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Saturday, July 18, 2026

19 जुलाई: बैंक राष्ट्रीयकरण—पर मनिंदर सिंह भाटिया का विशेष लेख

On Saturday 18th July 2026 at 22:37 WhatsApp Regarding Nationalisation of Banks By M S Bhatia

सार्वजनिक बैंकिंग की विरासत और आज की चुनौतियाँ

लुधियाना से बैंकिग इंडस्ट्री से रिटायर हुए मनिंदर सिंह भाटिया की कलम से 

AI image Regarding Banks Nationalisation 

इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं,
जो केवल किसी समय की सरकार की नीति नहीं होते, बल्कि पूरे राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक दिशा को नया मोड़ देते हैं। 19 जुलाई 1969 को देश के 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण ऐसा ही एक ऐतिहासिक निर्णय था। इसने भारतीय बैंकिंग को बड़े औद्योगिक घरानों और शहरी व्यापारिक हितों की सीमाओं से निकालकर किसानों, मज़दूरों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण जनता के विकास से जोड़ा।


1947 में
स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसमें बैंकिंग सेवाएँ मुख्यतः शहरों और बड़े व्यापारिक केंद्रों तक सीमित थीं। देश की अधिकांश आबादी—किसान, खेत मज़दूर, कारीगर और छोटे व्यापारी—औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर थी। उनकी ऋण आवश्यकताएँ साहूकारों और महाजनों से पूरी होती थीं, जो अत्यधिक ब्याज वसूलकर उनकी आर्थिक मजबूरी का शोषण करते थे।

स्वतंत्र भारत के सामने इसलिए एक बुनियादी प्रश्न था—क्या बैंकिंग व्यवस्था केवल निजी लाभ कमाने के लिए काम करेगी या उसे राष्ट्रीय विकास और सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जाएगा?

सामाजिक नियंत्रण का अधूरा प्रयोग

1960 के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया था कि निजी वाणिज्यिक बैंक देश की विकास संबंधी जरूरतों के अनुरूप अपनी ऋण नीति में आवश्यक परिवर्तन नहीं कर रहे थे। कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर व्यवसायों और ग्रामीण क्षेत्रों को संस्थागत ऋण बहुत सीमित मात्रा में मिलता था, जबकि बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक ऋण का बड़ा हिस्सा प्राप्त होता था।

इस असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 1967–68 में बैंकों पर “सामाजिक नियंत्रण” की नीति लागू की। इसका उद्देश्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना नहीं, बल्कि उनकी ऋण नीतियों को राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना था।

इस नीति के अंतर्गत बैंक निदेशक मंडलों में कृषि, लघु उद्योग, सहकारिता और अन्य जनहितकारी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रयास किया गया। आशा थी कि इससे बैंक ऋण का वितरण अधिक संतुलित होगा और जनता की जमा पूँजी का उपयोग व्यापक सामाजिक हित में किया जा सकेगा।

लेकिन यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया। बैंकों का स्वामित्व और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति निजी हाथों में ही बनी रही। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की ओर ऋण प्रवाह में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया। इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि केवल नियम बनाकर निजी स्वामित्व वाली बैंकिंग व्यवस्था के चरित्र को नहीं बदला जा सकता।

सामाजिक नियंत्रण राष्ट्रीयकरण का विकल्प सिद्ध नहीं हुआ; बल्कि उसकी असफलता ने बैंक राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया।

राष्ट्रीयकरण की माँग और जन आंदोलन

बैंक राष्ट्रीयकरण का निर्णय अचानक नहीं लिया गया था। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा ट्रेड यूनियनों, बैंक कर्मचारियों और वामपंथी दलों का आंदोलन भी था। कम्युनिस्ट आंदोलन ने बैंकिंग संसाधनों को बड़े औद्योगिक घरानों के नियंत्रण से निकालकर राष्ट्रीय विकास के लिए इस्तेमाल करने की माँग प्रमुखता से उठाई।

सांसद और प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन ने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार बैंक राष्ट्रीयकरण की माँग के समर्थन में लाखों लोगों के हस्ताक्षर एकत्र किए गए। इन हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापनों के बड़े-बड़े बंडल दिल्ली लाकर संसद के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

यह कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कई महीनों तक चला व्यापक जन अभियान था। इस आंदोलन ने बैंकिंग व्यवस्था के निजी चरित्र और बड़े पूँजीपति घरानों के साथ उसके संबंधों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया।

19 जुलाई 1969 का ऐतिहासिक फैसला

19 जुलाई 1969 की मध्यरात्रि को भारत सरकार ने अध्यादेश जारी करके ₹50 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। बाद में संसद ने इस निर्णय को कानूनी स्वीकृति प्रदान की।

राष्ट्रीयकृत किए गए बैंकों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनाइटेड कमर्शियल बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, देना बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, सिंडिकेट बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र शामिल थे।

इस निर्णय ने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का चरित्र बदल दिया। पहली बार स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया गया कि बैंक केवल निजी लाभ कमाने वाली व्यावसायिक संस्थाएँ नहीं हैं। जनता की बचत को एकत्र करके उसे कृषि, लघु उद्योग, ग्रामीण विकास, स्वरोज़गार और कमजोर वर्गों की आर्थिक उन्नति की ओर ले जाना भी बैंकिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

उस समय कुछ औद्योगिक घरानों और अर्थशास्त्रियों ने बैंक राष्ट्रीयकरण का विरोध किया। उनका तर्क था कि सरकारी नियंत्रण से बैंकों की कार्यकुशलता प्रभावित होगी और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। इसके विपरीत राष्ट्रीयकरण के समर्थकों का कहना था कि भारत जैसे विकासशील देश में बैंकिंग को पूरी तरह बाज़ार और निजी लाभ की शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

बैंकिंग को गाँवों और आम जनता तक पहुँचाना

राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र की प्राथमिकताएँ बदल गईं। इससे पहले बैंक मुख्य रूप से बड़े शहरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और औद्योगिक घरानों पर केंद्रित थे। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में हजारों नई बैंक शाखाएँ खोली गईं।

करोड़ों किसान, खेत मज़दूर, छोटे दुकानदार, कारीगर और स्वरोज़गार करने वाले लोग पहली बार औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। यह केवल शाखाओं की संख्या बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाने की प्रक्रिया थी।

हरित क्रांति के दौरान सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, ट्रैक्टर तथा अन्य कृषि उपकरणों के लिए बैंक ऋण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छोटे और कुटीर उद्योगों को भी संस्थागत वित्तीय सहायता मिलने लगी।

इसी दौर में प्राथमिकता क्षेत्र ऋण की नीति विकसित हुई। इसके अंतर्गत बैंकों को कृषि, लघु उद्योग, शिक्षा, आवास, स्वरोज़गार और समाज के कमजोर वर्गों को ऋण देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बैंकिंग को केवल लाभ कमाने की गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का माध्यम माना गया।

इस परिवर्तन में बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने दूर-दराज़ के इलाकों में शाखाएँ स्थापित कीं, लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित किया और बैंकिंग सेवाओं को आम नागरिकों तक पहुँचाया। आज जिस वित्तीय समावेशन की चर्चा की जाती है, उसकी वास्तविक नींव इसी दौर में रखी गई थी।

1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण

बैंक राष्ट्रीयकरण का दूसरा चरण 1980 में आया, जब ₹200 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले छह और प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इनमें आंध्रा बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, न्यू बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब एंड सिंध बैंक और विजया बैंक शामिल थे।

इसके बाद देश के लगभग 91 प्रतिशत बैंकिंग कारोबार पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण स्थापित हो गया। बैंकिंग का विस्तार शहरों से गाँवों तक हुआ और गरीब किसानों तथा छोटे व्यापारियों की साहूकारों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया गया।

राष्ट्रीयकरण की सफलता का मूल्यांकन केवल बैंकों के लाभ से नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने कितने लोगों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ा, कितने गाँवों में वित्तीय सेवाएँ पहुँचाईं और देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में कितना योगदान दिया।

उदारीकरण के बाद की बैंकिंग: नई चुनौतियाँ और सार्वजनिक बैंकों की भूमिका

1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित नई आर्थिक नीति अपनाई। बैंकिंग क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव किए गए। नए निजी बैंकों को लाइसेंस मिले, विदेशी बैंकों का विस्तार हुआ और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया।

इन परिवर्तनों से बैंकिंग तकनीक, डिजिटल भुगतान, ग्राहक सेवा और संचार व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार हुए। लेकिन इसके साथ एक पुराना प्रश्न फिर सामने आया—क्या बैंकिंग का उद्देश्य केवल अधिक लाभ कमाना है या उसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए?

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आज भी कृषि, शिक्षा, छोटे उद्योगों, स्वयं सहायता समूहों और कमजोर वर्गों को ऋण देने की प्रमुख जिम्मेदारी निभाते हैं। निजी बैंक स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों और ग्राहकों को अधिक प्राथमिकता देते हैं, जहाँ व्यावसायिक लाभ की संभावना अधिक होती है।

हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि बड़े बैंक अधिक मजबूत, पूँजी-संपन्न और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनेंगे। दूसरी ओर सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण की कोशिशों ने उनकी सामाजिक भूमिका के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं।

एनपीए और बड़े कर्जदारों का सवाल

भारतीय बैंकिंग की एक बड़ी समस्या गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की है। लेकिन इस समस्या को केवल सार्वजनिक बैंकिंग की विफलता बताना उचित नहीं होगा। बड़े औद्योगिक घरानों को दिए गए ऋणों का न लौटना, जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले बड़े कर्जदारों पर कमजोर कार्रवाई तथा कानूनी वसूली प्रक्रिया में देरी भी इस संकट के प्रमुख कारण हैं।

छोटे किसान या सामान्य ऋणधारक पर वसूली के लिए तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन हजारों करोड़ रुपये का ऋण न लौटाने वाले बड़े कर्जदार कई बार व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। इसलिए बैंकिंग सुधारों की वास्तविक दिशा बड़े कर्जदारों की जवाबदेही, पारदर्शी ऋण वितरण और प्रभावी वसूली तंत्र की स्थापना होनी चाहिए।

सार्वजनिक बैंकों की आज भी जरूरत

आज भी जनधन खाते खोलने, किसानों को ऋण देने, पेंशन और सरकारी सहायता पहुँचाने, स्वयं सहायता समूहों को वित्त उपलब्ध कराने तथा आर्थिक संकट के समय सरकारी नीतियों को लागू करने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक बैंकों ने राहत योजनाओं, ऋण सहायता और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे एक बार फिर स्पष्ट हुआ कि संकट के समय केवल लाभ आधारित बैंकिंग व्यवस्था समाज की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती।

सार्वजनिक बैंकों की कमियों को दूर करना आवश्यक है। उनमें पारदर्शिता, पेशेवर दक्षता, जवाबदेही और तकनीकी क्षमता बढ़नी चाहिए। राजनीतिक हस्तक्षेप तथा गलत ऋण वितरण पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन कमियों का समाधान निजीकरण नहीं है।

निष्कर्ष

19 जुलाई 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था। यह भारत की आर्थिक सोच में आया ऐतिहासिक परिवर्तन था, जिसने बैंकिंग व्यवस्था को बड़े व्यापारिक और औद्योगिक हितों की सीमाओं से निकालकर गाँवों, किसानों, छोटे उद्योगों और आम जनता से जोड़ा।

आज बैंकिंग क्षेत्र तकनीक, प्रतिस्पर्धा और नई आर्थिक परिस्थितियों के कारण तेजी से बदल रहा है। फिर भी सार्वजनिक बैंकों की सामाजिक जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी राष्ट्रीयकरण के समय थी।

वास्तविक चुनौती पुराने मॉडल पर आँख बंद करके लौटने या पूरी तरह निजीकरण की राह अपनाने की नहीं है। आवश्यकता ऐसी बैंकिंग व्यवस्था की है, जो कार्यकुशलता और पारदर्शिता को सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ सके।

इतिहास सिखाता है कि जब वित्तीय संस्थाएँ जनता से दूर हो जाती हैं, तो वे अपना वास्तविक उद्देश्य खो देती हैं। लेकिन जब बैंकिंग व्यवस्था समाज और उसकी आवश्यकताओं से जुड़ी रहती है, तब वह राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बनती है।

Sunday, February 22, 2026

केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जनता में तीखा रोष

From MSB on 22nd February 2026 at 17:23 Regarding Dharna in front of BJP office 

 बीजेपी ऑफिस के सामने दिया गया विशाल धरना-धरना 


लुधियाना
: 22 फरवरी 2026: (मीडिया लिंक रविंदर//कामरेड स्क्रीन डेस्क) ::

केंद्र सरकार के जनविरोधी कानूनों, जिसमें चार लेबर कोड, मनरेगा खत्म करके नया कानून लाना, इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल, सीड बिल और इंडिया-यूऐस ट्रेड एग्रीमेंट शामिल हैं, के खिलाफ आज  बीजेपी ऑफिस के सामने धरना दिया गया। इसी तरह, आम आदमी पार्टी और उसकी  जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आज पूरे पंजाब में मंत्रियों के घरों के सामने धरने दिए गए। आज का धरना एसकेएम , ट्रेड यूनियनों और जनतक जमहूरी संगठनों ने दिया। धरने को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार कॉर्पोरेट समर्थक और जनविरोधी है। जो भी कानून लाए जा रहे हैं, वे बड़े अमीरों को खुश करने के लिए लाए जा रहे हैं और मेहनतकश लोगों का खून निचोड़ा जा रहा है। इंडिया-यूएस एग्रीमेंट ने देश की आत्मा को हिला दिया है। स्पीकर्स में डॉ. राजिंदर पाल सिंह औलाख, रघबीर सिंह बेनीपाल, डी पी मौड, नरेश गौड   जमीर हुसैन, अवतार सिंह, लखविंदर सिंह, अजीत सिंह धंद्रा, सुखविंदर सिंह लोटे, केवल सिंह बनवैत, अवतार सिंह मेहलो, सरबजीत सिंह सरहाली, गुरप्रीत सिंह वड़ैच, जगदीश चंद, हरजिंदर सिंह, रविंदर कौर, जसवंत जीरख, मनिंदर सिंह भाटिया, जगदीप सिंह, हरजिंदर कौर, गुरप्रीत सिंह महदूदा और चरन सिंह नूरपुरा शामिल थे। प्रेसिडियम में अमरनाथ कुम कलां, परमजीत सिंह, विजय कुमार, देवराज लखविंदर सिंह, जसवीर झज्ज, जसप्रीत सिंह, रणवीर सिंह रुरका और गुरजीत सिंह जगपाल शामिल थे।

स्टेज का संचालन हरनेक सिंह गुज्जरवाल और युवा किसान नेता मनु बुआनी ने अच्छे से संभाला। जिन संगठनों ने हिस्सा लिया उनमें एटक , इंटक, सीटू, सीटीयू पंजाब, कारखाना मज़दूर यूनियन, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्स यूनियन, जम्हूरी किसान सभा, कुल हिंद किसान सभा 1936, टेक्निकल सर्विस यूनियन, पावरकॉम कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉई यूनियन, पेंशनर्स यूनियन, बीकेयू लखोवाल, बीके यू उगराहां, वेरका आउटसोर्स एम्प्लॉई यूनियन, बीके यू डकौंडा (धनेर) शामिल थे।

Monday, September 8, 2025

सीपीआई सांसद द्वारा बाढ़ प्रभावित पंजाब के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग

Received from MS Bhatia on Monday 8th September 2025 at 16:42 Regarding CPI MP

 सीपीआई नेता संतोष कुमार पी. ने केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह को पत्र लिखा 

*राज्यसभा में सीपीआई नेता संतोष कुमार पी.

*बाढ़ प्रभावित पंजाब के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग उठाई गई

*राज्यसभा में सीपीआई नेता ने विशेष पैकेज की मांग की

*बाढ़ प्रभावित पंजाब के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग की गई

*उन्होंने स्वयं गाँवों का दौरा किया


लुधियाना: 8 सितंबर 2025: (एमएस भाटिया//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब के फाजिल्का जिले के बाढ़ प्रभावित गाँवों के अपने दौरे के दौरान, राज्यसभा में सीपीआई नेता कॉमरेड संतोष कुमार पी. ने स्वयं गाँवों का दौरा किया और अभूतपूर्व बाढ़ से हुई तबाही को देखा। इस संवेदनशील दौर के बाद, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पंजाब के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए पैकेज की मांग की है।

उन्होंने कहा, "पूरे खेत जलमग्न हो गए हैं, फसलें बर्बाद हो गई हैं, मवेशी मर गए हैं और घर मलबे में तब्दील हो गए हैं। परिवार बाढ़ग्रस्त इलाकों में फंसे हुए हैं, उनकी आजीविका नष्ट हो गई है और हर जगह पानी जमा होने से बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित उन किसानों की आँखों में निराशा ने किया जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया है और आश्रय और जीविका की तलाश कर रहे परिवारों की लाचारी ने किया है। इस बेहद संवेदनशील स्थिति में भी किसान फल-फूल रहे हैं। वे एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं।"

अपनी यात्रा के दौरान, भाकपा सांसद संतोष ने प्रभावितों की मदद के लिए आगे आए अनगिनत स्वयंसेवकों से भी बातचीत की। एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, भारतीय सेना और अन्य एजेंसियां, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत जन संगठन भी शामिल हैं, बेहद कठिन परिस्थितियों में अथक परिश्रम कर रही हैं। प्रभावित गाँवों में जान बचाने और भोजन व दवाइयाँ पहुँचाने में उनका साहस और एकजुटता सराहनीय है। वे प्रशंसा से भी बढ़कर हैं।

फिर भी, इतने प्रयासों के बावजूद, इस आपदा की तबाही वास्तव में सरकारी राहत के पैमाने से कहीं ज़्यादा है। यह राहत बहुत कम है। फाजिल्का, गुरदासपुर, अमृतसर, कपूरथला, फिरोजपुर, तरनतारन, होशियारपुर, लुधियाना, मानसा और पटियाला पूरी तरह जलमग्न हैं। जलमग्न या बुरी तरह क्षतिग्रस्त। इसके साथ ही, लाखों लोग भूख, बीमारी और विस्थापन से पीड़ित हैं। उनकी पीड़ा को गिनना लगभग असंभव है।

उन्होंने आगे लिखा कि इन परिस्थितियों में, मैं केंद्र सरकार से तत्काल और सहानुभूतिपूर्वक कार्रवाई करने की अपील करता हूँ। पंजाब को नियमित वितरण के अलावा, तुरंत पर्याप्त राहत राशि जारी करने की आवश्यकता है, साथ ही एक व्यापक पैकेज भी जारी करना चाहिए जो फसल और पशुधन के नुकसान, घरों और आजीविका के विनाश और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की पूरी सीमा को कवर करे। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अगले फसल सीजन के लिए रियायती दरों पर बीज, उर्वरक और अन्य कृषि आदानों की आपूर्ति सुनिश्चित करके विशेष व्यवस्था की जाए। महामारी को रोकने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, स्कूलों और सार्वजनिक सुविधाओं का जीर्णोद्धार, और इन बाढ़ों से तबाह हुए सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने का समय पर पुनर्निर्माण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भाकपा राज्य इकाई के सदस्य ने भी लोगों का उत्साहवर्धन किया।

अपने पत्र के अंत में, उन्होंने लिखा कि मैं आपसे व्यक्तिगत हस्तक्षेप का अनुरोध करता हूँ ताकि राहत और पुनर्वास सुनिश्चित हो सके। पंजाब के लोगों तक बिना किसी देरी के पहुँचें। लोगों का धैर्य मज़बूत है और स्वयंसेवकों में एकता की भावना प्रेरणादायक है, लेकिन अभी केंद्र सरकार से निर्णायक समर्थन की तत्काल आवश्यकता है।

आवश्यक राहत पैकेज के बाद ही बाढ़ प्रभावित परिवार सम्मान के साथ अपने जीवन के पुनर्निर्माण की कठिन यात्रा शुरू कर सकते हैं।

Saturday, March 29, 2025

निर्माण मज़दूर हाशिये पर हैं और सरकार लगातार उदासीन बनी हुई है

 From M S Bhatia on Friday 28th March 2025 at 19:25 Regarding Pretest at Jantar Mantar New Delhi 

प्रेस विज्ञप्ति में बताई मज़दूर नेता *विजयन कुनिसरी ने मज़दूरों की दयनीय हालत

नई दिल्ली के जंतर मंत्र में निर्माण श्रमिकों द्वारा बड़े पैमाने पर मोर्चा 


नई दिल्ली: 28 मार्च 2025: (एम एस भाटिया//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस से संबद्ध भवन और निर्माण श्रमिकों के अखिल भारतीय परिसंघ ने आज एक संसद मोर्चा, यानी 28 मार्च 2025 को देश भर के लगभग 25 राज्यों और केंद्र क्षेत्रों से, 5000 निर्माण श्रमिक जंतर मंतर नई दिल्ली पर एकत्रित हुए ताकि सरकार पर दबाव डाला जा सके केवल निर्माण मजदूरों के प्रति बेपरवाही छोड़ दे।

एआईसीबीसीडब्ल्यू के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बासुदेब गुप्ता ने मोर्च की अध्यक्षता की। विजयन कुनिसरी के महासचिव (AICBCW) ने डिमांड चार्टर  प्रस्तुत किया। एम प्रवीण कुमार महासचिव ने सभी का स्वागत किया। अमरजीत कौर, महासचिव, AITUC ने धरना कार्यक्रम का उद्घाटन किया। के सुब्बारायण सांसद (सीपीआई), संथोश कुमार सांसद (सीपीआई, राज्यसभा) और वाहिधा निज़ाम और रामकृष्ण पांडा एटक के राष्ट्रीय सचिवों ने सभा को संबोधित किया।   

निर्माण क्षेत्र भारत में महिलाओं और बच्चों सहित 10 करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी प्रदान करता है। अधिकांश कार्यबल असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। विधायी संरक्षण का अभाव उन्हें सभी प्रकार के शोषण के लिए सबसे कमजोर बनाता है। मौजूदा कानूनों में से कोई भी जैसे कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, मातृत्व लाभ, अनुबंध श्रम अधिनियम आदि के हक में श्रमिकों को नहीं मिलते। वे सामाजिक रूप से उत्पीड़ित और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के बहुमत को बनाते हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में, BOCW अधिनियम 1996 के गैर-निष्पादन और भवन और अन्य निर्माण श्रमिकों के कल्याण सेस अधिनियम, 1996 के बारे में अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। संसद द्वारा लागू किए गए इन कानूनों को काफी हद तक राज्य सरकारों और संघ क्षेत्र प्रशासनों द्वारा  अवहेलना की गई है। 

यहां तक ​​कि जब मौजूदा कानून कार्यबल की रक्षा करने में विफल हुए हैं, पर श्रम कोड इस स्थिति को  बदतर बना देंगे। निर्माण श्रमिक लगातार अपने कानूनी अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहते हैं। यह संसद मोर्चा आजीविका के लिए गंभीर संघर्षों की श्रृंखला में एक और है।

के सुब्बारायण-सांसद ने श्रम और रोजगार मंत्री से मुलाकात की और AICBCW की मांगों के चार्टर का एक ज्ञापन सौंपा। मांगों में शामिल हैं:

1। श्रम कोड को निरस्त करें और सख्ती से BOC अधिनियम को लागू करें 

2। काम की खतरनाक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए ईएसआई के तहत सभी बीओसी श्रमिकों को शामिल किया जाए।

3। BOC श्रमिकों के लिए बोनस, पीएफ, ग्रेच्युटी और त्योहार भत्ता के लिए कानूनी प्रावधान करें

4। न्यूनतम मजदूरी को  36000/ रुपए प्रति माह तक बढ़ाया जाना चाहिए ( जो कि 15 वें ILC के दिशानिर्देशों और रैप्टकोस और ब्रेट केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार है)

5। न्यूनतम पेंशन को बढ़ाया जाना चाहिए रुपए 6000/- प्रति माह तक ।

6। सभी भूमिहीन बीओ सी श्रमिकों के लिए भूमि और आवास प्रदान करें

7। अलग -अलग कानूनों के माध्यम से व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य उपायों को सुनिश्चित करें।

8। सेस राशि को 2%तक बढ़ाएं, फंड को बढ़ाने के लिए उचित संग्रह सुनिश्चित करें

9। फंड के उचित उपयोग के लिए निगरानी समितियों की स्थापना करें।

10। कल्याण बोर्डों के माध्यम से मातृत्व लाभ अधिनियम में निर्धारित मातृत्व लाभ का भुगतान सुनिश्चित करें।

संसद मोर्चा व्यापक और मजबूत भागीदारी के संबंध में सफल है। लेकिन इस मामले का अल हाल  श्रमिकों की वास्तविक आजीविका के मुद्दों को संबोधित करने के लिए भाजपा सरकार की नीतियों में बदलाव पर निर्भर करता है। 

*विजयन कुनिसरी ऑल इंडिया कन्फेडरेशन ऑफ बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (AICBCW) महासचिव हैं और यह संगठन  AITUCसे  सबंधित है। 

Thursday, November 7, 2024

महान रूसी क्रांति: विश्व और आज के भारत के लिए इसके सबक

Tuesday 5th November 2024 at 16:19//WhatsApp//M S Bhatia

रूसी क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर भी गहरा प्रभाव डाला

    --डी. राजा, महासचिव, सीपीआई                                    अनुवाद> एम एस भाटिया 


वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य संघर्षों और गठबंधनों के बहुआयामी जाल से चिह्नित है,
जिसमें अमेरिकी साम्राज्यवाद एक अस्थिर शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका की हस्तक्षेपकारी विदेश नीति - सैन्य हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंध और शासन परिवर्तन को बढ़ावा देने की विशेषता - ने क्षेत्रीय अस्थिरता में योगदान दिया है, विशेष रूप से मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में। यह साम्राज्यवादी दृष्टिकोण वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य को जटिल बनाता है और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करता है। यह एक बहुध्रुवीय दुनिया में तनाव को भी बढ़ाता है, एक स्थिर और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की खोज को चुनौती देता है। इस संदर्भ में, 1917 की रूसी क्रांति के सबक वैश्विक और घरेलू मामलों में शांति, स्थिरता, आपसी सम्मान और सद्भाव लाने में महत्वपूर्ण महत्व रखते हैं, विशेष रूप से भारत में।

26 नवंबर, 1917 को जारी लेनिन का शांति पर फरमान प्रथम विश्व युद्ध और व्यापक वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण क्षण था। बोल्शेविक क्रांति से उभरकर, इस आदेश ने शत्रुता को तत्काल समाप्त करने का आह्वान किया और बिना किसी अधिग्रहण या क्षतिपूर्ति के शांति वार्ता की वकालत की। यह मानवता पर प्रथम विश्व युद्ध के क्रूर प्रभाव के लिए एक प्रत्यक्ष और साहसिक प्रतिक्रिया थी, जो संघर्ष को समाप्त करने के व्यापक आग्रह को दर्शाती है। लेनिन ने खुद को और पार्टी को लोगों की चिंताओं के साथ शांति के चैंपियन के रूप में स्थापित करके बोल्शेविकों के लिए भारी समर्थन जुटाया, जो युद्ध में शामिल अन्य शक्तियों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के बिल्कुल विपरीत था।

लेनिन ने पूंजीवाद के साम्राज्यवादी चरण का विश्लेषण किया और बताया कि समाजवाद ही विकल्प है। समाजवाद दुनिया में शांति और विकास के लिए खड़ा है। समाजवाद सभी के लिए सामान्य भलाई, खुशी और समृद्धि के लिए है। समाजवाद सभी प्रकार के शोषण और दासता को समाप्त करता है। समाजवाद लोगों को सभी भेदभावों और अन्याय से मुक्त करता है।

उस समय के दौरान वैश्विक संदर्भ युद्ध के साथ व्यापक मोहभंग से चिह्नित था, विशेष रूप से उन औपनिवेशिक देशों में जिनके संसाधनों और आबादी का यूरोपीय शक्तियों के लाभ के लिए शोषण किया गया था। शांति के लिए आह्वान केवल रूस में ही नहीं बल्कि विभिन्न उपनिवेशों और क्षेत्रों में भी गूंजा, जहाँ साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष बढ़ रहे थे। लेनिन के फरमान ने उपनिवेशी लोगों में यह उम्मीद जगाई कि वे आत्मनिर्णय और स्वतंत्रता की तलाश में साम्राज्यवादी शक्तियों के कमजोर होने का लाभ उठा सकते हैं। सोवियत संघ के साम्राज्यवाद-विरोधी रुख और शांति की वकालत ने औपनिवेशिक शासन से छुटकारा पाने के लिए प्रयासरत कई देशों की आकांक्षाओं पर गहरा प्रभाव डाला, जिससे एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में व्यापक क्रांतिकारी लहर भड़क उठी।

लेनिन के फरमान का प्रभाव रूस से कहीं आगे तक फैला, जिसने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को महत्वपूर्ण तरीकों से प्रभावित किया। जैसे-जैसे औपनिवेशिक विषयों ने शांति और आत्मनिर्णय के आह्वान को अपने संघर्षों के खाके के रूप में समझना शुरू किया, इसने दुनिया भर में राष्ट्रवादी आंदोलनों के उद्भव में योगदान दिया। भारत और मिस्र जैसे देशों में क्रांतिकारी परिवर्तन के बोल्शेविक मॉडल का अनुकरण करने की इच्छा से प्रेरित उपनिवेशवाद-विरोधी सक्रियता में वृद्धि देखी गई। इसके अतिरिक्त, युद्ध के बाद के समझौते में, विशेष रूप से पेरिस शांति सम्मेलन में, आत्मनिर्णय की अवधारणा को बल मिला, हालाँकि साम्राज्यवादी शक्तियों ने इन आकांक्षाओं को कमज़ोर करने की पूरी कोशिश की। इस प्रकार, शांति पर लेनिन के आदेश ने न केवल रूसी इतिहास की दिशा बदल दी, बल्कि एक परिवर्तनकारी लहर भी शुरू की जिसने दुनिया भर में उपनिवेशवाद की नींव को चुनौती दी और साम्राज्यवादी अराजकता और शोषण के बीच विश्व शांति की आशा जगाई।

इसी समय, लेनिन के राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के आह्वान ने औपनिवेशिक राष्ट्रों में गहरी प्रतिध्वनि पैदा की, जिसने औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता की मांग करने वाले उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों के लिए एक शक्तिशाली रूपरेखा प्रदान की। राष्ट्रों के अपने भाग्य का निर्धारण करने के अधिकार पर उनके जोर ने एशिया और अफ्रीका के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया, जिन्होंने उनके विचारों को औपनिवेशिक उत्पीड़न के खिलाफ उनके संघर्षों की पुष्टि के रूप में देखा। भारत में, इस भावना को विभिन्न आंदोलनों में अभिव्यक्ति मिली। लेनिन के सिद्धांत का प्रभाव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक विकास में स्पष्ट था। जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने विविध भारतीय समुदायों के बीच एकता के महत्व को पहचानते हुए, अपने राजनीतिक एजेंडे में आत्मनिर्णय और साम्राज्यवाद-विरोध की धारणाओं को शामिल करना शुरू कर दिया। 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उदय ने जनता के बीच लेनिनवादी विचारों के प्रभाव को दर्शाया, क्योंकि इसने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को वैश्विक क्रांतिकारी आंदोलन के साथ जोड़ने का प्रयास किया। ये आंदोलन और उनके नेता न केवल लेनिन के आह्वान से प्रभावित थे, बल्कि प्रतिरोध की एक व्यापक कथा में भी योगदान दिया, जो अंततः 1947 में भारत की स्वतंत्रता में परिणत हुई, जिसने औपनिवेशिक संदर्भ में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय पर लेनिन के विचारों की परिवर्तनकारी शक्ति को उजागर किया।

इसके अलावा, रूस का विशाल भूगोल भी कई अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व के कारण एक कठिन चुनौती पेश करता है। सोवियत गणराज्य की अवधारणा इस विविधता को ध्यान में रखते हुए की गई थी। राष्ट्रीयताओं के मुद्दे पर लेनिन के दृष्टिकोण ने अलग-अलग जातीय समूहों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर जोर दिया, जो भारत जैसे बहुभाषी, बहु-जातीय देश के लिए महत्वपूर्ण प्रासंगिकता रखता है। भारत, जिसकी विविध आबादी में कई भाषाएँ, धर्म और जातीय पृष्ठभूमि शामिल हैं, यह विचार एक मजबूत संघीय ढांचे की अनुमति देते हुए एकता को बढ़ावा देने के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में काम कर सकता है। उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के अधिकारों के लिए लेनिन की वकालत एक ऐसे ढांचे को प्रोत्साहित करती है जहाँ अल्पसंख्यकों की आवाज़ सुनी जा सकती है और उन्हें शासन प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है, जिससे तनाव कम हो सकता है और विभिन्न समुदायों के बीच अपनेपन की भावना को बढ़ावा मिल सकता है। व्यापक राष्ट्रीय ढांचे के भीतर स्थानीय पहचानों के महत्व को पहचानकर, भारत एक अधिक समावेशी समाज की दिशा में काम कर सकता है जो न केवल अपनी विविधता को स्वीकार करता है बल्कि उसका जश्न भी मनाता है। इस प्रकार राष्ट्रीयताओं पर लेनिन की अंतर्दृष्टि एक ऐतिहासिक लेंस प्रदान करती है जिसके माध्यम से भारत अपनी जटिल पहचान परिदृश्य को नेविगेट कर सकता है, विविधता में एकता का लक्ष्य रखते हुए यह सुनिश्चित करता है कि देश के भविष्य में सभी समूहों की हिस्सेदारी हो।

हमें इस तथ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए कि 1917 की रूसी क्रांति ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव डाला, जिसने विभिन्न राष्ट्रवादी गुटों के बीच राजनीतिक चेतना की एक नई लहर को प्रेरित किया। बोल्शेविकों द्वारा ज़ारवादी शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंकना और साम्राज्यवाद-विरोधी पर उनका जोर भारतीय नेताओं और कार्यकर्ताओं, विशेष रूप से देश में उभर रहे वामपंथी आंदोलनों के साथ गहराई से जुड़ा था। उत्पीड़ितों के अधिकारों और आत्मनिर्णय की आवश्यकता को प्राथमिकता देने वाली क्रांति के विचार ने भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए एक सम्मोहक ढांचा प्रदान किया, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से लगातार मोहभंग हो रहे थे। 

इसके परिणामस्वरूप 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ, जिसने साम्राज्यवाद के खिलाफ विभिन्न सामाजिक वर्गों को एकजुट करने और मजदूरों और किसानों के अधिकारों की वकालत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ट्रेड यूनियन गतिविधियों और किसान आंदोलनों में कम्युनिस्ट पार्टी की भागीदारी ने व्यापक उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे वर्ग संघर्ष और राष्ट्रीय मुक्ति के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी। 

इस अवधि के दौरान भारतीय कम्युनिस्टों द्वारा किए गए बलिदानों ने स्वतंत्रता के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाया। मार्क्सवादी विचारधाराओं से गहराई से प्रभावित भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी ब्रिटिश उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में प्रतिष्ठित शहीद बन गए। 1931 में उनकी फांसी ने पूरे देश में युवाओं को प्रेरित किया, इस विचार को मजबूत किया कि सच्ची स्वतंत्रता के लिए क्रांति आवश्यक है। 

इसके अतिरिक्त, 1940 के दशक के उत्तरार्ध में तेलंगाना विद्रोह में कई कम्युनिस्टों के प्रयासों ने न्याय की तलाश में हथियार उठाने की उनकी तत्परता को प्रदर्शित किया, अक्सर बड़ी व्यक्तिगत कीमत पर। इन व्यक्तियों और व्यापक कम्युनिस्ट आंदोलन के बलिदानों ने न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को समृद्ध किया, बल्कि वर्ग और राष्ट्रीय संघर्षों की परस्पर संबद्धता को भी उजागर किया। 

उनकी विरासत भारत में सामाजिक न्याय और समानता पर समकालीन चर्चाओं को प्रभावित करती रहती है, तथा राष्ट्र की स्वतंत्रता के मार्ग पर रूसी क्रांति के स्थायी प्रभाव और एक नए भारत - एक समाजवादी भारत के निर्माण को रेखांकित करती है।

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Tuesday, July 30, 2024

नरेगा श्रमिकों व मेटों पर सरकारी बदमाशी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे

 मंगलवार 30 जुलाई 2024 शाम ​​4:52 बजे

BDPO कार्यालय चौमन ब्लॉक मालूद पर एटक द्वारा विशाल धरना


मलौद
: 30 जुलाई 2024: (एमएस भाटिया//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

जानामाना, पुराना और मज़बूत मज़दूर संगठन "एटक" एक बार फिर मैदान में है। इस बार विरोध का निशाना नरेगा मजदूरों पर की जा रही दबंगई है। कर्मचारियों का आरोप है कि यह बदमाशी सरकार के इशारे और दादागिरी पर की गई है। संघर्ष चला रहे जुझारू नेताओं का कहना है कि सरकार के इशारे पर नरेगा कर्मियों व मेटों के साथ की जा रही बदमाशी बर्दाश्त नहीं की जायेगी। ये विचार कामरेड कश्मीर सिंह गदायिया, नरेगा रोज़गार प्राप्त मजदूर यूनियन (एटक) की तरफ से संगठनात्मक शक्ति के साथ दिया जाएगा। इन विचारों को एटक से और भाकपा से जुड़े नेता कामरेड डीपी मौड़, एटक के जिला महासचिव मनिंदर सिंह भाटिया और नेताओं ने मालोद में धरने को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। यह हड़ताल नरेगा मजदूरों ने की थी।  गौरतलब है की श्री मौड़ सीपीआई के ज़िला सचिव हैं। 

इन नेताओं ने कहा कि 2005 में कम्युनिस्ट पार्टियों की मदद से नरेगा अस्तित्व में आया, इस अधिनियम के माध्यम से गांव के मैनुअल मजदूर को 100 दिन का काम मिल सकता है, लेकिन हमें अफसोस के साथ कहना होगा कि बहुत कम गांवों को 100 दिन का काम मिलता है। पंजाब में ऐसे कई बीडीपीओ ब्लॉक होंगे जहां रोजगार चाहने वाले श्रमिकों का आवेदन ही दाखिल नहीं किया जाता। इस तरह इन श्रमिकों की मानसिक प्रताड़ना भी की जाती है और आर्थिक शोषण तो हो ही रहा है। इस रवैये ने कितनी कठिन बना दी है इन  मज़दूरों की ज़िन्दगी।  

इन नेताओं ने कहा कि अधिकांश बीडीपीओ ब्लॉक कार्यालय श्रमिकों के आवेदन दर्ज नहीं करते हैं। कर्मचारियों को उपस्थिति के लिए अपने बीच से ही एमईईटी का चयन करना होता है, लेकिन अधिकारी शाही सरकार के निर्देश पर अपने चहेतों पर एमईईटी थोप रहे हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस विरोध प्रदर्शन को संबोधित करते हुए भगवान सिंह, जोरा सिंह, गुरमेल सिंह मेहली बलजीत सिंह सीहान डोड नरेगा नेताओं ने कहा कि बीडीपीओ कार्यालय मलोद के अधिकारी श्रमिकों के आवेदन पंजीकृत नहीं करते हैं और न ही नियुक्ति पत्र देते हैं। अगर इन अधिकारियों का रवैया ऐसा ही रहा तो बीडीपीओ दफ्तर मलूद के बाहर भी जोरदार मोर्चा लगाया जाएगा। इस धरने को अवतार सिंह मलकीत सिंह रामगढ, लाभ सिंह, हरबंस सिंह रब्बो, हरबंस सिंह ने भी संबोधित किया।

अब देखना होगा कि सरकार इन कर्मचारियों की जायज मांगों को जल्द मानती है या फिर इन कर्मचारियों को कड़ा संघर्ष करने पर मजबूर करती है। 

Friday, February 16, 2024

भारत बंद ने दिखाया देश और दुनिया को अपनी जनशक्ति का जोश और जलवा

Friday 16th February 2024 at 4:43 PM

मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे

आंदोलनकारी किसानों/मजदूरों पर जारी अत्याचार की भी कड़ी निंदा

*चुनावी बांड को ख़त्म करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी चर्चा में रहा

*सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी सरकार के कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार को उजागर किया 


लुधियाना
: 16 फरवरी 2024: (मीडिया लिंक//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

आम जनता और मीडिया में लगातार छाए हुए किसान आंदोलन की चर्चा को आज कुछ विराम दिया भारत बंद की खबरों ने। सुबह से लेकर शाम तक तकरीबन सभी शहरों और गांवों में भारत बंद का असर देखने को मिला। लुधियाना,मोहाली, मानसा, फरीदकोट, खरड़, जालंधर--बहुत से स्थानों पर इस भारत बंद का असर देखा गया। 

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा की देशव्यापी हड़ताल और भारत बंद के आह्वान पर मजदूर किसान एकता के गगनभेदी नारों के बीच सेक्टोरल फेडरेशन/एसोसिएशनों ने बस स्टैंड लुधियाना में भी एक विशाल रैली की।  

इस भारत बंद का यह आह्वान मोदी सरकार की मजदूर विरोधी, कर्मचारी विरोधी, किसान विरोधी और अधिकार मांग रहे लोगों पर दमनकारी नीतियों के खिलाफ किया गया है.  रैली की अध्यक्षता एम एस भाटिया, जोगिंदर राम और जगदीश चंद की कमेटी ने की।  रैली के बाद श्रमिकों, कर्मचारियों, किसानों और समाज के अन्य वर्गों के लोगों ने मिनी सचिवालय की ओर मार्च भी किया, जहां रैली भी आयोजित की गई थी। 

दोनों जगहों पर आयोजित रैलियों को एटक,सीटू तथा सीटीयू पंजाब समेत विभिन्न संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया.  वक्ताओं ने मोदी सरकार द्वारा शंभू सीमा पर किसानों पर अत्याचार और शांतिपूर्वक विरोध कर रहे किसानों पर ड्रोन के इस्तेमाल से आंसू गैस के गोले और प्लास्टिक की गोलियां चलाने की भी निंदा की। 

उन्होंने कहा कि यह हमारे देश के संविधान के तहत सभी नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति और विरोध की स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां तीन कृषि बिल वापस ले लिए, वहीं सरकार किसानों की मांगों पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से पूरी तरह पीछे हट गई है।  

रैली में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि लगातार मजदूरों के खिलाफ कानून बनाये जा रहे हैं और सरकार कॉरपोरेट की सेवा करने पर तुली है.  जबकि गरीब लोगों को उनकी आजीविका और नौकरियों के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और अनियंत्रित मुद्रास्फीति से पीड़ित हैं, उनके अवैतनिक ऋणों को कर कटौती के रूप में एनपीए घोषित करके कॉर्पोरेट क्षेत्र को बड़ी रियायतें दी गई हैं और ऋण माफ किए जा रहे हैं। जिसकी भरपाई आम जनता पर अतिरिक्त कर लगाकर की जा रही है।

मज़दूर, कर्मचारी, किसान, छात्र, युवा, महिलाएं, छोटे-मझोले व्यवसायी, छोटे दुकानदार समेत अन्य लोगों ने इसके खिलाफ बिगुल बजा दिया है। आज का आह्वान, जिसमें किसानों ने गांव-गांव में बंद रखा और देशभर में मजदूर हड़ताल पर चले गये, लोगों में बढ़ते गुस्से का प्रतीक है। 

हर मोर्चे पर विफल होने के बाद सरकार वोट हासिल करने के लिए समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने और सांप्रदायिक दंगे कराने का खतरनाक खेल अपना रही है। वे सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को नष्ट कर रहे हैं और उन्हें अपनी कठपुतली बना रहे हैं।  देश का संघीय ढांचा गंभीर खतरे में है.  वक्ताओं ने चुनावी बांड योजना को असंवैधानिक घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया है और कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि यह सदी की सबसे भ्रष्ट सरकार है।

प्रदर्शनकारियों ने अन्य मांगों के अलावा निम्नलिखित प्रमुख मांगों पर जोर दिया:

 • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण रोका जाए।

 • चार श्रम संहिताएं रद्द करें और 44 कानून लागू करें

 • किसानों की उपज के लिए एमएसपी के फार्मूले @ C2+50% के अनुसार कानूनी गारंटी एवं खरीद गारंटी प्रदान की जाए।

 •श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 26000/- प्रति माह किया जाए।

 • आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं, मध्याह्न भोजन कार्यकर्ताओं और अन्य को नियमित किया जाना चाहिए और न्यूनतम मजदूरी के तहत लाया जाना चाहिए और श्रमिकों के रूप में सभी लाभ दिए जाने चाहिए।

• सेना में अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की अस्थाई भर्ती को वापस लिया जाए और पहले की तरह स्थाई भर्ती की जाए।

 • अमीर समर्थक और जनविरोधी नई शिक्षा नीति 2020 को खारिज किया जाना चाहिए।

 • नई पेंशन योजना को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए।

 • सेवानिवृत कर्मियों की मानी गई मांगों को लागू किया जाए।

• सभी निर्माण श्रमिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा के लिए ईएसआई योजना के तहत लाया जाना चाहिए।

 • हिट एंड रन कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए और संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद ही बनाया जाना चाहिए।

 • विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2022 को वापस लिया जाए।  प्री-पेड स्मार्ट मीटर न लगाए जाएं।

 • मनरेगा के तहत प्रति वर्ष 200 दिन के काम और 700/- प्रति दिन की गारंटी।

 • 8 घंटे की जगह 12 घंटे की अधिसूचना तुरंत रद्द की जाए।

 • न्यूनतम वेतन को संशोधित किया जाना चाहिए।

 • ईएसआई को पटियाला या पीजीआई चंडीगढ़ के बजाय लुधियाना के अस्पतालों को ही रेफर करना चाहिए।

 • खाद्य सुरक्षा की गारंटी करें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करें।

 • सिंघु बॉर्डर पर सभी शहीद किसानों की यादगार बनाई जाए, मुआवजा दिया जाए और उनके परिवारों का पुनर्वास किया जाए, सभी लंबित मामले वापस लिए जाएं।

 • केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त कर मुकदमा चलाया जाए।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 2024 में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को दोबारा सत्ता में आने से रोकना बहुत जरूरी हो गया है, अन्यथा इस देश में न केवल किसानों और मजदूरों के अधिकारों का हनन करने की नीति जारी रहेगी, बल्कि सरकारी संपत्तियों को  कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों सस्ते दाम पर बेचा जाएगा।  

धर्म के नाम पर समाज में फूट डालने से हमारे देश की एकता, अखंडता और संविधान को खतरा होगा।  

रैली को संबोधित करने वालों में एटक पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़, सीटीयू पंजाब के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंगत राम पासला, डी पी मौड, सुखविंदर सिंह लोटे, जगदीश चंद, विजय कुमार, चमकौर सिंह बरमी, डॉ. राजिंदर पाल सिंह औलख, डॉ. अरुण मित्रा, बलराम सिंह, राम लाल, चरण सराभा, सुभाष रानी, जोगिंदर राम, तहसीलदार यादव, हरबंस सिंह पंधेर, शमशेर सिंह, तहसीलदार, प्रोफेसर जगमोहन सिंह जम्हूरी अधिकार सभा, बलदेव कृष्ण मोदगिल इंटक, महिंदर पाल सिंह मोहाली, हरजिंदर सिंह मोल्डर्स एंड स्टील वर्कर्स यूनियन शामिल थे।

Wednesday, December 27, 2023

लुधियाना में 31 को फिर से गूंजेगी इजरायली हमलों के खिलाफ नारेबाज़ी

 बुधवार 27 दिसंबर 2023 को सुबह 10:53 बजे               27th December  2023 at 10:53 AM 

फिलिस्तीन को कब्रिस्तान में बदलता नापाक युद्ध अपराध जारी:लेफ्ट 


लुधियाना
: 27 दिसंबर, 2023: (कार्तिका कल्याणी सिंह//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

फिलिस्तीन के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई लंबे समय से चर्चा का विषय बनी हुई है। इजरायली सैनिक और अन्य घातक दस्ते लगातार फिलिस्तीनी बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और यहां तक कि लेखकों और पत्रकारों को भी निशाना बना रहे हैं। इस बर्बरता के खिलाफ दुनिया भर में रोष व्याप्त है। सच्चे हिंदोस्तानी सत्य-प्रेमी और मानवीय संवेदना का अहसास दिलाते हुए इस युद्ध अपराध का तीखा विरोध कर रहे हैं। 

यद्यपि वर्तमान संकटों की इस नाज़ुक स्थिति वाले हालात में भी वामपंथी एक नहीं हैं लेकिन फिर भी उनके कुछ संयुक्त एक्शन और हैं जो अभी भी उम्मीद जगा  रहे हैं कि यह एकता वक़्त की  महत्वपूर्ण ज़रूरत है और अभी भी संभव है। इस आश्य की घोषणा का इंतज़ार बहुत ही शिद्दत और बेसब्री से वाम का वह सारा केडर कर रहा है जिसने वाम के साथ अपनी पूरी उम्र लगा दी है। इस केंद्र ने हमेशां सच्चे मन से वामपंथियों के विचारों को स्वीकार किया है लेकिन एकता की कमी के चलते निराशा भी पैदा होने लगी है। 

इस तरह के हालात में पंजाब के सात वामपंथी क्रांतिकारी दलों और संगठनों ने एक बार फिर स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई है। इजरायल के बर्बर हमलों के खिलाफ वामपंथी फिर से मैदान पर हैं। अब 31 दिसंबर को लुधियाना में एक मजबूत विरोध प्रदर्शन हो रहा है। सात वामपंथी क्रांतिकारी दलों और पंजाब के बंदियों द्वारा महत्वपूर्ण घोषणाएं 

देश के वामपंथी अभी भी दुनिया भर में चल रही घटनाओं से पूरी तरह अवगत हैं। विश्व मंच पर फाशीवादी हमलों के खिलाफ, इजरायल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों की हत्या के खिलाफ, राज्य भर में बढ़ते  फाशीवादी रुझान के खिलाफ आवाज उठाने के लिए सक्रिय लेफ्ट ने  अब फिर संघर्ष तेज़ करने का आह्वान दिया है।  इसके जवाब में लुधियाना की पंजाबी इमारत में आज एक विशेष बैठक भी योजित की गई। 

आज, सीपीआई, आरएमपीआई, मुक्ती संग्राम लेबर फोरम और रिवोल्यूशनरी सेंटर पंजाब सहित लुधियाना जिले के वाम और जमुहरी दल और संगठन, डॉ। अरुण मित्रा की अध्यक्षता में एक विशेष बैठक आयोजित की गई, जिसमें एक रैली आयोजित करने और विरोध करने का निर्णय लिया गया। यह विरोध इस मामले में भी काफी हद तक जनता की सार्वजनिक चेतना को बढ़ाएगा। 

वामपंथियों के नेताओं ने बैठक के अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले ढाई महीनों से फिलिस्तीन एक कब्रिस्तान की तरह बना दिया गया है।  'इजरायल अपने ही देश से फिलिस्तीनियों पर हमला कर रहा है जिसके खिलाफ दुनिया भर के फिलिस्तीनियों के हक़ में आवाज उठाई जा रही है। वाम का भी कहना है कि इजरायल द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ की शह पर ही फिलस्तीनियों पर हमला किया जा रहा है। निरंतर बमबारी के साथ साथ बहुत से अन्य युद्ध अपराध भी किए जा रहे हैं।  

इन नेताओं ने कहा कि इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ और दुनिया भर के मजबूत विरोध को देख कर भी अपनी आंखें मूंद ली हैं, को युद्ध अपराधी घोषित किया जाना चाहिए। इजरायल के लिए मोदी के समर्थन भाव  की भी कड़ी निंदा की गई है। 

रैली की घोषणा रविवार, 31 दिसंबर को भी की गई 

बैठक के बाद प्रेस द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, रविवार 31 दिसंबर को सुबह 11 बजे शहीद कार्त सिंह सरभा पार्क, भाई बाला चौक में रैली आयोजित की जाएगी। इसमें विभिन्न दलों के नेता फासीवाद के खिलाफ और फिलिस्तीन के पक्ष में अपने विचार व्यक्त करेंगे। उसके बाद मार्च आयोजित किया जाएगा। 

इस प्रेस विज्ञप्ति ने सभी लोकतान्त्रिक और न्याय-प्रेमी संगठनों व लोगों से इस विरोध में शामिल होने की अपील की है। इस रैली व  मार्च की सफलता के लिए पार्टियां व्यक्तिगत तौर पर भी सक्रिय हैं।

इस मीटिंग में कॉमरेड डीपी मौड़, प्रोफेसर जयपाल सिंह, लखविंदर सिंह, सुरिंदर सिंह, डॉ.अरुण मित्रा, कॉमरेड परमजीत सिंह, गगनदीप कौर, सतनाम सिंह, एमएस भाटिया, जगदीश चंद, डॉ. गुलज़ार पंधेर, रघबीर सिंह बेनीपाल, चरण सिंह सराभा, बुलकौर सिंह गिल और डॉ. बलविंदर सिंह भी उपस्थित थे।

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Tuesday, October 17, 2023

सरकार द्वारा कामकाजी घंटों में बढोतरी की अधिसूचना वापस ले

16th October 2023 at 13:29

एटक, सीटू और सीटीयू पंजाब की ओर से उपायुक्त को मांग पत्र


लुधियाना: 16 अक्टूबर 2023:(*एम एस भाटिया//**हनुमान सिंह//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

आज एटक, सीटू और सीटीयू पंजाब की लुधियाना इकाइयों के प्रतिनिधिमंडल ने पंजाब सरकार द्वारा काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 घंटे करने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और डिप्टी कमिश्नर लुधियाना के नाम एक मांग पत्र दिया  जिसमें मुख्यमंत्री  से काम के घंटे आठ से बढ़ाकर 12 करने तथा अन्य मजदूर विरोधी धाराओं की अधिसूचना वापस लेने की मांग की गयी।

इस नोटिस के जरिए पंजाब सरकार ने अपना मजदूर विरोधी रवैया जाहिर किया है।  इसके अनुसार मजदूरों के लिए 12 घंटे काम करना कानूनी कर दिया गया है। अन्य श्रमिक विरोधी धाराएँ ओवरटाइम और श्रम अधिनियम में निहित हैं।  दुनिया में इसके जैसा कहीं और नहीं है।  हर जगह काम के घंटे आठ ही हैं। अधिसूचना में उल्लेखित विशेष परिस्थितियाँ पूर्णतया गलत हैं।  इस अधिसूचना में केवल उद्योगपतियों के अधिकार की बात की गई है जबकि मजदूरों या उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए काम के घंटों का कोई जिक्र नहीं है।  मजदूर पहले से ही बढ़ती महंगाई से परेशान हैं और बेरोजगारी का फायदा उठाकर उद्योगपति और सरकार दोनों मजदूरों का शोषण कर रहे हैं।  न्यूनतम वेतन को हर पांच साल में संशोधित किया जाना चाहिए अन्यथा श्रमिकों को उसी पुराने कानून के अनुसार मिलने वाले वेतन के साथ उनकी आय भी घटती रहेगी।  ग्लोबल वेज रिपोर्ट 2020-21 के अनुसार, भारतीय मजदूर पहले से ही सबसे लंबे समय तक काम कर रहे हैं और उन्हें दुनिया में सबसे कम वेतन मिलता है। न्यूनतम वेतन बढ़ाया जाए।

 हम काम के घंटे आठ से बारह करने की पंजाब सरकार की अधिसूचना को वापस लेने की मांग करते हैं।

प्रतिनिधिमंडल में एम एस भाटिया-एटक, सुखविंदर सिंह लोटे- सीटू, जगदीश चंद-सीटीयू पंजाब, विजय कुमार, जुगिंदर राम, केवल सिंह बनवैत, बलराम सिंह, राम लाल, कामेश्वर यादव, अजीत कुमार, रामप्रवेश सिंह और कामरेड तिवारी शामिल थे।

 *एम.एस. भाटिया एटक की ज़िला लुधियाना इकाई के महासचिव हैं बैंकिंग से ले कर थानों तक ट्रेड यूनियंस सरगर्मियों का सफलता से संचालन करते हैं। उनका मोबाईल नंबर है- 9988491002

**इसी तरह हनुमान सिंह सीटू(माकपा) के स्थानीय नेता हैं--और दिल्ली तक के एलक्शनों में भाग लेते रहते हैं। इनका मोबाईल नंबर है +91 94170 92779

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Tuesday, August 1, 2023

हरियाणा में हिंसा:सरकार तथा प्रशासन भी जिम्मेदार-CPI

Tuesday:1st August 2023 at 17:12 PM

मोनू मानेसर भड़की सांप्रदायिक हिंसा-कामरेड दरियाव सिंह 

पानीपत: 1 अगस्त 2023: (एम एस भाटिया//कामरेड स्क्रीन ब्यूरो):: 

सीपीआई की हरियाणा इकाई ने जहां हरिजाना की हिंसा को बहुत ही नज़दीक से देखा वहीं इस सारे घटनाक्रम पर  बारीकी से नज़र भी रखी। पार्टी ने इस सारे हिंसक घटनाक्रम पर बहुत ही बारीकी से सब कुछ नोट भी किया है। इन सभी दस्तावेज़ों को पार्टी की आज्ञा के बाद जनता के  जाएगा। पार्टी ने यथा सम्भव पीड़ित परिवारों की सहायता भी की। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  की हरियाणा राज्य कार्यकारिणी ने नूंह जिला में उत्पन्न तनावपूर्ण स्थिति पर गहरी चिंता प्रकट की है और इसके लिए सरकार तथा प्रशासन को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया है। आज यहां जारी एक प्रैस बयान में सीपीआई के राज्य सचिव दरियाव सिंह कश्यप ने कहा कि जब से राज्य में भाजपा सरकार अस्तित्व में आई है तब से मेवात को सांप्रदायिक ढंग से निशाने पर लिया जाता रहा।

पार्टी ने पूरी तरह से स्पष्ट शब्दों में कहा कि फिलहाल जो कुछ घटित  हुआ है वह सुनियोजित षड्यंत्र का ही परिणाम है । प्राप्त जानकारी के मुताबिक आरएसएस से संबंधित विश्व हिंदू परिषद ,बजरंग दल आदि की ओर से ब्रजमंडल यात्रा निकालने का ऐलान था जिसमें गत दिनों जुनैद और नासिर को जिंदा जलाकर मारने के प्रमुख आरोपी मोनू मानेसर ने खुद वीडियो जारी करके अपनी टीम के साथ भाग लेने की घोषणा के साथ बड़ी संख्या में सांप्रदायिक लामबंदी का आह्वान किया था ।

पार्टी की राज्य इकाई के सचिव कामरेड कश्यप ने कहा कि जानकारी मिली है कि स्थानीय जिम्मेदार लोगों ने प्रशासन से मिल कर चेताया था और इस यात्रा के निकलने से शांति भंग होने की आशंका प्रकट की थी। परन्तु प्रशासन की तरफ से न सिर्फ इस यात्रा को निकालने की अनुमति दी गई बल्कि अन्य ऐतिहाती कदम भी नहीं उठाए। नतीजतन वही हुआ जिसकी आशंका स्थानीय लोगों ने प्रकट की थी। जानकारी मिली है कि बङे पैमाने पर आसपास के राज्यों और जिलों से साम्प्रदायिक लामबंदी की गई और गाड़ियों के काफिले के साथ यात्रा निकालते हुए भड़काऊ नारे लगाए गए।विश्व हिन्दू परिषद के सुरेन्द्र जैन के साथ खुद मौनू मानेसर भी इस यात्रा में शामिल बताया गया है। 

गौरतलब है कि रिपोर्ट है कि हवाई फायरिंग, पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और आगजनी की वारदातें हुई हैं। स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी है।सम्प्रदायिक सदभाव बनाने में मदद करने के बजाए कुछ शरारती तत्व पलवल, सोहना तक एक विशेष समुदाय के धार्मिक स्थलों पर तोड़ फोड़ कर रहे हैं। पार्टी ने राज्य के मुख्यमंत्री से तुरंत प्रभावी कदम उठाने की मांग करते हुए पत्र लिखा है। साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से तमाम नागरिकों से अपील की है कि आपसी सद्भाव बनाए रखें, अफवाहों पर ध्यान न दें और साम्प्रदायिक तथा असामाजिक तत्वों को और ज्यादा माहौल बिगाड़ने का मौका न दें।

अब देखना यह है कि इस सारे घटनाक्रम के बाद भी लोग साम्प्रदायिक तत्वों को पूरी तरह से बेनकाब कर के हाशिए पर ला पाते हैं या नहीं?

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Sunday, April 30, 2023

May Day: लोकतंत्र बचाओ//जनता बचाओ//देश बचाओ

28th April 2023 at 8:36 PM

इस बार और भी उत्साह के साथ मई दिवस मनाएं

मूल आलेख:अमरजीत कौर                                              *अनुवाद:एम.एस.भाटिया


नई दिल्ली: 30 अप्रैल 2023: (कामरेड स्क्रीन डेस्क):
इस बार का मई दिवस पहले से अधिक चुनौतियों से भरा हुआ है। मज़दूर वर्ग की ज़िन्दगी और कठिन हो गई है। मज़दूरों के अधिकारों पर हमले और तेज़ हो गए हैं। ऐसी नाज़ुक स्थिति में एटक की महासचिव कामरेड अमरजीत कौर ने अत्यधिक संघर्षों का आह्वान किया है तांकि सत्ता को बदलने की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया और तेज़ की जा सके। इस मौके पर उनके अंग्रेज़ी आलेख को हिंदी और पंजाबी में अनुवाद किया है प्रगतिशील पत्रकार एम एस भाटिया ने। कामरेड स्क्रीन में पढ़िए पूरा आलेख बिना कांट छांट के। 

एटक की महासचिव कामरेड अमरजीत कौर 
मई दिवस हमें श्रमिकों और उनकी यूनियनों द्वारा श्रमिकों को जानवरों के रूप में नहीं बल्कि मनुष्यों के रूप में व्यवहार करने के लिए किए गए महान बलिदान की याद दिलाता है। बल्कि, यह दावा किया जा सकता है कि मानव इतिहास में मानव अधिकारों की मांग और उपलब्धि की शुरुआत श्रमिक आंदोलन द्वारा की गई थी। काम के निश्चित घंटे, काम के लिए 8 घंटे, आराम के लिए 8 घंटे और परिवार के साथ 8 घंटे 19वीं शताब्दी में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गूंजते थे। भारत में भी काम के निश्चित घंटों की मांग 1866 में शुरू हुई, जब क्षेत्रवार यूनियनें अभी तक नहीं बनी थीं। 1886 में, शिकागो में श्रमिकों ने 1 मई को अपनी विरोध हड़ताल शुरू की, जिसके बाद षड्यंत्रकारियों ने आंदोलन को कुचलने का बहाना खोजने के लिए एक बम विस्फोट किया।जिन आठ नेताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनमें से चार को मौत की सजा सुनाई गई, दो की जेल में मौत हो गई और दो को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

1889 में श्रमिक संगठनों की एक अंतरराष्ट्रीय बैठक में, जहां कार्ल मार्क्स ने शिकागो में मई के विरोध प्रदर्शनों की बात की, मजदूर वर्ग की पीड़ाओं और उस संघर्ष के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने और संघर्ष जारी रखने
और निश्चित कार्य घंटों के लिए, मई दिवस मनाने का सुझाव दिया।

1890 से यह दिन "दुनिया के मजदूरो एक हो" के नारे के साथ मनाया जाने लगा।

अनुवादक एम एस भाटिया 
संघर्ष जारी रहा और 1919 में आईऐल ओ का पहला सम्मेलन, जो फाउंडेशन सम्मेलन भी था, आठ घंटे के कार्य दिवस के लिए था।भारत में, एम सिंगारवेलु के नेतृत्व में ऐआईटीयूूसी  यूनियन ने1923 में वर्तमान तमिलनाडु में मई दिवस मनाने वाला पहली यूनियन  थी। 

दुनिया भर में मजदूर वर्ग निश्चित काम के घंटों और हड़ताल के अधिकार के लिए कठिन और लंबे संघर्ष के बाद जीते गए विभिन्न श्रम अधिकारों के उलटने की गंभीर स्थिति का सामना कर रहा है। इजारेदार पूंजीपतियों के लिए अपना समर्थन बनाए रखने के लिए सामूहिक संघर्ष के माध्यम से श्रमिक अधिकारों और यूनियनों पर हमला, कॉर्पोरेट समर्थक सरकारों के लिए मजदूरों के अधिकारों को दबाने और कमजोर करने का एक हथियार है।

मई दिवस 2023 कई महत्वपूर्ण कारणों से मजदूर वर्ग द्वारा अधिक उत्साह के साथ मनाया जाएगा। सन 2024 के आम चुनावों से एक साल पहले, सभी मोर्चों पर तेजी से हो रहे राजनीतिक घटनाक्रमों को ध्यान में रखते हुए, स्थिति का आकलन करना अनिवार्य है।भारत में भी हम एक ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं जहां 150 वर्षों के संघर्ष के बाद श्रमिकों के कठिन संघर्ष के साथ प्राप्त  किए अधिकारों को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली आरएसएस-बीजेपी सरकार द्वारा अपनाई जा रही श्रम विरोधी नीतियों और श्रम कानूनों द्वारा कमजोर किया जा रहा है। यह यूनियनों को कमजोर करने के लिए है क्योंकि वे सरकार की उन नीतियों का विरोध कर रहे हैं जो विदेशी और भारतीय कॉर्पोरेट समर्थक हैं और आजादी के बाद भारत द्वारा अपनाए गए आत्मनिर्भर आर्थिक मॉडल के विपरीत हैं। इन नीतियों के परिणाम स्वरूप लोगों के जीवन स्तर का अंतर बढ़ गया है, उनका जीवन अधिक विभाजित हो गया है।अर्थव्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। आवश्यक वस्तुओं, खाद्यान्न, दाल, गेहूं का आटा, चावल, खाना पकाने के तेल, रसोई गैस (लगभग 1200 रुपये प्रति सिलेंडर) की कीमतों में लगातार वृद्धि के कारण पिछले एक साल में खुदरा दूध की कीमतों में 15 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर लोगों का खर्च बढ़ रहा है, जबकि आय/मजदूरी नहीं बढ़ रही है, हर गुजरते दिन के साथ गरीब मजदूर वर्ग के लिए जीवित रहना कठिन होता जा रहा है।लोकसभा के आम चुनावों से पहले मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का आखिरी पूर्ण बजट श्रमिकों, किसानों और सामान्य रूप से गरीब और कमजोर वर्गों के हितों की कीमत पर कॉर्पोरेट समर्थक नीतियों का समर्थन करने की सरकार की निरंतर प्रवृत्ति को दर्शाता है। कॉरपोरेटस को अधिक रियायतें मिल रही हैं, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सुविधाओं, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए योजनाओं पर बजटीय आवंटन कम कर दिया गया है, मनरेगा आवंटन में 30 प्रतिशत की कटौती की गई है, विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए आवंटन में कटौती बहुत स्पष्ट है। बजट खूबसूरत शब्दों का जादू था।

वित्त मंत्री का बजट भाषण झूठा था

उपलब्धियों के तौर पर पेश किए गए अनुमान जमीनी हकीकत से कोसों दूर थे। बजट में उल्लिखित सात प्रमुख प्राथमिकताएं जैसे समावेशी विकास, अंतिम मील तक पहुंचना, युवा शक्ति आदि बिना किसी पुनःपूर्ति के खाली हैं। पुरानी पेंशन योजना की बहाली, सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा, सभी के लिए पेंशन, योजना कर्मियों का नियमितीकरण, असंगठित/अनौपचारिक और कृषि श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी जैसे मेहनतकशों के वास्तविक मुद्दों में से किसी का भी समाधान नहीं किया गया। केंद्र और राज्यों आदि में पद भरना। इस बजट ने देश के हितों को पीछे छोड़ दिया है, विशेष रूप से इसके 94% अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के कार्यबल जो कि सकल घरेलू उत्पाद में 60% का योगदान करते हैं।

बजट में दीर्घकालिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के सृजन को संबोधित नहीं किया गया। प्रत्येक वर्ष 10 मिलियन नए नौकरी तलाशने वाले नौकरी बाजार में प्रवेश करते हैं। बेरोजगारी 34% है जो सबसे ऊपर है। बजट मांग आधारित कौशल, औपचारिक शिक्षा के साथ आने वाले कौशल की बात करता है। भारत में औपचारिक शिक्षा की वास्तविकता को पीछे छोड़कर कौशल अर्थहीन हो जाता है। उद्योग 4.0 के लिए नए युग के पाठ्यक्रम तकनीकी रूप से साक्षर युवाओं के एक बहुत छोटे वर्ग के लिए लक्षित हैं और एक बडे वर्ग को पीछे छोड़ते हुए  हैं। बजट में उच्च शिक्षा पर खर्च का जिक्र है, जो वास्तव में विदेशी विश्वविद्यालयों को लाने की पूर्व योजना है।भाजपा सरकार अब तक शिक्षा पर जीडीपी का 3% से भी कम खर्च कर रही है। स्वास्थ्य पर सार्वजनिक/सरकारी व्यय में कमी ने भारत में गरीबी को बढ़ाया है। बजट में कृषि पर खर्च में भारी कटौती की गई है और किसानों को भुगतान चुनावी ड्रामा है। जमा सीमा बढ़ाने  से महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को कोई बड़ी राहत नहीं मिल रही है। लिंग आधारित वेतन असमानता को कम नहीं किया गया है और महिलाओं की रोजगार दरों में गिरावट को संबोधित नहीं किया गया है।

मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्यम (ऐमऐसऐमई) को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया था। गारंटी विस्तार के माध्यम से जो प्रदान किया जाता है वह व्यापक क्षेत्र के लिए बहुत छोटा है, जो विकास का इंजन है और रोजगार का सृजन करता है।

अमीरों और कारपोरेटों पर कर लगाकर राजस्व बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। घाटा पूरा करने के लिए उधारी पहले से ही दिखाई दे रही है। भारत पर कर्ज का बोझ पहले से ही भारी है और आगे का बोझ कर्ज चुकाने के बोझ को बढ़ाएगा।

बजट न सिर्फ आम आदमी को फेल कर गया बल्कि संसद में बिना चर्चा के पारित हो गया। ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ है। यहां तक ​​कि बजट पूर्व परामर्शों को भी तमाशे में बदल दिया गया और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने उनका बहिष्कार कर दिया।

अडानी साम्राज्य के पतन के साथ, हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद, अडानी कंपनियों में बड़ी रकम का निवेश करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान अब मुश्किल स्थिति में हैं। भारतीय जीवन बीमा निगम ने लगभग 30,000 करोड़ रुपये और भारतीय स्टेट बैंक ने 42,000 करोड़ रुपये और इसी तरह शिपिंग कंपनियों-प्रदीप, गेल, आईओसी, कुछ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को अडानी कंपनियों में निवेश करने के लिए बनाया गया था और यह समझा जाता है कि पीएमओ ने सूत्रधार की भूमिका निभाई है। दुनिया भर में यह बात जगजाहिर है कि प्रधानमंत्री ने अडानी कंपनियों को कई देशों में अपना कारोबार बढ़ाने के लिए बढ़ावा देने में व्यक्तिगत रुचि ली।ऑस्ट्रेलियाई खदानों में भारत सरकार अडानी कंपनी की गारंटी के रूप में खड़ी थी और धन प्रबंधक सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक एसबीआई था। अडानी की मॉरीशस कंपनी के लिए ढाल बने गृह मंत्री अडानी समूह को इज़राइल में पोर्ट करने के लिए, भारत सरकार संप्रभुता की गारंटी देने के लिए खड़ी थी। बिजली उत्पादन के ठेकों के मामले में श्रीलंका से भी एक नई कहानी सामने आई हैयह गंभीर वास्तविकता अच्छी तरह से समझाती है कि क्यों लोगों के जीवन में असमानताएं एक घृणित स्तर तक बढ़ रही हैं।

16 जनवरी 2023 को जारी भारत में असमानता पर ऑक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट में पाया गया कि केवल 5 प्रतिशत भारतीयों के पास देश की 60 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत के पास केवल 3 प्रतिशत संपत्ति है। उल्लेखनीय है कि इस 50 फीसदी आबादी के पास पिछले साल 2021 में 13 फीसदी थी। 2021 में कुल संपत्ति का 22 प्रतिशत रखने वाली शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी की हिस्सेदारी, 2022 में बढ़कर 40.3 प्रतिशत हो गई है।रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत के अरबपतियों पर एक बार उनकी पूरी संपत्ति पर 2 फीसदी की दर से टैक्स लगा दिया जाए तो यह अगले तीन साल में देश की कुपोषित आबादी को खिलाने के लिए 40,423 करोड़ रुपये की जरूरत को पूरा करेगा। यहां यह बताना जरूरी है कि सरकारी वकील ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में स्वीकार किया था कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की लगभग 65 प्रतिशत मौतें कुपोषण के कारण होती हैं।भारत का भूख सूचकांक बिगड़ गया है और देश 122 देशों में से 107वें स्थान पर है। दिहाड़ी मजदूर बेहद परेशान हैं। इस साल की क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले साल दर्ज की गई आत्महत्याओं में से लगभग 25 प्रतिशत दिहाड़ी मजदूरों की थीं।

"सरवाइवल ऑफ द रिचेस्ट: द इंडिया स्टोरी" शीर्षक वाली रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2012 से 2021 के बीच भारत में सृजित संपत्ति का 40 प्रतिशत सिर्फ 1 प्रतिशत आबादी के पास गया और केवल 3 प्रतिशत धन नीचे के 50 प्रतिशत लोगों के पास गया। , भारत में अरबपतियों की कुल संख्या 2020 में 102 से बढ़कर 2022 में 166 हो गई है। 18 महीने से अधिक के लिए संपूर्ण केंद्रीय बजट।

महामारी से पहले, 2019 में, केंद्र सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स स्लैब को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया था, जिसमें नई निगमित कंपनियां कम प्रतिशत (15 प्रतिशत) का भुगतान कर रही थीं। इस नई कर नीति से कुल 1.84 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर उत्पाद शुल्क और पेट्रोल पर और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने की नीति अपनाई और छूट में भी कटौती की। जीएसटी और ईंधन कर दोनों का अप्रत्यक्ष बोझ स्वाभाविक रूप से हमेशा न्यूनतम स्तर पर होता है। ग्रामीण और शहरी मुद्रास्फीति के बीच की खाई चौड़ी हो गई है।

अमीर लोगों और निगमों पर कर लगाने के बजाय, सरकार बाकी समाज पर कर लगाने का सहारा लेती है। यह प्रतिगामी है क्योंकि गरीब लोग अपनी आय का बड़ाव हिस्सा देते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, "अखिल भारतीय स्तर पर नीचे की 50 प्रतिशत आबादी शीर्ष 10 प्रतिशत की तुलना में आय के प्रतिशत के रूप में अप्रत्यक्ष करों में छह गुना अधिक भुगतान करती है।

"यूरोप में जारी युद्ध की स्थिति अर्थव्यवस्था के बढ़ते संकट को बढ़ा रही है। एक ओर, हथियारों की लॉबी रूस के खिलाफ अमेरिका-नाटो के गुप्त युद्ध को बढ़ावा दे रही है, जिसमें यूक्रेन उसके हाथों में एक मोहरा है, जबकि साम्राज्यवादी लॉबी युद्ध संघर्ष को एशिया में लाने के लिए उत्सुक है। मेहनतकश जनता की कीमत पर, गरमागरम लॉबी अपने कम्फर्ट जोन में हैं। यह युद्धरत देशों, रूस और यूक्रेन में कामकाजी लोगों की पीड़ा को बढ़ा रहा है, लेकिन विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर समग्र नकारात्मक प्रभाव भी डाल रहा है।

साम्राज्यवादियों का क्यूबा के खिलाफ आक्रामक रुख जारी है, और इसी तरह अमेरिका समर्थित इस्राइली सरकार की नीतियां भी, जो फ़िलिस्तीनी लोगों को मातृभूमि के उनके अधिकार से वंचित करती रहती हैं। ऐआटीयूूसी हमेशा क्यूबा और फिलिस्तीन के लोगों और उन सभी लोगों के साथ खड़ा रहा है जिन्होंने अपने संप्रभु अधिकारों को त्यागने और साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ सिद्धांत पर खड़े होने का साहस किया।

दुनिया भर में मंदी और आर्थिक संकट की स्थिति का जवाब विभिन्न देशों में पूंजीवादी समर्थक शासनों द्वारा दिया जा रहा है और सामाजिक सुरक्षा, पेंशन प्रणाली, नौकरी और मजदूरी सुरक्षा पर हमले किए जा रहे हैं। विरोध और हड़ताल के अधिकारों पर हमला हो रहा है। ट्रेड यूनियनों और समाज के अन्य वर्गों द्वारा इसका बड़े पैमाने पर विरोध किया जा रहा है।हाल के दिनों में फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, ग्रीस, स्पेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया के कुछ देशों में चल रहे संघर्षों को हम देख रहे हैं। सरकारें यूनियनों को समाप्त करने के लिए दमन और कानूनों को बदलने का सहारा ले रही हैं।

हमारे देश में हम पहले से ही परिवर्तन और प्रतिगामी श्रम कानूनों के संहिताकरण के हमले के अधीन हैं, जिसका हम ट्रेड यूनियनों के मंच के माध्यम से एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने उन राज्यों में केंद्रीय रूप से नियम बनाए हैं जहां उनकी पार्टी सत्ता में है या जहां वे गठबंधन में शासन कर रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में वे केंद्रीय नियमों को लागू कर रहे हैं।कई सरकारों ने अभी तक राज्यों में नियम नहीं बनाए हैं। राज्य स्तर पर ट्रेड यूनियनों को नियमों को नाम देने या जहां वे बनाए गए हैं, उन्हें अधिसूचित और लागू करने की अनुमति नहीं देने के लिए बहुत प्रतिरोध करना होगा।

प्रधान मंत्री कार्यालय सीधे हस्तक्षेप कर रहा है, श्रम मंत्रालय और राज्य सरकारों को बोर्ड भर में परिवर्तन करने का निर्देश दे रहा है और अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेटस की मांगों को पूरा करने के लिए, जिनके साथ प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी सीधे सौदे कर रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं और निवेश के लिए उनकी शर्तों के अनुरूप।कानून में बदलाव का वादा कर रहे हैं।  यह तथ्य कर्नाटक राज्य में विधायी संशोधन विधेयक के माध्यम से कारखाना अधिनियम में लाए गए नवीनतम संशोधनों में सामने आया है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस 23 मार्च को यूनियनों ने इसके खिलाफ एक बहुत ही सफल हड़ताल की। इसी तरह का एक बिल तमिलनाडु राज्य में पेश किया गया था, जिसके कारण ट्रेड यूनियनों और राज्य सरकार में कुछ राजनीतिक दलों के सहयोगियों ने एकजुट विरोध किया था। विरोध के बाद बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

सत्तारूढ़ आरएसएस/भाजपा की चौतरफा विफलता अब नफरत की राजनीति, सांप्रदायिक विभाजन पर निर्भर है, इसलिए "हिंदू राष्ट्र" के नारे पर अधिक जोर दिया जा रहा है। आरएसएस भारत के प्रमुख श्री मोहन भागवत का यह कथन कि हिंदू एक हजार साल बाद जागे हैं, सांप्रदायिक उग्रवादियों की हिंसा की गतिविधियों में और अधिक वृद्धि का संकेत है।

सांप्रदायिक आरोपों वाले हिंसक समूह गति पकड़ रहे हैं। इस संबंध में हरियाणा के चौंकाने वाले विवरण से यह भी पता चलता है कि पुलिस ऐसे समूहों को गौरक्षा के नाम पर गौ रक्षा बल सतर्कता समूहों की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की अनुमति दे रही है। यह एक राज्य तंत्र का एक उदाहरण है जो निजी व्यक्तियों को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति देता है।

अगर सरकार धार्मिक गतिविधियों की आड़ में इन समूहों को पनाह देती रही।

रामनवमी के दिन सांप्रदायिक हिंसा की हाल की घटनाएं भविष्य में होने वाली घटनाओं के लिए पर्याप्त संकेत हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा दृष्टिकोण, पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन करने की आड़ में, भावी पीढ़ियों को वास्तविकताओं से अन्धा बनाए रखने के आक्रामक प्रयास जारी रखता है। तब इन ताकतों के लिए भावनात्मक मुद्दों पर मिथक और सांप्रदायिक हिंसा फैलाना आसान हो जाएगा।

सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं पर खुलेआम और खुल्लम-खुल्ला हमले जारी हैं, जो विकास प्रक्रिया को चलाने के लिए अर्थव्यवस्था के स्तंभों को कमजोर कर देंगे और युवाओं के लिए बेहतर नौकरियों के मामले में प्रतिकूल साबित होंगे।

सरकार द्वारा संस्थानों का दुरुपयोग तेजी से हो रहा है और विरोध करने वाली आवाजों को चुप कराने के लिए ईडी, सीबीआई, यूएपीए आदि का इस्तेमाल इसके सामान्य उदाहरण हैं।

गुजरात में निचली अदालत के फैसले के बाद उनकी लोकसभा सीट को रद्द करने के तत्काल निर्णय कैसे लिए गए, इस बारे में सरकार की मंशा को स्पष्ट करने के लिए श्री राहुल गांधी का मामला उल्लेखनीय है।भारतीय संविधान के विपरीत होते हुए भी सरकार सत्ता पक्ष के लिए संस्थाओं का प्रयोग करती रहती है। संसदीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाने की रफ्तार तब देखने को मिली जब इस बजट सत्र के दौरान सरकारी बेंच संसद का काम नहीं होने दे रही थी।

एक अन्य आम प्रथा अदालतों को सीलबंद लिफाफों में सूचना दाखिल करने की प्रणाली थी, जिसका उपयोग मीडिया के साथ-साथ आम जनता, विशेषकर उन लोगों द्वारा किया जाता था, जिनके साथ सरकार असहज थी। 5 अप्रैल 2023 को एक अन्य न्यायाधीश के साथ मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा दिए गए एक फैसले में इसे प्राकृतिक न्याय के खिलाफ बताते हुए प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की गई थी।

सत्ता पक्ष द्वारा संविधान पर किए जा रहे हमले से सभी वाकिफ हैं, लेकिन अब हम देख रहे हैं कि कैसे भारत के उपराष्ट्रपति श्री धनखड़ और कानून मंत्री श्री रिजिजू अपने बयानों से बार-बार संविधान को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। 

अपने लिए और पूरे समाज के लिए इन अधिकारों की रक्षा करना मजदूर वर्ग का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

30 जनवरी 2023 को होने वाले मजदूर राष्ट्रीय अधिवेशन के फैसलों को आगे बढ़ाने, आरएसएस-भाजपा सरकार की मजदूर विरोधी, किसान विरोधी, जनविरोधी और देश विरोधी नीतियों का विरोध करने का संदेश सभी को देने के लिए हमारा संकल्प। संदेश देना है। इस क्रूर और क्रूर सरकार का असली चेहरा देश के कोने-कोने में जाकर लोगों के सामने बेनकाब करना है ताकि लोग इसका पालन कर सकें।

मई दिवस अमर रहे

दुनिया भर के मजदूर एक हों।

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Thursday, May 12, 2022

हम मनाया करेंगे हसरत मोहानी साहिब के दिन-भाटिया

वह हमारे शायर कामरेड थे जिन्होंने इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा दिया 

कामरेड एम एस भाटिया से हुई बातचीत पर आधारित 

शायरी की दुनिया: 12 मई 2022: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

हसरत मोहानी साहिब की खूबियां किताबों में तलाश करो या फिर इंटरनेट पर या शायर लोगों से तो बहुत कुछ सामने आता है। तालीम को बेहद महत्वपूर्ण मानते थे और इस मामले में रेकार्ड कायम करते रहे। थोड़ी जानकर यहाँ बी शेयर कर लेते हैं। हसरत मोहानी का नाम सय्यद फ़ज़ल-उल-हसन तख़ल्लुस हसरत था। वह क़स्बा मोहान ज़िला उन्नाव में एक जनवरी 1875 को पैदा हुए। उनके वालिद का नाम सय्यद अज़हर हुसैन था। हसरत मोहानी ने आरंभिक तालीम घर पर ही हासिल की और 1903 में अलीगढ़ से बीए किया। शुरू ही से उन्हें शायरी का शौक़ था औरअपना कलाम तसनीम लखनवी को दिखाने लगे। कलाम के शुरूआती दौर  थी। उनकी शायरी इश्क की गहराईयों को बहुत ही सादगी से प्रस्तुत करती हैं। सादगी भरे शब्द और ऊंची उड़ान। चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है। वामपंथी कार्यकर्ता और सक्रिय नेता एम एस भाटिया बताते हैं इस [प्रसिद्ध ग़ज़ल में १९ शेयर हैं। फिल्म में जो प्रस्तुत हुआ वो चुने हुए शेयर ही इस्तेमाल किए गए लेकिन उनका फिल्मांकन ज़बरदस्त रहा। फिल्म वाली ग़ज़ल सुने वक्त सीन देखने का खास महत्व है। एक एक शब्द--एक एक शेयर साकार होता सा लगता है फिल्म के पर्दे पर।  

मोहानी साहिब ने 1903 में अलीगढ़ से एक रिसाला (पत्रिका) उर्दूए मुअल्ला जारी किया। जो अंग्रेजी सरकार की नीतियों के खिलाफ था। 1904 वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हों गये और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े। 1905 में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक द्वारा चलाए गए स्वदेशी तहरीकों में भी हिस्सा लिया। सन 1907 में उन्होंने अपनी पत्रिका में "मिस्त्र में ब्रितानियों की पालिसी" के नाम से लेख छापी। जो ब्रिटिश सरकार को बहुत खली और हसरत मोहानी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। सांस्कृतिक संगठन इप्टा से जुड़े हुए कामरेड भाटिया बताते हैं कि भविष्य में हम एक जनवरी और 13 मई का दिन हसरत मोहानी साहिब की याद में मनाया करेंगे क्यूंकि वह हमारे कामरेड थे। शायर कामरेड जिन्होंने अपनी कलम से कम्युनिस्ट फलसफे की अवे को भी बुलंद किया। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा उन्हीं ने ईजाद किया जो बाद में आज तक बेहद पॉपुलर है।  भाटिया जी ने एक विशेष सुझाव//प्रस्ताव पार्टी हाई कमान और इप्टा हाई कमान को भी भेजा है

कामरेड भूपिंदर सांबर के साथ एम एस भाटिया 

इसी तरह 1919 के खिलाफत आन्दोलन में उन्होंने चढ़ बढ़ कर हिस्सा लिया। 1921 में उन्होंने सर्वप्रथम "इन्कलाब ज़िदांबाद" का नारा अपने कलम से लिखा। इस नारे को बाद में भगतसिंह ने मशहूर किया। उन्होंने कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन (1921) में हिस्सा लिया।

श्री भाटिया बताते हैं कि हसरत मोहानी हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उन्होंने तो श्रीकृष्ण की भक्ति में भी शायरी की है। वह बाल गंगाधर तिलक व भीमराव अम्बेडकर के करीबी दोस्त थे। सन 1946 में जब भारतीय संविधान सभा का गठन हुआ तो उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य से संविधान सभा का सदस्य चुना गया।

सन 1947 के भारत विभाजन का उन्होंने विरोध किया और हिन्दुस्तान में रहना पसंद किया आखिर 13 मई 1951 को मौलाना साहब का अचानक निधन हो गया।

उन्होंने अपने कलामो में हुब्बे वतनी, मुआशरते इस्लाही,कौमी एकता, मज़हबी और सियासी नजरियात पर प्रकाश डाला है। 2014 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया है।

बहुत ही दिलचस्प बात है कि भगत सिंह के सबसे पसंदीदा नारे इंकलाब जिंदाबाद को जन्म देने वाले मौलाना हसरत मोहानी एक कम्युनिस्ट क्रांतिकारी थे जिन्होंने वर्ष 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की। ऐसे देशभक्त को उनकी पुण्यतिथि पर सलाम। 

इप्टा के सूची में हसरत मोहनी साहिब का सक्रिय रूप में आना अब निश्चय ही प्रगतिशील शायरी को मज़बूत करेगा। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा अब नए जोश के साथ बुलंद होगा। इस नारे को अब नए आसमान मिलेंगे। हसरता साहिब कीशायरी के शब्द बहुत से नए लोगों को भी जोड़ेंगे। 

उनकी एक रचना भी ज़रूर पढ़िए:

और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है 

इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है 

दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्किल 

हम ने ये उन के तग़ाफ़ुल को सुना रक्खा है 

तुम ने बाल अपने जो फूलों में बसा रक्खे हैं 

शौक़ को और भी दीवाना बना रक्खा है 

सख़्त बेदर्द है तासीर-ए-मोहब्बत कि उन्हें 

बिस्तर-ए-नाज़ पे सोते से जगा रक्खा है 

आह वो याद कि उस याद को हो कर मजबूर 

दिल-ए-मायूस ने मुद्दत से भुला रक्खा है 

क्या तअम्मुल है मिरे क़त्ल में ऐ बाज़ू-ए-यार 

एक ही वार में सर तन से जुदा रक्खा है 

हुस्न को जौर से बेगाना न समझो कि उसे 

ये सबक़ इश्क़ ने पहले ही पढ़ा रक्खा है 

तेरी निस्बत से सितमगर तिरे मायूसों ने 

दाग़-ए-हिर्मां को भी सीने से लगा रक्खा है 

कहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-मोहब्बत जिस को 

नाम उसी का दिल-ए-मुज़्तर ने दवा रक्खा है 

निगह-ए-यार से पैकान-ए-क़ज़ा का मुश्ताक़ 

दिल-ए-मजबूर निशाने पे खुला रक्खा है 

इस का अंजाम भी कुछ सोच लिया है 'हसरत' 

तू ने रब्त उन से जो इस दर्जा बढ़ा रक्खा है 


Saturday, February 6, 2021

किसान आंदोलन के समर्थन में हुए सफल चक्का जाम

युवा पीढ़ी भी फिर तेज़ी से आ रही है वाम की तरफ 


लुधियाना: 6 फरवरी 2021: (एम एस भाटिया//जसप्रीत कौर समता//कामरेड स्क्रीन)::

किसान आंदोलन के समर्थन में चक्का जाम लुधियाना में भी सफल रहा। विभिन्न वक्ताओं ने सरकार से अपने सवाल दोहराए और किसानों  अपनी एकजुटता भी व्यक्त की। "कामरेड स्क्रीन" और "पंजाब स्क्रीन" सहित विभिन्न मीडिया टीमों ने वहां सक्रिय कवरेज की। वहां शामिल लोगों ने  केंद्र सरकार के खिलाफ अपना रोष व्यक्त किया।। इस बार भी जहां महिलाओं की संख्या ज़्यादा थी वहीं युवा वर्ग की मौजूदगी भी देखने लायक थी। किसानों के समर्थक गोदी मीडिया की आलोचना करते हुए स्वयं ही मीडिया की ज़िम्मेदारी भी निभा रहे थे। शहीद भगत सिंह के भान्जे प्रोफेसर जगमोहन सिंह, एटक की राष्ट्रिय महासचिव  कामरेड अमरजीत कौर, आर एम  पी आई के कामरेड मंगतराम पासला और कामरेड जयपाल सिंह ने बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से केंद्र सरकार को बेनकाब किया। कामरेड सुरिंदर कौर जयपाल और  पत्रकार सतीश सचदेवा ने जन समर्थक पत्रकारों को केंद्र सरकार द्धारा तंगपरेशान किये जाने की भी निंदा की। यह चक्का जाम दोपहर को पूर्व निश्चित और घोषित समय पर शुरू हुआ और ठीक तीन घंटे बाद तीन बजे खोला गया। इसी बीच दुसरे   परेशानी भी क्यूंकि उन्हें तीन घंटे का इंतज़ार करना पड़ा।  इन सभी को धरनाकारियों ने चाय-पानी-बिस्कुट इत्यादि से सेवा।  छोटे बच्चों के लिया बाकायदा दूध का भी प्रबंध किया गया।  पत्रकार मनिंदर सिंह भाटिया, किसान नेता कामरेड चमकौर सिंह और जम्हूरी अधिकार सभा के कामरेड जसवंत सिंह जीरख इस धरने के प्रबंधों  व्यस्त रहे। 


कामरेड अमरजीत कौर ने केंद्र सरकार को किया पूरी तरह बेनकाब 

कामरेड अमरजीत कौर ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल किले पर हुए सारे घटनाक्रम को लेकर मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया और सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने कहा कि किसान विरोधी तीन काले कानून न केवल किसानों के लिए, बल्कि आम उपभोक्ता के लिए भी हानिकारक हैं। संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर, मोदी सरकार द्वारा पारित तीन असंवैधानिक काले कानूनों को रद्द करवाने के लिए चल रहे संघर्ष के हिस्से के रूप में लुधियाना में आज तीन घंटे का जो ट्रैफिक जाम किया गया वह पूरी तरह सफल रहा। आज सुबह वेरका मिल्क प्लांट के पास फिरोजपुर-लुधियाना रोड पर बड़ी संख्या में किसान, छात्र, मजदूर, कर्मचारी, महिलाएं और बुजुर्ग धरने पर बैठे और धरना दोपहर 12.00 से  3.00 बजे तक चला। सबसे पहले, इस किसान संघर्ष में शहीद हुए साथियों को श्रद्धांजलि दी गई।अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) के राष्ट्रीय महासचिव अमरजीत कौर ने  धरने को संबोधित होते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि अमित शाह के इशारे पर पुलिस द्वारा लोगों के चुने हुए सांसदों को भी  किसानों से मिलने नहीं  दिया गया। एक ओर, प्रधान मंत्री मोदी कहते हैं कि मैं सिर्फ एक फोन कॉल दूर हूं, लेकिन दूसरी तरफ, वह सीमा पर तीन किलोमीटर के क्षेत्र में विशाल सीमेंट  दीवारें और नुकीली कीलों को खड़ा करके किसानों के साथ पैदा हो रही दूरी को और बढ़ा रहे हैं। कुछ और तस्वीरें फेसबुक पर भी देखें यहां क्लिक करके 

उन्होंने कहा कि बैरिकेड इस तरह स्थापित किए जा रहे थे जिस से ऐसा लगता है मानो कोई दुश्मन सेना बड़े टैंक लेकर आ रही है। मैडम अमरजीत ने पूछा कि अगर सरकार वार्ता के लिए तैयार है तो फिर किसके इशारे पर यह सब हो रहा है। ज़ाहिर है कि यह सब वार्ता को तोड़ने की साज़िशें हैं। दूसरी तरफ किसान हमेशा बातचीत के लिए तैयार हैं। गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को दिल्ली में हुई घटना के बारे में  उन्होंने  कहा कि यह सब सरकार द्वारा रची गई साजिश के तहत किया गया। यह केवल किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए किया गया है। दिल्ली पुलिस ने गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर यह सब किया है, जैसा कि जारी किए गए वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कुछ और तस्वीरें फेसबुक पर भी देखें यहां क्लिक करके 

उन्होंने यह भी कहा कि किसानों के साथ सहमत हुए मार्गों को बंद कर दिया गया था और किसानों को उस रास्ते पर डायवर्ट कर दिया गया जो इंडिया गेट और लाल किला को जाते हैं। उन्होंने मांग की कि इन सभी घटनाओं की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए, दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए और प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। 


कामरेड मंगतराम पासला ने कहा आंदोलन और मज़बूत हो रहा है 

आज वेरका मिल्क प्लांट के सामने हुई सभा को संबोधित करते हुए, कॉमरेड मंगत राम पासला ने कहा, "हम इस बात से संतुष्ट हैं कि सरकार के लाख प्रचार के बावजूद आंदोलन दिन-ब-दिन मजबूत होता जा रहा है।" उन्होंने घोषणा की कि जिस दिन इन काले कानूनों को वापस ले लिया जायेगा उस दिन संयुक्त मोर्चा का आंदोलन और धरना समाप्त हो जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि सरकार के पास मौजूदा सत्र में उन्हें वापस लेने और एमएसपी अधिनियम लागू करने का अवसर है। 


सभा को संबोधित करने वालों में चमकोैर सिंह, प्रो:जयपाल सिंह, डीपी मौड, डॉ गुलजार पंधेर, डॉ राजिंदर पाल सिंह औलख, दीपक कुमार तथा परवेज सिंह औलख शामिल थे। डाक्टर अरूण मित्रा, परमजीत सिंह, एम एस भाटिया, जगदीश कुमार, बलदेव सिंह वालिया, केवल सिंह बनवैत, कामरेड रमेश रतन, कामरेड विजय कुमार, कामरेड सुरिंदर कौर गिल जयपाल और जसवंत जीरख भी शामिल  हुए ।


महिलाओं ने भी की बड़ी संख्या में शमूलियत 
आज की इस  जन सभा में महिलाओं ने भी बड़ी संख्या में शमूलियत की। युवा लड़कियों ने अपने माटो और बैनर उठा कर सभी वक्ताओं को बहुत ही ध्यान से सुना। सारे प्रबंधन में इन  सहयोग दिया। गोदी मीडिया को मुँहतोड़ जवाब देते हुए भी इन लड़कियों ने सक्रिय पत्रकारिता में भागीदारी का संकेत दिया। भविष्य में अब जनपत्रकारिता  बोलबाला होगा इस बात को आज की जनसभा में देखा जा सकता था। बहुत से लोगों से जब गोदी मीडिया के संबंध में पूछा गया था ज़्यादातर लोगों का जवाब था कि वे टीवी देखना ही छोड़ चुके हैं। वे अब सोशल मीडिया से ही सच्चाई का पता लगाते हैं। कुछ और तस्वीरें फेसबुक पर भी देखें यहां क्लिक करके 

गीतसंगीत भी हुआ
आज के इस धरने में गीत संगीत भी हुआ। मोहम्मद शफ़ीक़ आलम ने जहां राहत इंदौरी साहिब की शायरी प्रस्तुत की वहीं बिहाईव थिएटर के कलाकारों ने भी अपने गेट संगीत से इस जनसभा को बांधे रखा। लोगों ने इन कलाकारों को पूरे ध्यान से सुना और तालियों से उनकी सुरमें भी सुर मिलाया। श्रोताओं की तालियों से मिला सुरताल एक अलग ही रंग बांध रहा था। (डेस्क इनपुट:कार्तिका सिंह)