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Tuesday, October 14, 2025

हम किसी भी हालत में पंजाब की ज़मीनें नहीं बिकने देंगे: भाकपा

Received on Monday 14th October 2025 at 04:51 PM From CPI Media Updated 15th October 08:48 AM 

सोमवार, 14 अक्टूबर 2025 को शाम 04:51 बजे भाकपा मीडिया से प्राप्त

वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतें भी इसका विरोध करें 

ਸੰਕੇਤਕ ਤਸਵੀਰ AI Image by Meta AI 
चंडीगढ़: 14 अक्टूबर 2025: (मीडिया लिंक रविंदर//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

सरकारी ज़मीनों और अन्य संपत्तियों को बेचने जैसी बातें अब आम होती जा रही है। पहले केवल वामपंथी दल ही इसका विरोध करने के लिए आगे आते थे और अब भाकपा ज़मीनों की बिक्री के खिलाफ सबसे पहले आवाज़ उठाने वाली पार्टी बन गई है। ऐसा लगता है कि अन्य दलों को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि सरकारी ज़मीनें बचाई जाएँ या नहीं। भाकपा पंजाब ने कहा है कि यह बेहद आश्चर्यजनक है कि ऐसा फ़ैसला लिया गया है। ऐसा लगता है कि पंजाब सरकार पूरी तरह से भ्रमित है।

पंजाब भाकपा के राज्य सचिव और जुझारू नेता कामरेड बंत बराड़ ने याद दिलाया कि पहले सरकार ने शहरी विकास के नाम पर शहरों के आसपास के किसानों से ज़मीनें जबरन छीनने की योजना बनाई थी, जिसे सभी पंजाबियों ने बुरी तरह विफल कर दिया था। इस नाकामी से कोई सबक लिए बिना, अब पंजाब सरकार ने सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों, बोर्डों और निगमों के पास पड़ी ज़मीनों को फिर से बेचने की योजना बना ली है।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना, जिसने पंजाब में कृषि के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है, उसकी 2000 एकड़ ज़मीन और पंजाब बिजली निगमों के पास पड़ी हज़ारों एकड़ ज़मीन को बेचने का पूरा कार्यक्रम बन गया है।

उपरोक्त फ़ैसले पर टिप्पणी करते हुए, पंजाब भाकपा सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ ने अपनी पार्टी का पक्ष रखते हुए कहा कि भाकपा पंजाब के किसानों और कर्मचारियों की संयुक्त यूनियनों के संघर्ष का पूरा समर्थन करती है और पंजाब की वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों से इसका कड़ा विरोध करने की अपील भी करती है।

कामरेड बराड़ ने कहा कि सरकार भ्रष्टाचार, नशाखोरी और गैंगस्टरों पर लगाम लगाने में बुरी तरह नाकाम रही है और अब ज़मीनें बेचकर पंजाब को बर्बाद करने पर तुली है, जिसे पंजाब के मेहनतकश लोग कभी नहीं होने देंगे।

Friday, February 16, 2024

भारत बंद ने दिखाया देश और दुनिया को अपनी जनशक्ति का जोश और जलवा

Friday 16th February 2024 at 4:43 PM

मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे

आंदोलनकारी किसानों/मजदूरों पर जारी अत्याचार की भी कड़ी निंदा

*चुनावी बांड को ख़त्म करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी चर्चा में रहा

*सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी सरकार के कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार को उजागर किया 


लुधियाना
: 16 फरवरी 2024: (मीडिया लिंक//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

आम जनता और मीडिया में लगातार छाए हुए किसान आंदोलन की चर्चा को आज कुछ विराम दिया भारत बंद की खबरों ने। सुबह से लेकर शाम तक तकरीबन सभी शहरों और गांवों में भारत बंद का असर देखने को मिला। लुधियाना,मोहाली, मानसा, फरीदकोट, खरड़, जालंधर--बहुत से स्थानों पर इस भारत बंद का असर देखा गया। 

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा की देशव्यापी हड़ताल और भारत बंद के आह्वान पर मजदूर किसान एकता के गगनभेदी नारों के बीच सेक्टोरल फेडरेशन/एसोसिएशनों ने बस स्टैंड लुधियाना में भी एक विशाल रैली की।  

इस भारत बंद का यह आह्वान मोदी सरकार की मजदूर विरोधी, कर्मचारी विरोधी, किसान विरोधी और अधिकार मांग रहे लोगों पर दमनकारी नीतियों के खिलाफ किया गया है.  रैली की अध्यक्षता एम एस भाटिया, जोगिंदर राम और जगदीश चंद की कमेटी ने की।  रैली के बाद श्रमिकों, कर्मचारियों, किसानों और समाज के अन्य वर्गों के लोगों ने मिनी सचिवालय की ओर मार्च भी किया, जहां रैली भी आयोजित की गई थी। 

दोनों जगहों पर आयोजित रैलियों को एटक,सीटू तथा सीटीयू पंजाब समेत विभिन्न संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया.  वक्ताओं ने मोदी सरकार द्वारा शंभू सीमा पर किसानों पर अत्याचार और शांतिपूर्वक विरोध कर रहे किसानों पर ड्रोन के इस्तेमाल से आंसू गैस के गोले और प्लास्टिक की गोलियां चलाने की भी निंदा की। 

उन्होंने कहा कि यह हमारे देश के संविधान के तहत सभी नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति और विरोध की स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां तीन कृषि बिल वापस ले लिए, वहीं सरकार किसानों की मांगों पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से पूरी तरह पीछे हट गई है।  

रैली में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि लगातार मजदूरों के खिलाफ कानून बनाये जा रहे हैं और सरकार कॉरपोरेट की सेवा करने पर तुली है.  जबकि गरीब लोगों को उनकी आजीविका और नौकरियों के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और अनियंत्रित मुद्रास्फीति से पीड़ित हैं, उनके अवैतनिक ऋणों को कर कटौती के रूप में एनपीए घोषित करके कॉर्पोरेट क्षेत्र को बड़ी रियायतें दी गई हैं और ऋण माफ किए जा रहे हैं। जिसकी भरपाई आम जनता पर अतिरिक्त कर लगाकर की जा रही है।

मज़दूर, कर्मचारी, किसान, छात्र, युवा, महिलाएं, छोटे-मझोले व्यवसायी, छोटे दुकानदार समेत अन्य लोगों ने इसके खिलाफ बिगुल बजा दिया है। आज का आह्वान, जिसमें किसानों ने गांव-गांव में बंद रखा और देशभर में मजदूर हड़ताल पर चले गये, लोगों में बढ़ते गुस्से का प्रतीक है। 

हर मोर्चे पर विफल होने के बाद सरकार वोट हासिल करने के लिए समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने और सांप्रदायिक दंगे कराने का खतरनाक खेल अपना रही है। वे सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को नष्ट कर रहे हैं और उन्हें अपनी कठपुतली बना रहे हैं।  देश का संघीय ढांचा गंभीर खतरे में है.  वक्ताओं ने चुनावी बांड योजना को असंवैधानिक घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया है और कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि यह सदी की सबसे भ्रष्ट सरकार है।

प्रदर्शनकारियों ने अन्य मांगों के अलावा निम्नलिखित प्रमुख मांगों पर जोर दिया:

 • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण रोका जाए।

 • चार श्रम संहिताएं रद्द करें और 44 कानून लागू करें

 • किसानों की उपज के लिए एमएसपी के फार्मूले @ C2+50% के अनुसार कानूनी गारंटी एवं खरीद गारंटी प्रदान की जाए।

 •श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 26000/- प्रति माह किया जाए।

 • आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं, मध्याह्न भोजन कार्यकर्ताओं और अन्य को नियमित किया जाना चाहिए और न्यूनतम मजदूरी के तहत लाया जाना चाहिए और श्रमिकों के रूप में सभी लाभ दिए जाने चाहिए।

• सेना में अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की अस्थाई भर्ती को वापस लिया जाए और पहले की तरह स्थाई भर्ती की जाए।

 • अमीर समर्थक और जनविरोधी नई शिक्षा नीति 2020 को खारिज किया जाना चाहिए।

 • नई पेंशन योजना को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए।

 • सेवानिवृत कर्मियों की मानी गई मांगों को लागू किया जाए।

• सभी निर्माण श्रमिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा के लिए ईएसआई योजना के तहत लाया जाना चाहिए।

 • हिट एंड रन कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए और संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद ही बनाया जाना चाहिए।

 • विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2022 को वापस लिया जाए।  प्री-पेड स्मार्ट मीटर न लगाए जाएं।

 • मनरेगा के तहत प्रति वर्ष 200 दिन के काम और 700/- प्रति दिन की गारंटी।

 • 8 घंटे की जगह 12 घंटे की अधिसूचना तुरंत रद्द की जाए।

 • न्यूनतम वेतन को संशोधित किया जाना चाहिए।

 • ईएसआई को पटियाला या पीजीआई चंडीगढ़ के बजाय लुधियाना के अस्पतालों को ही रेफर करना चाहिए।

 • खाद्य सुरक्षा की गारंटी करें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करें।

 • सिंघु बॉर्डर पर सभी शहीद किसानों की यादगार बनाई जाए, मुआवजा दिया जाए और उनके परिवारों का पुनर्वास किया जाए, सभी लंबित मामले वापस लिए जाएं।

 • केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त कर मुकदमा चलाया जाए।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 2024 में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को दोबारा सत्ता में आने से रोकना बहुत जरूरी हो गया है, अन्यथा इस देश में न केवल किसानों और मजदूरों के अधिकारों का हनन करने की नीति जारी रहेगी, बल्कि सरकारी संपत्तियों को  कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों सस्ते दाम पर बेचा जाएगा।  

धर्म के नाम पर समाज में फूट डालने से हमारे देश की एकता, अखंडता और संविधान को खतरा होगा।  

रैली को संबोधित करने वालों में एटक पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़, सीटीयू पंजाब के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंगत राम पासला, डी पी मौड, सुखविंदर सिंह लोटे, जगदीश चंद, विजय कुमार, चमकौर सिंह बरमी, डॉ. राजिंदर पाल सिंह औलख, डॉ. अरुण मित्रा, बलराम सिंह, राम लाल, चरण सराभा, सुभाष रानी, जोगिंदर राम, तहसीलदार यादव, हरबंस सिंह पंधेर, शमशेर सिंह, तहसीलदार, प्रोफेसर जगमोहन सिंह जम्हूरी अधिकार सभा, बलदेव कृष्ण मोदगिल इंटक, महिंदर पाल सिंह मोहाली, हरजिंदर सिंह मोल्डर्स एंड स्टील वर्कर्स यूनियन शामिल थे।

Friday, July 28, 2023

सीपीआई नेता कार्यकर्ताओं के साथ सड़कों पर मणिपुर हिंसा के खिलाफ उतरे

शनिवार 28 जुलाई 2023 15:26 व्हाट्सएप से मिली 

हिंसा तुरंत रुके//मणिपुर सरकार तुरंत बर्खास्त हो-बंत सिंह बराड़  


मोहाली
: 28 जुलाई 2023: (कार्तिका सिंह//कॉमरेड स्क्रीन)::
 

मणिपुर में हुई हिंसक घटनाओं से जहां पूरा देश चिंतित है वहीं पूरी दुनिया की निगाहें इस मामले पर टिकी हुई हैं। भारत की जिस महानता और नारी सम्मान पर हम सभी को गर्व था उस सब को इन वारदातों की खबरों ने मिटटी में मिला दिया है। नवंबर-84 तीन दिनों तक चला था लेकिन मणिपुर का सिलसिला मई महीने से जारी है। इन हिंसक घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार तत्वों के ख़िलाफ़ लेखकों, कलाकारों और ट्रेड यूनियनों के साथ-साथ राजनीतिक नेता भी मैदान में हैं। इस विरोध प्रदर्शन के लिए सीपीआई के सीनियर और जुझारू नेता बंत सिंह बराड़ अपने साथियों के साथ सड़कों पर उतर आए हैं। इस विरोध अभियान को जारी रखते हुए आज मोहाली के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय के सामने भी जोरदार विरोध और गुस्सा जताया गया। साथी राजकुमार और अन्य नेता भी अपने साथियों के साथ पहुंचे हुए थे। खराब मौसम के बावजूद सीपीआई के साथियों ने इस ज़ुल्म के खिलाफ आवाज उठाई। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) जिला परिषद, चंडीगढ़ और मोहाली द्वारा मणिपुर में महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मोहाली में डिप्टी कमिश्नर कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसमें कई ट्रेड यूनियन सदस्य, महिला संगठन, लेखक, बुद्धिजीवी, छात्र और बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं। 

इस प्रोटेस्ट के दौरान साथी देवी दयाल शर्मा, राज कुमार, विनोद चुघ, बृज मोहन, गुरनाम सिंह, जतिंदरपाल सिंह, करम सिंह वकील, महिंदरपाल सिंह, शिक्षक नेता रणजीत कौर, सुरजीत कौर कालरा, अमन भोगल, मंजीत कौर मीत, सुखपाल हुंदल, प्रीतम सिंह हुंदल, बलकार सिद्धू, दिलदार, प्रिंस शर्मा, कमलजीत सिंह, बलजीत सिंह, गुरदयाल सिंह, गुरुमीत सिंह और भूपिंदर सिंह ने भी संबोधित किया। 

इन वक्ताओं ने मणिपुर में अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की। सीपीआई के राज्य सचिव साथी बंत बराड़ ने कहा कि मणिपुर सरकार दंगों और असुरक्षा को नियंत्रित करने में बुरी तरह विफल रही है और इस सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। अत: इसे भंग कर के तत्काल राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। शांति बहाल करने और सांप्रदायिक सद्भाव को तुरंतआम की तरह शांत करके अल्पसंख्यकों और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस जनविरोधी सरकार को हटाने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए। 

इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर आरोप लगाते हुए भाकपा नेताओं ने कहा कि डबल इंजन वाली यह सरकार जानबूझकर सांप्रदायिक दंगा फैला रही है। पहले गुजरात को नुकसान हुआ और अब मणिपुर जल रहा है। कल पता नहीं किस राज्य का शांति कानून इस सांप्रदायिक आग में जलेगा? 

उन्होंने देश के लोगों से जागरूक होने और जनता की दो ताकतों को पहचानने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि पंजाब की भगवंत मान सरकार को भी तुरंत बाढ़ प्रभावित पंजाबियों का साथ देना चाहिए और बाढ़ प्रभावित पंजाबियों को उचित और उचित मुआवजा देना चाहिए। अंत में आये हुए साथियों का धन्यवाद किया गया तथा मंच संचालन करम सिंह वकील ने अपनी साहित्यिक शैली में किया।

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Monday, December 12, 2022

पंजाब में उद्योगपतियों के खिलाफ लंबित 500 से अधिक आपराधिक मामले

 सोमवार 12 दिसंबर 2022 अपराह्न 03:04 बजे 

श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन का मुद्दा फिर गरमाया 

चंडीगढ़: 12 दिसंबर 2022: (कार्तिका सिंह//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

राजनीतिक दल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और दुसरे सरमाएदारों से अक्सर चंदा लेते रहते हैं। कभी छुप कर कभी किसी तरह बता कर भी। इस तरह के चंदे से चलने वाले दलों और इस तरह के चंदे से बनी सरकारों और दलों से  आम गरीबों और श्रमिकों के कल्याण की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस तरह के अमीरों और सेठों को भी रवीश कुमार ने एनडीटीवी छोड़ने के बाद आड़े हाथों लेते हुए गोदी सेठ का नाम दिया है जो सरकार की गोदी में बैठ कर अपने कारोबार चलाते हैं। ऐसे गोदी सेठ पंजाब में भी देखे जा सकते हैं। 

राजनीतिक दलों का यह दोहरा चरित्र लंबे समय से चला आ रहा है। ऐसी पार्टियां और ऐसी सरकारें किसी न किसी बहाने से केवल पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का ही पक्ष लेती हैं। मज़दूरों का खून निचोड़ कर अमीर बनने वाले इन पूंजीपतियों के खिलाफ मज़दूरों का गुस्सा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। इस गुस्से को नियंत्रित रखने में भी ट्रेड यूनियन लहर काफी कुछ सकारत्मक करती है। मज़दूरों के प्रति ईमानदार ट्रेड यूनियनों ने कई बार इस अन्याय के प्रति गंभीरता भी दिखाई है और साहसिक कदम उठाए हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर जन कार्रवाई के बिना यह सब न कभी बेनकाब होगा और न ही कभी पूरी तरह बंद होगा।

सबसे पुराने ट्रेड यूनियन संगठन "एटक" यानी "ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काउंसिल" की पंजाब स्टेट कमेटी ने इस तरह का चलन जारी रहने का गंभीर नोटिस लिया है और इस पर गहरी चिंता भी व्यक्त की है। एटक की राज्य कमेटी ने मांग की है कि इस चलन पर तुरंत रोक लगाई जाए और उद्योगपतियों के खिलाफ लंबित मामलों का तुरंत फैसला किया जाए। इसके साथ ही एटक ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि ऐसे लोगों को कानून का उल्लंघन करने पर सख्त सजा दी जानी चाहिए और वह भी बिना किसी देरी के।

एटक ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि श्रम कानूनों के घोर उल्लंघन के कारण पंजाब के उद्योगपतियों के खिलाफ विभिन्न अदालतों में 500 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। फैक्ट्रीज एक्ट 1948, ईएसआईसी (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) और कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) जैसे विभिन्न कानूनों की धज्जियां उड़ाकर श्रमिकों की लूट के कारण फंसे उद्योगपतियों ने पंजाब सरकार से अब माफी का अनुरोध किया है। 

भारतीय उद्योग मंडल पंजाब राज्य परिषद के अध्यक्ष अमित थापर ने पंजाब के मुख्यमंत्री से इन सभी आपराधिक मामलों से उद्योगपतियों को बरी करने के लिए पहल करने की अपील की है। उद्योगपतियों के इस कदम का पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़ और महासचिव निर्मल सिंह धालीवाल ने तीखा विरोध किया है। 

कामरेड निर्मल सिंह धालीवाल ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए इस साज़िशी मांग को आड़े हाथों लिया है और मांग की है कि सरकार अपने श्रम विभाग का प्रयोग कर के कानूनों की धज्जियां उड़ाने वाले इन लोगों के खिलाफ प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करे। एटक ने स्पष्ट कहा कि इन लोगों की बेइंसाफी भरी हरकतों का शिकार बने भोले-भाले मजदूरों को न्याय दिया जाए। 

दोनों ट्रेड यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया है कि पिछली सरकारों की मज़दूर  विरोधी नीतियों के चलते इन लोगों ने श्रम विभाग के साथ मिलकर पूरी तरह से मज़दूरों को लूटा है और पिछले 10 सालों से न्यूनतम वेतन में भी कोई बढ़ोतरी नहीं की है। एटक के दोनों नेताओं ने कहा है कि अब उद्योगपति केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिता का सहारा लेकर आरोपों से माफी की मांग कर रहे हैं। 

उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की है कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कदम उठाना है तो सबसे पहले मज़दूरों का शोषण करने वालों के खिलाफ सख्त निर्णय लेकर कर्मचारियों व कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान किया जाए। सरकार को उन्हें रियायतें देने के किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए। 

अब देखना होगा कि एटक की इस जोरदार मांग का पंजाब सरकार पर क्या असर पड़ता है?पंजाब  सरकार पीड़ित मजदूरों को न्याय देती है या उद्योगपतियों को माफी, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा। अमीरों का धन और गरीबों का वोट दोनों ही राजनीतिक दलों के लिए सदा से ही आवश्यक रहे हैं। क़ज़ा आज के आधुनिक युग में यही सब चलेगा?

तमाम दबावों के बावजूद मज़दूर श्रमिक और अन्य कार्यकर्ता आज भी साहिर लुधियाना साहिब के इस गीत के प्रति समर्पित हैं।

हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे!

इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!

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Saturday, June 20, 2020

CPI ने बजाया तीखे जनआंदोलनों का बिगुल

20th June 2020 at 5:52 PM
 भाकपा की राज्य कार्यकारिणी के बैठक में लिए गए कई अहम फैसले 
चंडीगढ़//लुधियाना: 20 जून 2020: (एम एस भाटिया//कार्तिका सिंह//कामरेड स्क्रीन)::
कोरोना और लॉक डाउन के चलते छाई सहम भरी ख़ामोशी को सफलता पूर्वक तोड़ने के बाद अन तीखे जन आंदोलनों का बिगुल भी बजा दिया है। पैट्रोल डीज़ल की कीमतों में गत 13 दिनों से हो रही वृद्धि, यूपी सरकार की तरफ से पंजाबी किसानों को उजाड़ने का दमनचक्र, भाजपा सरकार की फाशीवादी नीतियों के अंतर्गत बढ़ रहे हमले, लोकतान्त्रिक और मानवी अधिकारों की बात करने वाले कार्यकर्ताओं की ग्रिफ्तारियां इत्यादि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर बोलना आम लोग भूल चुके हैं। स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या शिक्षा का हालत बेहद बुरी है। देश की प्रभुसत्ता और अखंडता की रक्षा का मुद्दा, शहीद हुए बहादुर सैनिकों का मुद्दा, किसान विरोधी तीन आर्डिनेंस वापिस करवाने का संघर्ष, मनरेगा क्षेत्र की समस्याएं और मांगे और ऐसे बहुत से मुद्दे जिन  आवाज़ बुलंद करने की बात एक साजिश के अंतर्गत सपना बन चुकी है उन सभी मुद्दों को उठाएगी अब सीपीआइ। पूरा सप्ताह चलेगा रोष एक्श्नों का यह सिलसिला जो दमन का सहारा लिए चल रही सत्ता को हिला कर रख देगा। 
सीपीआई की पंजाब इकाई के सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ भी इस बैठक में शामिल होने के लिए विशेष तौर लुधियाना स्थि पार्टी कार्यालय में पहुंचे। अध्यक्षता की पूर्व विधायक कामरेड हरदेव अर्शी ने। गौरतलब है की कोरोना संकट और लॉक डाउन के चलते यह बैठक साढ़े तीन महीनों के बाद हो सकी। शहीद करनैल सिंह ईसड़ू भवन में इस बैठक को बाकायदा सैनेटाईज़र का इस्तेमाल करने के बाद आयजित किया गया। सोशल डिस्टेंस  
के नियम की पालना भी की गई।  इस बैठक के फैसले कामरेड बंत सिंह बराड़ ने मीडिया को जारी किये। कामरेड डीपी मौड़ ने बैठक शुरू होने से पहले ही अपनी देखरेख में हाल को पूरी तरह सैनेटाईज़ किया।  
पार्टी के प्रांतीय सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ ने इस बैठक में राष्ट्रिय मुद्दों के साथ साथ पंजाब की गंभीर साथी पर भी चिंता व्यक्त की। कोविड-19 को लेकर स्थिति और भी भयानक हुई। उन्होंने कहा कि इस बेहद नाज़ुक स्थिति के बावजूद प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए सीपीआई के सभी यूनिटों ने जो सक्रियता दिखाई उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। ह वह स्थिति थी जब ज़िंदगी जीना कठिन हो गया था। इस तरह की भयानक स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों ने जो मुजरमाना लापरवाही दिखाई उसे हमेशां काळा अक्षरों में लिखा जाएगा। इस पर तुरंत और तीव्र प्रतिक्रिया करते हुए 9 वाम दलों ने ज़ोरदार रोष प्रदर्शन किये। ट्रेड यूनियन और श्रमिक अधिकारों पर किये गए हमलों का मुँहतोड़ उत्तर दिया जिसने सारे संसार को दिखा दिया की कोरोना और लॉक डाउन की आड़ में यह सरकार श्रमिकों के साथ क्या क्या करने की हद तक जा सकती है। इसके साथ ही उन लोकतान्त्रिक कार्यकर्ताओं की रिहाई की भी आवाज़ उठाई गई जिन को मानवी अधिकारों की बात करने पर जेलों में ठूंस दिया गया। सड़कों पर पैदल चलते मज़दूरों के साथ साथ अपने गांव जाने को तरस रहे मज़दूरों के दर्द पर भी सीपीआई खुल कर सामने आई। 
 इसी बैठक में लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी को लेकर हुए घटनाक्रम पर भी चर्चा हुई। देश की प्रभुसत्ता और अखंडता की रक्षा के शहीद हुए 20 सैनिकों को भी श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए।  गौरतलब है की इन २० सैनिकों में से चार सैनिक पंजाब के मानसा, संगरूर, पटियाला और गुरदासपुर के हैं। 
सीपीआई ने इस बात को गंभीरता से लिया है कि इन सैनिकों को बिना हथियारों के सीमा पर चीन किसने से लड़ने के लिए भेजा गया। फिर इस बात कई दिनों तक दबाया गया छुपाया गया। सीपीआई ने इस सारे निंदनीय घटनाक्रम की तीखे शब्दों में आलोचना की है। सीपीआई ने कहा कि पूरी हालत जनता  रखी जाये। साथ ही भारत और चीन दोनों सरकारों से मांग की गई कि सीमा के झगड़ों का समाधान बातचीत के ज़रिये निकाला जाये। 
इन सभी मुद्दों पर चर्चा करते हुए सीपीआई की एग्ज़ेक्युटिव कमेटी मीटिंग ने मीडिया को भी अड़े हाथों लिया। पार्टी ने कहा देश में गोदी मीडिया जिस तरह तीसरी विश्व जंग को भड़काने के मकसद की खबरें और रिपोर्टें दिखा रहा है वह एक गहरी साज़िश है। हम इस मानवता विरोधी साज़िश पर भी नज़र रख रहे हैं।  
कार्यकारिणी की बैठक में मौजूद वाम नेतायों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बुलाई गई सर्व दलीय बैठक में शामिल होने को लेकर जो मतभेद दिखाया है वह निंदनीय है। यह बेहद दुखद है कि चार सांसदों दिल्ली की सरकार के मुख्य मंत्री पर काम करती आम आदमी पार्टी को आमंत्रित ही नहीं किया गया। इसी तरह चार सांसदों वाली आर जे डी को भी नहीं बुलाया गया। तीन सांसदों और केरल सरकार में भागीदार सीपीआई को भी नहीं बुलाया गया। लेकिन दूसरी रफ चार सांसदों वाली पार्टी अकाली दाल को बुलाया गया। (सुखदेव ढींडसा पार्टी से बाहर हैं) सीपीआई ने कहा कि हमें इस बात का एतराज़ नहीं अकाली दाल को क्यों बुलाया गया। हमें ेराज़ यह है कि देश की दहलीज़ पर खड़ी दस्तक दे रही जंग, 20 सैनिओं के शहीद होने और 10 के कैदी बने होने के नाज़ुक सवालों पर भी महत्वपूर्ण दलों को विचार विमर्श से बाहर रखा गया।साफ़ ज़ाहिर है कि इतनी बड़ी बहुसंख्या होने के बावजूद केंद्र सरकार सैद्धांतिक स्टैंड लेने वाली पार्टियों के विरोधी सुर से डरती है और इस तरह के वक़्त में भी निमंत्रण देने में मतभेद का काम लेती है। यह पक्षपात पूरी दुनिया ने देखा और इसे भारत की जनता याद भी रखेगी। 
बिना कोई योजना बनाये लॉक डाउन और कर्फ्यू जैसे आदेशों को भी सीपीआई ने निशाने पर रखा। करोड़ों मज़दूरों को बेरोज़गार करने, उन्हें घर से बेघर करने, उन्हें सड़कों पर हज़ारों मील पैदल चलने को मजबूर करने, उन्हें भूखों मारने और्व राहत के नाम पर सारा धन मज़दूरों का नाम ले कर अपने लोगों के हवाले करने के सारे घटनाक्रम की उच्च सत्रीय जांच की भी मांग की। 
 इसके आलावा यूपी में उजाड़े जा रहे पंजाबी किसानों का मुद्दा भी मीटिंग में गहनता से  विचारा गया। ये वही पंजाबी किसान हैं जिन्होंने बंजर ज़मीनों को दशकों तक मेहनत करके उपजाऊ बनाया। बेहद दुखद है कि इस अतिमहत्वपूर्ण मुद्दे पर भी अकालीदल अपनी कुर्सियों से चिपका हुआ है और इस मामले पर लोलो पोपो करके बेहद निंदनीय भूमिका निभा रहा है। 
किसान विरोधी आर्डिनेंसों की भी इस भाकपा बैठक में तीखी आलोचना हुई। सीपीआई ने कहा कि एम एस पी से पीछे हटने के कुप्रासों का हम विरोध करते हैं और करते रहेंगे। बैठक ने कहा कि यह आर्डिनेंस किसानों को कार्पोरेटी मगरमच्छ के मुँह में डाल देंगें। ऐसे में एम एस पी  का मिलना नामुमकिन हो जायेगा। इस बैठक में किसान संगठनों के संघर्ष का समर्थन भी किआ गया। 
इसी कार्यकारिणी बैठक में 8 जुलाई को पंजाब के 9 वाम दलों के संघर्ष का भी ज़ोरदार समर्थन किया। सीपीआई ने अपने सभी यूनिटों से कहा कि मौके की नज़ाकत को देखते हुए कोविड-19 की शर्तों का भी पालन करें। सभी पहलुओं को देखते हुए अन्य पार्टियों के सम्पर्क और सहयोग में रहते हुए अपने अपने एक्शन करें। 
इसी बैठक में 3 जुलाई को अखिल भारतीय स्तर की ट्रेड यूनियनों की तरफ से श्रमिक अधिकारों की रक्षा के लिए, ठेका प्रबंधों को समाप्त करने के लिए, न्यूनतम वेतन में वृद्धि, मनरेगा वर्करों के अधिकारों की रक्षा, आशा वर्करों स्कीम वर्करों के वेतन बढ़ाने के लिए हर वर्कर के कहते में 7500/- रूपये डालने के लिए और अन्य मांगों के लिए किये जा रहे अखिल भारतीय स्तर के रोष एक्शन का भी समर्थन किया। इन रोष प्रदर्शनों में भाग लेने को भी कहा गया। 
इसी कार्यकारिणी बैठक में कहा गया कि माइक्रो फाईनांस कम्पनीआं जो गरीबों को क़र्ज़ देने के मामले में अब गड़बड़गहताला कर रही हैं। इस धक्केशाही को बंद कराया जाये। नीले कार्डों के मुद्दे पर लोगों के साथ हो रहे मतभेद को भी बंद करने की मांग की गई। बिजली के बढ़ाये गए रेट भी वापिस लेने की बात कही गई। डीज़ल-पैट्रोल के हर रोज़ बढ़ रहे भावों पर भी चिंता व्यक्त की गई और इसकी निंदा हुई। इनके खिलाफ जन अभियान की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिए गया। 
बैठक में उन सभी कामरेड साथियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए जो हाल ही के दिनों में हमसे हमेशां के लिए बिछड़ गए। इस मौके पर सर्वश्री कामरेड ईशर सिंह दलेर सिंह वाला, अमरनाथ, नौनिहाल सिंह, गुरबख्श मुल्लां, प्यारा सिंह राओ-के-कलां, मिहर सिंह बद्दोवाल और सुखराज कौर भी श्रद्धांजलि दी गई। 
कोरोना काल में लॉक डाउन के कारण लम्बे अंतराल के बाद हुई इस बैठक में 24 प्रमुख कामरेड साथियों ने अपने विचार व्यक्त किये। इनमें कामरेड राज्य सचिव-कामरेड बंत सिंह बराड़ के साथ साथ पूर्व विधायक-हरदेव अर्शी, डाक्टर जोगिंदर दयाल, निर्मल धालीवाल, भूपिंदर सांबर, हरभजन सिंह, पृथीपाल माड़ीमेघा, अमरजीत आसल, सुखदेव शर्मा, कुलदीप भोला, लखबीर निजामपुरा, डीपी मौड़, रमेश रत्न, कृष्ण चौहान,  गदाईयां, कुलवंत मौलवीवाला, गुलज़ार सिंह, मैडम कुशल भौरा इत्यादि भी शामिल रहे। 
अब देखना है कि  सीपीआई का यह संघर्ष केंद्र और राज सरकारों को कितनी बड़ी चुनौती देने में सफल रहता है।