Wednesday, January 4, 2023

यह आजादी का अमृत वर्ष नहीं, पूंजीपतियों का अमृत वर्ष है

Tuesday 3rd January 2023 at 5:45 PM

विनोद सिंह ने शहीद श्यामल चक्रवर्ती की स्मृति में बहुत कुछ कहा 


धनबाद: 3 जनवरी 2023: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो):: 

शहीद श्यामल चक्रवर्ती कितने लोगों के दिलों में बस्ते हैं इसका अहसास इस श्रद्धांजलि आयोजन को देख कर हुआ जो उनकी समृति में किया गया। गौरतलब है कि 3 जनवरी 2023 को  धनबाद में शहीद श्यामल चक्रवर्ती स्मारक समिति एवं मार्क्सवादी युवा मोर्चा के संयुक्त तत्वाधान में आईआईटी, आईएसएम के प्रथम गेट पर शहीद श्यामल चक्रवर्ती का 32वां शहादत दिवस मनाया गया श्रद्धांजलि कार्यक्रम की अध्यक्षता काशीनाथ चटर्जी ने किया। इस यादगारी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बगोदर विधायक विनोद सिंह एवं विशिष्ट अतिथि बीबीएम काॅलेज के पूर्व प्राचार्य सिद्धार्थो वंद्योपाध्याय सहित सेकड़ों लोगों ने श्यामल चक्रवर्ती के प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद शहीद रणधीर वर्मा के स्मारक पर भी माल्यार्पण किया गया। स्नेह और सम्मान का एक सैलाब सा आया हुआ था। 

इस पर भी विशेष चर्चा हुई कि आज हमारा देश भले ही अमृत महोत्सव मना रहा है, लेकिन हमारी संघर्ष की लड़ाई अब भी जारी है। इस लड़ाई में हम उन शहीदों को नहीं भूल सकते, जिन्होंने अपनी कुर्बानियां दी है। यह बातें भाकपा माले के बगोदर विधायक विनोद सिंह ने धनबाद में आयोजित श्यामल चक्रवर्ती की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा। उनकी समृति में बहुत कुछ कहा गया। 

श्री सिंह ने कहा कि पूरा देश कारपोरेट घरानों के हाथों में खेल रहा है। कोयला, स्टील, बैंक सहित कई सेक्‍टर पर कारपोरेट घरानों की नजर है और सरकार उनके मन मुताबिक नियमों को बनाकर काम कर रही है। हमें उन क्षेत्रों को बचाना है, जिनके लिए संघर्ष की शुरुआत हुई है।

इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया कि श्‍यामल चक्रवर्ती के साहस को भुलाना मुमकिन नहीं है। उन्‍होंने कहा कि आज हमारा देश कहां खड़ा है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। किसान, मजदूर, बेरोजगार युवक रोजगार की लड़ाई लड़ रहे हैं। श्यामल चक्रवर्ती ने जिस साहस और पराक्रम का परिचय दिया है उसे हम भुला नहीं सकते। शहीद एसपी रणधीर वर्मा की शहादत को भी हम नमन करते हैं जिन्होंने अपने कर्तव्य और निष्ठा का पालन करते हुए अपनी जान गंवा दी।

श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कामरेड विनोद सिंह ने कहा कि आजादी के 75वर्ष की उपलब्धि की विडम्बना यह है कि भाजपा रेल, बैंक, कोयला, शिक्षा इन सभी चीजों को निजीकरण के नाम पर कारपोरेट घरानों को बेच रही है। मोदी सरकार के कार्यकाल में सहारा एवं अन्य प्राइवेट कंपनियों ने लूट की छूट पूरा फायदा उठाया। 

उपभोक्ताओं की गाढ़ी कमाई को लूटा जा रहा है। इन्हें सार्वजनिक संस्थाओं  को बेचा जा रहा है।  दूसरी तरफ इस देश के  एक-एक नागरिक ने देश की सुरक्षा एवं सम्मान की चिंता की है। इसके लिए लोगों ने शहादत तक दिया है। शहीद श्यामल चक्रवर्ती और रणधीर प्रसाद वर्मा दोनों ही अपने पद एवं  दायित्व के साथ देश की रक्षा के लिए शहीद हुए। 

यह आजादी का अमृत वर्ष नहीं, पूंजीपतियों का अमृत वर्ष है

शहीद का दर्जा इन दोनों ही शहीदों को मिलना चाहिए था। लेकिन शहीद श्यामल चक्रवर्ती को सम्मान न देकर सरकार ने आम जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है. यह आजादी का अमृत वर्ष नहीं, पूंजीपतियों का अमृत वर्ष है। उन्होंने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार गरीबों का खून चूस रही है। 

विशिष्ट अतिथि बीबीएम काॅलेज के पूर्व प्राचार्य सिद्धार्थो वंद्योपाध्याय ने कहा कि शहीद श्यामल चक्रवर्ती को सरकार ने नागरिक सम्मान नहीं दिया, लेकिन आज धनबाद कोयलांचल के सैकड़ों लोगों ने माल्यार्पण कर एवं श्रद्धांजलि देकर सम्मान दिया। मासस के केंद्रीय महासचिव हलधर महतो ने कहा कि वर्तमान एवं पूर्व सरकार शहीद श्यामल चक्रवर्ती को नागरिक सम्मान देने में विलंब कर रही है जबकि शहीद रणधीर प्रसाद वर्मा को नागरिक सम्मान देने में सरकार ने तनिक भी देर नहीं की। स्मारक समिति एवं मायुमो प्रत्येक वर्ष शहीद श्यामल चक्रवर्ती को नागरिक सम्मान दिलाने के लिए हर साल माल्यार्पण एवं श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करते आये हैं। 

शहादत दिवस पर आई श्‍यामल चक्रवर्ती की बहादुरी की याद

मंगलवार को श्यामल चक्रवर्ती के शहादत पर आईएसएम गेट स्थित शहीद श्यामल चक्रवर्ती के प्रतिमा पर उनके शहादत दिवस के अवसर पर फुलमाला चढ़ाकर श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों का तांता लगा रहा। यह कार्यक्रम श्यामल चक्रवर्ती स्मारक समिति व मार्क्सवादी युवा मोर्चा के तत्वाधान में किया गया था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ज्ञान-विज्ञान समिति के काशीनाथ चटर्जी ने कहा कि सरकार आती है और चली जाती है लेकिन एक नागरिक देश की संपत्ति को बचाने के लिए जो कुर्बानी देता है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। सभा को मासस के केन्द्रीय सचिव हरि प्रसाद पप्पू, बबलू महतो, जिला अध्यक्ष बिंदा पासवान, जगदीश रवानी, मुखिया सुलोचना देवी, शेख रहीम, रामाकृष्णा, सीपीएम के गोपीकान्त बक्शी आदि ने सम्बोधित किया। भाकपा(माले) के जिला सचिव कार्तिक प्रसाद ने धन्यवाद ज्ञापन किया। 

दोनों वीर सपूतों की शहादत को सलाम

माकपा जिला सचिव मंडल सदस्य राम कृष्णा पासवान ने कहा कि आज के दिन दो शहादतें हुई थीं। एक पुलिस महकमे से एसपी रणधीर वर्मा, जिन्‍हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। दूसरे धनबाद के सपूत एक जिम्मेदार नागरिक, जो अपनी जान की परवाह किए बगैर बैंक लुटेरों से लड़ते हुए शहीद हो गए। शहीद श्यामल चक्रवर्ती को सरकारी सम्मान मिले या न मिले पर वे धनबाद के लाखों दिलों में बसते हैं, जिस पर हमे गर्व है। उनके शहादत को हम सलाम करते हैं।

श्रद्धांजलि सभा में मार्क्सवादी युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष पवन महतो, सुभाष चटर्जी, सुभाष सिंह, टूटून मुखर्जी, रुस्तम अंसारी, दिल मोहम्मद, संदीप कौशल, समीर गोस्वामी, कल्याण घोषाल, बादल बाउरी, आदि समेत सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया। 

Monday, January 2, 2023

जल्द ही देश सेवक तीन भाषाओं में प्रकाशित होगा-कॉमरेड सेखों

1 जनवरी 2023 को शाम 06:10 बजे 

'देश सेवक' की शमा को हम बुझने नहीं देंगें:कॉमरेड युसूफ तारिगामी 


चंडीगढ़: 1 जनवरी 2023: (कार्तिका सिंह//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब में अधिकतर मीडिया संगठनों द्वारा अपनी वर्षगांठ आम तौर पर इस तरह खुले में नहीं मनाई जाती जिसमें आम लोग भी सहभागी बन सकें। इस तरह के आयोजनों की कमी अक्सर खलती भी है। मनाए जाने पर भी वे संबंधित मीडिया संगठनों के कार्यालयों की सीमाओं के भीतर ही रह जाती है जिसकी खबर अगले दिन प्रासंगिक समाचार पत्र में प्रकाशित की जाती है। 

ऐसे माहौल में 'देश सेवक' की 27वीं जयंती बहुत ही भव्य तरीके से मनाई गई जिसमें दूर-दूर से आम कार्यकर्ताओं, मज़दूरों और किसानों के नेता पहुंचे. करतार सिंह, एक बुजुर्ग व्यक्ति, लुधियाना के एक गाँव से आया था और उसकी उम्र 75 वर्ष से अधिक थी। इन सभी ने एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और जन-समर्थक रुख बनाए रखने का संकल्प लिया और कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के सपनों को साकार करने के प्रयासों को जारी रखने का संकल्प दोहराया। माकपा के राज्य सचिव और दैनिक देश सेवक के प्रबंध निदेशक कॉमरेड सुखविंदर सिंह सेखों ने देश सेवक द्वारा निभाई गई भूमिका के बारे में बहुत कुछ याद दिलाया। 

स्थानीय सेक्टर 29-डी के बाबा सोहन सिंह भकना भवन में पूरा दिन भर चहल-पहल रही। गर्म चाय और पकौड़े अटूट लंगर के रूप में वितरित हो रहे थे। कड़ाके की ठंड के बीच गर्मजोशी भरे जज़्बातों से भरे लोग दूर दूर से पहुंचे थे। इस तरह देश सेवक की 27वीं वर्षगांठ भव्य तरीके से मनाई गई। समारोह बेशक एक घंटे की देरी से शुरू हुआ लेकिन शुरू होने के बाद बिना रुके चलता रहा। मंच से बोलने वाला  हर वक्ता अनमोल था।  उसका जहर शब्द नई जानकारी से भरा था। इस तरह हर पल स्मरणीय बना रहा। इस कार्यक्रम को सुनने से एक पल भी वंचित रहना एक घाटे का सौदा था। इस स्मृति समारोह की अध्यक्षता माकपा राज्य सचिवालय सदस्य कामरेड भूपचंद चन्नो ने की और मंच सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे राज्य सचिवालय सदस्य कामरेड गुरदर्शन सिंह खासपुर ने निभाई।

बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने के लिए उत्सुकता से पहुंचे पहुंचे हुए थे। यह हर उम्र के लोग थे।  पार्टी के प्रोग्रामों से पूरी तरह जुड़े हुए लोग। इन्हें मीडिया की समझ बेशक ज़्यादा न भी रही हो लेकिन आज जनता का पक्ष लेने वाला मीडिया कितना महत्वपूर्ण हो गया है इसका पता इन्हें ज़रूर था। 

इस कार्यक्रम में विशेष रूप से माकपा के सेंट्रल कमेटी सदस्य और जम्मू-कश्मीर से कई बार विधायक कॉमरेड मुहम्मद यूसुफ तारिगामी भी विशेष रूप से पहुंचे हुए थे। लोग उन्हें सुनने को उत्सुक थे। कॉमरेड सुखविंदर सिंह सेखों, 'देश सेवक' के एमडी और सीपीआई (एम) के राज्य सचिव, राज्य सचिवालय सदस्य कॉमरेड राम सिंह नूरपुरी, कॉमरेड गुरनेक सिंह बजल, कॉमरेड सुचा सिंह अजनाला, कामरेड सुखप्रीत सिंह जोहल, कॉमरेड अब्दुल सतार, चेतन शर्मा, इस कार्यक्रम में देश सेवक के स्थानीय संपादक सह महाप्रबंधक, संपादक रिपुदमन रिप्पी और देश सेवक के मुद्रक और प्रकाशक रंजीत सिंह शामिल हुए। पंजाब का शायद ही कोई ऐसा कोना हो जहां से देश सेवक से जुड़े लोगों के एक जा दो प्रतिनिधि न पहुंचे हों। 

इस मौके पर देश सेवक के मिशन को और आगे ले जाने की बात भी कही गई। इस बीच, एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए कॉमरेड युसूफ तारिगामी ने कहा कि उन्हें आज नए साल का तोहफा मिला है, क्योंकि वे आपस में बैठकर अपने दिल की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 1920 के दशक में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंद किए गए 'देश सेवक' को फिर से शुरू करने की इच्छा कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के मन में लगातार बनी रही और इसे अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उन्होंने 1 जनवरी 1996 को इस सपने को साकार किया। 

इस तरह कामरेड सुरजीत ने देश सेवक के पुनर आगमन के इस सुअवसर को फिर से सच कर दिखाया। इस प्रकार देश सेवक का संघर्ष भरा इतिहास एक बार फिर सामने आ गया, जिससे आज भी बहुत से लोग अनभिज्ञ हैं। स्वतंत्र और जनसमर्थक मीडिया के रास्ते में आने वाली कठिनाइयों की भी बात हुई। कॉमरेड युसूफ तारिगामी ने कहा कि इस पल को किसी भी सूरत में फीका नहीं पड़ने दिया जाएगा। 

उन्होंने कहा कि आज सही मायनों में पत्रकारिता बहुत कठिन कार्य है। संपादक को कलम उठाने से पहले सोचना पड़ता है, क्योंकि यदि आदेश का उल्लंघन होता है तो उस संपादक के खिलाफ ईडी, सीबीआई या कोई अन्य एजेंसी कार्रवाई कर सकती है. उन्होंने कहा कि 'देश सेवक' ने अब तक कई चुनौतियों का सामना किया है और भविष्य में भी करना होगा, जिसका सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार हैं।

इस यादगार समारोह के मौके पर 'देश सेवक' के कैलेंडर और डायरी का भी विमोचन किया गया। कॉमरेड युसूफ तारिगामी ने कहा कि 'देश सेवक' कभी भी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटा है और वह अपने पाठकों के प्रति जवाबदेह है और रहेगा. उन्होंने कहा कि यह अखबार दबे-कुचले लोगों का मुखपत्र बन गया है और उनके मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। 

कॉमरेड युसूफ तारिगामी ने कहा कि आज जब देश की स्थितियों को शासकों ने दूसरी दिशा में मोड़ दिया है तो शासकों की लोकलुभावन नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए 'देश सेवक' की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्होंने जनता को समर्पित मीडिया के महत्व की भी बहुत सी गहरी बातें विस्तार से कहीं। 

उन्होंने कहा कि आज संवैधानिक संस्थाओं पर खतरा है क्योंकि शासक अपने निजी स्वार्थों के लिए इनका दुरुपयोग कर रहे हैं.जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने को लेकर उन्होंने कहा कि सरकार बताए कि क्या यह हमारे संविधान के खिलाफ है. कोई उपवाक्य नहीं है, या यह किसी विदेशी संविधान का उपवाक्य है? उन्होंने कहा कि जब भारत का संविधान लिखा गया था तो उसमें यह खंड भी शामिल था। 

उन्होंने कहा कि जहां केंद्र शासित प्रदेश हैं, वहां उन्हें राज्य बनाने की मांग हो रही है. इसके विपरीत, जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया गया है और इसे दो भागों में विभाजित कर एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है।उन्होंने कहा कि केंद्र द्वारा 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद, लोगों को वहाँ जो हुआ वह स्पष्ट है। लोगों के बोलने, सुनने, कपड़े पहनने, खाने-पीने और चलने पर पाबंदियां लगा दी गई हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र को बताना चाहिए कि क्या ये लोग भारत के नागरिक नहीं हैं. उनके साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जाता था।

कामरेड युसूफ तारिगामी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग लोकतंत्र प्रेमी लोग हैं, उन्होंने 1947 में बंटवारे के वक्त आपसी भाईचारे का रास्ता नहीं छोड़ा और उससे पहले देश की आजादी के लिए लड़े संघर्ष में भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि केंद्र की तरफ से पंजाब और जम्मू कश्मीर, जो दोनों सीमावर्ती राज्य हैं, पर विशेष प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि इन दोनों राज्यों के लोग भिखारी नहीं हैं, वे नागरिकों की तरह व्यवहार करना चाहते हैं। वे अपना अधिकार चाहते हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब में 50 किलोमीटर का इलाका बीएसएफ को सौंप दिया गया है, जहां से सत्ताधारियों की मंशा देखी जा सकती है। पंजाब के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान दिया, लेकिन आतंकवाद के दौर में भी भाईचारा बनाए रखा और दिल्ली की सीमा पर लड़े गए 'किसान आंदोलन' में प्रमुख भूमिका निभाई। 

उन्होंने कहा कि किसान चाहे जम्मू-कश्मीर का हो या पंजाब का, वह खेती में लगा रहेगा और उसकी रक्षा करेगा और फसलों की कीमत भी खुद तय करेगा। कॉमरेड युसूफ तारिगामी ने कहा कि बीजेपी को अब समझ लेना चाहिए कि देश की जनता उसके इशारों पर ज़्यादा दिन चलने वाली नहीं है।  

अंत में उन्होंने 'देश सेवक' के पूरे प्रबंधन को उसकी 27वीं वर्षगांठ पर बधाई दी और साथ देने का आश्वासन भी दिया। रोज़ाना देश सेवक के प्रबंध निदेशक और पार्टी के प्रदेश सचिव कामरेड सुखविंदर सेखों ने भी मंच से ऐसे कई मामलों का जिक्र किया जिनमें देश सेवक ने सतर्क और ज़िम्मेदार मीडिया की भूमिका निभाई। उन खास समाचारों की बातें भी हुई जिन्हें छपने की हिम्मत केवल देश सेवक ने भी निभाई। सिर्फ देश सेवक ने ही सबसे पहले सनसनीखेज़ खुलासे किए जो पूरी तरह सच भी थे। इन्हें छापने का साहस देश सेवक ने ही दिखाया। 

एक प्रसिद्ध डेरे की खबर का ज़िक्र याद दिलाते हुए कॉमरेड सेखों ने कहा कि 2002 में जब इस खबर वाली गुमनाम चिट्ठी छपी थी तो उस दिन की खबर 200 रुपये से 500 रुपये तक प्रति अखबार ब्लैक में भी बिक रही थी। देश सेवक अपनी निष्पक्षता और साहस के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ। कामरेड सेखों ने कहा कि देश सेवक को जल्द ही तीन भाषाओं में प्रकाशित करने की योजना बनाई जा रही है ताकि ये अखबार उत्तर भारत के एक मजबूत मीडिया के रूप में उभरें। 

इस विशेष सभा को संबोधित करते हुए कॉमरेड सेखों ने कहा कि कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का मिशन था कि एक ऐसा अखबार होना चाहिए जो साम्प्रदायिक विभाजन और रूढ़िवाद का विरोध करे। इसी मिशन के तहत आज से 27 साल पहले उन्होंने 'देश सेवक' को फिर से शुरू किया। उन्होंने कहा कि इस दौरान बड़ी मुश्किलें आईं और कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन 'देश सेवक' अपने रास्ते पर बेखौफी से चलता रहा।  उन्होंने याद दिलाया कि 'देश सेवक' ने कई खबरें प्रमुखता से छापी, जिनका संबंध समाज से था। 

उन्होंने कहा कि 25 सितंबर 2002 को देश सेवक में सिरसा की एक तथाकथित साध्वी द्वारा यौन शोषण की शिकार एक लड़की द्वारा लिखा गया गुमनाम पत्र प्रकाशित किया गया था, जिसका स्वत: संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। इस मामले के खुलासे ने सारी दुनिया में हलचल सी मचा दी थी।  मामला।तथाकथित धर्मस्थलों की हकीकत को सामने लाया था देश सेवक। 

उन्होंने कहा कि जब पंचकूला की सीबीआई अदालत ने 25 अगस्त, 2017 को इस तथाकथित साध को सजा सुनाई, तो 26 अगस्त, 2017 के अंग्रेजी ट्रिब्यून ने अपनी छपी खबर में 'देश सेवक' और तथाकथित साधु बाबाओं की भूमिका का खुलकर उल्लेख किया था। गौरतलब है कि 'देश सेवक' में इस साध के खिलाफ कांड भी प्रकाशित हुआ था। उसे गुमनाम पात्र को देश सेवक ने ही पहल करके छपा था। 

उन्होंने कहा कि कॉमरेड सुरजीत का सपना था कि 'देश सेवक' तीन भाषाओं में प्रकाशित हो और यह उत्तर भारत का प्रमुख समाचार पत्र बने। उन्होंने कहा कि कामरेड सुरजीत के इस सपने को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है। 

कामरेड सुरजीत की यादों और सपनों के विषय पर कॉमरेड सेखों ने बताया कि कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का नाम स्कूल से तब हटा दिया गया जब वह 9वीं कक्षा में पढ़ रहे थे, पार्टी की मांग पर सरकार ने उस स्कूल को कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत में बदल दिया है। इसी तरह जंडियाला से नवां पिंडा तक की साढ़े 24 किमी लंबी सड़क का नाम भी कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के नाम पर रखा गया है।

उन्होंने कहा कि कामरेड सुरजीत ने स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि 23 मार्च, 1932 को कांग्रेस की ओर से डीसी कार्यालयों पर तिरंगा फहराने और यूनियन जैक फहराने का निमंत्रण दिया गया था, लेकिन बाद में इस निमंत्रण को वापस ले लिया गया. उन्होंने कहा कि इस मौके पर कॉमरेड सुरजीत 16 साल के थे और वह होशियारपुर कांग्रेस कार्यालय पहुंचे और उनसे पूछा कि आवाहन का क्या हुआ, तो उन्हें बताया गया कि उसे वापस ले लिया गया है। इस पर कामरेड सुरजीत नाराज़ हुए और पुछा की इसे वापिस क्यों लिया गया। इस पर वहां किसे ने कॉमरेड सुरजीत से कहा गया कि अगर आपकी इच्छा है तो आप खुद तिरंगा चढ़ा दें। 

इस पर कामरेड सुरजीत डीसी कार्यालय पहुंचे और यूनियन जैक हटाकर तिरंगा फहराया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने इस स्थान को कामरेड सुरजीत के स्मारक के रूप में विकसित करने की मांग की है। कामरेड सेखों ने कहा कि 23 मार्च को जिस स्थान पर कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का जन्म दिवस मनाया जायेगा, उसी स्थान पर शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव का शहीदी दिवस भी मनाया जायेगा। इस मौके पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सीताराम येचुरी पहुंचेंगे। 

देश सेवक वर्षगांठ के इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए 'देश सेवक' के स्थानीय संपादक सह महाप्रबंधक चेतन शर्मा ने कहा कि नए प्रबंधन ने पांच साल पहले संगठन का प्रबंधन संभाला था. इस दौरान कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। उन्होंने कहा कि कामरेड सुरजीत की सोच पर पहरा देकर 'देश सेवक' की बेहतरी के लिए दिन-रात एक किए जा रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि कॉमरेड सुरजीत का सपना था कि 'देश सेवक' का प्रकाशन अन्य भाषाओं में भी हो, इसलिए 2020 में संस्था ने एक पंजाबी और अंग्रेजी वेबसाइट शुरू की। उन्होंने कहा कि ढाई साल में एक करोड़ 97 लाख दर्शक इससे जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में मीडिया की क्या स्थिति है, यह सभी जानते हैं, लेकिन 'देश सेवक' ने निष्पक्ष पत्रकारिता की राह नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि जल्द ही दूसरी भाषा में भी 'देश सेवक' शुरू होने जा रहा है।

दैनिक 'देश सेवक' के संपादक रिपुदमन रिप्पी ने बोलते हुए कहा कि 'देश सेवक' ने हमेशा लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा की है और लगातार जन-समर्थक दृष्टिकोण अपनाया है। उन्होंने कहा कि आज देश की आम जनता महंगाई और बेरोजगारी के बोझ तले जी रही है और सामाजिक स्तर पर सत्ताधारियों द्वारा धर्म के आधार पर जहरीली साम्प्रदायिकता फैलाई जा रही है, जिससे लोगों में फूट पड़ रही है। ऐसे नाज़ुक माहौल में "देश सेवक" जैसे अखबारों की ज़िम्मेदारी खूब बढ़ जाती है। 

इसी बीच 'देश सेवक' का साल 2023 का कैलेंडर और डायरी भी जारी की गई। अंत में, कॉमरेड भूप चंद चन्नो ने कार्यक्रम में आए सभी लोगों का धन्यवाद किया। भी पी। सिंह नागरा और अन्य भी अंत तक पूरी तरह से सक्रिय रहे। कुल मिलाकर, कई पुराने मित्रों, जो इस परिवार के सक्रिय सदस्य भी थे, की अनुपस्थिति तो बहुत खली लेकिन इसके बावजूद यह आयोजन बहुत यादगारी रहा। 

आयोजन में पहुंचने वाले लोगों की सही संख्या का अनुमान लगाने में भी आयोजक कुछ चूक गए। हॉल में इतने लोग पहुँच गए थे की वहां खड़ा होना भी काफी मुश्किल हो रहा था जिससे मीडिया को भी कवरेज करने में दिक्कत हो रही थी। लंगर भी इसी वजह से काम पड़ता महसूस हुआ। वैसे बड़े आयोजनों में तमाम कोशिशों के बावजूद यह सब कुछ न कुछ कहीं न कहीं रह ही जाता है। अब उम्मीद है की अगले बरस 28 वीं वर्षगांठ को और भी बड़े पैमाने पर मनाया जाएगा। गोदी मीडिया की बड़ी संख्या के कारण जनता को समर्पित मीडिया की भूमिका और  भी बढ़ जाती है। 

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Monday, December 12, 2022

पंजाब में उद्योगपतियों के खिलाफ लंबित 500 से अधिक आपराधिक मामले

 सोमवार 12 दिसंबर 2022 अपराह्न 03:04 बजे 

श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन का मुद्दा फिर गरमाया 

चंडीगढ़: 12 दिसंबर 2022: (कार्तिका सिंह//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

राजनीतिक दल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और दुसरे सरमाएदारों से अक्सर चंदा लेते रहते हैं। कभी छुप कर कभी किसी तरह बता कर भी। इस तरह के चंदे से चलने वाले दलों और इस तरह के चंदे से बनी सरकारों और दलों से  आम गरीबों और श्रमिकों के कल्याण की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस तरह के अमीरों और सेठों को भी रवीश कुमार ने एनडीटीवी छोड़ने के बाद आड़े हाथों लेते हुए गोदी सेठ का नाम दिया है जो सरकार की गोदी में बैठ कर अपने कारोबार चलाते हैं। ऐसे गोदी सेठ पंजाब में भी देखे जा सकते हैं। 

राजनीतिक दलों का यह दोहरा चरित्र लंबे समय से चला आ रहा है। ऐसी पार्टियां और ऐसी सरकारें किसी न किसी बहाने से केवल पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का ही पक्ष लेती हैं। मज़दूरों का खून निचोड़ कर अमीर बनने वाले इन पूंजीपतियों के खिलाफ मज़दूरों का गुस्सा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। इस गुस्से को नियंत्रित रखने में भी ट्रेड यूनियन लहर काफी कुछ सकारत्मक करती है। मज़दूरों के प्रति ईमानदार ट्रेड यूनियनों ने कई बार इस अन्याय के प्रति गंभीरता भी दिखाई है और साहसिक कदम उठाए हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर जन कार्रवाई के बिना यह सब न कभी बेनकाब होगा और न ही कभी पूरी तरह बंद होगा।

सबसे पुराने ट्रेड यूनियन संगठन "एटक" यानी "ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काउंसिल" की पंजाब स्टेट कमेटी ने इस तरह का चलन जारी रहने का गंभीर नोटिस लिया है और इस पर गहरी चिंता भी व्यक्त की है। एटक की राज्य कमेटी ने मांग की है कि इस चलन पर तुरंत रोक लगाई जाए और उद्योगपतियों के खिलाफ लंबित मामलों का तुरंत फैसला किया जाए। इसके साथ ही एटक ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि ऐसे लोगों को कानून का उल्लंघन करने पर सख्त सजा दी जानी चाहिए और वह भी बिना किसी देरी के।

एटक ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन के कारण पंजाब के उद्योगपतियों के खिलाफ विभिन्न अदालतों में 500 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। फैक्ट्रीज एक्ट 1948, ईएसआईसी (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) और कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) जैसे विभिन्न कानूनों की धज्जियां उड़ाकर श्रमिकों की लूट के कारण फंसे उद्योगपतियों ने पंजाब सरकार से अब माफी का अनुरोध किया है। 

भारतीय उद्योग मंडल पंजाब राज्य परिषद के अध्यक्ष अमित थापर ने पंजाब के मुख्यमंत्री से इन सभी आपराधिक मामलों से उद्योगपतियों को बरी करने के लिए पहल करने की अपील की है। उद्योगपतियों के इस कदम का पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़ और महासचिव निर्मल सिंह धालीवाल ने तीखा विरोध किया है। 

कामरेड निर्मल सिंह धालीवाल ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए इस साज़िशी मांग को आड़े हाथों लिया है और मांग की है कि सरकार अपने श्रम विभाग का प्रयोग कर के कानूनों की धज्जियां उड़ाने वाले इन लोगों के खिलाफ प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करे। एटक ने स्पष्ट कहा कि इन लोगों की बेइंसाफी भरी हरकतों का शिकार बने भोले-भाले मजदूरों को न्याय दिया जाए। 

दोनों ट्रेड यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया है कि पिछली सरकारों की मज़दूर  विरोधी नीतियों के चलते इन लोगों ने श्रम विभाग के साथ मिलकर पूरी तरह से मज़दूरों को लूटा है और पिछले 10 सालों से न्यूनतम वेतन में भी कोई बढ़ोतरी नहीं की है। एटक के दोनों नेताओं ने कहा है कि अब उद्योगपति केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिता का सहारा लेकर आरोपों से माफी की मांग कर रहे हैं। 

उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की है कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कदम उठाना है तो सबसे पहले मज़दूरों का शोषण करने वालों के खिलाफ सख्त निर्णय लेकर कर्मचारियों व कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान किया जाए। सरकार को उन्हें रियायतें देने के किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए। 

अब देखना होगा कि एटक की इस जोरदार मांग का पंजाब सरकार पर क्या असर पड़ता है?पंजाब  सरकार पीड़ित मजदूरों को न्याय देती है या उद्योगपतियों को माफी, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा। अमीरों का धन और गरीबों का वोट दोनों ही राजनीतिक दलों के लिए सदा से ही आवश्यक रहे हैं। क़ज़ा आज के आधुनिक युग में यही सब चलेगा?

तमाम दबावों के बावजूद मज़दूर श्रमिक और अन्य कार्यकर्ता आज भी साहिर लुधियाना साहिब के इस गीत के प्रति समर्पित हैं।

हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे!

इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!

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Saturday, October 29, 2022

पार्टी को उन मूल्यों का बचाव करना है जो कांग्रेस के गठन का आधार थे

29th October 2022 at 04:11 PM

भारतीय प्रजातंत्र, चुनावी राजनीति और कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव

कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों पर श्री राम पुनियानी का विशेष लेख


जो लोग सोनिया गांधी को विदेशी बताकर प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे वे ही ऋषि सुनाक के इंग्लैंड का प्रधानमंत्री निर्वाचित होने पर खुशियां मना रहे हैं-इसी लेख में से..... 

भोपाल: 29 अक्टूबर 2022:(राम पुनियानी//कामरेड स्क्रीन)::

हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राजनीति में लंबा अनुभव रखने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे निर्वाचित घोषित किए गए। इस अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित पद पर बैठने वाले वे तीसरे दलित हैं। पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करीब 24 साल बाद हुए। यह दिलचस्प है कि कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़कर, भारत में लगभग सभी पार्टियों के पदाधिकारी नामांकित होते आए हैं। अधिकांश पार्टियों पर विशिष्ट परिवारों का कब्जा रहा है। यद्यपि भाजपा, कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करती रही है परंतु भाजपा में राजनैतिक वंशों की कोई कमी नहीं है। भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसका नियंत्रण एक दूसरी संस्था - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - के हाथों में है। कांग्रेस पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह गांधी परिवार का नियंत्रण में है। हमें यह याद रखना चाहिए कि सन् 2004 में जब सोनिया गांधी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया गया था तब अनेक व्यक्तियों और दलों ने इसका जमकर विरोध करते हुए सोनिया के विदेशी मूल का होने का हवाला दिया गया था। सोनिया गांधी उस समय कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता थीं, सांसद थीं और प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार थीं। यह दिलचस्प है कि जो लोग सोनिया गांधी को विदेशी बताकर प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे वे ही ऋषि सुनाक के इंग्लैंड का प्रधानमंत्री निर्वाचित होने पर खुशियां मना रहे हैं। 

खड़गे एक ऐसे समय कांग्रेस का नेतृत्व संभाल रहे हैं जब पार्टी के समक्ष असंख्य चुनौतियां उपस्थित हैं और राजनीति के प्रांगण में विघटनकारी ताकतों का बोलबाला है।अन्य क्षेत्रों में भी भगवा विचारधारा वालों को प्राथमिकता दी जा रही है। उदाहरण के लिए विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और शिक्षकों की भर्ती का आधार उनकी विचारधारा होती है ना कि उनकी शैक्षणिक योग्यता। यह एक ऐसा समय है जब देश में कई तबके तरह-तरह की परेशानियों से घिरे हुए हैं।

वैश्विक स्तर पर भूख, प्रेस की स्वतंत्रता, प्रजातांत्रिक आजादियां, धर्म की स्वतंत्रता आदि के सूचकांकों में भारत की स्थिति गिरती ही जा रही है. आम लोगों की आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ी है. कीमतें बढ़ रही हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है और खेती से जीवनयापन करना मुश्किल होता जा रहा है। कई अंतर्राष्ट्रीय एजेसिंयों ने अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचारों के बारे में चेतावनी दी है। नरसंहारों के अंतर्राष्ट्रीय अध्येता ग्रेगोरी स्टेंटन ने भी कहा है कि भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। 

जाहिर है कि इस पृष्ठभूमि में भारत की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के समक्ष चुनौतियों का अंबार है। पार्टी को उन मूल्यों का बचाव करना है जो कांग्रेस के गठन का आधार थे।  सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के पहले देश में कई आधुनिक संस्थाएं अस्तित्व में आ चुकीं थीं। इनमें शामिल थीं बाम्बे एसोसिएशन, मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा आदि. इन सभाओं के प्रतिनिधियों की 1883 में कलकत्ता में हुई बैठक में इस बात पर जोर दिया गया था कि देश के नागरिकों की राजनैतिक मांगों को अंग्रेजों तक पहुंचाने के लिए एक राजनैतिक मंच की आवश्यकता है। इन मांगों में शामिल थीं देश का औद्योगिकरण, भू-सुधार, आईसीएस परीक्षा  केन्द्रों की भारत में भी स्थापना और प्रशासन में भारतीयों की अधिक सहभागिता।       

लार्ड ए. ओ. ह्यूम इन विभिन्न संगठनों और उनके नेतृत्व को एकसाथ लाए और राजनीति में भारतीयों की अधिक भागीदारी के लिए प्रयास करने हेतु एक संगठन बनाया। यह संगठन धर्म, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर था। समय के साथ महिलाएं भी इसमें शामिल हुईं। कांग्रेस में अध्यक्ष का पद बहुत महत्वपूर्ण था और पार्टी के अध्यक्षों में मुस्लिम (मौलाना आजाद), ईसाई (डब्लू. सी. बनर्जी) और पारसी (दादाभाई नैरोजी) शामिल थे।  इन सबके संयुक्त प्रयासों से कांग्रेस एक समावेशी मंच बन सकी। पार्टी के शुरूआती वर्षों में लोकमान्य तिलक, एम. जी. रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले आदि ने प्रजातांत्रिक मूल्यों को स्वर दिया और औपनिवेशिक शासकों की तानाशाहीपूर्ण नीतियों के विरूद्ध याचिकाएं प्रस्तुत कीं। 

परिदृश्य पर महात्मा गांधी के उभरने के साथ ही जनांदोलन शुरू हुए जिन्होंने लोगों को एक किया। अंततः इन्हीं जनांदोलनों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। महात्मा गांधी का मंत्र था कि आखिरी पंक्ति के आखिरी मनुष्य के हितों का ध्यान रखा जाए। एक तरह से उनका यह सिद्धांत कांग्रेस की नीतियों का पथ प्रदर्शक बन गया। दुर्भाग्यवश वैश्विक हालातों के चलते कांग्रेस सरकारों को ऐसी नीतियां लागू करनी पड़ीं जो निर्धन वर्गों के हितों के अनुरूप नहीं थीं। परंतु फिर भी यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकारों की नीतियां काफी हद तक जनोन्मुखी थीं. इन्हीं सरकारों के दौर में सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार जैसे क्रांतिकारी कानून बनाए गए। इस दौर में सामाजिक आंदोलनों और प्रगतिशील ताकतों को सरकार की समाज कल्याण नीतियों को आकार देने का मौका मिला।

पहचान की राजनीति की शुरूआत ने सब कुछ उलट-पलट दिया. सन् 1980 और 1986 के आरक्षण विरोधी दंगे आने वाले समय की चेतावनी थे। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद सकारात्मक भेदभाव की नीतियों का विरोध, आडवानी की रथयात्रा और उसके बाद बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के रूप में सामने आया। धर्म के आधार पर लोगों को विभाजित किया जाने लगा। गौमांस, गाय, घर वापसी, जनसंख्या संतुलन आदि मुख्य मुद्दे बन गए जिससे हमारी सांझा संस्कृति और परंपराओं पर आधारित बंधुत्व कमजोर हुआ। 

हाल में आयोजित कांग्रेस का उदयपुर सम्मेलन एक नई शुरूआत हो सकता है। इस सम्मेलन से यह आशा जागृत होती है कि शायद हमारे देश में बंधुत्व फिर से स्थापित होगा, हमारे संविधान की उद्धेश्यिका में वर्णित मूल्यों को प्रोत्साहित किया जाएगा और प्रशासनिक तंत्र में साम्प्रदायिक तत्वों की घुसपैठ को रोकने के प्रयास होंगे।

जिस समय खड़गे को अध्यक्ष चुना गया है उस समय पार्टी के एक शीर्ष नेता राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं। यह यात्रा यदि सचमुच लोगों को जोड़ सकी तो इससे गांधी, पटेल, नेहरू, सुभाष और अम्बेडकर के सपनों के भारत के निर्माण में मदद मिलेगी। इस यात्रा में जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं वे महत्वपूर्ण हैं। हमें संविधान पर बढ़ते हमलों की ओर भी ध्यान देना होगा और संविधान की समावेशी आत्मा को बचाए रखना होगा। 

नए अध्यक्ष को सिद्धांतों के आधार पर विपक्ष की एकता कायम करने पर विचार करना चाहिए। ये सिद्धांत प्रेम, सदभाव और शांति से जुड़े हो सकते हैं। विपक्षी दलों में एकता कायम करने के लिए ऐसी आर्थिक नीतियों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक होनी चाहिए जो आम लोगों के जीवन में बेहतरी लाए। हम केवल आशा ही कर सकते हैं कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में खड़गे का चुनाव और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा, विघटनकारी राजनीति की चक्की में पिस रही भारतीय जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने वाले सिद्ध होंगे। यह विघटनकारी राजनीति केवल उद्योगपतियों और साम्प्रदायिक तत्वों का भला कर रही है।     (26 अक्टूबर 2022)

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)


Friday, October 14, 2022

गंभीर चुनौतियां हैं सीपीआई विजयवाड़ा सम्मेलन के समक्ष

के. रामकृष्ण और तीन सूत्री एजेंडा पर होगा गहन विचार 

विजयवाड़ा: 13 अक्टूबर 2022: (कामरेड स्क्रीन विशेष टीम):: 

सीपीआई का 24वां पार्टी सम्मेलन विजयवाड़ा में 14 अक्टूबर से शुरू होने को तैयार है। जोशो खरोश और उत्साह के साथ बहुत से कार्यकर्ता विजयवाड़ा पहुँच चुके हैं। हर तरफ लाल सागर लहराता नज़र आ रहा है जो आने वाले लाल तूफान की दस्तक भी है। सियासी तौर पर विरोध में करने वाले पूरी तरह सतर्क निगाहें लगाए बैठे हैं लेकिन यह  यह लाल तूफ़ान एक नया इतिहास रचने को तैयार है और जनाब हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में पूछ रहा है:

गीले बादल, पीले रजकण,

सूखे पत्ते, रूखे तृण घन

लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे?

तुम तूफान समझ पाओगे?


गंध-भरा यह मंद पवन था,

लहराता इससे मधुवन था,

सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?

तुम तूफान समझ पाओगे?


तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएं,

नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएं,

जाता है अज्ञात दिशा को! हटो विहंगम, उड़ जाओगे!

तुम तूफान समझ पाओगे?

सीपीआई का 14 अक्टूबर से पांच दिनों के लिए विजयवाड़ा में होने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की 24 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार को गिराने की योजना बनाने पर ध्यान देने के साथ तीन सूत्री एजेंडा होगा।

14 अक्टूबर से पांच दिनों के लिए विजयवाड़ा में होने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की 24 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार को गिराने की योजना बनाने पर ध्यान देने के साथ तीन सूत्री एजेंडा होगा। मीडिया से बात करते हुए, भाकपा के राज्य सचिव के रामकृष्ण ने बहुत सी सच्ची लेकिन संवेदनशील बातें भी कहीं। उन्होंने कहा कि एजेंडे में पहला बिंदु एक वैकल्पिक आर्थिक नीति के साथ आना है और दूसरा सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों के साथ गठबंधन पर चर्चा करना है ताकि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सके। गौरतलब है कि आर्थिक नीति की कमी लम्बे समय से महसूस की जा रही है। जब ओशो ने अमेरिका तक में में अपना एक ऐसा कम्यून चला कर दिखाया था जिसमें कोई करेंसी नहीं चलती थी लेकिन सभी को हर जरूरत को चीज भी मिलती थी। ओशो कम्यून के उस ऐतिहासिक तजरूबे से जहां अमेरिका का सिस्टम और प्रशासन दंग रह गया था वहीं मास्को टीवी ने ओशो से भेंट वार्ता भी प्रसारित की थी। लेकिन भारत जहां ओशो ने जन्म लिया था वहां पूरे हालात अनुकूल होने के बावजूद वाम शक्तियां न तो करेंसी रहत कोई छोटा सा भी कम्यून चला पाईं और न ही कोई ऐसी आर्थिक नीति दे पाईं जो समाजवादी सुर से मेल खाती होती। ऐसे में पूंजीवाद का बोलबाला लगातार बढ़ता गया।

अभी तक भी वाम के पास कोई जन हितैषी आर्थिक नीति नहीं है। विगत दशकों में ऐसा कुछ भी सामने नहीं आ पाया जो पूंजीवाद पर चोट मारने वाली आर्थिक नीति की तरह होता। इसलिए आर्थिक नीति की कमी शिद्दत के साथ महसूस की जा रही है। नोटबंदी, जी एस टी, टैक्सेसशन और अंबानी//अडानी जैसे बड़े घरानों को सौंपे गए देश के बड़े बड़े प्रोजेक्टों को वापिस लेने की बात करती हो।

बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है सन 2024 के चुनाव और अंतिम बिंदु कम्युनिस्ट पार्टियों का पुनर्मिलन। क्या सचमुच यह पुनर्मिलन अब संभव है? सन 2024 के आम चुनावों के लिए अपनी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताते हुए, भाकपा नेता ने कहा कि पार्टी सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों के साथ व्यापक गठबंधन की तलाश कर रही है। टीआरएस के साथ गठबंधन से इंकार नहीं करते हुए, जिसने राष्ट्रीय राजनीति के लिए खुद को बीआरएस के रूप में उन्नत किया है, रामकृष्ण ने कहा कि किसी भी अन्य धर्मनिरपेक्ष दल की तरह, वे मोदी सरकार को गिराने के लिए गठबंधन में शामिल होने के लिए टीआरएस//बीआरएस का स्वागत करते हैं। इस संबंध में राज्य स्तर तक भी विचार करनी होगी। 

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ समझौता होने की संभावना पर, क्योंकि भाकपा की राज्य स्तर पर सबसे पुरानी पार्टी के साथ प्रतिद्वंद्विता है, उन्होंने कहा कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति दो अलग-अलग चीजें हैं और इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। वाम दल और कांग्रेस के बीच समझ और बढ़े इसी से सकर्तात्मक परिणाम निकलेंगे।

उन्होंने कहा कि हम सभी गैर-बीजेपी ताकतों को एक साथ लाने की उम्मीद कर रहे हैं। रामकृष्ण ने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में, जहां आम आदमी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की नीतियों की चुभन महसूस कर रहा है, देश और उसके लोगों के हितों की रक्षा के लिए एक वैकल्पिक आर्थिक नीति के साथ आना सर्वोपरि हो गया है। कम्युनिस्ट पार्टियों के एकीकरण के संबंध में, उन्होंने कहा कि यह विषय लंबे समय से कार्ड पर है और सीपीआई के विजयवाड़ा सम्मेलन में इस पर गंभीरता से चर्चा होगी।

मुख्य एजेंडे के अलावा, पांच दिवसीय सम्मेलन, जिसके लिए अजित सिंह नगर के माकिनेनी बसवापुन्नैया स्टेडियम में विस्तृत व्यवस्था की गई है, पिछले साढ़े चार वर्षों में देश में हुए विकास पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा। पार्टी की 23वीं कांग्रेस अप्रैल 2018 में कोल्लम में आयोजित हुई। पांच दिवसीय सम्मेलन में 29 राज्यों के लगभग 1,000 प्रतिनिधि भाग लेंगे। 

केरल और तमिलनाडु प्रत्येक 100 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भेजेंगे। इसके अलावा, 25 देशों के बिरादरी के प्रतिनिधि भी कांग्रेस में शामिल होंगे, उन्होंने कहा। कांग्रेस के पहले दिन विशाल रैली होगी, उसके बाद जनसभा होगी. उद्घाटन सत्र दूसरे दिन होगा। सीपीआई और अन्य वाम दलों के राष्ट्रीय नेता सत्र में भाग लेंगे। 'संविधान की रक्षा और लोकतंत्र की रक्षा में' विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। अंतिम दिन पार्टी की नई कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद का चुनाव किया जाएगा।

इस चुनाव में जहां नई टीम सामने आएगी वहीं नई नीतियां और रणनीति भी सामने आएगी। यह रणनीति एक तरह से युद्ध के बिगुल को तरह उद्घोष करती हूं महसूस होंगी। निकट भविष्य की रहें बेहद कठिन्नहो सकती हैं। हालात बहुत मुश्किल बन सकते हैं। टकराव तेज़ हो सकते हैं। वाम के पुराने कठिन दिनों की यादें भी तेज़ हो सकती हैं लेकिन और कोई दूसरा रास्तभी नहीं। फाशी वाद के खिलाफ जंग निर्णायक होने वाली है इसलिए मुश्किलों के लिए तैयार रहना ही होगा। 

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Saturday, September 24, 2022

कविता कृष्णन ने दिखाई वाम आंदोलन को सिद्धांतक रौशनी

Saturday 24th September 2022 at 03:21 PM  

कहा-किसी भी तानाशाह की हार में हर तानाशाह की हार है! 


कविता कृष्णन की तरफ से विशेष आलेख जिसमें है अहम चर्चा    

ईरान हो या यूक्रेन-तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों की जीत में हमारी जीत है

*महाशक्तियों का 'भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन' और 'एक-ध्रुवीयता बनाम बहु-ध्रुवीयता' वाले गणित के हिसाब से जनांदोलनों के लिए हमारी साझीदारी को कम-बेशी करने का सलाह, हमारे देश में लोकतंत्र के आंदोलन के लिए नैतिक और भौतिक पतन का ही रास्ता खोलेगा।  

स्क्रीन शॉट में माकपा के सोशल मीडिया सेल की ज़िम्मेदारी सम्भालने वाले एक शख्स हैं जो कह रहे हैं कि भई, ईरान की सरकार एक दकियानूस तानाशाही सरकार तो है, पर वे नहीं चाहते कि ईरान की महिलाएँ और उसकी जनता तानाशाह को उखाड़ फेंकें-क्योंकि उनके अनुसार ऐसा होना जनांदोलन की जीत नहीं, अमेरिका द्वारा "तख्तापलट" होगा। ये कह रहे हैं कि ईरान में आंदोलन "हिंसक" हो गया है-ठीक वैसे जैसे हमारे देश में TV चैनलों ने पुलिस द्वारा मार और हत्या झेल रहे किसान आंदोलन को "हिंसक" कह दिया था। ईरान में आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ सेना को उतार दिया गया है; इंटर्नेट बंद कर दिया गया है ताकि बिना गवाहों के जनसंहार किया जा सके; बच्चों बुजुर्गों और युवाओं सब पर गोलियाँ और पेलेट गन इस्तेमाल किए जा रहे हैं; मारे जाने वाले प्रदर्शनकारियों की संख्या पता नहीं है। ऐसे में आंदोलनकारी युवा जब पुलिस द्वारा दागे गए टियर गैस के गोले को हाथों में उठाकर वापस पुलिस के ख़ेमे में फेंकते हैं; पुलिस वालों को घेर कर उन्हें भगाते या पीट देते हैं - तो इसे हिंसा नहीं, जान पर खेल जाने वाला अद्भुत साहस कहते हैं।  

इस पोस्ट के कहने का मतलब है कि महसा अमीनी जैसी महिलाओं का वहाँ की "नैतिकता पुलिस" द्वारा प्रताड़ित और बेइज़्ज़त किया जाना और यहाँ तक कि मारा जाना, वहाँ के लोगों को तानाशाह के ख़िलाफ़ बोलने या लिखने या फ़िल्म बनाने के लिए जेल में डाला जाना या मौत की सजा दिया जाना, दुखद तो है-पर इसे ईरान के लोग थोड़ा बर्दाश्त कर लें क्योंकि ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक के गिरने से "अमेरिकी साम्राज्यवाद" को फ़ायदा हो जाएगा।  

वामपन्थ के नाम पर इस क़िस्म का दिवालियापन-चाहे वह इस पोस्ट जितना निर्लज्ज हो चाहे वह गोल-गोल शब्दों का इस्तेमाल करें-हमने सीरिया, यूक्रेन और अब ईरान के मामले में देखा है। जनसंहार पर आमादा तानाशाह के ख़िलाफ़ जनांदोलन की जीत हो इसके लिए वाम जनवादी ताक़तों को तो अपने और दुनिया के सभी सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए कि वे ऐसे आंदोलनों को जनसंहार से बचाने और जीत हासिल करने में हर सम्भव मदद करें।  पर ऐसा न करके वे अक्सर हर आंदोलन, चाहे जहां चल रहा हो, की समीक्षा अमेरिका को केंद्र में रखकर करते हैं। अमेरिका के लिए फ़ायदा-नुक़सान को नाप तौल कर, अमेरिका को कहीं फ़ायदा न पहुँच जाए उस हिसाब से आंदोलन के लिए साझीदारी को माप-माप कर देते हैं।   

वरिष्ठ वाम नेता कविता कृष्णन 
तानाशाह कितना भी जनसंहारी और क्रूर क्यों न हो, दुनिया के तमाम तानाशाह (यहाँ तक कि अमेरिका में भी ट्रम्प जैसे तानाशाह बनने की इच्छा रखने वाले नेता) एक दूसरे से मिले हुए क्यों न हो, कुछ वामपंथी कहते हैं कि "हम तो उसे अमेरिका और "पश्चिमी देशों" के ख़िलाफ़ "ध्रुव" मान रहे हैं।" वे कहते हैं "देख भई 'बहु-ध्रुवीयता' के नाम पर उस तानाशाह का बना रहना ही उस देश के लोगों की आज़ादी से ज़्यादा ज़रूरी है। उनके जनसंहार के क़ीमत पर ही सही। बहु-ध्रुवीयता बचना चाहिए, और इसलिए वहाँ की जनता को अमेरिका से मदद नहीं मिलना चाहिए। हाँ हमने रोजावा लड़ाकुओं का खूब साथ दिया, उनके महिला सैनिकों की तस्वीरों को अपने पत्रिकाओं में लगाया, इसके बावजूद कि वे अमेरिका से शस्त्र लेते हैं। पर यूक्रेन या ईरान या सीरिया में तानाशाह के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे लोगों की दुनिया से मदद की प्रार्थना के जवाब में हम कहेंगे, "देखिए आपकी लड़ाई जायज़ तो है, और हम आपके साथ सहानुभूति भी रखते हैं, पर अफ़सोस, 'बहु-ध्रुवीयता' के लिए आपकी शहादत ज़रूरी है।" 

मुझसे न जाने कितने बार पूछा जाता है: "विदेश में चल रहे आंदोलन की जीत के लिए हम भला क्या ही कर सकते हैं? ट्वीट तो कर ही दिया न? चलिए लेख भी छाप देंगे अपनी पत्रिका में। काफ़ी नहीं है? विदेश के आंदोलन को लेकर इतना क्या भावुक होना? हमारे पास और काम नहीं हैं?" ऐसे नैतिक रूप से दिवालिया सवालों का क्या जवाब है? फिर भी जवाब दे ही दिया जाए:   

-हम ईरान की महिलाओं के और अन्य देशों में रह रहे ईरान के पत्रकारों और नारीवादियों और लोकतंत्र पसंद लोगों की आवाज़ को बुलंद कर सकते हैं. मसीह अलीजेनाद और गोलशिफ़्ते फ़रहनी के सोशल मीडिया हैंडल्ज़ को फ़ॉलो करना शुरू करें. आंदोलन के बारे में फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का हम मुक़ाबला कर सकते हैं।  

-हम खुद ईरान के लोगों के पक्ष में प्रदर्शन कर सकते हैं - उनके नारों (जैसे 'तानाशाह मुर्दाबाद', 'ज़न, ज़िंदगी, आज़ादी', और 'इंसाफ़, आज़ादी, हिजाब-ए-इख़्तियारी (हिजाब पर अपनी मर्ज़ी)' को बुलंद कर सकते हैं।  

-जब हम ईरान या सीरिया या फ़िलिस्तीन या यूक्रेन या अफ़ग़ानिस्तान या चीन या रूस या तुर्की या अमेरिका या कहीं की भी सत्ता द्वारा नस्लवाद, साम्प्रदायिकता, तानाशाही, दमन-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ पीड़ित जनता का पुरज़ोर साथ देते हैं तो हम अपने देश में भी लोकतंत्र की जड़ों को (जिनके बारे में अम्बेडकर ने ठीक ही चेतावनी दी थी कि ये जड़ें ऊपरी मिट्टी में ही हैं, गहरे नहीं हैं सतही हैं) खाद पानी देते हैं, उसे मज़बूत करते हैं।       

दुनिया के मज़दूरों के एक होने की बात से वामपन्थ कुछ भटक नहीं गया है? 

दुनिया के जनांदोलनों को क्या दुनिया के सभी तानाशाहों या भावी तानाशाहों के ख़िलाफ़ एक नहीं होना चाहिए? 

खमेनी, मोदी, ट्रम्प, पूतिन, ओरबान, शी, म्यांमार की मिलिटरी शासन, इज़्रेली सत्ता, तालिबान, एरदोआँ, लिज़ ट्रस, बोरिस जॉनसन, ल पेन, ए.एफ.डी - तमाम तानाशाही, नस्लवादी, साम्प्रदायिक, साम्राज्यवादी और औपनिवेशी राज्यों और ताक़तों के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलनों को क्या एक दूसरे का साथ नहीं देना चाहिए? 

"ध्रुव नम्बर वन" अमेरिका में भी तो ट्रम्प जैसा तानाशाह है जो कि मोदी से 'हाउड़ी' कहता है, पूतिन के पैसों पर पलता है, चीन और रूस दोनों की सरकारों की मदद से उन देशों में अपना बिज़्नेस चलाता है। अमेरिका में ट्रम्प के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे लोगों; और यूक्रेन, सीरिया, फ़िलिस्तीन, भारत, चीन, रूस आदि में तानाशाही और नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों में साझीदारी कुछ हद तक बराबरी भी लाता है। इज़्रेल की दमनकारी टेक्नॉलजी अमेरिका में ब्लैक लाइव्ज़ मैटर के प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होता है; इज़्रेल की ख़ुफ़िया पेगासस टेक्नॉलजी और चीन की फ़ेशल रेकग्निशन टेक्नॉलजी (जो पहले उईगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ और फिर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ख़िलाफ़ और अब कोविड के बहाने चीन की पूरी जनता के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हुआ) दोनों ही भारत की मोदी सरकार दमन के काम में लगा रही है। चीन ने अपने यहाँ उईगर मुसलमानों के लिए विशाल कारा शिविर (कॉन्सेंट्रेशन कैम्प) खोली है; और वह म्यांमार के मिलिटरी को फ़ंडिंग देती है, जो कि रोहिंग्या लोगों की राष्ट्रीयता छीन कर उनका जनसंहार कर रही है। 

क्या भारत में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई को लड़ने के लिए काफ़ी है कि हम इज़्रेल के साथ मोदी राज के रिश्तों को समझें? बिलकुल। पर हमारे बग़ल में चीन और म्यांमार की नीतियों द्वारा पैदा हुए मुस्लिम-विरोधी और तानाशाही माहौल से मोदी राज को होने वाले फ़ायदे की चर्चा से क्यों इनकार किया जाता है?  

चीन की दमनकारी टेक्नॉलजी; चीन में हान-वर्चस्ववादी और मुस्लिम-विरोधी राष्ट्रवाद को समाजवाद का चोला पहनाया जाना; चीन में एक पार्टी, एक नेता, एक विचार धारा का सर्वसत्ता-प्राप्त राज; चीन की जनता को हक़-प्राप्त नागरिक नहीं बल्कि "लाभार्थी" और "कर्तव्यनिष्ट" प्रजा में तब्दील करने में शी शासन और उनके नेतृत्व में चीन की कॉम्युनिस्ट पार्टी की सफलता-इन सब चीजों से क्या मोदी राज शिक्षा नहीं ले रहा? ट्रम्प हो या नेतान्याहु, शी हो या पूतिन, मोदी तो सभी तानाशाहों से शिक्षा ले रहे हैं! 

पूतिन और उनके फ़ासीवादी बुद्धिजीवी (जैसे दूगिन) खुल कर कहते हैं कि रूस, चीन, भारत, अरब देश आदि "प्राचीन सभ्यताएँ" हैं जिनकी संस्कृति में तानाशाही है, फ़ासीवाद है, लोकतंत्र नहीं। इनके अनुसार लोकतंत्र, नारीवाद और महिलाओं, LGBTQIA लोगों की बराबरी, मानवाधिकार आदि "पश्चिमी देशों" की बातें हैं, जिन्हें पूरी दुनिया पर थोपा जा रहा है। पूतिन ने घोषणा की है कि दुनिया के शक्ति संतुलन को बदलकर लोकतंत्र की जगह इन "प्राचीन सभ्यताओं" की सत्ता को क़ायम करना होगा, और इन सभ्यताओं द्वारा अपना साम्राज्य क़ायम करने के लिए किसी बग़ल देश पर हमला, या उनके देश के भीतर किसी समुदाय का उत्पीड़न; चुनाव का होना न होना आदि के सवाल पर कोई UN जैसी ताक़त जवाबदेही न माँग सकें। 

सन 2009 में लिखे एक लेख में दूगिन ने साफ़ कर दिया था कि भारत की प्राचीन सभ्यता से उनका मतलब हिंदू-वर्चस्व से है-उन्होंने संघ के नेता दत्तोपंत तेंगदी के हवाले से अपनी बात को पुख़्ता किया था। दुनिया में इस फ़ासीवादी शक्ति-संतुलन को स्थापित करने के पूतिन के लक्ष्य के रास्ते में यूक्रेन की जनता और उसका बहादुर जनयुद्ध ही सबसे बड़ा रोड़ा है। 

इसके बावजूद क्या हम कहते रहेंगे कि भारत में फ़ासीवाद-विरोधी लड़ाई पर ज़ोर देने का मतलब है यूक्रेन कि लड़ाई को नाम-वास्ते समर्थन देकर कन्नी काट लेना? पूतिन जैसे तानाशाह का भी "बहु-ध्रुवीयता" के नाम पर बचाव करना? पूतिन के झूठे तर्कों के ख़िलाफ़ प्रचार करने की ज़िम्मेदारी से बचना या यहाँ तक कि उन झूठे तर्कों का खुद प्रचार करना? ठीक वैसे जैसे आज CPIM के ये शक़्स ईरान के आंदोलन को अमेरिकी तख्ता-पलट की साज़िश बता कर बदनाम कर रहे हैं; वैसा ही दुनिया और भारत के मुख्य वामपंथी धाराओं ने 2014 के यूक्रेन के मैदान आंदोलन को अमेरिकी तख्ता-पलट की साज़िश कह कर बदनाम किया। जबकि वह आंदोलन एक अफ़ग़ान-मूल के रूसी भाषी मुस्लिम पत्रकार के फ़ेस्बुक पोस्ट से शुरू हुआ, पूतिन द्वारा पैसे खाकर EU से संधि से अंतिम मिनट मार मुकर जाने वाले प्रेसिडेंट यानुकोविच के ख़िलाफ़ आंदोलनकारियों की किसी बिल्डिंग के खिड़की से रूस के गुप्त स्नाइपर सेना ने गोली मारकर हत्या करने पर आंदोलन और भी व्यापक हो गया और पूरा देश मैदान पर उतर आया, और  यानुकोविच को भागना पड़ा-ठीक वैसे जैसे हाल में श्री लंका के जनांदोलन ने गोताबया राजपक्षा को भागने के लिए मजबूर किया। वामपंथ के ढेर सारी धाराओं ने पूतिन के दुष्प्रचार को फैलाया-कि इस 'तख्तापलट' के जवाबी कार्यवाही में पूतिन ने 2014 में यूक्रेन पर हमला किया।                            

ईरान और यूक्रेन और फ़िलिस्तीन और यमन-जनता की सभी लड़ाइयों की जीत, दुनिया के जनता की तानाशाही नफ़रती राजनीति के ऊपर जीत है. लोकतंत्र के लिए इस साझी लड़ाई में अमेरिका नहीं दावा कर सकता है कि हम लोकतंत्र को अन्य देशों में 'एक्सपोर्ट' (निर्यात) कर रहे हैं; या हम लोकतंत्र के ग्लोबल चौकिदार हैं, हमारे नेतृत्व में तानाशाहों के ख़िलाफ़ आइए युद्ध लड़िए. बल्कि हर देश की तरह अमेरिका को भी अपने यहाँ के फ़ासीवादी तानाशाही नफ़रती ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ते हुए, दुनिया में हर ऐसी लड़ाई का हार सम्भव मदद करना होगा। 

इतनी सरल बात को घुमाने की कोशिशों के प्रति सचेत रहने की ज़रूरत है; सवालों से बच निकलने के बजाय जनता और जनवाद के प्रति जवाबदेह रखने की हम सब की ज़िम्मेदारी है। दुनिया में 'भू-राजनैतिक शक्ति-संतुलन' बनाए रखने के बहाने तानाशाह/फ़ासीवाद-विरोधी जनांदोलनों, जनयुद्धों से कन्नी काटने, खुले दिल से समर्थन करने से बचने, या उन आंदोलनकारियों को जीत की बलि देने, और थोड़ा झुक जाने की सलाह देने की प्रवृत्ति को पहचानें -और वामपंथी और प्रगतिशील ताक़तों द्वारा ऐसा किए जाने पर सवाल करें क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति प्रगतिशील और वामपंथी आंदोलनों को-उनके नैतिक और भौतिक आधार को-"रियल पोलिटिक" के नाम पर कमज़ोर ही करेगा।  अन्यायपूर्ण 'असलियत' को बदलने की  बजाय उसे 'रियल' मान लेने के नाम पर हमने भारत में वामपंथी सरकारों को पूँजीपतियों के लिए किसानों की ज़मीन छीनकर उनपर गोली चलाने का नतीजा देखा है।  दुनिया में चाहे एक ध्रुव रहे या कई ध्रुव-हम प्रगतिशील-वामपंथी लोगों को साम्राज्यवादी युद्ध, तानाशाही, नफ़रती राज्यों और ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ना तो है ही-और अन्य देशों में ऐसी लड़ाइयों के साथ होना है, बस, इतनी सरल बात है। 

किस आंदोलन का साथ देने से कौन से 'बिग पावर' (महाशक्ति) का फ़ायदा या नुक़सान होगा, उस गणित के हिसाब से जायज़ जनांदोलनों के लिए हमारी साझीदारी को कम-बेशी करना, यह हमारे आंदोलनों को भी महाशक्तियों की होड़ की राजनीति का खिलाड़ी बना देता है। और ऐसा होना, हमारे आंदोलन के नैतिक-भौतिक पतन का ही रास्ता खोलता है।  

चीन के उईगरों और ईरान के लोगों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाकर, चीन के तानाशाही मुस्लिम-विरोधी सत्ता और ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक के झूठ का पर्दाफ़ाश करके हम भारत में भी लोगों को समझाने में ज़्यादा सफल होंगे, कि संप्रदायिकता, और एक-पार्टी एक-नेता, एक-धर्म/विचारधारा के नाम पर दमन के ख़िलाफ़ हम निष्पक्ष होकर आंदोलन करेंगे; चाहे हिंदू राष्ट्र के नाम पर मोदी हो, "कॉम्युनिस्ट राष्ट्र" के नाम पर शी हो, या 'इस्लामिक रिपब्लिक' के नाम पर खमेनी हो. इसे हम जितनी जल्दी समझें उतना अच्छा।           

हर जगह, हर परिस्थिति में, तानाशाह चाहे दक्षिणपंथ का हो या खुद को वामपंथी कहता हो: सच का साथ दें, दमन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे जनता का साथ दें, उनकी जीत के लिए ताक़त लगाएँ. क्योंकि उनकी जीत में हमारी जीत है: और किसी भी तानाशाह के हार में हार तानाशाह का हार है. बस इतनी सी बात है! इस नैतिक ताक़त और स्पष्टता के बिना भारत में भी लोकतंत्र के लिए जनसमर्थन और जनांदोलन तैय्यार नहीं हो सकता, जो कि पूरे मन से और स्पष्ट समझ से संघी फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ एकता बना सके।

----- कविता कृष्णन

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Saturday, September 3, 2022

कौन काटता है आम आदमी की जेब?

3rd September 2022 at 5:53 PM

 कहां जाता है आम आदमी का पैसा?

रविवार से शुरू बैंक मुलाज़िमों के सम्मेलन में खोले जाएंगे कई राज़ 


लुधियाना3 सितंबर 2022: (एम एस भाटिया//इनपुट-कार्तिका सिंह और कामरेड स्क्रीन डेस्क):: 

आम इंसान सिर्फ दुखी है कि आखिर मेहनत करके भी उसका गुज़ारा क्यों नहीं होता। उसकी कमाई उसकी जेब में आने की बजाए किसी और की जेब में क्यों और कैसे चली जाती है। वह कभी कभी सवाल भी करता है कि बैंकों से कर्ज़े ले कर फिर उन्हें अंगूठा दिखा देने वाले लोग दुनिया के सबसे बड़े अमीरों  की सूची में कैसे आ जाते हैं? वे लोग बैंकों से लोन ले कर देश के पब्लिक सेक्टरों को खरीदने की बातें कैसे सिरे चढ़ा लेते हैं? साथ ही उसे अपनी गरीबी का  है और वह सोचता है क्या कभी वह या उसकी औलाद भी अमीर बन भी पाएगी? इस तरह के बहुत से सवाल आम जनता के मन में हैं लेकिन जवाब कोई नहीं देता। आज लुधियाना में बैंक वालों की प्रेस कांफ्रेंस थी। उनका दो दिवसीय सम्मेलन कल रविवार से लुधियाना के गुरु नानक भवन में शुरू हो रहा है। इसमें पहुंच रहे वक्ता प्रवक्ता उन सभी बारीकियों को बताएंगे कि आम इंसान गरीब कैसे होता जा रहा है और सत्ता में  रहने वाले बड़े बड़े लोग दुनिया में बड़े बड़े अमीर कैसे होते जा रहे हैं। मंदहाली की हवा सिर्फ बेबस और गरीब लोगों तक ही क्यों पहुँचती है? वैश्विक मंडी सिर्फ आम जनता के लिए क्यूं? बड़े बड़े धन्ना सेठों के लिए क्यूं नहीं? कोरोना युग में भी कुछ लोग तेज़ी से अमीर हो गए थे और बाकियों में से ज़्यादातर को ख़ुदकुशी का रास्ता चुन्न्ना पड़ा था। बैंक वालों के आज के पत्रकार सम्मेलन में आल  इंडिया बैंक इम्प्लाईज़ एसोसिएशन के महासचिव सी एच वेंकटचलन, सचिव बी इस राम बाबू और एक अन्य सचिव संजय कुमार भी मौजूद रहे। आम जनता के प्रतिनिधि बन कर सवाल करने वाले पत्रकार आज भी कम ही थे। 

4  और 5 सितंबर 2022 को लुधियाना में आल इँडिया सेंट्रल बैंक इम्प्लाइज फैडरेशन और ऑल इँडिया सेंट्रल बैंकऑफिसर्स एसोसिएशन के संयुक्त सम्मेलन के अवसर पर खोले जाएंगे ऐसे रहस्य जो आपको हैरान कर देंगें। इन लोगों ने अपनी स्वतंत्रता से ही शुरू की। हम स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ की जय करते हैं: हम अपने बुजुर्गों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हाथों से लड़ने और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए किए गए बलिदानों को तहे दिल से याद करते हैं। भारत ने पिछले 75 वर्षों में बहुत प्रगति की है और हमें उस पर गर्व भी है लेकिन साथ ही पूरी बेबाकी से बताया कि आज भी हमारा देश धन के असमान वितरण है। 

आज भी कुछ धनी लोगों के हाथों में बढ़ती जा रही है धन की एकाग्रता। आज भी  हमारे लोगों की एक बड़ी संख्या की गरीबी जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। जब हम इस खुशी के अवसर पर सभी को बधाई देते हैं, तो हम सभी के लिए एक बेहतर और समान समाज के लिए लड़ने का संकल्प भी  लेते हैं।

पब्लिक सेक्टर के बैंकों के मौजूदा संकट की चर्चा करते हुए यहां उल्लेखनीय है कि इसी बीच अडानी ग्रुप पर बैंकों का बड़ा कर्ज बकाया है पड़ा है। वित्त वर्ष 2021-22 में अडानी समूह पर कर्ज बढ़ गया है और 40.5 फीसदी बढ़कर 2.21 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।  जबकि पिछले वित्त वर्ष 2020-21 में यह 1.57 लाख करोड़ रुपये था।  फाइनेंशियल ईयर 2021-22 में अडानी एंटरप्राइजेज का कर्ज 155 बढ़ा है। आप इन लोगों की अमीरी के कारण और स्रोत जान सकते हैं सिर्फ इस तरह के आंकड़ों पर एक नज़र डाल कर। 

बैंकों का निजीकरण न करें: 1969 में, भारत में प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। पिछले 53 वर्षों में, इन राष्ट्रीयकृत बैंकों ने हमारे देश के आर्थिक विकास में बहुत योगदान दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में आम लोगों की सेवा के लिए हजारों शाखाएं खोली गई हैं। कृषि, लघु और मध्यम उद्योग, शिक्षा, प्रमुख उद्योग, ग्रामीण विकास, बुनियादी ढांचा क्षेत्र आदि को बड़े पैमाने पर ऋण दिया जा रहा है। इन बैंकों द्वारा जनता की बचत को उनकी बचत के लिए सुरक्षा प्रदान करने के लिए जुटाया गया है।

राष्ट्रीयकरण से पहले और 1969 के बाद भी निजी बैंकिंग की सर्विस स्थिति बिगड़ती चली जा रही है। कई निजी बैंक कुप्रबंधन के कारण ध्वस्त हो गए हैं और लोगों की बचत खो गई है। राष्ट्रीयकृत बैंक लोगों की बचत की रक्षा कर रहे हैं। राष्ट्रीयकृत बैंक ही प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण दे रहे हैं।  इसके बावजूद इन्हीं सरकारी बैंकों को निजी सेक्टर के हवाले करने के अभियान चलाए जा रहे हैं। बैंक कर्मी इन नापाक कोशिशों के रास्ते में बार बार खड़े होते आ रहे हैं लेकिन सत्ता के सामने और बड़े ढहना सेठों के सामने उनकी शक्ति सीमित कर दी गई है। 

आज बैंकों की कुल जमाराशियां : रु. 170 लाख करोड़             दिया गया कुल ऋण : रु. 120 लाख करोड़

लोगों की सेवा के लिए इन राष्ट्रीयकृत बैंकों को और मजबूत करना होगा। लेकिन सरकार ने घोषणा की है कि राष्ट्रीयकृत बैंकों का निजीकरण किया जाएगा। यदि बैंकों का निजीकरण किया जाता है, तो ग्रामीण बैंकिंग प्रभावित होगी। निजी बैंक ग्रामीण बैंकिंग को बढ़ावा नहीं देंगे। वे अधिक लाभ में ही रुचि लेंगे। धीरे-धीरे केवल अमीर लोगों को ही खाते रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसलिए एआईबीईए बैंकों के निजीकरण के फैसले का विरोध कर रहा है।

हम अपनी मांग का समर्थन करने के लिए लोगों को शिक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान चला रहे हैं। हम प्रधानमंत्री को एक सामूहिक याचिका दायर करने के लिए लोगों से हस्ताक्षर एकत्र कर रहे हैं।

एआई.बी.ई.ए ने बड़ी कंपनियों से खराब ऋण की वसूली की मांग की: आज बैंकों में एकमात्र बड़ी समस्या बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा डिफ़ॉल्ट रूप से बढ़ते खराब ऋण हैं। हम उनके खिलाफ कर्ज की वसूली के लिए कार्रवाई की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार उन्हें अधिक से अधिक रियायतें दे रही है।

पिछले 6 वर्षों से, खराब ऋण खातों को दिवाला और दिवालियापन संहिता IBC के तहत न्यायाधिकरणों को संदर्भित किया जाता है। कर्ज वसूली की जगह ये कर्ज कुछ अन्य कंपनियों को सस्ते दर पर बेचे जा रहे हैं जैसे दूकान की वस्तु बिका करती है इस सब कुछ से  और बैंकों को भारी नुकसान हुआ है।

आईबीसी जनता का पैसा लूटने का एक तरीका बन गया है क्योंकि बैंकों को इन सौदों में बड़े पैमाने पर (हेयर कट) घोर घाटे पढ़ते  हैं। और बलिदान देना पड़ता है। चूककर्ता बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के भाग जाते हैं। एक अन्य कॉर्पोरेट कंपनी सस्ते दरों पर इन ऋणों को ले रही है।

एनपीए-आईबीसी (हेयर कट )घाटे पढने की कहानी 

करोड़ों रु में

बैंकों के लिए    ऋण राशि                ऋण राशि का निपटान         और समाधान %         के पक्ष में

एस्सार                    54,000                    42,000                                       23%                    आर्सेलर मित्तल

भूषण स्टील्स         57,000                    35,000                                       38                        टाटा

ज्योति संरचनाएं       8,000                    3,600                                          55                          शरद संघ

डीएचएफएल         91,000                 37,000                                           60                         पीरामल

भूषण पावर               48,000                 19,000                                          60                        जेएसडब्ल्यू

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स 14,000                   5,000                                            62                       वेदांत

मोनेट इस्पात         11,500                   2,800                                          75                        जेएसडब्ल्यू

एमटेक                     13,500                  2,700                                          80                         डीवीआईएल

आलोक इंडस्ट्रीज    30,000              5,000                                          83                         रिलायंस + जेएम फिन

लैंको इंफ्रा              47,000                5,300                                              88                        कल्याण समूह

वीडियोकॉन            46,000               2,900                                             94                          वेदांत

एबीसी शिपयार्ड       22,000              1,200                                              95                          परिसमापन

शिवशंकरनीउद्योग     4,800                 320                                               95%                            ससुर

लाभ कहाँ जाता हैमार्च, 2022 तक - सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक

कुल सकल परिचालन लाभ: 208,654 करोड़

 खराब ऋण आदि के लिए प्रावधान: 1,41,918 करोड़

 प्रावधानों के बाद शुद्ध लाभ: 66,736 करोड़

इस प्रकार, बैंकों द्वारा अर्जित अधिकांश लाभ (लाभ का 68%) खराब ऋणों के प्रावधान और खराब ऋणों को बट्टे खाते में डालने के लिए चला जाता है। इस प्रकार कॉरपोरेट्स द्वारा लोगों का पैसा लूटा जा रहा है।

शाखाओं का बंद होना: जब सरकार समावेशी विकास और सभी लोगों की सेवा लेने की बात करती है, तो वास्तव में शाखाओं की संख्या साल दर साल कम होती जा रही है। हम मांग करते हैं कि अधिक से अधिक नई शाखाएं खोली जानी चाहिए, विशेष रूप से गैर-बैंकिंग क्षेत्रों में।

हम बैंकों के निजीकरण पर पनागरिया रिपोर्ट का विरोध करते हैं:

13-7-2022 को, श्री अरविंद पनागरिया, पूर्व नीति आयोग और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के पूनम गुप्ता ने सभी बैंकों के निजीकरण का सुझाव देते हुए एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है क्योंकि निजी बैंक अधिक कुशल हैं। यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक और प्रतिशोधात्मक रिपोर्ट है।

वे पूरी तरह से भूल गए हैं कि हमारे देश में दक्षता और सरकार के कारण इतने सारे निजी बैंक ध्वस्त हो गए हैं। बैंकों को विलय करना पड़ा और उन्हें बचाना पड़ा।

वे भूल गए हैं कि 90% बैड लोन बड़ी निजी कॉरपोरेट कंपनियों के कारण हैं।

वे भूल गए हैं कि जन धन योजना के 98% खाते सरकार के बैंक द्वारा खोले गए हैं और निजी बैंकों द्वारा नहीं।

वे भूल गए हैं कि कृषि, रोजगार सृजन, गरीबी में कमी, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण आदि के लिए ऋण केवल सरकार बैंक द्वारा दिया जाता है। और निजी बैंक नहीं।

वे भूल गए हैं कि केवल पीएसबी ने दूरस्थ ग्रामीण गांवों में शाखाएं खोली हैं, निजी बैंकों ने नहीं।

आज भी प्राइवेट बैंकों में बहुत सारी छिपी हुई गड़बड़ियां हैं। निजी बैंकों का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड बिल्कुल भी अच्छा नहीं रहा है।

हम इस रिपोर्ट को खारिज करने की मांग करते हैं-सी.एच. वेंकटचलम, महासचिव ने बहुत ही सादगी से लेकिन स्पष्ट हो कर यह सब कहा। अब देखना है कि आम जनता कब इन बैंक वालों  का साथ देगी, कैसे देगी और जो लोग जनता का धन लूट कर ही अमीर बन रहे हैं उन्हें बेनकाब कब करेगी?

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