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Friday, February 16, 2024

भारत बंद ने दिखाया देश और दुनिया को अपनी जनशक्ति का जोश और जलवा

Friday 16th February 2024 at 4:43 PM

मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे

आंदोलनकारी किसानों/मजदूरों पर जारी अत्याचार की भी कड़ी निंदा

*चुनावी बांड को ख़त्म करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी चर्चा में रहा

*सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी सरकार के कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार को उजागर किया 


लुधियाना
: 16 फरवरी 2024: (मीडिया लिंक//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

आम जनता और मीडिया में लगातार छाए हुए किसान आंदोलन की चर्चा को आज कुछ विराम दिया भारत बंद की खबरों ने। सुबह से लेकर शाम तक तकरीबन सभी शहरों और गांवों में भारत बंद का असर देखने को मिला। लुधियाना,मोहाली, मानसा, फरीदकोट, खरड़, जालंधर--बहुत से स्थानों पर इस भारत बंद का असर देखा गया। 

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा की देशव्यापी हड़ताल और भारत बंद के आह्वान पर मजदूर किसान एकता के गगनभेदी नारों के बीच सेक्टोरल फेडरेशन/एसोसिएशनों ने बस स्टैंड लुधियाना में भी एक विशाल रैली की।  

इस भारत बंद का यह आह्वान मोदी सरकार की मजदूर विरोधी, कर्मचारी विरोधी, किसान विरोधी और अधिकार मांग रहे लोगों पर दमनकारी नीतियों के खिलाफ किया गया है.  रैली की अध्यक्षता एम एस भाटिया, जोगिंदर राम और जगदीश चंद की कमेटी ने की।  रैली के बाद श्रमिकों, कर्मचारियों, किसानों और समाज के अन्य वर्गों के लोगों ने मिनी सचिवालय की ओर मार्च भी किया, जहां रैली भी आयोजित की गई थी। 

दोनों जगहों पर आयोजित रैलियों को एटक,सीटू तथा सीटीयू पंजाब समेत विभिन्न संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया.  वक्ताओं ने मोदी सरकार द्वारा शंभू सीमा पर किसानों पर अत्याचार और शांतिपूर्वक विरोध कर रहे किसानों पर ड्रोन के इस्तेमाल से आंसू गैस के गोले और प्लास्टिक की गोलियां चलाने की भी निंदा की। 

उन्होंने कहा कि यह हमारे देश के संविधान के तहत सभी नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति और विरोध की स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां तीन कृषि बिल वापस ले लिए, वहीं सरकार किसानों की मांगों पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से पूरी तरह पीछे हट गई है।  

रैली में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि लगातार मजदूरों के खिलाफ कानून बनाये जा रहे हैं और सरकार कॉरपोरेट की सेवा करने पर तुली है.  जबकि गरीब लोगों को उनकी आजीविका और नौकरियों के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और अनियंत्रित मुद्रास्फीति से पीड़ित हैं, उनके अवैतनिक ऋणों को कर कटौती के रूप में एनपीए घोषित करके कॉर्पोरेट क्षेत्र को बड़ी रियायतें दी गई हैं और ऋण माफ किए जा रहे हैं। जिसकी भरपाई आम जनता पर अतिरिक्त कर लगाकर की जा रही है।

मज़दूर, कर्मचारी, किसान, छात्र, युवा, महिलाएं, छोटे-मझोले व्यवसायी, छोटे दुकानदार समेत अन्य लोगों ने इसके खिलाफ बिगुल बजा दिया है। आज का आह्वान, जिसमें किसानों ने गांव-गांव में बंद रखा और देशभर में मजदूर हड़ताल पर चले गये, लोगों में बढ़ते गुस्से का प्रतीक है। 

हर मोर्चे पर विफल होने के बाद सरकार वोट हासिल करने के लिए समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने और सांप्रदायिक दंगे कराने का खतरनाक खेल अपना रही है। वे सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को नष्ट कर रहे हैं और उन्हें अपनी कठपुतली बना रहे हैं।  देश का संघीय ढांचा गंभीर खतरे में है.  वक्ताओं ने चुनावी बांड योजना को असंवैधानिक घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया है और कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि यह सदी की सबसे भ्रष्ट सरकार है।

प्रदर्शनकारियों ने अन्य मांगों के अलावा निम्नलिखित प्रमुख मांगों पर जोर दिया:

 • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण रोका जाए।

 • चार श्रम संहिताएं रद्द करें और 44 कानून लागू करें

 • किसानों की उपज के लिए एमएसपी के फार्मूले @ C2+50% के अनुसार कानूनी गारंटी एवं खरीद गारंटी प्रदान की जाए।

 •श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 26000/- प्रति माह किया जाए।

 • आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं, मध्याह्न भोजन कार्यकर्ताओं और अन्य को नियमित किया जाना चाहिए और न्यूनतम मजदूरी के तहत लाया जाना चाहिए और श्रमिकों के रूप में सभी लाभ दिए जाने चाहिए।

• सेना में अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की अस्थाई भर्ती को वापस लिया जाए और पहले की तरह स्थाई भर्ती की जाए।

 • अमीर समर्थक और जनविरोधी नई शिक्षा नीति 2020 को खारिज किया जाना चाहिए।

 • नई पेंशन योजना को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए।

 • सेवानिवृत कर्मियों की मानी गई मांगों को लागू किया जाए।

• सभी निर्माण श्रमिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा के लिए ईएसआई योजना के तहत लाया जाना चाहिए।

 • हिट एंड रन कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए और संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद ही बनाया जाना चाहिए।

 • विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2022 को वापस लिया जाए।  प्री-पेड स्मार्ट मीटर न लगाए जाएं।

 • मनरेगा के तहत प्रति वर्ष 200 दिन के काम और 700/- प्रति दिन की गारंटी।

 • 8 घंटे की जगह 12 घंटे की अधिसूचना तुरंत रद्द की जाए।

 • न्यूनतम वेतन को संशोधित किया जाना चाहिए।

 • ईएसआई को पटियाला या पीजीआई चंडीगढ़ के बजाय लुधियाना के अस्पतालों को ही रेफर करना चाहिए।

 • खाद्य सुरक्षा की गारंटी करें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करें।

 • सिंघु बॉर्डर पर सभी शहीद किसानों की यादगार बनाई जाए, मुआवजा दिया जाए और उनके परिवारों का पुनर्वास किया जाए, सभी लंबित मामले वापस लिए जाएं।

 • केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त कर मुकदमा चलाया जाए।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 2024 में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को दोबारा सत्ता में आने से रोकना बहुत जरूरी हो गया है, अन्यथा इस देश में न केवल किसानों और मजदूरों के अधिकारों का हनन करने की नीति जारी रहेगी, बल्कि सरकारी संपत्तियों को  कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों सस्ते दाम पर बेचा जाएगा।  

धर्म के नाम पर समाज में फूट डालने से हमारे देश की एकता, अखंडता और संविधान को खतरा होगा।  

रैली को संबोधित करने वालों में एटक पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़, सीटीयू पंजाब के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंगत राम पासला, डी पी मौड, सुखविंदर सिंह लोटे, जगदीश चंद, विजय कुमार, चमकौर सिंह बरमी, डॉ. राजिंदर पाल सिंह औलख, डॉ. अरुण मित्रा, बलराम सिंह, राम लाल, चरण सराभा, सुभाष रानी, जोगिंदर राम, तहसीलदार यादव, हरबंस सिंह पंधेर, शमशेर सिंह, तहसीलदार, प्रोफेसर जगमोहन सिंह जम्हूरी अधिकार सभा, बलदेव कृष्ण मोदगिल इंटक, महिंदर पाल सिंह मोहाली, हरजिंदर सिंह मोल्डर्स एंड स्टील वर्कर्स यूनियन शामिल थे।

Saturday, February 6, 2021

किसान आंदोलन के समर्थन में हुए सफल चक्का जाम

युवा पीढ़ी भी फिर तेज़ी से आ रही है वाम की तरफ 


लुधियाना: 6 फरवरी 2021: (एम एस भाटिया//जसप्रीत कौर समता//कामरेड स्क्रीन)::

किसान आंदोलन के समर्थन में चक्का जाम लुधियाना में भी सफल रहा। विभिन्न वक्ताओं ने सरकार से अपने सवाल दोहराए और किसानों  अपनी एकजुटता भी व्यक्त की। "कामरेड स्क्रीन" और "पंजाब स्क्रीन" सहित विभिन्न मीडिया टीमों ने वहां सक्रिय कवरेज की। वहां शामिल लोगों ने  केंद्र सरकार के खिलाफ अपना रोष व्यक्त किया।। इस बार भी जहां महिलाओं की संख्या ज़्यादा थी वहीं युवा वर्ग की मौजूदगी भी देखने लायक थी। किसानों के समर्थक गोदी मीडिया की आलोचना करते हुए स्वयं ही मीडिया की ज़िम्मेदारी भी निभा रहे थे। शहीद भगत सिंह के भान्जे प्रोफेसर जगमोहन सिंह, एटक की राष्ट्रिय महासचिव  कामरेड अमरजीत कौर, आर एम  पी आई के कामरेड मंगतराम पासला और कामरेड जयपाल सिंह ने बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से केंद्र सरकार को बेनकाब किया। कामरेड सुरिंदर कौर जयपाल और  पत्रकार सतीश सचदेवा ने जन समर्थक पत्रकारों को केंद्र सरकार द्धारा तंगपरेशान किये जाने की भी निंदा की। यह चक्का जाम दोपहर को पूर्व निश्चित और घोषित समय पर शुरू हुआ और ठीक तीन घंटे बाद तीन बजे खोला गया। इसी बीच दुसरे   परेशानी भी क्यूंकि उन्हें तीन घंटे का इंतज़ार करना पड़ा।  इन सभी को धरनाकारियों ने चाय-पानी-बिस्कुट इत्यादि से सेवा।  छोटे बच्चों के लिया बाकायदा दूध का भी प्रबंध किया गया।  पत्रकार मनिंदर सिंह भाटिया, किसान नेता कामरेड चमकौर सिंह और जम्हूरी अधिकार सभा के कामरेड जसवंत सिंह जीरख इस धरने के प्रबंधों  व्यस्त रहे। 


कामरेड अमरजीत कौर ने केंद्र सरकार को किया पूरी तरह बेनकाब 

कामरेड अमरजीत कौर ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल किले पर हुए सारे घटनाक्रम को लेकर मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया और सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने कहा कि किसान विरोधी तीन काले कानून न केवल किसानों के लिए, बल्कि आम उपभोक्ता के लिए भी हानिकारक हैं। संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर, मोदी सरकार द्वारा पारित तीन असंवैधानिक काले कानूनों को रद्द करवाने के लिए चल रहे संघर्ष के हिस्से के रूप में लुधियाना में आज तीन घंटे का जो ट्रैफिक जाम किया गया वह पूरी तरह सफल रहा। आज सुबह वेरका मिल्क प्लांट के पास फिरोजपुर-लुधियाना रोड पर बड़ी संख्या में किसान, छात्र, मजदूर, कर्मचारी, महिलाएं और बुजुर्ग धरने पर बैठे और धरना दोपहर 12.00 से  3.00 बजे तक चला। सबसे पहले, इस किसान संघर्ष में शहीद हुए साथियों को श्रद्धांजलि दी गई।अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) के राष्ट्रीय महासचिव अमरजीत कौर ने  धरने को संबोधित होते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि अमित शाह के इशारे पर पुलिस द्वारा लोगों के चुने हुए सांसदों को भी  किसानों से मिलने नहीं  दिया गया। एक ओर, प्रधान मंत्री मोदी कहते हैं कि मैं सिर्फ एक फोन कॉल दूर हूं, लेकिन दूसरी तरफ, वह सीमा पर तीन किलोमीटर के क्षेत्र में विशाल सीमेंट  दीवारें और नुकीली कीलों को खड़ा करके किसानों के साथ पैदा हो रही दूरी को और बढ़ा रहे हैं। कुछ और तस्वीरें फेसबुक पर भी देखें यहां क्लिक करके 

उन्होंने कहा कि बैरिकेड इस तरह स्थापित किए जा रहे थे जिस से ऐसा लगता है मानो कोई दुश्मन सेना बड़े टैंक लेकर आ रही है। मैडम अमरजीत ने पूछा कि अगर सरकार वार्ता के लिए तैयार है तो फिर किसके इशारे पर यह सब हो रहा है। ज़ाहिर है कि यह सब वार्ता को तोड़ने की साज़िशें हैं। दूसरी तरफ किसान हमेशा बातचीत के लिए तैयार हैं। गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को दिल्ली में हुई घटना के बारे में  उन्होंने  कहा कि यह सब सरकार द्वारा रची गई साजिश के तहत किया गया। यह केवल किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए किया गया है। दिल्ली पुलिस ने गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर यह सब किया है, जैसा कि जारी किए गए वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कुछ और तस्वीरें फेसबुक पर भी देखें यहां क्लिक करके 

उन्होंने यह भी कहा कि किसानों के साथ सहमत हुए मार्गों को बंद कर दिया गया था और किसानों को उस रास्ते पर डायवर्ट कर दिया गया जो इंडिया गेट और लाल किला को जाते हैं। उन्होंने मांग की कि इन सभी घटनाओं की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए, दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए और प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। 


कामरेड मंगतराम पासला ने कहा आंदोलन और मज़बूत हो रहा है 

आज वेरका मिल्क प्लांट के सामने हुई सभा को संबोधित करते हुए, कॉमरेड मंगत राम पासला ने कहा, "हम इस बात से संतुष्ट हैं कि सरकार के लाख प्रचार के बावजूद आंदोलन दिन-ब-दिन मजबूत होता जा रहा है।" उन्होंने घोषणा की कि जिस दिन इन काले कानूनों को वापस ले लिया जायेगा उस दिन संयुक्त मोर्चा का आंदोलन और धरना समाप्त हो जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि सरकार के पास मौजूदा सत्र में उन्हें वापस लेने और एमएसपी अधिनियम लागू करने का अवसर है। 


सभा को संबोधित करने वालों में चमकोैर सिंह, प्रो:जयपाल सिंह, डीपी मौड, डॉ गुलजार पंधेर, डॉ राजिंदर पाल सिंह औलख, दीपक कुमार तथा परवेज सिंह औलख शामिल थे। डाक्टर अरूण मित्रा, परमजीत सिंह, एम एस भाटिया, जगदीश कुमार, बलदेव सिंह वालिया, केवल सिंह बनवैत, कामरेड रमेश रतन, कामरेड विजय कुमार, कामरेड सुरिंदर कौर गिल जयपाल और जसवंत जीरख भी शामिल  हुए ।


महिलाओं ने भी की बड़ी संख्या में शमूलियत 
आज की इस  जन सभा में महिलाओं ने भी बड़ी संख्या में शमूलियत की। युवा लड़कियों ने अपने माटो और बैनर उठा कर सभी वक्ताओं को बहुत ही ध्यान से सुना। सारे प्रबंधन में इन  सहयोग दिया। गोदी मीडिया को मुँहतोड़ जवाब देते हुए भी इन लड़कियों ने सक्रिय पत्रकारिता में भागीदारी का संकेत दिया। भविष्य में अब जनपत्रकारिता  बोलबाला होगा इस बात को आज की जनसभा में देखा जा सकता था। बहुत से लोगों से जब गोदी मीडिया के संबंध में पूछा गया था ज़्यादातर लोगों का जवाब था कि वे टीवी देखना ही छोड़ चुके हैं। वे अब सोशल मीडिया से ही सच्चाई का पता लगाते हैं। कुछ और तस्वीरें फेसबुक पर भी देखें यहां क्लिक करके 

गीतसंगीत भी हुआ
आज के इस धरने में गीत संगीत भी हुआ। मोहम्मद शफ़ीक़ आलम ने जहां राहत इंदौरी साहिब की शायरी प्रस्तुत की वहीं बिहाईव थिएटर के कलाकारों ने भी अपने गेट संगीत से इस जनसभा को बांधे रखा। लोगों ने इन कलाकारों को पूरे ध्यान से सुना और तालियों से उनकी सुरमें भी सुर मिलाया। श्रोताओं की तालियों से मिला सुरताल एक अलग ही रंग बांध रहा था। (डेस्क इनपुट:कार्तिका सिंह)

Saturday, January 16, 2021

कृषि सुधार और किसान आंदोलन

 Friday:15th January  2021 at 8:53 PM

   लेखक:यादविंदर सिंह हुंजन                                                                       अनुवाद: एम एस भाटिया  


किसानों और उनकी उपज से संबंधित भारत सरकार ने सितंबर 2020 में तीन कानून पारित किए हैं। यह कानून निजी और कॉर्पोरेट व्यापारियों द्वारा कृषि उपज,निजी बाजार प्रणाली और कृषि अनुबंध प्रणाली को विनियमित करता है। सरकार ने आपात स्थितियों के अलावा आवश्यक वस्तुओं पर स्टॉकहोल्डिंग प्रतिबंधों को हटाने के लिए कानून पारित किया है। भारत के प्रधान मंत्री, उनकी सरकार और कृषि अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इन कानूनों से कृषि क्षेत्र में सुधार होगा। कृषि क्षेत्र में परिवर्तन 1991 के प्रसिद्ध आर्थिक सुधारों से संबंधित हैं। इन आर्थिक सुधारों के साथ, सरकार का नियंत्रण हटाकर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को एक खुला बाजार बनाना है।

लेखक यादविंदर हूंझण 
किसानों को गहराई से चिंता है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी) खत्म कर देगी। नए अनुबंध कृषि कानूनों ने कॉर्पोरेट और निजी व्यापारियों को अधिक अधिकार दिए हैं। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को सीधे कॉर्पोरेट द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। किसान तीनों कानूनों को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। पंजाब के किसान अगस्त 2020 से इन कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं जब सरकार ने संसद में कानून पेश किए थे। पहले विरोध प्रदर्शन पंजाब राज्य तक ही सीमित थे, लेकिन अब अधिकांश राज्यों की किसान यूनियने आंदोलन का हिस्सा हैं।
पंजाब के किसानों ने बिना किसी सकारात्मक परिणाम के कुछ हफ्तों के लिए रेलवे लाइनों को अवरुद्ध कर दिया। अक्टूबर 2020 में, पंजाब किसानों को खुश करने के लिए केंद्र के कानून को रद्द करने के लिए एक कानून पारित करने वाला पहला राज्य बन गया, लेकिन किसान संतुष्ट नहीं थे।
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत के संविधान में, कृषि राज्य का विषय है, और व्यापार और अर्थव्यवस्था केंद्रीय विषय हैं। तब पंजाब के किसानों ने अगले चरण के रूप में विरोध करने का फैसला किया और दिल्ली जाने और वहां प्रदर्शन के लिए बैठने का फैसला किया, क्योंकि यह लोकतंत्र में नागरिकों का कानूनी अधिकार है। हरियाणा सरकार ने पंजाब के किसानों को विभिन्न सीमाओं पर रोक दिया लेकिन यह विफल रहा। इस बीच, हरियाणा के किसान भी आंदोलन में शामिल हो गए और  दिल्ली की ओर मार्च करना शुरू कर दिया। हरियाणा और दिल्लीपुलिस ने किसानों को रोकने की कोशिश की। उन्होंने  बैरिकेड्स का इस्तेमाल किया, तेज स्टील के तार लगाए, सड़कें खोदीं, सड़कों को अवरुद्ध किया, रेत के ट्रक लगाए, पानी का छिड़काव किया और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। दिल्ली पुलिस ने दिल्ली बॉर्डर पर किसानों को रोका। तब किसानों ने दिल्ली जाने वाले मुख्य मार्गों को अवरुद्ध करके विरोध करने का फैसला किया। भारत सरकार ने विरोध के लिए दिल्ली में एक जगह की पेशकश की, लेकिन किसानों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि उनके पास रिपोर्ट थी कि दिल्ली पुलिस इस स्थान को स्थानीय जेल में बदल देगी। वर्तमान में, किसान दिल्ली जाने वाले महत्वपूर्ण मार्गों को अवरुद्ध किए हुए  हैं और विरोध कर रहे हैं। इस बीच, दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य भारतीय राज्यों के किसान शामिल हुए। विरोध शांतिपूर्णम और अहिंसक हैं।
अनुवादक एम एस भाटिया 

रिपोर्टों के अनुसार, अनुबंध खेती के बिल में प्रावधान किसानों को विवाद को हल करने के लिए दीवानी अदालत में अपील करने से रोकते हैं। अनुभाग के अनुसार, किसान केवल विवादों को हल करने के लिए जिला प्रशासन से संपर्क कर सकते हैं। किसानों के अनुसार देश में उनके मूल कानूनी और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला हो रहा है। नए कानून के तहत, निजी व्यापारी आयकर पहचान (पैन कार्ड) या किसी अन्य पहचान के साथ कृषि उत्पाद खरीद सकते हैं और पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। भारत में उन्हें ट्रेस करना लगभग असंभव होगा। किसान भी चिंतित हैं कि ये निजी व्यापारी अपनी उपज के लिए एमएसपी से कम भुगतान करेंगे। कुछ राज्य सरकारें ग्रामीण विकास के लिए सरकारी मंडियों में फसलों की खरीद पर कर लगाती हैं जबकि नए कानून राज्य सरकारों को निजी मंडियों से कर वसूलने से रोकते हैं। इस संबंध में, कानून सरकारी मंडियों के विपरीत है और निजी मंडियों का पक्षधर है।
किसानों की आशंका इस तथ्य पर आधारित है कि बिहार राज्य ने 2006 में कृषि बाजार प्रणाली को समाप्त कर दिया और बिहार में किसान अपनी उपज को आधे एमएसपी मूल्य पर बेचने के लिए मजबूर हैं। 1960 के दशक में हरित क्रांति के दौरान  एम एस पी अस्तित्व में आया।
अब किसान मांग कर रहे हैं कि उनकी उपज का एमएसपी कानून द्वारा सुनिश्चित किया जाए। जिस तरह से संसद में कानून पारित किए गए हैं, उसके खिलाफ आपत्तियां भी उठाई गई हैं। कोविद 19 महामारी के दौरान बिलों के लिए संसद में एक अध्यादेश लाया गया था। यह देश अभी भी महामारी से जूझ रहा  हेै। इस समय कृषि कानूनों की क्या आवश्यकता थी? हद तो तब हो गई जब संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में फर्जी वोटों के साथ कानून पारित कर दिया गया। राज्यसभा के सदस्य संसदीय समिति को विधेयक भेजने के लिए कह रहे थे ताकि विपक्ष की चिंताओं का विश्लेषण, चर्चा और समाधान किया जा सके। किसान यूनियनों का यह भी आरोप है कि सरकार ने विधेयक को तैयार करने में उनकी सलाह नहीं ली। प्रमुख हितधारकों के रूप में, उन्हें सरकार द्वारा विचार-विमर्श में शामिल किया जाना चाहिए था। घटनाओं का क्रम इंगित करता है कि कानून अनुमोदन के लिए हैं वर्तमान सत्ताधारी पार्टी ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संसद के नियमों का पालन नहीं किया है।
भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार इन कानूनों की प्रशंसा की है और उन्हें 'क्रांतिकारी' कहा है। सरकार के अनुसार, यह कृषि क्षेत्र में सुधार करेगा और किसानों के भविष्य को मजबूत करेगा। दूसरी ओर, किसान और आम नागरिक, सरकार के दावों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पे अड़े हुए हैं। मोदी सरकार के हमारे छह साल के प्रदर्शन के आधार पर किसानों की आशंका जायज है। 2014 में, मोदी ने भारत के लोगों को सबजबाग दिखाकर अपने पक्ष में फतवा जीता था।
उन्होंने वादा किया कि उनकी सरकार पहले 100 दिनों में स्विस बैंकों से काला धन लाएगी, उनकी सरकार हर साल 20 मिलियन नौकरियां पैदा करेगी, भारत को बहु-अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था और कई और झूठे वादे । दूसरा कार्यकाल जीतने के बावजूद इनमें से कोई भी दावा पूरा नहीं हुआ है। इसके विपरीत, इसने 2016 में नोटबंदी की विनाशकारी नीति को लागू किया, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी। तब से, भारतीय अर्थव्यवस्था गिरावट में रही है और वापस नहीं उठी है। मार्च 2020 में हालिया महामारी ने भारत के इतिहास में सबसे खराब आर्थिक मंदी ला दी है।
लाखों नौकरियां चली गईं हैं। नोटबंदी से आहत अर्थव्यवस्था, अभी तक नहीं उबर पाई थी जब सरकार ने 2017 में जल्दबाजी में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जी एस टी) को लागू किया था। अर्थशास्त्रियों की राय है कि जीएसटी कर सुधार की आवश्यकता तो थी, लेकिन इसका कार्यान्वयन कुशल और प्रभावी नहीं था, जिसका अर्थव्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव पड़ा।

वर्तमान सरकार की नीतियां और कार्य कुछ कॉर्पोरेट घरानों के पक्ष में हैं। दूसरी ओर, अधिकांश भारतीयों के जीवन स्तर में अभी भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की कमी है। हाल के वर्षों में, सरकार ने कुछ कॉरपोरेट घरानों को कई हवाई अड्डों, रेलवे और फाइटर जेट्स के लिए अनुबंध प्रदान किया है।
सरकार का खराब प्रदर्शन सरकार और उसके नागरिकों के बीच विश्वास की कमी पैदा कर रहा है। यह एक कारण हो सकता है कि किसान प्रधानमंत्री पर भरोसा नहीं करते हैं, जो दावा करते हैं कि नए कानून सुधारवादी और किसान समर्थक हैं। यहाँ यह बताना उचित है कि भारत की राजनीतिक, प्रशासनिक, पुलिस और निचली न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का इतिहास है।
सरकार किसानों के विरोध को अनावश्यक बनाने की कोशिश कर दोहरा खेल भी खेल रही है। सरकार ने अपने संसाधनों का दुरुपयोग किया है जैसे कि समाचार मीडिया हाउस और सोशल मीडिया ने गलत सूचना फैलाने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अलगाववादियों के रूप में लेबल लगाकर जनता की राय में हेरफेर किया है और अब तक विफल रहा है। यहां यह बताना उचित है कि मोदी सरकार की  रणनीति सफल रही है  जो   सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) के विरोध  और जम्मू और कश्मीर राज्य की 370 खतम करने के विरोध को विफल बनाने ; और 2019 में पिछले आम चुनाव मुख्य रूप से हिंदी भाषी राज्यों में जीते गए थे।
अब तक, पंजाबी (हरियाणा सहित) किसानों के संघर्ष को दो महीने हो चुके हैं, भले ही सरकार ने विरोध प्रदर्शनों को रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन किसान अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखने में सफल रहे। पंजाबियों की अपनी भूमि और संस्कृति में क्रांतियों का इतिहास है और सवभाव  से आक्रामक हैं। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ी संख्या में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। हाल के वर्षों में पिछले दो आम चुनावों में भी, मोदी लहर के बावजूद केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के लिए संसद कम से कम सदस्य चुने जाने वाला पंजाब एकमात्र राज्य था। किसानों  का यह मोदी सरकार के खिलाफ एक सफल विरोध प्रदर्शन करने का ऐतिहासिक साहस है , जिस सरकार ने पिछले सभी विरोध प्रदर्शनों को बलपूर्वक या धमकाने के द्वारा विफल किया है। इस अंदोलन ने दिखाया है कि वह न केवल आक्रामक हैं, उसकी सोच भी रणनीतिक है। वे अधिकारियों को उनकी शिकायतों के बारे में  सफलतापूर्वक सूचित कर सकते हैं। सरकार समर्थक मीडिया और सोशल मीडिया की गलत सूचना के बावजूद, किसानों द्वारा  आम जनता को तर्कसंगत रूप से और उचित विश्लेषण के साथ समझने की क्षमता है, जो कि के आंदोलन को अधिक गति दे रहा है और सरकारी प्रचार का जवाब दे रहा है।
कुछ ने यह सुझाव देना शुरू कर दिया है कि नए कानूनों को निरस्त करने के लिए किसानों को अन्य तरीकों का चयन करना चाहिए। उन्हें अदालत जाना चाहिए। भारतीय न्यायपालिका लंबे समय से न्याय देने में देरी के लिए जानी जाती है। हाल ही में, कुछ वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने चिंता व्यक्त की है कि न्यायपालिका ने कई मामलों में पर्याप्त न्याय नहीं किया है। न्यायालयों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों को लेकर न्यायाधीश चिंतित थे। ये न्यायाधीश लोकतांत्रिक संस्थानों की स्थापना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों में न्याय तक पहुंच की कमी के बारे में भी चिंतित हैं। इसी प्रकार, राज्य को एक साल से अधिक समय के लिए बंद कर दिया गया और जंमू औरकश्मीर के लोगों के अधिकारों और फरवरी 2020 में धारा 370, सीएए, दिल्ली दंगों का उन्मूलन, चुनाव बॉन्ड, मतदाता प्रमाणित पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीटी) के तहत  गिनती का क्या हुआ, राफेल जेट घोटाला और जज लोया हत्या का मामला चिंताजनक है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के चार बहुत वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अदालत के कामकाज पर चिंता व्यक्त करने के लिए जनवरी 2018 में एक संवाददाता सम्मेलन किया क्योंकि उन्हें डर था कि अदालत में सब कुछ ठीक नहीं था और लोकतंत्र दांव पर था। भारत की आजादी में यह पहली बार था जब न्यायाधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इन घटनाओं से पता चलता है कि भारतीय न्यायपालिका के उच्च न्यायालय अपनी चमक खो रहे हैं और उखड़ने लगे हैं, जिसकी विश्वसनीयता के लिए दुनिया में सबसे अधिक सम्मान था। परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय में लोगों का विश्वास उठ रहा है।
अब, जनता की राय को बदलने के लिए, नई गलत सूचना फैलने लगी है कि अगर खरीदार एमएसपी के अनुसार अपने उत्पादों के लिए किसानों को भुगतान करता है, तो यह मुद्रास्फीति को बढ़ावा देगा, अर्थात कीमतों में वृद्धि।
लोगों को गलत सूचना की गलत धारणा को दूर करने के लिए एमएसपी, खुदरा मूल्य (एमआरपी) और मूल्य निर्धारण प्रणाली के बीच के अंतर को समझने की जरूरत है।  एम एस पी का अर्थ कृषि की कुल लागत और लाभ को जमा करके केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित खरीद मूल्य है। एम आर पी वह मूल्य है जिस पर उपभोक्ता उत्पाद खरीदेंगे।
मूल्य प्रणाली को समझने के लिए, उदाहरण के लिए, गेहूं अनाज और गेहूं का आटा; वर्तमान में गेहूं के अनाज के लिए एमएसपी 20 रुपये प्रति किलोग्राम है जो किसान को उपलब्ध है और गेहूं के लिए एमआरपी लगभग 40 रुपये प्रति किलोग्राम है, जिसके लिए उपभोक्ता इसे खरीद रहा है। इसका मतलब है कि उपभोक्ता उस कीमत को दोगुना कर रहा है जिसके अनुसार किसान को प्राप्त होता है - एमएसपी और बिचौलियों द्वारा प्राप्त 100% का अंतर बताता है कि किसान (कच्चे माल का उत्पादक) मूल्य प्रणाली में सबसे अधिक लाभार्थी नहीं; लाभार्थी मध्यम लोग हैं जो व्यापारिक लोग हैं - निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं सहित। तार्किक रूप से, सभी कच्चे माल उत्पादकों (किसानों सहित) को एक मूल्य दिया जाना चाहिए जो इसके इनपुट लागत और लाभ के बीच अंतर को कवर करता है, जो कि एमएसपी में - किसानों के मामले में।
भारतीय कृषि क्षेत्र में सुधारों की बहुत आवश्यकता है। चावल की फसलों के लिए पानी के अधिक उपयोग के कारण गिरता जल स्तर चिंता का विषय है जो फसल विविधीकरण की आवश्यकता को इंगित करता है। किसान की आय रुकी हुई है और इसकी आय दोगुनी करने के लिए सुधार किए जाने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र की समस्या को हल करने के लिए कई रिपोर्ट और अध्ययन किए गए  हैं। प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री, स्वामीनाथन, जो भारत में हरित क्रांति के रचेता हैं, ने 2004 से 2006 तक दो रिपोर्ट सरकार को सौंपी। सिफारिशों में से एक किसान की आय में सुधार करना था और दूसरा इनपुट लागत के 50% के साथ एमएसपी को ठीक करना था। सभी राजनीतिक दल स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए सहमत हो रहे थे और अपने चुनावी घोषणापत्र में इसे शामिल कर रहे थे। फिर भी, एक दशक बाद, किसी भी सरकार ने इसे लागू करने की हिम्मत नहीं की।
90 के दशक के मध्य से 2010 के आर्थिक सुधारों के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था में आम तौर पर सुधार हुआ है। जैसे कि नौकरी में वृद्धि,  ग्राहक सेवा मे  सुधार और गरीबी का घटना  इत्यादि। सुधार का एक अच्छा उदाहरण सॉफ्टवेयर, बैंकिंग और दूरसंचार क्षेत्र हैं। उन्होंने बहुत विकास देखा, बहुत सारी नौकरियां पैदा कीं, अच्छी ग्राहक सेवा और नवाचार देखा। भारत और चीन दोनों ने दिखाया है कि सुधारों के आधार पर आर्थिक विकास से लोगों की आजीविका में सुधार हो सकता है। इसलिए, इसका मतलब है कि भारत को समृद्धि का नेतृत्व करने के लिए कृषि क्षेत्र में सुधार करना होगा।
इससे भारतीय किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपनी उपज बेचने और निर्यात में सुधार करने में मदद मिलेगी।
वर्तमान मोदी के नेतृत्व वाली सरकार हाल के लाभों को बताने और संवाद करने में विफल रही है। चूंकि इसने संसद में कुछ जनविरोधी कानून पारित किए हैं,यह सरकार के बुरे इरादे को दिखाते हैं  ताकि लाभार्थियों की भागीदारी के बिना कॉर्पोरेटों को लाभ मिल सके।
अब, यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार आम आदमी, खेती और अन्य संबद्ध सेवाओं और नौकरियों के लिए, जो भारत के कुल रोजगार का लगभग 70% है, "सूट-बूट सरकार" बन गई है।
आर्थिक विकास केवल व्यापक आबादी को लाभान्वित कर सकता है यदि यह लोकतांत्रिक हो। विकास, पारदर्शिता,  विश्वास, निवेश और सभी के लिए विकास की श्रृंखला, जो समृद्धि की ओर ले जाती है, वर्तमान सरकार द्वारा तोड़ दी गई है। भारत नीचे जा रहा है (या नीचे चला गया है), जो अमीरों को प्रभावित नहीं कर रहा है, यह कम से कम मध्यम वर्ग को प्रभावित करेगा लेकिन यह गरीबों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा। हम केवल आशा कर सकते हैं कि वर्तमान सरकार स्थिति और किसानों को समझती है। भाजपा आंदोलन के पीछे हताशा और पीड़ा को महसूस करे। सरकार को बड़ी संख्या में लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए कदम उठाने चाहिए और किसान संघों को यह समझना चाहिए कि कृषि क्षेत्र को नवाचार और बेहतर भविष्य के लिए बेहतर बनाने की जरूरत है।
इस लेख के लेखक यादविंदर सिंह हूंझण शहीद गुरमेल सिंह हूंझण पंधेरखेड़ी के बेटे हैं और आजकल अमेरिका में सेटल हैं। इस लेख को उन्होंने अंग्रेजी में लिखा था जिसे अनुवाद करने का कार्य किया नवां ज़माना और कामरेड स्क्रीन से जुड़े वाम पत्रकार एम एस भाटिया ने।  आपको यह लेख और इसका अनुवाद कैसा लगा अवश्य बताएं। --सम्पादक 

Tuesday, December 10, 2019

8 जनवरी के बंद में रेल भी रोकी जाएगी और सड़क भी

लुधियाना में हुई कई किसान संगठनों की विशेष बैठक 
लुधियाना: 10 दिसंबर 2019: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::
आठ जनवरी 2020 के प्रस्तावित भारत बंद को ले कर करीब सभी परम्परिक वाम दलों के तकरीबन सभी संगठन सक्रिय हैं। गांवों में इस मकसद की सरगर्मियां बहुत तेज़ी से हो रही हैं। जहां एक तरफ पूंजीवादी शक्तियां गांवों को शहर जैसा बना कर उनका शहरीकरन करने में लगी हैं वहीँ वाम संगठन गांवों के मूल स्वरूप को बनाये रखने पर ध्यान दे रहे हैं। विकास के नाम गांवों में पहुंची आत्म हत्याओं की आंधी का गंभीर नोटिस लिया है वाम दलों ने। वाम दलों की शक्ति इस बार 8 जनवरी के प्रस्तावित भारत बंद में बहुत उभर कर सामने आने की सम्भावना है। पूंजीवादी नीतिओं के चलते जहां शहरों में जीना मुश्किल हो गया है वहीँ गांवों में रहने वाले लोग भी बहुत दुःख में हैं। जब किसान से 10 या 15 रूपये किलो में खरीदा गया प्याज 100 रूपये किलो से भी महंगा बिकता है तो किसान के जीवन का अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं होना चाहिए। इंक़लाब के लिए जो हालात चाहिए थे वे तेज़ी से बनते जा रहे हैं। हर तरफ बेचैनी है। पुलिस के डंडे से इस रोष को कब तक दबाया जायेगा? इस रोष को दुनिया के सामने लाएगा आठ जनवरी का भारत बंद। 
    इस भारत बंद को सफल बनाने लिए एक विशेष बैठक लुधियाना में करनैल सिंह ईसडू भवन में हुई। यह भवन वास्तव में सीपीआई का ज़िला मुख्यालय ही है। यहां बने करीब तीन चार हाल कमरों में वाम दलों से सबंधित ट्रेड यूनियनों और अन्य संगठनों की बैठकें अक्सर होती रहती हैं। 
    आज की बैठक में एलान किया गया कि लुधियाना ज़िले के रायकोट और जगराओं में जहाँ सड़क-पर चलने वाले ट्रैफिक को जाम रखा जायेगा वहीँ रेल मार्ग भी बंद किया जायेगा। इस ट्रैफिक को दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक बंद रखा जायेगा। सड़क और रेल रोको से सबंधित इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विशेष अभियान भी शुरू जा रहा है। इसके अंतर्गत 19 दिसंबर को गांव झोरड़ा से एक जत्था मार्च भी शुरू किया जायेगा। यह जथ्था तीन दिनों के अंदर इस सरे इलाके को कवर करके लोगों को इस बंद का मकसद बतलायेगा। 
इस के बाद गाँव भूंदड़ी में विशेष बैठक भी होगी। इस  के बाद 24  दिसंबर को गांव ग़ालिब कलां से एक जत्था मार्च शुरू होगा। यह जत्था भी इलाके के सभी गाँवों तक इस बंद का संदेश पहुंचाएगा।
इसके बाद खन्ना, दोराहा, समराला, किला रायपुर, पायल तहसीलों के सभी गांव भी कवर किये जायेंगे। इस इलाकों में शहरी क्षेत्र मज़दूर मुलाज़िम संगठन भी सक्रिय सहयोग देंगें। देहात के किसान संगठन भी इस अभियान में सक्रिय रहेंगे।
  आज की इस लुधियाना बैठक में जहाँ स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक फसलों के भाव, सरकारी खरीद की गारंटी, गांव की पंचायती ज़मीनें बेचने का विरोध, साथ वर्ष  आयु वालों को 10 हज़ार रूपये पेंशन देने की मांगें भी दोहराई गयीं। आवारा पशुओं आउट आवारा कुत्तों की समस्या का हल निकलने ी भी मांग की गयी। इस तरह कुल 19 मांगों का चार्टर आज की बैठक में चर्चा का विषय रहा। 
      लुधियाना में हुई आज की इस बैठक में कामरेड सुरिंदर सिंह जलालदीवाल, तरलोचन सिंह झोरड़ा, सुखदेव सिंह ग़ालिब कलां, रघबीर सिंह बैनीपाल, महिंद्र सिंह अचरवाल, गुरमेल सिंह रूंगी, बलदेव सिंह लताला,  जगरूप सिंह झोरड़ा, गुरचरण सिंह बाबेका, जलौर सिंह, राजिंदर सिंह असूवाल, अमरीक सिंह सहौली, मखन सिंह झोरड़ा इत्यादि ने अपने  रखे। पंजाब किसान सभा की तरफ से कामरेड बूटा सिंह ने इन मांगों पर अपनी सहमति देते हुए इस बंदा का समर्थन किया। 
 जो किसान संगठन इस बंद को बनाने के लिए दिनरात एक कर रहे हैं उनमें से कीर्ति किसान यूनियन, भारतीय किसान यूनियन एकता (डकौंदा), आल इण्डिया किसान सभा (साम्भर), आल इण्डिया किसान सभा (दूसरी) और जम्हूरी किसान सभा शामिल रहीं। 
इस संबंध में और विवरण के लिए कामरेड तरलोचन सिंह झोरड़ा के साथ उन के मोबाईल नंबर: 9592676833 पर सम्पर्क किया जा सकता है।