Tuesday, March 31, 2026

वामपंथी विचारधारा की उपज है नक्सलवाद--केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह

प्रविष्टि तिथि: 30 March 2026 at 10:03 PM by PIB Delhi

"नक्सलवाद का समर्थन नरसंहार का समर्थन है"

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नक्सलमुक्त भारत पर विशेष चर्चा का जवाब दिया 

आज लोक सभा में वामपंथी उग्रवाद (LWE) से देश को मुक्त कराने के प्रयास पर चर्चा का जवाब दिया

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नई दिल्ली
: 30 मार्च 2026: (PIB Delhi//कामरेड स्क्रीन डेस्क):: 

चालू बरस 2026 का मार्च का महीना समाप्त हो रहा है। देश और दुनिया की निगाहें नक्लवाद उन्मूलन के उस एलान पर थी जो केंद्र सरकार ने पहले ही किया हुआ था। इस महीने के अंत में 30 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मस्से पर बहुत से पहलु स्पष्ट किए और बहुत सी बातें बेबाकी से कहीं। 

उन्होंने स्पष्ट कहा कि वामपंथी विचारधारा की उपज है नक्सलवाद। साथ ही यह भी कहा कि गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, नक्सलवाद के कारण गरीबी फैली है। 

केंद्रीय गृह मंत्री ने सीधे शब्दों में कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी अन्याय का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि हमारी संसदीय प्रणाली का विरोध करने के लिए बनी है। इसके साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि नक्सली हिंसा करने वालों के दिन अब लद गए हैं। 

उन्होंने दोहराया कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की कमी नहीं बल्कि वामपंथी विचारधारा है, जिसे 1969 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ दल की नेता ने इसे स्वीकार कर लिया था। 

उन्होंने यह दावा भी किया कि नक्सल-मुक्त भारत मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। 

सके साथ ही उन्होंने इतिहास की चर्चा करते हुए कहा कि जिस कम्युनिस्ट पार्टी की नींव ही दूसरे देश की विचारधारा से प्रेरित हो, वो भारत का भला कैसे करेगी?

माओवादियों ने रेड कॉरिडोर भेदभाव का विरोध करने के लिए  नहीं बल्कि सरकार की पहुँच कम होने के कारण चुना था। 

वामपंथी विचारधारा के समर्थकों ने भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस को नहीं बल्कि “MAO” को अपना आदर्श माना। 

इधर ये मोदी सरकार है जो हथियार उठायेगा उसको हिसाब देना पड़ेगा। 

चूंकि इस इलाके पर लाल आतंक की परछाई थी इसलिए बस्तर विकास से पिछड़ गया था, लाल आतंक की परछाई हट गई, अब बस्तर विकसित हो रहा है। 

नक्सलमुक्त भारत मोदी सरकार के सबसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण सफलता। 

इसका पूरा श्रेय केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, विशेषकर कोबरा और CRPF के जवानों, राज्य पुलिस, छत्तीसगढ़ पुलिस और DRG जवानों और स्थानीय आदिवासियों को जाता है। 

वामपंथी उग्रवादियों ने दशकों तक जहाँ विकास नहीं पहुंचने दिया, वहां मोदी सरकार घर-घर विकास पहुंचा रही है। 

मोदी सरकार डरने वाली नहीं बल्कि सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। 

सत्ता के समर्थन के बिना देश के बीचो-बीच, तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक, रेड कॉरिडोर संभव ही नहीं था। 

वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है इसलिए सारे वामपंथी अलग-अलग थ्योरी रच-रच कर अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं। 

स्टेट, गवर्नेंस, संविधान और सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा कर रक्तपात करना ही वामपंथी विचारधारा का उद्देश्य है, जो अब सफल नहीं होगा। 

नक्सलियों ने गांवों में स्कूल, दवाखाने और बैंक जला दिए, फिर लोगों को बरगला कर बोलते थे विकास नहीं पहुंचा। 

मैंने बहुत से बुद्धिजीवियों के आर्टिकल्स पढ़े जो नक्सलियों के मानव अधिकार की बात कर रहे थे, उनमें से एक भी आर्टिकल उस माँ के लिए नहीं था जिसके बच्चे को नक्सली जबरदस्ती उठा ले गए या उन शहीदों की विधवाओं के लिए जिनको नक्सालियों ने मारा।   

वामपंथी विचारधारा का ध्रुव वाक्य "सत्यमेव जयते" नहीं बल्कि ये है कि “सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।”

नक्सलियों के साथ रहते-रहते मुख्य  विपक्षी पार्टी और उसके नेता खुद नक्सली बन गए हैं। 

नक्सलियों के कारण हुए नरसंहार में नक्सलियों के समर्थक भी उतने ही भागीदार हैं जितना हिंसा करने वाले हैं। 

मुख्य विपक्षी दल के शासनकाल में बनी NAC में भरे पड़े थे नक्सल समर्थक। 

सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी ऑपरेशन को अन्याय की लड़ाई बताने वालों को बस्तर ओलिंपिक और बस्तर पंडूम में जरुर जाना चाहिए।   

चाहे नक्सलियों से मिलना हो या उनका समर्थन करना हो, मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता हमेशा नक्सलियों के साथ खड़े दिखते हैं।  

एक समान्तर सरकार और न्याय व्यवस्था चला कर आदिवासियों का शोषण करने वाले नक्सली लोकतंत्र के घोर विरोधी हैं। 

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज लोक सभा में नियम 193 के अंतर्गत वामपंथी उग्रवाद (LWE) से देश को मुक्त कराने के प्रयास पर चर्चा का जवाब दिया।

चर्चा का जवाब देते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों और उनके समर्थकों ने भोले भाले आदिवासियों के सामने एक गलत प्रकार का नेरेटिव रखा गया था कि वे उनके अधिकारों और उन्हे न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है और वहां हर गांव में स्कूल बनाने और राशन की दुकान खोलने की मुहिम शुरू हो चुकी है। गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलवाद की वकाल करने वाले बताएं कि 1970 से अब तक यह सब क्यों नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार आने के बाद पूरे देश के हर गरीब को घर, गैस, पीने का पानी, 5 लाख तक का बीमा, 5 किलो मुफ्त अनाज मिला, लेकिन बस्तर वाले छूट गए क्योंकि सत्य को झुठलाया गया और लाल आतंक की परछाई के कारण वहां विकास नहीं पहुंचा था। श्री शाह ने कहा कि लाल आतंक इसीलिए नहीं था कि वहां विकास नहीं था, बल्कि लाल आतंक के कारण वहां विकास नहीं हुआ था, लेकिन आज लाल आतंक की परछाई हट गई है और बस्तर विकसित हो रहा है।

श्री अमित शाह ने कहा कि यह नरेन्द्र मोदी जी की सरकार है और जो भी हथियार उठाएगा उसे हिसाब चुकता करना पड़ेगा। गृह मंत्री ने कहा कि सरकार संवेदनशील है और सभी समस्याओं को सुनना और उनका निराकरण करना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने योजनाएं बनाई हैं लेकिन उन पर अमल नहीं करने देंगे क्योंकि वामपंथी उग्रवादी और उनके समर्थकों की  आइडियोलॉजी यानी उनका अवैध शासन वहां चलता रहे। श्री शाह ने  कहा कि आजादी के बाद 75 साल में से 60 साल तक देश में मुख्य़ विपक्षी पार्टी का शासन रहा तब भी आदिवासी विकास से महरूम कैसे रहे। उन्होंने कहा कि विकास तो अब नरेन्द्र मोदी जी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टी को अपने अंदर झांककर देखना चाहिए कि दोषी कौन है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार, बंगाल, केरल, कर्नाटक के कुछ हिस्से और उत्तर प्रदेश के 3 ज़िलों सहित 12 राज्यों में  पूरा रेड कॉरिडोर बनाकर रखा था। इन क्षेत्रों में 12 करोड़ लोग सालों तक गरीबी में जीते रहे और 20,000 युवा मारे गए इसके लिए कौन जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की मांग नहीं बल्कि एक आइडियोलॉजी है। नक्सलवाद का मूल कारण विकास की कमी नहीं बल्कि वामपंथी विचारधारा है, जिसे 1969 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ दल की नेता ने स्वीकार कर लिया था।

श्री अमित शाह ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने पूरे देश के सामने स्वीकारा किया था कि कश्मीर और नॉर्थईस्ट की तुलना में देश की आंतरिक सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी समस्या हथियारबंद माओवादी हैं। उन्होंने कहा कि 2014 में परिवर्तन हुआ और प्रधानमंत्री मोदी जी के शासन में कई वर्षों पुरानी समस्याओं का निराकरण हुआ, धारा 370 और 35A हट गई, राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बन चुका है, GST आज वास्तविकता बन चुका है, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) बन चुका है, विधायी मंडलों में मातृशक्ति को 33% आरक्षण दिया गया है। उन्होंने कहा कि आजादी के वक्त से इस देश की जनता जो कई सारे बड़े काम चाहती थी वे सभी काम नरेन्द्र मोदी जी के शासन के 12 साल में हुए और अब नक्सलवाद से मुक्त भारत की रचना भी नरेन्द्र मोदी जी के शासन के अंदर ही होगी। श्री शाह ने कहा कि पिछले 12 साल देश के लिए बहुत शुभ साबित हुए हैं। देश को गरीबी से मुक्ति दिलाने, युवाओं के लिए नई शिक्षा पद्धति लाने, आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने, देश के मूलों से न जुड़ी नीतियों को दरकिनार करने के लिए गत  12 साल में बहुत कुछ हुआ है। उन्होंने कहा कि अगर सबसे अधिक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले को देखा जाए तो निसंकोच नक्सलमुक्त भारत सबसे ऊपर होगा।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलमुक्त भारत जो बड़ी घटना देश में आकार लेने जा रही है, उसका पूरा श्रेय हमारे केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, विशेषकर कोबरा और सीआरपीएफ के जवानों, राज्य पुलिस, विशेषकर छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस और डीआरजी के जवानों और स्थानीय आदिवासियों को जाता है। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवाद के समाप्त होने में जनता का भी बड़ा योगदान है।

श्री अमित शाह ने कहा कि इस विचारधारा का विकास और विकास की मांग से भी कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि यह कौन सी विचारधारा है? क्या है माओवादी विचारधारा? इसका ध्रुव वाक्य क्या है? इनका ध्रुव वाक्य है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। ये विकास के लिए नहीं बल्कि अपनी आइडियोलॉजी के अस्तित्व, उसकी विजय और आइडियोलॉजी को भोले-भाले आदिवासियों में फैलाकर कर सत्ता हासिल करने के लिए है। इनका लोकतंत्र पर कोई विश्वास नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने इनकी तुलना भगत सिंह जी और बिरसा मुंडा से कर दी। शहीद भगत सिंह और भगवान बिरसा मुंडा, जो अंग्रेजों के सामने लड़े, उनकी तुलना आप संविधान तोड़कर हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों की हत्या करने वालों लोगों के साथ कर रहे हैं? यह विचारधारा कहती है कि दीर्घकालीन युद्ध ही उनकी विचारधारा को फैला सकता है। उनको अपने लोगों  का खून बहाने से भी कोई परहेज़ नहीं है। इस विचारधारा के समर्थकों ने भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस को नहीं बल्कि माओं को अपना आदर्श माना है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि सच्चाई यह है कि इन्होंने पूरे रेड कॉरिडोर को इसीलिए चुना था क्योंकि वहां राज्य की पहुंच कम थी। भोले भाले आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथों में हथियार पकड़ा दिए गए। उन्होंने कहा कि जो आदिवासी 15 अगस्त 1947 से पहले भगवान बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, मुर्मू बंधुओं को हीरो मानकर चलता था, वह आदिवासी 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो कैसे मानने लगा? श्री शाह ने कहा कि विकास और अन्याय के कारण नहीं बल्कि कठिन भूगोल और राज्य की अनुपस्थिति के कारण अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने इस क्षेत्र को चुना और भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाना शुरू किया। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों ने सालों तक उस क्षेत्र में विकास को पहुंचने नहीं दिया, लेकिन अब नरेन्द्र मोदी जी के शासन में वहां घर-घर विकास पहुंच रहा है। गृह मंत्री ने कहा कि गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इस पूरे क्षेत्र में वर्षों तक गरीबी रही। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से नहीं जुड़ी बल्कि वैचारिक हैं।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलबाड़ी में साक्षरता का दर 32%, बस्तर में 23%, सहरसा, बिहार में 33% और बलिया, उत्तर प्रदेश में 31% था। इसी प्रकार, नक्सलबाड़ी में प्रति व्यक्ति आय ₹500, बस्तर में ₹190, सहरसा में ₹299 और बलिया में ₹374 थी। उन्होंने कहा कि चारों क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय भी एक समान थी, लेकिन नक्सलबाड़ी और बस्तर में वामपंथी उग्रवाद पनपा और सहरसा और बलिया में नहीं। ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि सहरसा और बलिया का भूगोल उनके अनुकूल नहीं था, वहां घने जंगल, नदी नाले, छुपने की पहाड़ियां नहीं थी, हथियार लेकर अपनी मूवमेंट करने, आदिवासियों को दबाने और उनको जबरदस्ती अपनी आइडियोलॉजी के साथ जोड़ने की अनुकूलता नहीं थी। उन्होंने कहा कि अगर विकास ही पैमाना होता, अगर प्रति व्यक्ति आय ही पैमाना होता, तो देश के बहुत सारे हिस्से ऐसे थे जहां 1970 में विकास नहीं पहुंचा था, लेकिन वहाँ नक्सलवाद क्यों नहीं फैला?

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि ये डरने वाली नहीं बल्कि सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलबाड़ी और बंगाल से हुई। 1971 के एक ही वर्ष में वहां 3620 हिंसा की घटनाएं हुई थीं,1980 का दशक आते-आते पीपल्स वॉर ग्रुप बन गया और फिर यह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा राज्यों में फैला। 1990 के दशक में वामपंथी विचारधारा सिकुड़ती गई और यहां पर भी उग्रवादी गुटों और वामपंथी पार्टियों में विलय शुरू हुआ। 2004 में दो प्रमुख गुट मिल गए और सीपीआई माओवादी का गठन किया। 1970 से 2004 के कालखंड में चार साल छोड़कर पूरा समय मुख्य विपक्षी पार्टी का शासन रहा है।

श्री अमित शाह ने कहा कि यही समय है जब नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ ये आंदोलन 12 राज्यों, देश के 17% भूभाग और 10% से ज्यादा आबादी में पहुंच गया। उन्होंने कहा कि सत्ता के समर्थन के बगैर देश के बीचो-बीच, तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक, रेड कॉरिडोर संभव ही नहीं था। उन्होंने कहा कि जो हथियार पकड़े गए हैं, उसमें से 92% हथियार पुलिस से लूटे हुए थे। थाने लूट लिए गए, गोलियां लूट ली गई और उनका उपयोग निर्दोष जवानों, बच्चों, कृषकों को मारने के लिए किया गया। वामपंथी विचारधारा ने इसे एक भ्रांति की तरह प्रोपेगेंडा के माध्यम से अपनी विचारधारा को टिकाने के लिए फैलाया कि अन्याय से बचने के लिए हथियार हाथ में उठाए।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि किसी भी समस्या का समाधान बहस से निकल सकता है, हथियारों से नहीं। उन्होंने कहा कि नक्सलियों ने इस देश में वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया, स्टेट का वैक्यूम, सारी व्यवस्थाएं नष्ट कर गवर्नेंस का वैक्यूम, संविधान से श्रद्धा खत्म कर संविधान का वैक्यूम और पुलिस थानों को जलाकर सिक्योरिटी वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया है। गृह मंत्री ने कहा कि माओवादी और नक्सली  हिंसा करने वालों के दिन अब लद गए हैं और मोदी सरकार में ये लंबे समय नहीं चलेगा।

श्री अमित शाह ने कहा कि माओवादी उग्रवादियों को अन्याय के खिलाफ हथियारों की लड़ाई लडने वालों की तरह मानने की गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है इसलिए सारे वामपंथी अलग-अलग थ्योरी रच-रच कर अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं। इनका एकमात्र एजेंडा है, देश में वैक्यूम खड़ा करना है। स्टेट, गवर्नेंस, संविधान और सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा कर रक्तपात करना ही उनका उद्देश्य है जो अब सफल नहीं होगा। श्री शाह ने कहा कि नक्सलियों ने कई सारे भोले-भाले ग्रामीणों को एनिमी इन्फॉर्मर बताकर फांसी पर चढ़ा दिया। इन्होंने जनता अदालत के नाम से एक दिखावा किया जहां न कोई वकील है, न जज है, वे स्वयं बैठे हैं, स्वयं फैसले करते हैं और फांसी देते हैं।

 केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलियों ने ना जनता ना सरकार के नाम से एक भ्रांति खड़ी की और विकास योजनाओं को रोकने का काम किया। इन्हें संविधान और न्याय व्यवस्था को निशाना बनाकर संविधान का वैक्यूम खड़ा करना था। जो लोग अब कह रहे हैं बातचीत करो, उनको पता होना ताहिए कि मैं 50 बार सार्वजनिक मंचों पर बस्तर में जाकर कह चुका हूं कि हथियार डाल दीजिए, सरकार आपके पूरे पुनर्वास की व्यवस्था करेगी। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की पॉलिसी है, चर्चा उसी से होती है जो हथियार डालता है, लेकिन जो गोली चलाता है, उसको जवाब गोली से ही दिया जाता है।

श्री अमित शाह ने कहा कि जैसे ही रूस में साम्यवादियों की सरकार का गठन हुआ, यहां पर 1925 में सीपीआई की स्थापना हुई। जब रूस में कम्युनिस्टों की सरकार बनी, उसी वक्त यहां सीपीआई की स्थापना हुई। इसके बीच में कोई रिलेशनशिप है क्या? रूस की सरकार ने स्पॉन्सर कर दुनियाभर में कम्युनिस्ट पार्टी की रचना की। अब जिस पार्टी की नींव ही किसी दूसरे देश की प्रेरणा से की गई है, वो हमारे देश का भला कैसे सोचेगी? इन्होंने तो अंग्रेजों का भी समर्थन किया था। 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सिस्ट बनी, ये भी समझने की बात है कि सीपीआईएम क्यों बना? यह भी समझना पड़ेगा कि जब सीपीआई थी, तो फिर सीपीआईएम क्यों बनी? 1964 में सोवियत रूस और चीन के बीच झगड़ा हुआ तो दोनों साम्यवादी राष्ट्र के अंदर अलग-अलग विचारधारा की साम्यवादी सरकारें आई। जैसे ही अलग-अलग विचारधारा की सरकारें आई, तो यहां पर चीन की एक समर्थित पार्टी सीपीआई मार्क्सिस्ट बना दी। इसके बाद 1969 में संसदीय राजनीति का विरोध करने के लिए सीपीआई एमएल मार्क्सिस्ट की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विकास का वैक्यूम बनाना या अधिकारों की रक्षा नहीं था बल्कि उसके संविधान में उद्देश्य था संसदीय राजनीति का विरोध कर सशस्त्र क्रांति करना।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इन्होंने सशस्त्र क्रांति और संसदीय राजनीति का विरोध करने के दो उद्देश्यों के साथ सीपीआई मार्क्सिस्ट बनाई और यही आज के माओइस्ट हैं। उसके बाद 1975 में जैसे ही कांग्रेस का समर्थन मिला, एमसीसी माओइस्ट बनी और बिहार झारखंड केंद्रीय पार्टी बनी। फिर पीडब्ल्यूजी 1980 में बना। वह आंध्र केंद्रित बना। 1982 में दलित किसान केंद्रीय सशस्त्र संघर्ष सीपीआई एमएल पार्टी यूनिटी बिहार में बनी। दलित किसान केंद्रीय संघर्ष उनका उद्देश्य था। 1998 में पीपल्स वॉर ग्रुप बना और उसमें माओवादियों का एकत्रीकरण हुआ। इतना सब करने के बाद भी वह सफल नहीं हुए और 2000 में पीएलजीए बना, गुरिल्ला फोर्स बनाई और 2004 में ये पीडब्ल्यूजी एमसीसी का विलय हो गया। 2014 में मोदी जी आए और 2026 में सब की समाप्ति हो गई। ये 1925 से लेकर 2026 तक 101 साल का उनका इतिहास है। इसे अन्याय के खिलाफ संघर्ष का स्वरूप मानकर महिमामंडित मत करो। ये लोग वोट की जगह बुलेट से शासन प्राप्त करना चाहते हैं। कुछ लोग चर्चा से मानते नहीं है, वहां बल प्रयोग कर उनके अत्याचार से निर्दोष नागरिकों को बचाना पड़ता है। ये हमारी पार्टी की सरकार है और हर नागरिक की सुरक्षा नरेन्द्र मोदी जी ने सुनिश्चित की है। जो भी नागरिकों के साथ अन्याय करेगा, समझा तो ठीक है वरना ये फोर्स इसी के लिए बनाई गई है। इसका उपयोग भी होगा, परिणाम भी आएगा और आज आ भी गया है

श्री अमित शाह ने कहा कि अर्बन नक्सली कहते हैं कि हथियार उठाकर घूमने वाले माओवादियों के साथ चर्चा करो क्योंकि वो अन्याय के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें मारना नहीं चाहिए और इनके प्रति सिंपैथी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक भी बुद्धिजीवी दिव्यांग बनने वाले किसान, 5000 से ज्यादा सिक्योरिटी फोर्सेज के जवानों, उनकी विधवाओं के लिए नहीं है, इनके अनाथ बच्चों के लिए नहीं लिखता। उन्होंने कहा कि इनकी मानवता संविधान तोड़कर हथियार लेकर घूमने वालों के लिए ही है। इनके हथियारों से जो नागरिक मारे जा रहे हैं, इनके लिए आपकी मानवता नहीं है। मानवता के दोहरे चरित्र को स्वीकार नहीं कर सकते, यह मानवतावादी नहीं हैं, बल्कि नक्सलियों के समर्थक हैं। ये लोग गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा को फैलाना चाहते हैं, मगर उनके भी दिन लद गए हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सलवा जुडूम की शुरुआत 2005 में सरकार समर्थित जनआंदोलन के रूप में हुई। आदिवासी युवाओं को एसपीओ बनाया गया और उनको आतंक फैलाने वालों के सामने लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी गई। सलवा जुडूम की शुरुआत श्रीमान कर्मा ने की थी जिन्हें नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था। 5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च अदालत ने नंदिनी सुंदर और अन्य लोगों ने एक विवाद दायर किया और सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सुदर्शन रेड्डी के नेतृत्व में तय किया कि नक्सलियों के खिलाफ राज्य की ये लड़ाई गैरकानूनी है और तुरंत ही इनको हथियार वापस देने का ऑर्डर कर दिया। इसका परिणाम हुआ उनके हथियार वापस दिए गए और इन्होंने चुन-चुन कर सलवा जुडूम से जुड़े हुए लोगों को मार दिया और वही सुदर्शन रेड्डी विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बने। जो देश की कानून और व्यवस्था को मानते हैं, वो सुदर्शन रेड्डी को कभी अपना प्रत्याशी नहीं बनाते। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति जज बनकर अपनी व्यक्तिगत आइडियोलॉजी का उपयोग कर, संवैधानिक कपड़े पहनकर, अपनी आइडियोलॉजी को ऑर्डर में कन्वर्ट कर, हजारों बेगुनाह आदिवासियों की जान जाए ऐसा फैसला देता है, तो इस जजमेंट की घोर निंदा करते हैं। आइडियोलॉजी जनता के कल्याण से ऊपर नहीं है।

श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में 2014 के बाद नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में 17,589 किलोमीटर सड़कें बनाने की मंजूरी दी है, जिसमें 12,000 किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं। विकास इसीलिए हो रहा है कि धीरे-धीरे-धीरे नक्सलवाद समाप्त हो रहा है। लगभग-लगभग 5,000 मोबाइल टावर, ₹6,000 करोड़ के खर्चे से हम लगा चुके हैं। दो अन्य योजनाओं में और 8,000 4G टावर बनाने का फैसला नरेन्द्र मोदी जी ने किया है। 1804 बैंक शाखाएं 12 साल में खुली हैं, 1321 एटीएम खुले हैं, 37,850 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंस बनाए गए और 6025 डाकघर खुले। यह सब सिर्फ 12 साल में हुआ है। हमने माओवादियों के साथ चर्चा नहीं की, उन्हें समाप्त किया और विकास को आगे बढ़ाया। 259 एकलव्य आदर्श विद्यालय बनाए, इसके साथ-साथ 46 आईटीआई, 49 स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए, 16 कौशल विकास केंद्र बनाए और लगभग इस सबके लिए 800 करोड़ रुपए का खर्च 12 साल में हमने किया है। सिविक प्रोग्राम में 212 करोड़ के कार्य किए जो स्वास्थ्य शिविर और दवाओं से जुड़े हुए हैं और जनजाति युवा एक्सचेंज के कार्यक्रम भी हमने बनाए। सिक्योरिटी के लिए राज्यों की सहायता के लिए एसआरई लेकर आए जिसमें 10 साल में 3000 करोड़ दिया। स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम लेकर आए और इसमें 5000 करोड़ दिया। उन्होंने पूछा कि ये सब 1970 से अब तक क्यों नहीं हुआ था? पिछली सरकारें करने जाती थीं तो वो धमाके कर मार देते थे। हमने धमाके करने वालों को समाप्त किया, तो अब विकास हो रहा है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि 2014 के बाद क्लियर पॉलिसी और स्ट्रॉन्ग पॉलिटिकल विल इस काम में जुड़ी है। उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी जी ने ये स्पष्ट कर दिया इस देश के किसी भी कोने में चाहे कश्मीर हो, उत्तर पूर्व हो, या वामपंथी उग्रवादी प्रभावित क्षेत्र हो, गैरकानूनी प्रवृत्ति नहीं चलेगी और इस पर कठोर हाथों से काम होगा। केन्द्र और राज्यों के बीच में अलाइनमेंट हुआ। स्टेट की कैपेसिटी में गवर्नमेंट, गवर्नेंस और पुलिसिंग में हमने सुधार किया। सीएपीएफ और स्टेट पुलिस का समन्वय बढ़ाया। एक्शनेबल इंटेलिजेंस को नीचे तक परकोलेट करने की व्यवस्था की और जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कर दी। ऑल एजेंसी अप्रोच शुरू किया और सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि एनआईए, ईडी, इंटेलिजेंस एजेंसी, जैसे सभी नेटवर्क, फंडिंग और सपोर्ट सिस्टम, पर हमने प्रहार किया। इफेक्टिव सरेंडर पॉलिसी लेकर आए। डेवलपमेंट और गवर्नेंस में हमने कोई वैक्यूम नहीं छोड़ा और अब पहले जहां राज्य की उपस्थिति नहीं थी, वहां आज राज्य की उपस्थिति है और नक्सलवाद की हार का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य अब हर गांव में पहुंच चुका है, वहां पंचायत बन चुकी है। विकास के लिए हमने Whole of Government अप्रोच लिया और सुरक्षा नकेल कसने के लिए Whole of Agency अप्रोच लिया।

श्री अमित शाह ने कहा कि 20 अगस्त, 2019, 24 अगस्त 2024 और कल 31 मार्च 2026 की तीन महत्वपूर्ण तारीखों के बारे में बताना चाहूंगा। 20 अगस्त 2019 को गृह मंत्रालय में एक मीटिंग हुई और पूरा पुलिस कोऑर्डिनेशन, मॉडर्नाइजेशन, रिटायर्ड नक्सलियों को पुलिस फोर्स में लेना, इनका कोऑर्डिनेशन खुफिया एजेंसी के साथ, ये सब 20 अगस्त को डिजाइन किया। छत्तीसगढ़ में विपक्षी पार्टी की सरकार थी जिसने सहयोग नहीं दिया। बिहार 2024 के पहले नक्सलमुक्त हो चुका था, महाराष्ट्र एक तहसील छोड़कर 2024 के पहले नक्सल मुक्त हो चुका था। ओडिशा 2024 के पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। झारखंड एक जिला छोड़कर 2024 के पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। सिर्फ छत्तीसगढ़ बचा हुआ था क्योंकि छत्तीसगढ़ की विपक्षा पार्टी की सरकार ने नक्सलवादियों को बचा कर रखा था। जनवरी 2024 में छत्तीसगढ़ में हमारी सरकार बनी और दूसरे ही दिन, वहां पूरे समर्थन का भरोसा मिल गया। साझा रणनीति बनी और 24 अगस्त 2024 को हमने घोषित किया था कि 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद पूरे देश से समाप्त कर देंगे।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इसके बाद हमने सुरक्षा घेरे में बढ़ोतरी की। प्रधानमंत्री मोदी जी के 11 साल में 596 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बने। नक्सल प्रभावित जिले जो 2014 में 126 थे, आज सिर्फ दो बचे हैं। मोस्ट इफेक्टेड जिले 2014 में 35 थे, आज शून्य है। नक्सल घटनाएं दर्ज करने वाले पुलिस स्टेशन जो 350 थे, आज 60 हैं। पिछले 6 साल में 406 नए सीएपीएफ के कैंप बनाए, 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड बनाए, 400 बुलेट प्रूफ, ब्लास्ट प्रूफ गाड़ियां हमारे जवानों को दी गई, पांच अस्पताल हमारे जवानों के लिए बनाए गए और कम्युनिकेशन की सारी व्यवस्था दुरुस्त कर दी गई।

श्री अमित शाह ने कहा कि 2024, 2025 और 2026 का संयुक्त आंकड़ा देखें तो तीन सालों में मारे गए नक्सली, 2026 के मार्च तक 706 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए। 2218 गिरफ्तार हुए, उनको पकड़कर हमने जेलों में डाला है, अदालतों की शरण में ले गए और 4839 लोगों ने आत्मसमर्पण किया है। उन्होंने कहा कि विपक्ष संवाद की बात करता है। शासन का यही अप्रोच होना चाहिए जो वार्ता करना चाहता है, उसके साथ वार्ता करनी चाहिए और जो हमारे जवानों, किसानों, आदिवासियों, बच्चों पर गोली चलाता है, उसका जवाब गोली से देना चाहिए। हमने संवाद, सुरक्षा और समन्वय तीनों का उपयोग किया है। नवीनतम टेक्नोलॉजी का उपयोग कर सटीक निगरानी और ढेर सारे टेलीफोन बिलों का विश्लेषण किया है। लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम, मोबाइल फोन की गतिविधियां, साइंटिफिक कॉल लॉग्स, सोशल मीडिया एनालिसिस, फॉरेंसिक और तकनीकी संस्थानों की सहायता लेकर इस पूरे अभियान का गृह मंत्रालय ने नेतृत्व किया है। ड्रोन सर्वेलेंस, सैटेलाइट उपयोग, इमेजिंग टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा एनालिसिस से ये सफलता प्राप्त हुई है।

बूढ़ा पहाड़ क्षेत्र में बिहार में 2022 में ऑपरेशन ऑक्टोपस चला। ऑपरेशन डबल बुल गुमला, लोहरदगा और लातेहार जिलों में चला 8 से 25 फरवरी, 2022 में, तीनों जिले नक्सलवाद से मुक्त हो गए। ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म झारखंड के सरायकेला, पश्चिमी सिंहभूम और खूंटी जिले में 1 से 3 सितंबर 2022 में चला। ऑपरेशन भीमबर्ग मुंगेर जिले के जून व जुलाई 2022 में चला। ऑपरेशन चक्रबांधा बिहार के गया और औरंगाबाद जिलों में 2022 में चला और ये सारे एरिया इससे मुक्त हो गए। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा में 50 किलोमीटर लंबी और 37 किलोमीटर चौड़ी एक पहाड़ी पर चला। वहां पर नक्सलियों ने अपना एक परमानेंट कैंप बनाया था और वहां 5 साल लड़ सकने के लिए हथियार, सोलर लाइट की व्यवस्थाएं, ढेर सारी आईडी बनाने की फैक्ट्रियां और 5 साल का अनाज था। इसके अलावा 400 से 500 कैडर वहां पर एकत्रित थे। गृह मंत्री ने कहा कि 45 डिग्री टेंपरेचर पहाड़ पर पत्थर गर्म हो जाता था। शरीर में से 2 लीटर, 3 लीटर पसीना बह जाता था लेकिन जवानों ने उफ तक नहीं की और 21 दिन तक ऑपरेशन चला। 30 से ज्यादा माओवादी मारे गए, बाकी नीचे उतरते ही पुलिस के साथ मुठभेड़ों में मारे गए या सरेंडर कर दिया और यह पूरा असला हमने जब्त कर लिया। इसी ने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मतलब बस्तर और तेलंगाना में माओवादी आंदोलन का अंत कर दिया। श्री शाह ने कहा कि कोबरा, सीआरपीएफ, डीआरजी और छत्तीसगढ़ पुलिस के जवानों ने अमानवीय धैर्य के साथ इनके किले को तोड़ा है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सेंट्रल कमिटी मेंबर और पोलित ब्यूरो मेंबर 2024 की शुरुआत में कुल 21 थे, जो इनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व है। एक पकड़ा गया है, सात सरेंडर हुए हैं, 12 मारे गए हैं और एक फरार है, उसके साथ भी वार्ता चल रही है। 21 के 21 सेंट्रल कमिटी मेंबर और पोलित ब्यूरो मेंबर समाप्त हो चुके हैं और उनकी केंद्रीय व्यवस्था टूट चुकी है। दंडकारण्य में 27 की स्टेट कमेटी थी, तीन अरेस्ट हुए, 20 सरेंडर हुए, 11 मारे गए और दो से बातचीत जारी है। दंडकारण्य की उनकी मुख्य स्टेट कमेटी थी, वो समाप्त हो चुकी है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, एमएमसी स्टेट कमेटी, तीन सरेंडर कर गए, तीन की ही बची थी। ओडिशा, चार बचे थे, एक सरेंडर हुआ, तीन मारे गए। ओएससी, ओडिशा, पांच ने सरेंडर किया, पांच मारे गए, 10 ही थे। डिस्टर्ब रीजन ब्यूरो, अरेस्ट एक हुआ, तीन मारे गए, एक फरार है। तेलंगाना में छह सरेंडर हो गए, तीन मारे गए, एक भी नहीं बचा है तो उनकी पोलित ब्यूरो मेंबर और सीएमसी पूरा समाप्त हो चुका है। हमने लक्ष्य रखा था कि 31 मार्च को देश को नक्सलवाद मुक्त करेंगे और हम नक्सलमुक्त हो गए हैं, ऐसा कहने में अब कोई संकोच नहीं है। बसव राजू उनके महासचिव न्यूट्रलाइज हुए, हिड़मा जिन्होंने 27 लोगों को मारा था, गजुरल्ला रवि 11 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए।कदारी सत्यनारायण रेड्डी 46 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। गणेश उइके 44 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। वेणुगोपाल आत्मसमर्पण किया। 46 वर्ष से एक्टिव थे। वासुदेव आत्मसमर्पण किया, 36 वर्ष से एक्टिव थे। पल्लूरी प्रसाद राव चंदना 46 वर्ष से एक्टिव थे, आत्मसमर्पण किया। रामदेव मांझी देबू 36 वर्ष से एक्टिव थे, समर्पण किया। टिपरी तिरुपति 44 वर्ष से एक्टिव थे, उन्होंने भी सरेंडर कर दिया है। सभी मुख्य हथियारी माओवादी समाप्त हो चुके हैं। हमने ल्यूक्रेटिव पुनर्वास पॉलिसी को अपनाया है, जिसमें आत्मसमर्पण की प्रोत्साहन राशि 50,000 घोषित की गई है, जो सामूहिक सरेंडर पर दोगुना कर देते हैं। मोबाइल सबको सरकार की ओर से देते हैं। हथियार जमा कराने पर और मुआवजा देते हैं। पुनर्वासन केंद्र पर कौशल प्रशिक्षण व टूल किट का वितरण करते हैं। ₹10,000 प्रति माह 36 माह तक हम उनको देते हैं। सभी को मोदी जी ने प्रधानमंत्री आवास योजना की गिफ्ट दी है। नक्सल मुक्त पंचायत होते ही गांव के विकास के लिए ₹1 करोड़ दिया जाता है।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों ने 15000 बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया इसका जिम्मेदार कौन है? उन्होंने कहा कि आप तो एसी चेंबर में बैठकर कोर्ट के प्रोटेक्शन के तहत आर्टिकल लिखते हैं और वहां जीवन के जीवन उजड़ गए हैं और किसी को परवाह नहीं है। उन्होंने कहा कि जो अपने आप को ह्यूमन राइट का चैंपियन मानते हैं उनसे पूछा जाए कि 32 साल की आयु तक मेहंदी ना लगाने वाली बच्ची के ह्यूमन राइट की कौन चिंता करेगा? उन्होंने कहा कि उसकी चिंता नरेन्द्र मोदी जी करेंगे और कोई नहीं। उन्होंने कहा कि इन लोगों का अधिकार छीन लिया है, इसका हिसाब कभी न कभी देना पड़ेगा। श्री शाह ने कहा कि जिन्होंने भी शब्द या प्रच्छन्न रूप से नक्सलियों का समर्थन किया है, वह सब इस पाप के उतने ही भागीदार हैं जितना बंदूक लेकर घूमने वाले हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इनकी नौकरी और रोजगार के लिए हमने ढेर सारे प्रयास किए हैं, कौशल केंद्र बनाए हैं। बारहवीं तक इनके बच्चों के लिए बारहवीं तक की मुक्त मुफ्त शिक्षा करी है। महिलाओं को 2 लाख और पुरुषों को 5 लाख के ऋण की व्यवस्था की है। वहां बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम के माध्यम से संस्कृति और खेल को बढ़ावा दे रहे हैं। वहां अब 1 लाख 20 हजार कलाकारों ने बस्तर पंडुम में भागीदारी की और 5 लाख 50 हजार आदिवासी खेले हैं। जो इसको न्याय की लड़ाई कहते हैं, वो बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक में जाएं। श्री शाह ने कहा कि पीड़ितों पर जुल्म ढाने वालों के लिए भाषण करने के लिए आपके पास बहुत समय है।

श्री अमित शाह ने कहा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की सरकार बनी, तब एक नेशनल एडवाइजरी काउंसिलबनी थी। एक नई नेशनल एडवाइजरी काउंसिल एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल फोरम खड़ा किया गया जो देश के कानून बनाता था। उन्होंने कहा कि हर्ष मंदर इसके सदस्य थे, जिनके एनजीओ अमन वेदिका में शीर्ष नक्सली नेता की पत्नी को जिम्मेदारी दी गई थी और रिकॉर्ड है कि वह उन नक्सलियों में शामिल थी जिन्होंने अपहरण के केस अर्बन एरिया में किए थे। उन्होंने कहा कि ये एनएससी देश का नीति निर्धारण करती थी। उन्होंने कहा कि रामदयाल मुंडा कहते थे कि नक्सल ऑपरेशन जरूरत से ज्यादा कठोर है। उन्होंने कहा कि इस प्रच्छन्न समर्थन ने ही नक्सलियों की हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने कहा कि नंदिनी सुंदर, रामचंद्र गुहा, ई ए एस शर्मा, ये सारे लोग सलवा जुडूम के केस के साथ भी जुड़े थे। जब सरकार की एक एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी, जो पीएम से भी ऊपर थी, उसके सदस्य अगर नक्सलवाद के समर्थक हों तो किस तरह से नक्सलियों का हौसला टूटेगा? कैसे टूटेगा? उन्होंने कहा कि यह मुख्य विपक्षी पार्टी ने किया था। ये तो इतिहास है और जो लोग इस बात का विरोध करते हैं, आने वाले दिनों में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जाएगी जो आपके कारनामों से भरी हुई होगी।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलियों और उनके हमदर्दों के साथ देखे गए हैं। उन्होंने कहा कि भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठनों ने हिस्सा लिया, इसका रिकॉर्ड है। उन्होंने कहा कि वे 2010 में ओडिशा में लाडो सिकोका के साथ मंच पर दिखे। सिकोका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और उन्हें माला भी पहनाई। उन्होंने कहा कि 2018 में हैदराबाद में गुम्मांडी विट्ठल राव उर्फ गद्दार से नेता प्रतिपक्ष ने मुलाकात की जो विचारधारा के करीब रहे। मई 2025 में कोऑर्डिनेशन कमिटी ऑफ पीस के साथ मुलाकात की। आज जब 172 जवानों को मारने वाला हिडमा मारा गया तब इंडिया गेट पर नारे लगे, कितने हिडमा मारोगे? हर घर से निकलेंगे हिड़मा और इस वीडियो को नेता प्रतिपक्ष ने स्वयं शेयर किया है।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों के समर्थकों ने 1970 से लेकर मार्च 2026 तक नक्सलवाद का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ये नरसंहार का समर्थन है और 20 हजार लोग जो मारे गए, इसका दोषी अगर कोई एक है तो मुख्य विपक्षी पार्टी की वामपंथी विचारधारा है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों के साथ रहते-रहते, ये पार्टी और उसके नेता खुद नक्सलवादी बन गए हैं। उन्होंने कहा कि इसका जवाब इस देश की जनता को चुनाव में देना पड़ेगा क्योंकि ये बात यहां रुकेगी नहीं, बल्कि जनता की अदालत में जाएगी।

*****//आरके / आरआर / पीआर


Wednesday, February 25, 2026

RMPI 26 फरवरी को चंडीगढ़ में बड़ी रैली करेगी

 MPS on Wednesday 24th February 2025 Regarding Proposed Rally By RMPI Chandigarh at on 26th Feb 2025

जनरल सेक्रेटरी कॉमरेड मंगत राम पासला करेंगे बड़े खुलासे

चंडीगढ़: 25 फरवरी, 2025: (मीडिया लिंक रविंदर//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

रिवोल्यूशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (RMPI) की पंजाब स्टेट कमेटी 26 फरवरी को चंडीगढ़ के सेक्टर 25 के रैली ग्राउंड में एक बड़ी स्टेट-लेवल रैली करेगी। यह रैली RSS-BJP की पंजाब विरोधी साजिशों और मोदी सरकार द्वारा पंजाब के साथ किए जा रहे भेदभाव के खिलाफ और दशकों से पेंडिंग पंजाब से जुड़े इंटर-स्टेट मामलों का पक्का हल निकालने के लिए हो रही है। इसे पार्टी के जनरल सेक्रेटरी कॉमरेड मंगत राम पासला और दूसरे सेंट्रल और स्टेट लीडर्स एड्रेस करेंगे।

इस बारे में स्टेट कमेटी के सेक्रेटरी परगट सिंह जमाराई ने कहा है कि रैली के दौरान केंद्र सरकार द्वारा राज्य के अधिकारों और नागरिक आज़ादी के उल्लंघन के खिलाफ भी ज़ोरदार आवाज़ उठाई जाएगी। इस मौके पर दूसरे स्पीकर: परगट सिंह जमाराई, कुलवंत सिंह संधू, सज्जन सिंह मोहाली, दर्शन नाहर, धरमिंदर सिंह मुकेरियां और दूसरे नेता भी मौजूद रहेंगे।

उन्होंने कहा कि पंजाब की भगवंत मान सरकार कानून-व्यवस्था के मामले में पूरी तरह फेल साबित हुई है और राज्य के लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। जमाराई ने आगे कहा है कि रैली की कामयाबी के लिए सभी जिलों में ज़बरदस्त तैयारियां की गई हैं।

उन्होंने सभी पंजाबियों से अपील की है कि वे धर्म, जाति, भाषा वगैरह के भेदभाव को भुलाकर अपने परिवारों के साथ रैली में पहुंचें और पंजाब और पंजाबी होने का झंडा ऊंचा रखें।

Sunday, February 22, 2026

केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जनता में तीखा रोष

From MSB on 22nd February 2026 at 17:23 Regarding Dharna in front of BJP office 

 बीजेपी ऑफिस के सामने दिया गया विशाल धरना-धरना 


लुधियाना
: 22 फरवरी 2026: (मीडिया लिंक रविंदर//कामरेड स्क्रीन डेस्क) ::

केंद्र सरकार के जनविरोधी कानूनों, जिसमें चार लेबर कोड, मनरेगा खत्म करके नया कानून लाना, इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल, सीड बिल और इंडिया-यूऐस ट्रेड एग्रीमेंट शामिल हैं, के खिलाफ आज  बीजेपी ऑफिस के सामने धरना दिया गया। इसी तरह, आम आदमी पार्टी और उसकी  जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आज पूरे पंजाब में मंत्रियों के घरों के सामने धरने दिए गए। आज का धरना एसकेएम , ट्रेड यूनियनों और जनतक जमहूरी संगठनों ने दिया। धरने को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार कॉर्पोरेट समर्थक और जनविरोधी है। जो भी कानून लाए जा रहे हैं, वे बड़े अमीरों को खुश करने के लिए लाए जा रहे हैं और मेहनतकश लोगों का खून निचोड़ा जा रहा है। इंडिया-यूएस एग्रीमेंट ने देश की आत्मा को हिला दिया है। स्पीकर्स में डॉ. राजिंदर पाल सिंह औलाख, रघबीर सिंह बेनीपाल, डी पी मौड, नरेश गौड   जमीर हुसैन, अवतार सिंह, लखविंदर सिंह, अजीत सिंह धंद्रा, सुखविंदर सिंह लोटे, केवल सिंह बनवैत, अवतार सिंह मेहलो, सरबजीत सिंह सरहाली, गुरप्रीत सिंह वड़ैच, जगदीश चंद, हरजिंदर सिंह, रविंदर कौर, जसवंत जीरख, मनिंदर सिंह भाटिया, जगदीप सिंह, हरजिंदर कौर, गुरप्रीत सिंह महदूदा और चरन सिंह नूरपुरा शामिल थे। प्रेसिडियम में अमरनाथ कुम कलां, परमजीत सिंह, विजय कुमार, देवराज लखविंदर सिंह, जसवीर झज्ज, जसप्रीत सिंह, रणवीर सिंह रुरका और गुरजीत सिंह जगपाल शामिल थे।

स्टेज का संचालन हरनेक सिंह गुज्जरवाल और युवा किसान नेता मनु बुआनी ने अच्छे से संभाला। जिन संगठनों ने हिस्सा लिया उनमें एटक , इंटक, सीटू, सीटीयू पंजाब, कारखाना मज़दूर यूनियन, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्स यूनियन, जम्हूरी किसान सभा, कुल हिंद किसान सभा 1936, टेक्निकल सर्विस यूनियन, पावरकॉम कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉई यूनियन, पेंशनर्स यूनियन, बीकेयू लखोवाल, बीके यू उगराहां, वेरका आउटसोर्स एम्प्लॉई यूनियन, बीके यू डकौंडा (धनेर) शामिल थे।

Wednesday, February 11, 2026

12 फरवरी की देश-व्यापी हड़ताल को लेकर तरफ सरगर्मियां तेज़

Sent on Wednesday 11th February 2026 at 16:25 Regarding Strike on 12th February 2026

मोल्डर एण्ड स्टील वर्करज यूनियन की ओर से ज़ोरदार अपील 


लुधियाना
: 11 फरवरी 2026: (कामरेड हरजिंदर सिंह/ /मीडिया लिंक टीम/ /कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

12 फरवरी को हो रही हड़ताल की तैयारियां अंतिम स्वरूप में हैं।  इस बार की हड़ताल नए रिकॉर्ड कायम करेगी।  सबसे पहले मज़दूरों को नमन स्वीकार करें। 

जिसका हर लम्हा किसी जंग से आसान नहीं होता,

वो मजदूर ही होता है जो कभी बेईमान नहीं होता।


*यूनियन ने अपील की समस्त उद्योगिक मजदूरों, शहरी गरीबों एवं मेहनतकश‌ लोगों को जोरदार अपील 

*केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर संयुक्त किसान मोर्चा के समर्थन से हो रही हड़ताल 

*12 फरवरी की देश-व्यापी हड़ताल को सफल बनाने के अभियान 

*12 फरवरी को सुबह 10:30 बजे चतर सिंह पार्क में पहुँचने की अपील 

*फिर वहां से मार्च करके बस स्टैंड में सांझी रैली में शामिल होने की अपील 

*क्यों की जा रही है यह हड़ताल? 

*यह हड़ताल केंद्र की भाजपा आर एस एस की मोदी सरकार एवं राज्य सरकारों के खिलाफ हो रही है। 

*जनता में रोष है क्यूंकि देश के उत्पादन स्रोतों को बेचने का जान विरोधी काम किया गया है। 

*इसके साथ ही सस्ती श्रमिक शक्ति को लूटने का अपराध भी किया गया है। 

*निजीकरण के तेज किए हमलों के खिलाफ भी तीखा आक्रोश है 

*अपनी रोटी-रोजी और सम्मान की जिंदगी जीने का अधिकार बचाने के लिए हो रही है यह हड़ताल। 

सांझी मांगें / मुद्दे क्या हैं ?

1)- बिजली बिल -2003 एवं 2025 रद्द किया जाए। स्मार्ट मीटर लगाने बंद किए जाएं।  पावर सैक्टर में निगमीकरण निजीकरण करने के उठाए सभी कदम वापिस लिए जाएं। सभी की पहुंच में आने वाली सब्सिडी आधारित बिजली एक्ट -1948 लागू किया जाए।  

2)-मजदूरों के कार्य घंटे बढ़ाने, यूनियन बनाने , संघर्ष / हड़ताल करने, रक्त निचोडू ठेका भर्ती करने, हायर एण्ड फायर की नीती‌ को पूंजीपति मालिकों के पक्ष में लागू करने वाले 4 श्रम कोड़ों /कानूनों को रद्द किया जाए। 

3)-"  मगनरेगा  " कानून को बदल कर केंद्रीय कब्जे वाला "वी बी जी राम जी" कानून को रद्द किया जाए। मनरेगा मजदूरोंको साल भर उत्पादक काम दिया जाए। कम से कम प्रति दिन 700 रूपए दिहाड़ी दी जाए। 

4)- केंद्र व राज्य के सरकारी विभागों के निजीकरण/ पंचायती करण की नीति बंद की जाए।

5)- ' आप ' की भगवंत मान सरकार द्वारा पावर कॉम, ट्रांसपोर्ट, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी समेत सभी सरकारी

विभागों की संपतियों को कारपोरिटों को बेचने की नीति को तुरंत रद्द किया जाए।

6)- ठेका / आऊटसोर्सिंग भर्ती की बजाए पक्की भर्ती की जाए

एवं समस्त ठेका / आऊटसोर्सिंग श्रमिकों को रैगूलर किया जाए। नियमों मुताबिक वेतन- भत्ते व पेंशन दी जाए।

7)- मोदी सरकार द्वारा किसानों को उजाड़ने वाला प्रस्तावित  " बीज बिल -2025 वापिस लिया जाए। 

8) देश विरोधी भारत-अमरीका मुक्त व्यापार समझौता रद्द किया जाए।

9)- केंद्र की भाजपा सरकार व

पंजाब सरकार द्वारा कुचले जा रहे लिखने , बोलने , संघर्ष करने

के अधिकारों को बहाल किया जाए। यू ए पी ए , देश द्रोही , अफस्पा , एन एस ए जैसे

काले कानून रद्द किए जाएं। 

10)- मजदूरों किसानोंं के कर्जे माफ किए जाएं।

11)- पिछले 10 महीनों से झूठे केसों में बठिंडा जेल में बंद अपने 2 किसान आगूओं की रिहाई व रोष - प्रदर्शन करने बठिंडा जा रहे भारतीय किसान यूनियन ( एकता ऊगराहां) पर भगवंत मान सरकार द्वारा अंधाधुंध लाठीचार्ज, अश्रु गैस के गोले दागने, सैंकडे किसानों पर नाजायज़ मामले दर्ज करने के अत्याचार , अंदोलनकारी पनबस एवं पी आर टी सी के कंटरेकट मुलाजिमों पर पुलिस दमन , जेलों में बंद किसान , मजदूर ,मुलाजिमों की रिहाई की आवाज बुलंद करें।    

-मज़दूर, किसान , मुलाजिम , नौजवान , छोटे कारोबारियों से जुड़ी सांझी मांगों संबंधी 12 फरवरी की देश - वयापी हड़ताल के साथ -साथ 22 फरवरी 2026 , रविवार को भाजपा केंद्र सरकार एवं पंजाब सरकार के मंत्रियों /प्रमुख नेताओं के घरों /दफ्तरों के आगे विशाल धरनों - प्रदर्शनों में शामिल हों।                       

-संसद में बिजली संसोधन बिल पेश होने के विरोध में अगले दिन

पंजाब में काले दिन के तौर पर टोल पलाजे मुक्त किए जाएंगे। इस एक्शन में भी मोल्डर एण्ड स्टील वर्करज यूनियन के साथियों ने शामिल होना है।

साथियों, उपरोक्त सांझे मुद्दों पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की संयुक्त किसान मोर्चा के समर्थन से 12 फरवरी की महत्वपूर्ण हड़ताल को पंजाब में 90 संगठनों द्वारा भी सफल करने, 22 फरवरी के एक्शन प्रोग्राम के बाद भी इन जन-दुशमन नीतियों के खिलाफ लगातार ज़ोरदार संघर्ष जारी रखना है। 

सांझी एकता को और भी मजबूत करना है। याद रखो इन जन-दुशमन नीतियों को सभी  केंद्र व राज्य सरकारों ने डंडे के बल पर लोगों के विरोध के बावजूद लागू किया है। इन नीतियों को अब विकास के नाम पर भाजपा की मोदी सरकार एवं पंजाब में आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार तेजी से लागू कर रही है। इस समय शासकीय वर्गीय पार्टीयों की सरकारों की अदला-बदली के चुनावी चक्रव्यूह में फसने की बजाय इन जन-विरोधी नीतीयों को रद्द करवाने के लिए सांझे मुद्दों पर विशाल एकता एवं सांझे संघर्ष पर पूरा ज़ोर लगा कर रखें। 

अपील‌ करता  :- मोल्डर एण्ड स्टील वर्करज यूनियन ( रजि:)

लुधियाना।

संपर्क : हरजिंदर‌ सिंह प्रधान 

( 9464360755)

Wednesday, February 4, 2026

मज़दूरों के दिल दिमाग में बसा रहता है यह नारा

बॉलीवुड से भी गहरा रिश्ता है इस नारे का 

लुधियाना: 3 फरवरी 2026: (मीडिया लिंक टीम//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::


"हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है"
बहुत दिलचस्प कहानी है इस नारे की भी। इस नारे ने कई बार इतिहास रचा है। वास्तव में यह नारा मशहूर शायर जनाब शैलेंद्र द्वारा रचित एक क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन का नारा है। बुझ गए निराश दिलों में यह नारा एक नया जोश भर देता है। यह नारा दमन, शोषण और मँहगाई के खिलाफ एकजुटता और संघर्ष का एक ऐसा ज़ोरदार प्रतीक भी है जिसे संघर्षशील लोगों ने हमेशां याद रखा। जब जब भी आंदोलन चले और हड़तालें हुईं तब तब इस नारे को अक्सर मज़दूरों, युवाओं और राजनीतिक प्रदर्शनों में हक़ की आवाज़ उठाने के लिए बड़े उत्साह और जोशोखरोश के साथ बुलंद किया।  

इस नारे की मुख्य बातें सीधा मज़दूर हित की बात करती हैं शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करती हैं। नारे में कोई चल नहीं - -कोई भविष्य में वाली बात भी नहीं। शोषण के खिलाफ यह नारा सीधी उंगली उठा कर आंख से आंख मिलाकर बात करता है। मज़दूरों और उनकी मेहनत पर होते हमलों को बड़ी बेबाकी से बेनकाब भी करता है यह नारा।  

इसी नारे को कुछ और गहराई से देखें तो यह नारा पूंजीवादी शोषण, छँटनी, और सरकारी वादों के टूटने के खिलाफ मज़दूर वर्ग की बहुत ही ज़बरदस्त ललकार भी है। आपको हैरानी होगी कि जानेमाने शोमैन राजकपूर और जानेमाने शायर शैलेन्द्र के नज़दीक आने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। वाम विचारधारा और शोषण का विरोध इन्हें नज़दीक ले कर आया। इन्होने मिल कर फिल्म संसार को उन विचारों और गीतों से बेहद अमीर बना दिया। वाम विचारधारा का ज़ोरदार प्रचार कम्युनिस्ट वर्करों और नेताओं से ज़्यादा तो ऐसे गीतों ने किया।  इस तरह के गीतों और कहानियों के चलते ही लेफ्ट के विचारों ने उस जनता में ज़ोरदार ज़मीन पकड़ ली जहां अत्यधिक बौद्धिकता के चलते लीडरों के भाषण आम जनता के सिर के ऊपर से गुज़र जाते थे। गीतों के बोल जनता के दिल दिमाग में घर कर जाते थे। 

शैलेंद्र और राज कपूर की ऐतिहासिक जोड़ी 1940 के दशक के अंत में एक मुशायरे में बनी, जब राज कपूर ने शैलेंद्र की कविता 'जलता है पंजाब' सुनी और प्रभावित हुए। शुरू में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर शैलेंद्र ने फिल्म में लिखने से इनकार किया, लेकिन बाद में आर्थिक तंगी के कारण 'बरसात' (1949) फिल्म के लिए 'बरसात में तुमसे मिले' व 'पतली कमर है' जैसे गानों से उन्होंने करियर की शुरुआत की। 

इस प्रसिद्ध जोड़ी की कहानी के मुख्य पहलू न केवल शायरी बल्कि समाज के नवनिर्माण से जुड़े अभियान के संबंध में भी बहुत कुछ बताते हैं। विचारों का मिलना ही इस जोड़ी के लिए उम्र भर महत्वपूर्ण रहा। दबे कुचले लोगों के दर्द की बात दोनों के दिल में थी। इसके साथ ही राजकपूर साहिब के इश्क और प्रेम ने भी एक नया रंग उभारा। यहां याद आता है कि शुरुआती मुलाकात भी बहुत ख़ास थी लेकिन शैलेन्द्र ने फिल्मों के लिए गत्त लिखने से साफ़ इंकार कर दिया था। उनदिनों गंभीर लोग फिल्मों वाले काम को अच्छा नहीं समझते तहे। शैलेन्द्र साहिब के इस इनकार के बावजूद राज कपूर साहिब ने न कोशिश छोड़ी है और न ही इस सोच को का ही अपने दिमाग से निकाला। वह एक ऐतिहासिक वक़्त कहा जा सकता है जब राजकपूर साहिब ने शैलेंद्र को अपनी पहली फिल्म आग (1948) के लिए गाने लिखने का प्रस्ताव दिया था। शोमैन राजकपूर के प्रस्ताव को ठुकराना भी सबके बस में नहीं होता लेकिन शैलेन्द्र अपने आदर्श के साथ प्रतिबद्ध रहे कि फिल्मों के लिए नहीं लिखना। लेकिन प्रकृति हमें वहीं ले जाती है जहां हम नहीं जाना चाहते। 

ज़िंदगी के रंग बदलते रहते हैं। शैलेन्द्र साहिब के हालात और ज़िंदगी भी गर्दिश में आ गए। परिवार में एक बहुत बड़ी मजबूरी उनकी न टाले जा सकने वाली आर्थिक जरूरत भी बन गई। ऐसे में शैलेन्द्र को राजकपूर ही याद आए। जब शैलेंद्र को पैसों की तंगी हुई तब वह स्वयं राज कपूर साहिब के पास गए। सुना है की वह तो उधार मांगने गए थे उस समय बरसात (1949) फिल्म बन रही थी।

सफल सफर: 'बरसात' के गानों की सफलता के बाद, राज कपूर ने शैलेंद्र को अपनी फिल्मों का मुख्य गीतकार बना लिया।

सदाबहार गाने: इस जोड़ी ने आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी, और अनारी जैसी फिल्मों में 'आवारा हूं', 'प्यार हुआ इकरार हुआ', और 'मेरा जूता है जापानी' जैसे अमर गीत दिए।

गहरी दोस्ती: राज कपूर उन्हें 'कविराज' या 'पुष्किन' कहकर बुलाते थे। शैलेंद्र की मौत (14 दिसंबर 1966) पर राज कपूर ने कहा था, "मेरी आत्मा मुझसे बिछड़ गई"। 

तीसरी कसम (1966) जैसी फिल्मों में उनके बीच के रचनात्मक तालमेल का भी गहरा असर दिखा। 

ज़िंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जिसे शैलेन्द्र जी ने अपनी कलम से कवर न किया हो। यही कारण है कि उनके गीत आज भी लोगों के दिल दिमाग में बसते हैं।

Saturday, December 27, 2025

संघर्ष की एक सदी। नए विरोध और उम्मीद का भविष्य।

From MSB on Saturday 27th December 2025 at 10:03 Regarding CPI 100th Anniversary Celebration

CPI की सौवीं सालगिरह के मौके पर जगह जगह हुव आयोजन 

“कम्युनिस्ट मूवमेंट एट 100: लिगेसी एंड द फ्यूचर” पर एक चर्चा हुई

नई दिल्ली: 27 दिसंबर 2025: (एम एस भाटिया के सौजन्य से//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सौवीं सालगिरह के मौके पर, CPI हेडक्वार्टर के अजय भवन में SV घाटे हॉल में “कम्युनिस्ट मूवमेंट एट 100: लिगेसी एंड द फ्यूचर” पर एक चर्चा हुई।

मीटिंग को संबोधित करते हुए, CPI जनरल सेक्रेटरी डी. राजा, CPI नेशनल सेक्रेटरी और AITUC जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर, CPI नेशनल सेक्रेटरी एनी राजा, CPI नेशनल सेक्रेटरी के. प्रकाश बाबू, और CPI दिल्ली सेक्रेटरी और नेशनल एग्जीक्यूटिव मेंबर प्रो. दिनेश वार्ष्णेय ने आज़ादी की लड़ाई में कम्युनिस्ट मूवमेंट की ऐतिहासिक भूमिका और प्रोग्रेसिव, लोगों के हक वाली पॉलिसी में इसके हमेशा रहने वाले योगदान पर बात की।

स्पीकर्स ने डेमोक्रेसी, सेक्युलरिज्म, सोशल जस्टिस और मज़दूरों के अधिकारों के सामने आज की चुनौतियों पर ज़ोर दिया, और संवैधानिक मूल्यों और लोगों की रोज़ी-रोटी पर आज के हमले का सामना करने के लिए कम्युनिस्ट मूवमेंट को मज़बूत करने के काम पर ज़ोर दिया।

संघर्ष की एक सदी। नए विरोध और उम्मीद का भविष्य। CPI भारत में कम्युनिस्ट मूवमेंट की अगली सदी में गर्व से लाल झंडा उठाएगी।

Friday, December 5, 2025

फिर करवट ले रहा है रूस-भारत मैत्री का लंबा इतिहास

From LS Hardenia Friday 5th December 2025 at 10:37 AM Regarding India Russia Friendship//Comrade Screen 

बदल गया है पूर्व के विरोधी आरएसएस खेमा का रूख


एल.एस. हरदेनिया//गुरुवार, 4 दिसम्बर 2025:

द्वितीय विश्वयुद्ध में अपने देश को महान सफलता दिलवाने और युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत संघ के सर्वमान्य नेता मार्शल स्टालिन की मृत्यु हुई थी। भारतीय लोकसभा में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि मार्शल स्टालिन एक ऐसे नेता थे जो शांति में भी बड़े नेता थे और युद्ध में भी।

सोवियत संघ से हमारी मैत्री का एक बहुत लंबा इतिहास है। जब 1917 में सोवियत क्रांति हुई तब हमारे देश के लगभग सभी नेताओं ने उसका स्वागत किया था और उसे दुनिया के इतिहास में एक नया अध्याय बताया था। क्रांति के बाद भी सोवियत संघ से हमारे संबंध जारी रहे। स्वतंत्रता के पूर्व पंडित जवाहरलाल नेहरू कई बार सोवियत संघ गए। भारत के अनेक संगठन-जिनमें कम्युनिस्ट पार्टियां, भारत-सोवियत मैत्री संघ आदि शामिल थे- सोवियत संघ की प्रशंसा करते थे और सोवियत क्रांति को मानवता के इतिहास का एक नया अध्याय बताते थे।

इस दरम्यान जहां हमारे देश के अनेक संगठन सोवियत संघ से मित्रता की बात करते थे तो कुछ ऐसे व्यक्ति और संगठन भी थे जो सोवियत संघ से भारत की मैत्री के विरेधी थे। अमरीका-समर्थक एक बहुत बड़ी लॉबी भारत में काम करती थी जिसमें कई बुद्धिजीवी शामिल थे। वे सोवियत संघ से मैत्री के विरोधी थे। विरोधियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और तत्कालीन जनसंघ भी शामिल थे। वे सतत यह दावा करते रहते थे कि नेहरू जी के नेतृत्व वाली सरकार सोवियत संघ की गोद में बैठ गई है।

इस प्रचार के बावजूद हमारी मैत्री कायम रही और जब बांग्लादेश के प्रश्न को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात बनने लगे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ के साथ 20 साल की मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि में यह प्रावधान भी शामिल था कि यदि भारत पर कोई देश आक्रमण करता है तो सोवियत संघ हमारी मदद करेगा और यदि सोवियत संघ पर कोई आक्रमण करता है तो हम सोवियत संघ की मदद करेंगे। इस संधि का भी भारत में कुछ लोगों ने विरोध किया। सबसे बड़ा विरोध जनसंघ की ओर से किया गया। जनसंघ के नेता सोवियत संघ से दोस्ती के विरोधी रहे हैं।

यह विरोध तब तक चलता रहा जब भारत में अटल बिहारी वाजपेयी पहले विदेश मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री बने। विदेश मंत्री बनने के बाद वे भोपाल आए हुए थे। भोपाल में पत्रकारवार्ता में हम लोगों ने उनसे पूछा कि आपका अब सोवियत संघ के साथ भारत के संबंधों के बारे में क्या विचार है? तो उन्होंने कहा कि सोवियत संघ से मैत्री इज़नॉननेगोशियेबल (सोवियत संघ से मैत्री पर किसी भी प्रकार की चर्चा जरूरी नहीं है)। सोवियत संघ हमारा मित्र है।

इस मित्रता का मुख्य कारण यह था कि सोवियत संघ ने हमारे देश को कई बड़े कारखाने दिए, रक्षा उपकरण दिए और हमारे साथ कई संधियां कीं। सोवियत संघ की मदद से सबसे पहले भिलाई में इस्पात संयंत्र स्थापित किया गया। उसके बाद अनेक बड़े-बड़े कारखाने स्थापित करने में सोवियत संघ ने हमारी मदद की। फिर यह मदद बिना किसी शर्त के होती थी। सोवियत संघ से मिलने वाली मदद को हैल्पविथनोस्ट्रिंग कहते थे - बिना किसी शर्त की सहायता।

अब देश में एक लंबे समय से कांग्रेस की सरकार नहीं है। सन् 2014 में माननीय नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी। लोग सोचते थे कि नरेन्द्र मोदी सोवियत संघ से मैत्री पूरी तरह तोड़ देंगे। परंतु ऐसा नहीं हुआ और उतनी तो नहीं पर काफी हद तक सोवियत संघ से हमारी मैत्री कायम रही। सोवियत संघ के विघटन और वहां कम्युनिस्ट सरकार के पतन के बाद सोवियत संघ को अब रूस कहा जाता है। रूस से भी हमारी मैत्री कायम रही। इसी मैत्री के प्रतिस्वरूप वहां के सर्वोच्च नेता ब्लादिमीर पुतिन हमारे देश आए हुए हैं। उनका भी लगभग वैसा ही स्वागत किया जाएगा जैसे जब सोवियत संघ में कम्युनिस्ट शासन था तब वहां हमारे नेताओं का स्वागत होता था।

रूस से हमारे संबंधों का सबसे बड़ा कारण है हथियार। जो हथियार हमको रूस से मिलते हैं वे हमारी बड़ी ताकत है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि यह ताकत कायम रहेगी। जब सोवियत संघ था तब वह दुनिया में शांति स्थापित करने की बात करता था और उसके लिए उसका नेतृत्व और साहित्य उपलब्ध रहता था। आज भी जो वैश्विक स्थिति बनी हुई है उसमें रूस और भारत की मैत्री कायम रहेगी, पुतिन की यात्रा इसका स्पष्ट सुबूत है।(संवाद)