में उन सभी कामरेड साथियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए जो हाल ही के दिनों में हमसे हमेशां के लिए बिछड़ गए। इस मौके पर सर्वश्री कामरेड ईशर सिंह दलेर सिंह वाला, अमरनाथ, नौनिहाल सिंह, गुरबख्श मुल्लां, प्यारा सिंह राओ-के-कलां, मिहर सिंह बद्दोवाल और सुखराज कौर भी श्रद्धांजलि दी गई। 
कोरोना काल में लॉक डाउन के कारण लम्बे अंतराल के बाद हुई इस बैठक में 24 प्रमुख कामरेड साथियों ने अपने विचार व्यक्त किये। इनमें कामरेड राज्य सचिव-कामरेड बंत सिंह बराड़ के साथ साथ पूर्व विधायक-हरदेव अर्शी, डाक्टर जोगिंदर दयाल, निर्मल धालीवाल, भूपिंदर सांबर, हरभजन सिंह, पृथीपाल माड़ीमेघा, अमरजीत आसल, सुखदेव शर्मा, कुलदीप भोला, लखबीर निजामपुरा, डीपी मौड़, रमेश रत्न, कृष्ण चौहान,  गदाईयां, कुलवंत मौलवीवाला, गुलज़ार सिंह, मैडम कुशल भौरा इत्यादि भी शामिल रहे। 
अब देखना है कि  सीपीआई का यह संघर्ष केंद्र और राज सरकारों को कितनी बड़ी चुनौती देने में सफल रहता है। 

Friday, May 22, 2020

कोरोना की आड़ में साज़िशी दमन का आरोप-देश भर में रोष

Friday: 22nd May 2020 at 4:38 PM 
 देश स्तरीय आह्वान पर 16 जन संगठनों द्धारा पंजाब भर में रोष प्रदर्शन 
चण्डीगढ़: 22 मई 2020: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::
आज ट्रेड यूनियनों द्वारा देश भर में रोष प्रदर्शन करने के आह्वान के तहत पंजाब के 16 मज़दूर-मुलाज़िम, किसान, नौजवान, विद्यार्थी संगठनों ने 16 जिलों में 56 जगहों पर रोष प्रदर्शन किए। कई जगहों पर इनमें शामिल संगठनों द्वारा ट्रेड यूनियनों के साथ संयुक्त रोष प्रदर्शन भी किए गए। यह जानकारी आज मज़दूर नेताओं राजविन्दर सिंह, लछमण सिंह सेवेवाला, जगरूप सिंह, प्रमोद कुमार और किसान नेताओं जोगिन्द्र सिंह उगराहाँ, कंवलप्रीत सिंह पन्नू ने अपनी एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में दी।  
रोष प्रदर्शनों को संबोधित करते हुए इन लोकप्रिय जननेताओं ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने कोरोना संकट को बहाना बना कर मज़दूर वर्ग पर तीखा राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक हमला किया है। विभिन्न राज्यों में 8 घंटों की जगह 12 घंटे कार्यदिवस लागू करने समेत अन्य क़ानूनी श्रम अधिकारों का हनन किया गया है और किया जा रहा है। पंजाब में भी बारह घंटे कार्यदिवस लागू करने तैयारी है। भाजपा की उत्तर-प्रदेश सरकार ने तो लगभग सभी श्रम कानून ख़त्म करने का ऐलान कर दिया है। ज़रूरत तो इसकी थी कि कमज़ोर श्रम कानूनों को मज़दूरों के पक्ष में मज़बूत बनाया जाये परन्तु सरकारें न सिर्फ़ इनको और कमज़ोर बनाने पर तुलीं थी बल्कि अब तो ख़त्म ही कर रही हैं। यह प्रक्रिया पहले ही जारी थी परन्तु कोरोना संकट के बहाने और लॉकडाउन का फ़ायदा उठा कर इस मज़दूर विरोधी और देशी-विदेशी पूँजीवादी एजंडे को अंजाम दिया रहा है। इस तरह सरकारें पूँजीपतियों को मज़दूरों से जैसे मर्ज़ी लूट-खसोट और अन्य बेइन्साफ़ी करने की पूरी छुट दे रही हैं। 
नेताओं ने कहा कि सरकारों ने कोरोना संकट के हल के लिए उचित कदम उठाने की जगह इसको और भी गंभीर बनाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि हुकूमत द्वारा कोरोना से बचाव के बहाने जनता पर थोपे गए ग़ैर-जनवादी और दमनकारी लॉकडाउन के ज़रिए मज़दूरों-मेहनतकशों को भुखमरी, शारीरक कमज़ोरी, कोरोना और अन्य बीमारियों से नुकसान का ख़तरा बढ़ाने, पैदल व साईकिलों के ज़रिए लंबे सफरों, पुलिस दमन, नाजायज गिरफ़्तारियों, हादसों, आत्महत्यों आदि मुसीबतों के मुँह में धकेलने की आपराधिक भूमिका निभाई गई है जिसके लंबे समय तक भयानक नतीजे मज़दूरों तथा अन्य जनता को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जनता की समस्याएँ दूर करने की जगह सरकारें ‘‘देश’’ तथा ‘‘राज्य ’’ को कोरोना और लॉकडाउन से हुए नुकसान का बहाना बना कर आर्थिक पैकेज के नाम पर पूँजीपतियों को सरकारी ख़ज़ाना लुटा रही हैं और बिजली क्षेत्र समेत तमाम जन-सेवाओं के उपक्रमों के मुकम्मल निजीकरण के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। सरकारें जनता पर नए टेक्स थोपने की तैयारी कर रही हैं। खेती को राहत के नाम पर खेती उपभोग उत्पाद के उद्योगपतियों को लुटाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ़ जनता को कोरोना संकट, लॉकडाउन और अन्य भयानक मुसीबतों के मुँह में धकेल कर बड़ा राजनीतिक-आर्थिक हमला किया जा रहा है। 
रोष प्रदर्शनों को टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन, पॉवर कॉम एंड ट्रांसको ठेका मुलाज़िम यूनियन, पंजाब खेत मज़दूर यूनियन, टेक्नीकल सर्विसज़ यूनियन, भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहाँ), किसान संघर्ष कमेटी पंजाब, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्ज़ यूनियन, जल स्पलाई एवं सेनिटेशन कंट्रैक्ट वर्कर्ज़ यूनियन पंजाब (रजि. नं 31), नौजवान भारत सभा (ललकार), पी.एस.यू. (शहीद रंधावा), नौजवान भारत सभा, पी.एस.यू. (ललकार), कारख़ाना मज़दूर यूनियन, गुरू हरगोबिंद थर्मल प्लांट लहरा मोहब्बत ठेका मुलाज़िम यूनियन आज़ाद, ठेका मुलाज़िम संघर्ष कमेटी पॉवर कॉम (ज़ोन बठिंडा) और पंजाब रोडवेज़ /पनबस कंट्रैक्ट वर्कर्ज़ यूनियन के नेताओं जसविंदर सिंह सोमा, रछपाल सिंह, हरजिंदर सिंह, लखविंदर सिंह, सुखवंत सिंह, गुरपाल सिंह नंगल, अश्वनी कुमार घुद्दा, छिंदरपाल सिंह, हरिंदर कौर बिंदु, बलिहार सिंह, हरमेश मालड़ी, वरिंदर सिंह मोमी, गुरविंदर सिंह पन्नु, रेशम सिंह, हुशियार सिंह सलेमगढ़, गुरप्रीत सिंह, सुखविंदर सिंह सुख्खी आदि ने संबोधित किया।

Monday, March 9, 2020

CAA के खिलाफ पंजाब के वाम संगठन भी पूरी तरह सक्रिय

9th March 2020 at 5:30 PM  
डिटेंशन कैम्पों में बंद लोगों को रिहा करने की मांग भी उठायी 
लुधियाना//चंडीगढ़: 9 मार्च 2020: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::
मुद्दा तो सीएए के विरोध का ही था लेकिन यही विरोध वाम संगठनों, दलित संगठनों और अल्पसंख्यकों को एक दुसरे के बेहद नज़दीक ले आया है। आज लुधियाना शाहीन बाग़ में हुई विशाल रैली में वाम के वे 14 जन संगठन शामिल हुए जिनका जनाधार बहुत  है। इन सक्रिय संगठनों की शमूलियत का क्या अर्थ है इस बात को राज्य और केंद्र सरकार की ख़ुफ़िया एजंसियां भी जानती हैं।  कार्यकर्ताओं के लिए चाय-पानी और लंगर का प्रबंध संगठन हर वक़्त वाहनों पर तैयार ही रखते हैं तांकि अगर कहीं अचानक भी मोर्चा लगाना पड़े तो हर तरह की तैयारी पूरी हो। विरोधियों की तरफ से साज़िशी और शरारती तत्वों के हमलों पर नज़र रखने और उनका तुरंत  जवाब देने का प्रबंध भी होता है। इन वाम संगठनों के प्रबंध पारम्परिक वाम पार्टियों से पूरी तरह अलग और ज़ोरदार हैं। इस लिए इन संगठनों का  लुधियाना के शाहीन बाग़ में आना साधारण समर्थन नहीं है। ये संगठन हैं जो दिल्ली और अन्य स्थानों के शाहीन बाग़ तक भी समर्थन जता कर आये हैं। 
शाहीन बाग़ लुधियाना में नज़र आए होली के रंग तिरंगे के संग
CAA, NRC और NRP को नागरिकता अधिकारों पर हमला बताते हुए इस की हर पंक्ति के हर शब्द पर चर्चा करने तैयार रहते हैं। इस कानून के विरुद्ध पंजाब के किसानों, औद्योगिक व खेत मज़दूरों, बिजली कर्मचारियों, नौजवानों व विद्यार्थियों पर आधारित इन 14 संघर्षरत संगठनों  जन काफिला एक रह से लॉन्ग मार्च पर ही है। यह काफिला हर उस जगह जहाँ इसकी ज़रूरत है। अब इनके साथ धार्मिक अल्पसंख्यक और दलित वर्ग  भी आ मिले हैं इसलिए यह शक्ति और भी बढ़ गयी है। एक लम्बे संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है यह काफिला। इन 14 संगठनों की ओर से साझे तौर पर नागरिकता संशोधन क़ानून, जनसंख्या व नागरिक रजिस्टर खिलाफ अभियान जारी है। इनका आरोप है कि मोदी-शाह हुकूमत की सरपरस्ती में संघी गुंडा गिरोहों द्वारा  दिल्ली में साज़िशी योजनाबद्ध कत्लेआम। आम लोगों को उजाड़ा गया।  दिल्ली के इस हत्याकांड और उजाड़े के ख़िलाफ़ लुधियाना के शाहीन बाग, दाना मंडी (जालंधर बाईपास) में जिला स्तरीय विशाल रैली हुई  ऐतिहासिक लगती थी।  रैली में बड़ी संख्या में औरतों समेत विभिन्न धर्मों व जातियों के हज़ारों मेहनतकश लोग शामिल हुए। इसकी वीडियो रिपोर्ट वाम से जुड़े मीडिया सेल ने तुरंत देश भर में भेज दी। ऐसा लग रहा है कि अब वाम हर मोर्चे पर सामना करने को तैयार है। यह बात अलग है की पारम्परिक वाम पार्टियां अभी इस मामले में इस काफिले से कहीं पीछे हैं।   शाहीन बाग़ लुधियाना में नज़र आए होली के रंग तिरंगे के संग
“हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, सारे मेहनतकश भाई-भाई”, “फासीवाद मुर्दाबाद” व अन्य गूंजते नारों को बुलंद करते हुए लोगों के इस विशाल सम्मेलन ने मांगों से संबंधित प्रस्ताव भी पारित किए। इस रैली ने मांग की किसी.ए.ए., एन.आर.सी. व एन.पी.आर. तुरंत रद्द हो, एन.आर.सी. की प्रक्रिया के तहत बनाए गए सारे नज़रबंदी कैंप बंद किए जाएं, वहां कैद लोगों को रिहा किया जाए, नागरिकता अधिकारों पर हमले के ख़िलाफ़ प्रचंड जनाक्रोश को दबाने के लिए भड़काई जा रही सांप्रदायिक हिंसा तुरंत बंद हो, दिल्ली में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के दोषी भाजपा-आर.एस.एस. के नेताओं, हमलावर गुंडों व इनके पालतू पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार करके उनको मिसाली सज़ाएं दी जाएं। मांग की गई कि नागरिकता अधिकारों पर हमले  के ख़िलाफ़ शाहीन बाग दिल्ली समेत देश भर में संघर्षरत लोगों पर सभी तरह के हमले बंद हों, उनकी सुरक्षा की गांरटी हो, संघर्षरत लोगों पर दर्ज़ किए गए झूठे केस रद्द हों, गिरफ़्तार किए गए लोग व बुद्धिजीवी रिहा किए जाएं, जे.एन.यू. व जामिया यूनिवर्सिटी तथा देश भर में दमन करने वाले अधिकारियों पर सख़्त कार्रवाई की जाए। 
पंजाब के मुद्दे पर भी इन संगठनों ने तीखा रुख अख्तियार किया। इन 14 जन संगठनों ने पंजाब की कांग्रेस सरकार द्वारा एनपीआर लागू ना करने के बारे में जनता को गुमराह करने की कोशिशों की निंदा करते हुए माँग की है कि इस बारे में मुख्य मंत्री लिखती रूप में स्थिति स्पष्ट करे। जन नेताओं ने कहा कि 14 जनसंगठन अपने ऐलान पर अडिग हैं कि अगर राज्य में एनपीआर लागू करने की कोशिश की तो इसका जवाब राज्य सरकार के खिलाफ़ तीखे संघर्ष से दिया जाएगा और इसे हरगिज लागू नहीं होने दिया जाएगा।
आज की इस रैली को बी.के.यू. (एकता-उगराहाँ) के प्रधान जोगिंदर सिंह उगराहाँ, बी.के.यू. (एकता-डकौंदा) के सीनीयर मीत प्रधान मनजीत सिंह धनेर, टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन के अध्यक्ष राजविंदर, मजलिस अहरार इस्लाम हिंद जामा मस्जिद के महासचिव मौलाना मोहम्मद उसमान लुधियानवी, नौजवान भारत सभा (ललकार) की नेता बिन्नी, किसान नेता हरिंदर कौर बिंदू, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्ज़ यूनियन के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह, इंकलाबी मज़दूर केंद्र के नेता सुरिंदर सिंह, टैक्नीकल सर्विसिज यूनियन की ओर से इकबाल सिंह, जमहूरी अधिकार सभा के महासचिव प्रो. जगमोहन सिंह, पंजाब खेत मज़दूर यूनियन के नेता लछमन सिंह सेवेवाला, कारखाना मज़दूर यूनियन के अध्यक्ष लखविंदर, इंकलाबी नौजवान विद्यार्थी मंच के हरशा सिंह, नौजवान भारत सभा के नेता अशवनी घुद्दा, पंजाब स्टूडैंटस यूनियन (ललकार) के नेता गुरविंदर, पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन (शहीद रंधावा) के नेता हुशिय़ार सिंह, धार्मिक भाईचारा नेता मोहम्मद मुसकीम अहरार और कारी मुसतकीम करीमी, किसान संघर्ष कमेटी पंजाब के अध्यक्ष कंवलप्रीत सिंह पन्नू ने संबोधित किया। मंच संचालन की जिम्मेवारी किसान नेता जगमोहन सिंह धनेर ने बाखूबी निभाई।
नेताओं ने कहा कि सन् 84 में सिखों के कत्लेआम की तर्ज़ पर दिल्ली में मुसलमानों के कत्लेआम ने मोदी-शाह हुकूमत के नागरिकता संशोधन क़ानून के पीछे छिपे जनद्रोही इरादों को पूरी तरह नंगा कर दिया है। वक्ताओं ने आर.एस.एस. व भाजपा की केंद्रीय हुकूमत द्वारा अधिकारों के लिए किए जा रहे संघर्ष को कुचलने की निंदा करते हुए ऐलान किया कि लोगों को धर्म के नाम पर लड़ाने, सांप्रदायिक फूट डालने, अंध-राष्ट्रवाद भड़काने, कत्लोगारद करने, नागरिकता समेत अन्य जनवादी अधिकारों के हनन व जनता की लूट तीव्र करने के जनद्रोही मंसूबे सफल नहीं होने देंगे। शाहीन बाग़ लुधियाना में नज़र आए होली के रंग तिरंगे के संग
वक्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार सी.ए.ए., एन.आर.सी., व एन.पी.आर. द्वारा जनता की सामुदायिक सदभावना व अमन को खत्म करके, सांप्रदायिक ज़हर घोलने का कुकर्म कर रही है। ऐसा करके यह सत्ता  जनता के वास्तविक मुद्दों व दुश्मनों से ध्यान हटाना चाहती है। इसका शिकार मुसलमानों समेत सभी अल्पसंख्यकों, सभी मेहनतकशों, दलितों, पिछड़ी श्रेणियों, दमित राष्ट्रीयताओं, जनपक्षधर बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्ष व वैज्ञानिक सोच रखने वाले व जनवादी अधिकारों के लिए जूझ रहे सारे संघर्षरत लोग हैं। मोदी हुकूमत इसकी आड़ में देश के उत्पादन-स्रोत, कमाई के साधन, जल-जंगल-ज़मीनों का निजीकरण करके सरकारी व अर्ध-सरकारी संस्थाएं कौड़ियों के दाम देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों के हवाले कर रही है। हुकूमत की इन नीतियों के चलते मज़दूरों-मुलाज़िमों की बड़े स्तर पर छंटनी हो रही है और उनका रोज़गार खत्म हो रहा है, नाममात्र के श्रम क़ानूनों को खत्म किया जा रहा है, छोटे काम-धंधों वाले लोग आर्थिक तबाही का शिकार हो रहे हैं। इन जन-विरोधियों नीतियों के ख़िलाफ़ जूझ रहे लोगों को देशद्रोही कहने वाली मोदी हुकूमत ख़ुद देशद्रोही है। नेताओं ने कहा कि खतरा मुसलमानों से नहीं है, बल्कि मोदी सरकार की नीतियों से है।
उन्होंने कहा कि मोदी हुकूमत देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है, लेकिन इसका मतलब हिंदू धर्म के लोगों का विकास नहीं, बल्कि ऐसा प्रतिक्रियावादी राज्य कायम करना है जहाँ लोगों के बुनियादी, जनवादी व क़ानूनी अधिकार खत्म किए जाएं ताकि वे लूट-दमन के विरुद्ध संघर्ष ना कर सकें। उन्होंने कहा कि मौजूदा काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ हर जाति, धर्म-मज़हब के लोग-औरतें, नौजवान, विद्यार्थी, बुद्धिजीवी, किसान, मज़दूर मैदान में डटे हुए हैं। उन्होंने हुकूमत के इस हमले को टक्कर दी है। दिल्ली, यू.पी. में योजनाबद्ध ढंग से आगजनी करने, कत्लोगारद, सबके बावजूद विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हैं, फिरकापरस्तों को भगा रहे हैं, सांप्रदायिक अमन को मज़बूत करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और नागरिक अधिकारों पर हमले के ख़िलाफ़ डटकर संघर्ष कर रहे हैं। शाहीन बाग की तर्ज़ पर जगह-जगह मोर्चे बने हुए हैं। नेताओं ने जन-शक्ति में विश्वास प्रकट करते हुए कहा कि फासीवादी हुकूमत को जनता मिट्टी में ज़रूर मिलाएगी।
नेताओं ने मोदी-शाह की हुकूमत के नागरिकता अधिकारों पर हमले, दिल्ली कत्लेआम, देशभर में संघर्षरत लोगों के दमन, लोगों के सभी जनवादी अधिकारों के हनन का मुँह-तोड़ जवाब देने के लिए जुझारू जनांदोलन को और व्यापक बनाने का आह्वान किया।  अब देखना है की आम जनता इन 14 वाम संगठनों को कितना समर्थन देती है।
शाहीन बाग़ लुधियाना में नज़र आए होली के रंग तिरंगे के संग

Saturday, December 14, 2019

हंबड़ाँ कत्ल काण्ड:जनसंघर्ष की शानदार जीत

Saturday:Dec 14, 2019, 5:49 PM
रिहा हुए 10 साथियों का जोशीली नारेबाज़ी से स्वागत: झूठे केस रद्द हुए 
15 दिसम्बर को होगी मज़दूर पुस्तकालय के सामने विशाल विजय रैली
लुधियाना:14 दिसम्बर 2019: (कामरेड स्क्रीन टीम)::
हंबड़ाँ कत्ल काण्ड विरोधी संघर्ष के दौरान जनवादी जनसंगठनों पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल), टेक्सटाईल-हौज़री कामगार यूनियन, भारतीय किसान यूनियन (एकता-डकौंदा) व नौजवान भारत सभा के झूठे पुलिस केस में जेल में बन्द किए 10 नेताओं-कार्यकर्ताओं पर थोपे गए झूठे पुलिस केस रद्द करवा लिए गए हैं। आज जेल से रिहा हुए साथियों का जेल के सामने पहुँचे विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं ने लाल झण्डों व जोशीले नारों के साथ स्वागत किया। जेल प्रशासन के निक्कमेपन की वजह से आई तकनीकी दिकक्त के कारण साथी गुरविन्दर की रिहाई नहीं हो पाई थी। आज सुबह उनकी रिहाई भी हो गई। 14 दिसम्बर को हँबड़ाँ व भूँदड़ी में जोशीले विजयी स्वागत मार्च किए गए। संघर्ष कमेटी द्वारा 15 दिसम्बर से सहायक पुलिस कमिश्नर (पच्छिमी) के सामने रखा अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन रद्द कर दिया गया है। अब 15 दिसम्बर को मज़दूर पुस्तकालय, ताजपुर रोड, लुधियाना पर 2 बजे विजय रैली की जाएगी।
       संघर्ष कमेटी ने इसे साझे जनवादी जनसंघर्ष की शानदार जीत करार दिया है। संघर्ष कमेटी के संघर्ष की बदौलत पहले पुलिस को हम्बड़ाँ कत्ल काण्ड के दोषी ठेकेदार रघबीर पासवान को गिरफ्तार करने पर मज़बूर होना पड़ा था। उसे सख्त से सख्त सजा करवाने के लिए व पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा दिलाने के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
       संघर्ष कमेटी द्वारा आज जारी प्रेस ब्यान में कहा गया है कि 18 नवंबर को जब लोग ठेकेदार रघबीर पासवान पर कत्ल केस दर्ज करने और उसकी गिरफ़्तारी, पीड़ित परिवार को मुआवज़ा देने, कारखानों और अन्य कार्य-स्थलों पर मज़दूरों की सुरक्षा की गारंटी करने आदि माँगों के लिए शान्तिपूर्ण रोष-प्रदर्शन कर रहे थे तो जायज मांगें मानने की जगह पुलिस को लोगों की अधिकारपूर्ण आवाज़ बर्दाशत नहीं हुई और लुधियाना पुलिस प्रशासन ने संघर्षरत लोगों को न सिर्फ़ मारा-पीटा बल्कि संगठनों के नेताओं-कार्यकर्ताओं सुखदेव सिंह भूँदड़ी, राजविन्दर, सुखविन्दर हम्बड़ाँ, जसमीत, गुरविन्दर, मेजर सिंह, जगदीश, चिमन सिंह, गुरदीप और शुलिन्दर को ग्रिफतार कर जेल में डाल दिया। उन पर पुलिस पर हमला करने, सड़क जाम करने और अन्य झूठे दोष लगाकर झूठा पुलिस केस दर्ज कर दिया गया। इस तरह पुलिस ने न सिर्फ़ दोषी को बचाने की कोशिश की है बल्कि यह मज़दूरों के लूट-दमन को बेरोक-टोक चलता रखने की, पूंजीपतियों के जंगल राज को चलता रखने की कोशिश है जहाँ मज़दूरों को कोई हक प्राप्त नहीं, जहाँ मज़दूरों का भयानक अपमान, मारपीट, कत्ल होते हैं। पुलिस ने लोगों के एकजुट संघर्ष करने के जनवादी-संवैधानिक अधिकार को कुचला है। संघर्ष कमेटी ने जनसंघर्ष के दम पर लुधियाना पुलिस प्रशासन के जनता के जनवादी अधिकारों पर इस हमले का डटकर जवाब दिया है।
       संघर्ष में टेक्सटाईल हौज़री कामगार यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल), भारतीय किसान यूनियन (एकता -डकोंदा), एटक, जमहुरी किसान सभा, कुल हिंद किसान सभा, मोलडर एंड स्टील वर्करज़ यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल), किरती किसान यूनियन, मोलडर एंड स्टील वर्करज़ यूनियन, सीटू, कारख़ाना मज़दूर यूनियन, नौजवान भारत सभा, सीटीयू, भारतीय किसान यूनियन (एकता -उगराहां), पेंडू मज़दूर यूनियन, उसारी मज़दूर यूनियन, इंकलाबी नौजवान विद्यार्थी मंच, लोक एकता संगठन, रेड़ीफड़ी यूनियन, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, पंजाब निर्माण मज़दूर यूनियन, पलस मंच, कामागाटामारू यादगारी समिति, इंकलाबी केंद्र पंजाब, इंकलाबी लोक मोर्चा, डेमोक्रेटिक मुलाज़िम फ्रंट, डीटीएफ, पंजाब रोडवेज़ इंपलाईज़ यूनियन, जल सप्लाई एण्ड सेनीटेशन कंट्रेक्ट वर्कर्ज यूनियन, पावरकॉम एण्ड टरांस्को ठेका मुलाजिम यूनियन संगठन शामिल रहे हैं। जेल के आगे रिहाई के अवसर पर व विभिन्न जगहों पर हुए विजयी स्वागत मार्चों को विभिन्न संगठनों के नेताओं लखविन्दर, बलजीत, हरदीप गालिब, गुरनाम सिद्धु, इन्दर, सूरज, हरदेव मुल्लापुर, बिन्नी, जसवीर सिंह, जसदेव ललतों, सुरिन्दर, अवतार विरक, कंवलजीत खन्ना, एम.एस. भाटिया, एसपी सिंह, संदीप, व अन्य नेता व बड़ी संख्या कार्यकर्ता हाजिर थे।

Tuesday, December 10, 2019

ACP (W) समीर वर्मा के खिलाफ़ रोष और गरमाया

Tuesday: 10th Dec, 2019, 5:02 PM
प्रतिनिधि मण्डल पुलिस कमिश्नर को मिला:झूठे मामलों में बंद नेताओं को रिहा करने की मांग 
15 दिसम्बर से अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन का ऐलान दोहराया 
लुधियाना: 10 दिसम्बर 2019: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::
आज हम्बड़ाँ कत्ल काण्ड दमन विरोधी संघर्ष कमेटी में शामिल विभिन्न जनसंगठनों का एक प्रतिनिधि मण्डल पुलिस कमिश्नर को मिला। प्रतिनिधि मण्डल ने माँग की कि हम्बड़ाँ कत्ल काण्ड के खिलाफ़ इंसाफ के लिए संघर्ष के दौरान एसीपी (पच्छिमी) समीर वर्मा द्वारा झूठे पुलिस में जेल में तीन हफतों से बन्द जननोताओं की तुरन्त रिहाई हो। संघर्ष कमेटी द्वारा आज जारी प्रेस ब्यान में कहा गया है कि अगर केस रद्द न हुए और नेताओं की रिहाई न हुई तो 15 दिसम्बर से एसीपी (पच्छिमी) समीर वर्मा के खिलाफ़ अनिश्चिताकालीन धरना प्रदर्शन किया जाएगा।
        18 नवम्बर को इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहे लोगों का दमन करने, जननेताओं को गिरफतार करने, झूठा पुलिस के बनाने, जेल में बन्द करने का दोषी सहायक पुलिस कमिश्नर (पच्छिमी) समीर वर्मा है। इसी अफसर ने ही संघर्ष कमेटी को भरोसा दिया था कि झूठा पुलिस केस रद्द होगा व नेताओं की रिहाई होगी। लेकिन इस प्रक्रिया को लटकाया गया है। रिहाई की प्रक्रिया पूरा करने का काम जो कुछ दिनों में हो सकता था व कई हफतों में भी पूरा नहीं हुआ। इस लिए केस रद्द न होने व रिहाई न होने की सूरत में संघर्ष कमेटी द्वारा इस अफसर के कार्यालय पर अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन करने का फैसला किया गया है।
        हम्बड़ाँ के एक पलाईवुड कारखाने में ठेकेदार रघबीर पासवान ने लवकुश नाम के 15 वर्षों के नाबालिग मज़दूर की पीट पीट कर हत्या कर दी थी। कत्ल केस दर्ज करके कालित को जेल में बन्द करने की जगह एसीपी समीर वर्मा ने इंसाफपसंद संघर्षशील नेताओं-कार्यकर्ताओं को ही झूठे पुलिस केस में जेल में बन्द किया हुआ है। इस खिलाफ संघर्ष कमेटी लगातार संघर्ष कर रही है।
          संघर्ष कमेटी में टेक्सटाईल हौज़री कामगार यूनियन, एटक, भारतीय किसान यूनियन (एकता-डकौंदा), भारतीय किसान यूनियन (एकता-उगराहां), कुल हिन्द किसान सभा, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल), किरती किसान यूनियन, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियन, सीटू, कारखाना मज़दूर यूनियन, नौजवान भारत सभा, सीटीयू, उसारी मज़दूर यूनियन, इंकलाबी नौजवान छात्र मंच, लोक एकता संगठन, रेड़ीफड़ी यूनियन, इंकलाबी मज़दूर केन्द्र, पलस मंच, पंजाब निर्माण मज़दूर यूनियन, कामागाटामारू यादगारी कमेटी, इंकलाबी केन्द्र पंजाब, इंकलाबी लोक मोर्चा, डेमोक्रेटिक मुलाजम फ्रण्ट, डीटीएफ, लाल झण्डा भट्ठा मज़दूर यूनियन, व अन्य अनेकों संगठन शामिल हैं। आने वाले दिनों में अन्य अनेक संगठनों के भी संघर्ष कमेटी में शामिल होने की अपील है।
इस संबंध में और जानकारी या इससे जुड़ने के लिए सम्पर्क किया जा सकता मोलडर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियन के अध्यक्ष हरजिन्दर सिंह सिंह के साथ उनके मोबाईल फोन नंबर-94643-60755 पर।