Thursday, May 12, 2022

हम मनाया करेंगे हसरत मोहानी साहिब के दिन-भाटिया

वह हमारे शायर कामरेड थे जिन्होंने इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा दिया 

कामरेड एम एस भाटिया से हुई बातचीत पर आधारित 

शायरी की दुनिया: 12 मई 2022: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

हसरत मोहानी साहिब की खूबियां किताबों में तलाश करो या फिर इंटरनेट पर या शायर लोगों से तो बहुत कुछ सामने आता है। तालीम को बेहद महत्वपूर्ण मानते थे और इस मामले में रेकार्ड कायम करते रहे। थोड़ी जानकर यहाँ बी शेयर कर लेते हैं। हसरत मोहानी का नाम सय्यद फ़ज़ल-उल-हसन तख़ल्लुस हसरत था। वह क़स्बा मोहान ज़िला उन्नाव में एक जनवरी 1875 को पैदा हुए। उनके वालिद का नाम सय्यद अज़हर हुसैन था। हसरत मोहानी ने आरंभिक तालीम घर पर ही हासिल की और 1903 में अलीगढ़ से बीए किया। शुरू ही से उन्हें शायरी का शौक़ था औरअपना कलाम तसनीम लखनवी को दिखाने लगे। कलाम के शुरूआती दौर  थी। उनकी शायरी इश्क की गहराईयों को बहुत ही सादगी से प्रस्तुत करती हैं। सादगी भरे शब्द और ऊंची उड़ान। चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है। वामपंथी कार्यकर्ता और सक्रिय नेता एम एस भाटिया बताते हैं इस [प्रसिद्ध ग़ज़ल में १९ शेयर हैं। फिल्म में जो प्रस्तुत हुआ वो चुने हुए शेयर ही इस्तेमाल किए गए लेकिन उनका फिल्मांकन ज़बरदस्त रहा। फिल्म वाली ग़ज़ल सुने वक्त सीन देखने का खास महत्व है। एक एक शब्द--एक एक शेयर साकार होता सा लगता है फिल्म के पर्दे पर।  

मोहानी साहिब ने 1903 में अलीगढ़ से एक रिसाला (पत्रिका) उर्दूए मुअल्ला जारी किया। जो अंग्रेजी सरकार की नीतियों के खिलाफ था। 1904 वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हों गये और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े। 1905 में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक द्वारा चलाए गए स्वदेशी तहरीकों में भी हिस्सा लिया। सन 1907 में उन्होंने अपनी पत्रिका में "मिस्त्र में ब्रितानियों की पालिसी" के नाम से लेख छापी। जो ब्रिटिश सरकार को बहुत खली और हसरत मोहानी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। सांस्कृतिक संगठन इप्टा से जुड़े हुए कामरेड भाटिया बताते हैं कि भविष्य में हम एक जनवरी और 13 मई का दिन हसरत मोहानी साहिब की याद में मनाया करेंगे क्यूंकि वह हमारे कामरेड थे। शायर कामरेड जिन्होंने अपनी कलम से कम्युनिस्ट फलसफे की अवे को भी बुलंद किया। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा उन्हीं ने ईजाद किया जो बाद में आज तक बेहद पॉपुलर है।  भाटिया जी ने एक विशेष सुझाव//प्रस्ताव पार्टी हाई कमान और इप्टा हाई कमान को भी भेजा है

कामरेड भूपिंदर सांबर के साथ एम एस भाटिया 

इसी तरह 1919 के खिलाफत आन्दोलन में उन्होंने चढ़ बढ़ कर हिस्सा लिया। 1921 में उन्होंने सर्वप्रथम "इन्कलाब ज़िदांबाद" का नारा अपने कलम से लिखा। इस नारे को बाद में भगतसिंह ने मशहूर किया। उन्होंने कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन (1921) में हिस्सा लिया।

श्री भाटिया बताते हैं कि हसरत मोहानी हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उन्होंने तो श्रीकृष्ण की भक्ति में भी शायरी की है। वह बाल गंगाधर तिलक व भीमराव अम्बेडकर के करीबी दोस्त थे। सन 1946 में जब भारतीय संविधान सभा का गठन हुआ तो उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य से संविधान सभा का सदस्य चुना गया।

सन 1947 के भारत विभाजन का उन्होंने विरोध किया और हिन्दुस्तान में रहना पसंद किया आखिर 13 मई 1951 को मौलाना साहब का अचानक निधन हो गया।

उन्होंने अपने कलामो में हुब्बे वतनी, मुआशरते इस्लाही,कौमी एकता, मज़हबी और सियासी नजरियात पर प्रकाश डाला है। 2014 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया है।

बहुत ही दिलचस्प बात है कि भगत सिंह के सबसे पसंदीदा नारे इंकलाब जिंदाबाद को जन्म देने वाले मौलाना हसरत मोहानी एक कम्युनिस्ट क्रांतिकारी थे जिन्होंने वर्ष 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की। ऐसे देशभक्त को उनकी पुण्यतिथि पर सलाम। 

इप्टा के सूची में हसरत मोहनी साहिब का सक्रिय रूप में आना अब निश्चय ही प्रगतिशील शायरी को मज़बूत करेगा। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा अब नए जोश के साथ बुलंद होगा। इस नारे को अब नए आसमान मिलेंगे। हसरता साहिब कीशायरी के शब्द बहुत से नए लोगों को भी जोड़ेंगे। 

उनकी एक रचना भी ज़रूर पढ़िए:

और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है 

इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है 

दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्किल 

हम ने ये उन के तग़ाफ़ुल को सुना रक्खा है 

तुम ने बाल अपने जो फूलों में बसा रक्खे हैं 

शौक़ को और भी दीवाना बना रक्खा है 

सख़्त बेदर्द है तासीर-ए-मोहब्बत कि उन्हें 

बिस्तर-ए-नाज़ पे सोते से जगा रक्खा है 

आह वो याद कि उस याद को हो कर मजबूर 

दिल-ए-मायूस ने मुद्दत से भुला रक्खा है 

क्या तअम्मुल है मिरे क़त्ल में ऐ बाज़ू-ए-यार 

एक ही वार में सर तन से जुदा रक्खा है 

हुस्न को जौर से बेगाना न समझो कि उसे 

ये सबक़ इश्क़ ने पहले ही पढ़ा रक्खा है 

तेरी निस्बत से सितमगर तिरे मायूसों ने 

दाग़-ए-हिर्मां को भी सीने से लगा रक्खा है 

कहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-मोहब्बत जिस को 

नाम उसी का दिल-ए-मुज़्तर ने दवा रक्खा है 

निगह-ए-यार से पैकान-ए-क़ज़ा का मुश्ताक़ 

दिल-ए-मजबूर निशाने पे खुला रक्खा है 

इस का अंजाम भी कुछ सोच लिया है 'हसरत' 

तू ने रब्त उन से जो इस दर्जा बढ़ा रक्खा है 


Friday, February 25, 2022

युद्ध किसी भी भू-राजनीतिक संघर्ष का समाधान नहीं है-CPI

भाकपा ने यूक्रेन के आसपास सैन्य संघर्ष पर चिंता व्यक्त की

नई दिल्ली: 24 फरवरी 2022: (एम एस भाटिया//कॉमरेड स्क्रीन)::

यूक्रेन पर रूस  सैन्य करवाई को लेकर सियासत गर्म है। भाकपा ने भी इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिवालय ने आज (24 फरवरी, 2022 को) निम्नलिखित बयान जारी किया:

इस बयान में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय सचिवालय यूक्रेन और उसके आसपास सैन्य संघर्षों पर अपनी गहरी चिंता और पीड़ा व्यक्त करता है।

जंग को लम्बे समय से नकारती आ रही भाकपा ने सपष्ट किया है कि जंग के मुद्दे पर भाकपा अपनी अडिग स्थिति को दोहराती है कि युद्ध दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी भू-राजनीतिक संघर्ष का समाधान नहीं है। इनका समाधान शांतिपूर्ण तरीकों और सार्थक बातचीत से ही हो सकता है। भाकपा का मत है कि नाटो को पूर्व और दुनिया के किसी भी हिस्से में विस्तारित करने के लिए अमेरिका का कदम विश्व शांति के लिए एक शाश्वत खतरा होगा।

भाकपा भारत सरकार से यूक्रेन में रहने वाले सभी भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करने का आग्रह करती है। इस क्षेत्र में भारतीय मिशनों के अधिकारियों को इस मुद्दे को अत्यंत तत्परता से उठाने के लिए कहा जाना चाहिए।   

Friday, January 7, 2022

मोदी की सुरक्षा-इतना हो हल्ला क्यों?--*पावेल कुस्सा

6th January 2022 at 23.56 PM

यह सारा मसला एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश है


मोदी के पंजाब से बेरंग वापस जाने पर
खड़ा किया जा रहा हो-हल्ला, भाजपा की तरफ से मुद्दों को प्रतिगामी रंगत देने का प्रचलित चलन है। प्रधानमंत्री की राजनीतिक नमोशी को देश की सुरक्षा का मसला बनाने की भरकस कोशिश की जा रही है, और ऐसा हमेशा की तरह पूरी बेशर्मी से किया जा रहा है। भाजपाई प्रवक्ता देश के टी वी चैनलों पर चिंघाड़ रहे हैं- देश के अपमान की बातें कर रहे हैं और पंजाब में राष्ट्रपति राज लगाने का आह्वान कर रहे हैं। यह सारा मसला एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश है।
लेखक पावेल कुस्सा 
सबसे पहले तो यह मोदी की बुरी तरह विफल हुई रैली को ढकने का प्रयत्न है।
प्रधानमंत्री के लिए चुनावों में सहानुभूति बटोरने का प्रयास है। 'मोदी ही राष्ट्र है' के दम्भी वृतांत को मजबूत करने की कोशिश है। अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी-पंजाब कांग्रेस को मात देने की कोशिश है।
हालांकि यह हकीकत जग जाहिर है कि प्रधानमंत्री को किसी ने पूर्वन्योजित फैसला करके नहीं घेरा, बल्कि खुद उसकी अपनी तरफ से ही ऐन मौके पर सड़क मार्ग का च्यन किया गया था। जिस कारण उसे मार्ग में हो रहे प्रदर्शनों के समीप 10 मिनट के लिए रुकना पड़ा। किसी ने प्रधानमंत्री के नजदीक जाने की कोशिश तक भी नहीं की। फिर भी अगर प्रधानमंत्री को अपने ही लोगों से इतना खतरा महसूस होता है तो यह उसके के लिए सचमुच ही सोच विचार का मसला बनना चाहिऐ।
इस 10 मिनट की रुकावट को सुरक्षा दृष्टि से बहुत ही खतरनाक घटना बनाकर पेश किया जा रहा है ताकि बुरी तरह विफल रही रैली की तस्वीर को इस सारे दृश्य से ओझिल किया जा सके। मोदी के वापस जाने का फैसला उसकी रैली को पंजाब के लोगों द्वारा नाकार दिए जाने के कारण करना पड़ा| पर उसने जाते-जाते अपनी घोर प्रतिगामी प्रवृत्ति के चलते नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। शरीरक तौर पर तो किसी ने उसे छुआ तक भी नहीं है और ना ही ऐसा करने की किसी की तरफ से कोई मंशा व्यक्त हुई है।
सही बात तो यह है कि मोदी अपनी राजनीतिक पिछाड़ को सहन नहीं कर पा रहा। इस सारी बहस में प्रधानमंत्री की सुरक्षा के तकनीकी नुक्तों के अलग-अलग पहलुओं पर जवावदेही तय करने का अपना स्थान है| पर यह लोगों के रोष प्रदर्शन के लोकतान्त्रिक अधिकार से ऊपर नहीं है| सबसे पहले लोगों के रोष प्रदर्शन के लोकतान्त्रिक अधिकार को बुलंद किया जाना चाहिए।
देश के प्रधानमंत्री के आगे अपना रोष व्यक्त करना लोगों का बुनियादी लोकतान्त्रिक अधिकार है। अगर लोग पूर्वन्योजित कार्यक्रम के तहित भी 2 घंटे मोदी की कार को घेरकर नारेबाजी कर देते तो भी कोई आसमानी बिजली नहीं गिर जाने वाली थी। लोग अपने लोकतान्त्रिक अधिकार को ही लागू कर रहे होते।
किसान आंदोलन अभी स्थगित किया गया है, खत्म नहीं हुआ। किसान दिल्ली के बॉर्डर से उठ गए हैं यद्यपि एम.एस.पी. और केसों को रद्द किए जाने सहित सारे मुद्दे अभी भी उसी तरह खड़े हैं और इन मसलों पर कोई भी बात ना सुनने वाली मोदी सरकार का रवैया सामने आ चुका है।
इस तरह की स्थिति में अगर किसान अपना रोष ना व्यक्त करें तो और क्या करें। यह बात प्रधानमंत्री को पंजाब में आने से पहले सोचनी चाहिए थी पर वह तो आया ही 'पंजाब विजय' के लिए था। वह तो केंद्रीय कोष पर काबिज होने के अहंकार के रथ पर सवार हो पंजाबियों को खरीदने आया था।
यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मसला नहीं है, बल्कि उसकी लोगों के प्रति जवाबदेही का मसला है। अगर वह पंजाब के लोगों को सचमुच की खुशहाल जिंदगी के पैकेज देने के ऐलान करने आ रहा था तो क्यों वही लोग उसके विरोध में सड़कों पर थे। तो उसको प्रश्न अपनी सुरक्षा के मसले में नहीं, बल्कि उसके लोगों के साथ रिश्ते के मामले में उठना चाहिए था। जब प्रधानमंत्री मोदी फिरोजपुर की तरफ जा रहा था, ठीक उसी समय पंजाब के शहरों और कस्बों में उसके पुतलो को फूंका का जा रहा था। गांव देहात के सीधे साधे लोगों को बसों में भर कर फिरोज़पुर ले जाना भाजपाइयों के लिए मुश्किल क्यों हो गया था!
प्रधानमंत्री की रैली बुरी तरह खाली रही।
जो कुछ हुआ वह-
कारपोरेटों से उसकी वफादारी का नतीजा है।
लखीमपुर खीरी में कुचल दिए गए किसानों की शहादतों का नतीजा है।
साल भर किसानों को दिल्ली की सड़कों पर परेशान करने का नतीजा है।
700 से ऊपर किसानों की जान लेने का नतीजा है।
अभी तक भी कारपोरेटों को मुल्क लुटाने की नीतियों को लागू करते रहने का नतीजा है।
लोगों को झूठे सुहावने ख़ुआब दिखाकर पंजाब विजय कर लेने की ख्वायिशें पालने का नतीजा है।
भाजपा की इस हाहाकार के दरमियान हमें डटकर कहना चाहिए कि यह धरती और इसके मार्ग हमारे हैं। हमारी जिन्दगीओं में तबाही मचाने वाले हाकिमों को इन रस्तों पर रोकना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।
हमारी इज्जत और प्रधानमंत्री की इज्जत एक नहीं है। इसमें हमेशा से टकराव है। उसने तो हमेशा ही देश के लोगों की शान-इज्जत को अपने पैरों तले रौंदा है। और इस इज्जत को पैरों तले रौंदे जाने के बारे में सवाल करने के लिए लोग उसके सामने भी आएंगे और उसके मार्ग भी रुकेंगे। सभी इंसाफ पसंद और जागृत देशवासियों को भाजपा की इस झल्लाई महिम का डटकर विरोध करना चाहिए। लोगों के विरोध वयक्त करने के लोकतान्त्रिक अधिकार को डट कर बुलंद करना चाहिए। और इस को सुरक्षा मसले में प्रवर्तित कर भटकाने की कोशिशों का पर्दाफाश करना चाहिए। किसान संघर्ष की जय-जय कार करनी चाहिए, और इसकी हमायत करनी चाहिए।

*पावेल कुस्सा वाम लहर में काफी समय से सक्रिय हैं और सुर्ख लीह नामक पत्रिका से जुड़े हुए भी हैं
इसे सोशल मीडिया पर 6th January 2022 at 23.56 PM को पोस्ट किया गया।

Saturday, January 1, 2022

नफरत फैलाना, हिंसा भड़काना अब नहीं है अपराध!//- राम पुनियानी

Saturday 1st January 2022 at 8:45 AM

'प्रभाकरण' और 'भिंडरावाले' बनने का आव्हान भी शुरू 

साभार Online News India की वीडियो से कवर तस्वीर 


आने वाले दिन बेहद नाज़ुक हो सकते हैं। देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को थस नहस करने वाले हो सकते हैं। जिस तरह दिसंबर के महीने में हुए आयोजन में खून खराबे की बातें की गई हैं उनसे यही लगता है। देश के दिग्गज लोगों ने इसका विरोध भी किया लेकिन कानून के मुताबिक जो जो कदम उठाए जाने चाहिए थे वो नहीं उठाए गए। स्थिति की गंभीरता पर एक लेख लिखा है राम पुनियानी जी ने जो वृद्धावस्था के बावजूद सक्रिय लेखन को जारी रखे हुए हैं। उनकी कलम बहुत कुछ नया भी बताती है और मार्गदर्शन भी देती है। --रेक्टर कथूरिया 

 एल एस हरदेनिया 
सूरजपाल अमु ने अत्यंत घटिया और नफरत फैलाने वाला भाषण दिया। उसके बाद उन्हें भाजपा की राज्य इकाई का प्रवक्ता बना दिया गया। गौरक्षा-बीफ के मुद्दे पर अखलाक की हत्या के आरोपियों में से एक की मौत हुई। एक तत्कालीन केंद्रीय मंत्री (महेश शर्मा) ने उसे श्रद्धांजलि दी और उसके शव को तिरंगे में लपेटा। लिंचिंग के 8 आरोपियों को जमानत पर रिहा किया गया। एक अन्य केंद्रीय मंत्री (जयंत सिन्हा) ने जेल से छूटने पर फूलमालाओं से उनका स्वागत किया। 

इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में, जो लोग इन दिनों नफरत फैला रहे हैं और हिंसा भड़का रहे हैं उनके खिलाफ कोई कार्यवाही न होने से हमें चकित नहीं होना चाहिए। अभी ज्यादा समय नहीं गुज़रा जब आन्दोलनकारियों को 'गोली मारने' का आव्हान करने वाले राज्य मंत्री को कैबिनेट में पद्दोन्नत किया गया था। हम सबको याद है कि हमारे प्रधानमंत्री, जो अपने मन की बात से हमें जब चाहे अवगत कराते रहते हैं, जुनैद और रोहित वेम्युला की मौत के बाद या तो चुप्पी साधे रहे या बहुत दिन बाद कुछ बोले। 

आज जनवरी 2022 की 1 तारीख है और आज तक हमारे प्रधानमंत्री ने पांच दिन पहले घटित दो विचलित और चिंतित करने वाले घटनाओं के सम्बन्ध में अपने विचारों से हमें अवगत नहीं करवाया है। इनमें से एक घटना 19 दिसम्बर को हुई थी। इस दिन सुदर्शन टीवी के मुख्य संपादक सुरेश चाव्हानके ने युवा लड़कों और लड़कियों को शपथ दिलवाई। कार्यक्रम का आयोजन हिन्दू वाहिनी द्वारा किया गया था। इस संगठन के संस्थापक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ हैं। शपथ इस प्रकार थी: "हम सब शपथ लेते हैं, अपना वचन देते हैं, संकल्प करते हैं कि हम भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाएंगे, अपनी अंतिम सांस तक इसे एक हिंदू राष्ट्र रखेंगे। हम लड़ेंगे और मरेंगे। अगर जरूरत पड़ी तो हम मार भी डालेंगे।"

हरिद्वार में एक अन्य आयोजन में सैकड़ों भगवाधारी साधु और साध्वियां "इस्लामिक आतंकवाद और हमारी जिम्मेदारियां" विषय पर मंथन के लिए एकत्रित हुए. यह एक 'धर्म संसद' थी, जिसका आयोजन गाज़ियाबाद मंदिर के मुख्य पुजारी यति नरसिम्हानंद ने किया था. उन्होंने आयोजन की दिशा निर्धारित करते हुए अपने भाषण में कहा, "(मुसलमानों के) आर्थिक बहिष्कार से काम नहीं चलेगा...हथियार उठाए बिना कोई समुदाय अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता...तलवारें किसी काम की नहीं है, वे केवल मंच पर अच्छी लगती हैं. आपको अपने हथियारों को बेहतर बनाना होगा...अधिक से अधिक बच्चे और बेहतर हथियार ही आपकी रक्षा कर सकते हैं।" मुसलमानों के खिलाफ हथियारबंद हिंसा का आव्हान करते हुए उन्होंने 'शस्त्रमेव जयते' का नारा दिया. एक अन्य वीडियो में, नरसिम्हानंद हिन्दू युवकों को (लिट्टे नेता) 'प्रभाकरण' और 'भिंडरावाले' बनने का आव्हान करते हुए दिखलाई देते हैं. वे 'प्रभाकरण' जैसा बनने वाले हिन्दुओं के लिए एक करोड़ रुपये के पुरस्कार की घोषणा भी करते हैं। 

हिन्दू महासभा की महासचिव अन्नपूर्णा माँ (जो पूर्व में पूनम शकुन पांडे कहलाती थीं) ने कहा कि हमें 100 सिपाहियों की ज़रुरत हैं जो उनके (मुसलमानों) 20 लाख लोगों को मार सकें। उन्होंने आगे कहा, "मातृ शक्ति के शेर के पंजे हैं. फाड़ कर रख देंगे". ये वही महिला हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले मेरठ में गांधीजी की हत्या के दृश्य का पुनःसृजन किया था और उसके बाद मिठाई बांटी थी। 

बिहार से पधारे धरम दास महाराज ने फरमाया, "जब संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि मुसलमानों का देश के संसाधनों पर पहले हक है उस समय यदि मैं संसद में मौजूद होता तो नाथूराम गोडसे की तरह, मनमोहन सिंह के शरीर में रिवाल्वर से छह गोलियां उतार देता।"

ये धर्म संसद की कार्यवाही की कुछ अंश हैं. इन आयोजनों की शुरुआत विश्व हिन्दू परिषद् ने बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद की थी. आश्चर्यजनक यह है कि इन वीडियो के सोशल मीडिया पर आसानी से उपलब्ध होने के बाद भी पुलिस ने इस मामले में अब तक कोई कार्यवाही नहीं की है। 

जो इस तरह की बातें कह रहे हैं वे कानून की दृष्टि से निश्चय ही अपराधी हैं. परन्तु उन्हें पता है कि उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होगी. उन्हें पता है कि मन ही मन सत्ताधारी उनके इस तरह की भाषणों की सराहना करते हैं. यह भी हो सकता है कि इस तरह की बातें, इस तरह की भड़काऊ बातें, चुनाव की तैयारी का हिस्सा हों. मज़े की बात यह है कि यह सब तब हो रहा है जब मुन्नवर फारुकी को ऐसे चुटकुले के लिए गिरफ्तार किया गया था जो उसने सुनाया ही नहीं था. और तबसे उसके अनेक शो रद्द किये जा चुके हैं।    

इस तरह की बातों का अल्पसंख्यकों पर क्या असर पड़ेगा? वे इस देश के समान नागरिक हैं. क्या उनके मन में डर का भाव उत्पन्न नहीं होगा? क्या उनके आर्थिक बहिष्कार और उनकी जान लेने की धमकियों से उनमें अपने मोहल्लों में सिमटने की प्रवृत्ति और नहीं बढेगी? परेशान और चिंतित जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द के महमूद मदनी ने केंद्रीय गृह मंत्री को इस मामले में एक पत्र लिखा है. क्या अल्पसंख्यक आयोग इन अत्यंत आपत्तिजनक भाषणों का संज्ञान लेकर कार्यवाही करेगा? क्या पुलिस जितेन्द्र त्यागी (पूर्व में वसीम रिज़वी) के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से आगे कोई कार्यवाही नहीं करेगी? क्या सुप्रीम कोर्ट इस मसले का स्वतः संज्ञान नहीं लेगा?

खुलेआम और इस स्तर की हिंसा के लिए भड़काने और नफरत फैलाने के इस तमाशे से पूरी दुनिया स्तंभित है. देश किस ओर जा रहा है इसका अनुमान विश्व मीडिया को कुछ हद तक पहले से ही था. डेली गार्जियन में 2020 में प्रकाशित एक लेख में कहा गया था, "चूँकि जनता के समग्र हितों के लिए काम करना कठिन है इसलिए सत्ताधारी दल की कमियों, जिनका धर्म से कोई सम्बन्ध हो या न हो, की ओर ध्यान दिलाने के लिए अनवरत नफरत फैलाने वाली बातों का सिलसिला सन 1990 के दशक के प्रारंभ से ही शुरू हो गया था और यह दूसरी सहस्त्राब्दी के शुरूआती वर्षों में भी जारी रहा. नफरत फैलाने वाली बातें भारतीय प्रजातंत्र का हिस्सा बनतीं गईं।"   

अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत का भाव चरम पर पहुँच गया है. अविभाजित भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों को एक दूसरे का शत्रु बनाने की जो सांप्रदायिक राजनीति शुरू हुई थी, वह अब केवल मुसलमानों पर केन्द्रित हो गई है। हर मौके का इस्तेमाल मुसलमानों के दानवीकरण के लिए किया जा रहा है. पिछले सात सालों में बीजेपी सरकार के शासनकाल में यह प्रवृत्ति और बढ़ी है। अमरीकी मीडिया द्वारा इस्लामिक आतंकवाद जैसे शब्दों को गढ़ कर, इस समुदाय के ज़ख्मों पर नमक छिड़का जा रहा है। 

आज ज़रुरत इस बात की है कि नागरिक समाज इस स्थिति के बारे में कुछ करे। देर-सवेर, 'दूसरों' के खिलाफ हिंसा और नफरत, उसी समुदाय के लिए भस्मासुर बन जाती है जो उसे हवा देता है. सभी गैर-भाजपा पार्टियों को एक मंच पर आकर नफरत के सौदागरों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। 

परस्पर प्रेम को बढ़ावा देने और नफरत से किनारा करने के लिए एक सामाजिक आन्दोलन की ज़रुरत है। हमें भक्ति और सूफी संतों और महात्मा गाँधी व मौलाना आजाद की दिखाई राह पर चलना होगा। तभी देश और समाज में शांति और सद्भाव का वातावरण बन सकेगा। 

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

Saturday, December 25, 2021

लोगों पर शाकाहार थोपना एक राजनैतिक एजेंडा//- राम पुनियानी

25th December 2021 at 9:47 AM 

सबसे बड़ा कत्लेआम करने वाला हिटलर शुद्ध शाकाहारी था 


भोपाल
: 22 दिसम्बर 2021 :(राम पुनियानी//कामरेड स्क्रीन)::
Courtesy Photo 
हाल (दिसंबर, 2021) में अहमदाबाद नगर निगम की नगर नियोजन समिति ने घोषणा की कि शहर में सार्वजनिक सड़कों और स्कूल, कालेज व धार्मिक स्थलों के 100 मीटर के दायरे में मांसाहारी खाद्य पदार्थ बेचने वाले स्टाल नहीं लगने दिए जाएंगे। इसी तरह का निर्णय बड़ौदा, भावनगर, जूनागढ़ और राजकोट के नगरीय निकायों ने भी लिया।  मांसाहारी खाद्य पदार्थ के विक्रेता इस निर्णय के खिलाफ अदालत में गए जिसने इस निर्णय को रद्द कर दिया। 

यह आश्चर्यजनक परंतु सत्य है कि हमारे देश में मांसाहार का विरोध साम्प्रदायिक एजेंडे का हिस्सा बन गया है।  प्रचार यह किया जाता है कि मांसाहार करने वाले व्यक्ति स्वभाव से हिंसक होते हैं। हम अपने आसपास के कई लोगों से यह तर्क सुनते रहते हैं कि मुसलमानों की प्रवृत्ति इसलिए आक्रामक है क्योंकि वे मांसाहारी होते हैं। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि मुसलमान बीफ का सेवन करते हैं। हिन्दुओं के लिए गाय एक पवित्र पशु है परंतु मुसलमान बीफ खाते हैं और इस तरह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाते हैं। गाय और बीफ के मुद्दे पर देश भर में लिंचिग की अनेक घटनाएं हो चुकीं हैं। 

मांसाहार और मुसलमानों द्वारा बीफ के सेवन को एक-दूसरे से जोड़ दिया गया है। पहला तर्क यह है कि मांसाहार से व्यक्ति में हिंसक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। दूसरा तर्क यह है कि मुसलमान बीफ खाते हैं और इस प्रकार हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाते हैं। मांसाहार की अनेक परिभाषाएं हैं। अक्सर ये परिभाषाएं स्थान और समुदाय के साथ बदलती रहती हैं। कुछ शाकाहारी अंडे खाते हैं तो कुछ अंडे से सख्त परहेज करते हैं। कुछ का मानना है कि सी फूड जैसे मछली इत्यादि शाकाहार है। अन्य लोग उसे मांसाहार मानते हैं। आज पूरी दुनिया में 80 से 90 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं। इंडियास्पेन्ड द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 80 प्रतिशत पुरूष और 70 प्रतिशत महिलाएं हफ्ते में कम से कम एक बार मांस खाते हैं। 

मुसलमानों को बीफ खाने के लिए कटघरे में खड़ा किया जाता है परंतु यूरोप और अमरीका के निवासियों को नहीं, जबकि बीफ उनका मुख्य भोजन है। ऐसे देश जहां के लोग अहिंसा के सबसे बड़े पैरोकार गौतम बुद्ध में श्रद्धा रखते हैं, वहां भी मांसाहार आम है। भारत में भी कई ऐसे समुदाय हैं जिनके नियमित भोजन में बीफ शामिल था और है।  विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अधिकांश राज्यों में मांस खाने वाले समुदायों की आबादी, शाकाहारियों से कहीं ज्यादा है, और यह बात गुजरात के बारे में भी सही है। 

आज राजनैतिक कारणों से इस सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है कि मांसाहार करने वाले नफरत के पात्र हैं। हम बिना अतिश्योक्ति के खतरे के कह सकते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय को खलनायक सिद्ध करने के लिए शाकाहार का सामाजिक और राजनैतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। हरेक को यह अधिकार है कि वह मांसाहार को त्यागकर शाकाहारी बन जाए। परंतु मांसाहार के प्रति असहिष्णुता के भाव को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह कहना कि मुसलमान हिंसक होते हैं और उसका कारण यह है कि वे मांसाहारी हैं, एक शुद्ध राजनैतिक प्रचार अभियान है जिसका न तो वैज्ञानिक आधार है और ना ही मनोवैज्ञानिक। इतिहास गवाह है कि वैदिक काल में बीफ और अन्य मांसाहारी पदार्थों का सेवन आम था। 'अथो अन्नम् वै गौः' (गाय ही वास्तविक भोजन है) स्वामी विवेकानंद के अनुसार, "आपको आश्चर्य होगा यदि मैं आपको बताऊं कि प्राचीन रस्मों के अनुसार जो व्यक्ति बीफ नहीं खाता वह अच्छा हिन्दू नहीं है. कुछ मौकों पर एक अच्छे हिन्दू को बैल की बलि देकर उसे खाना चाहिए" (द कम्पीलट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद, खण्ड 3, पृष्ठ 536, अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1997)

डी. एन. झा अपनी पुस्तक 'मिथ ऑफ द होली काऊ' में बताते हैं कि कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के उदय के साथ गौतम बुद्ध ने गाय की बलि पर प्रतिबंध लगाया। इस प्रतिबंध का मुख्य उद्धेश्य मवेशियों को बचाना था. बौद्ध धर्म के समर्पित अनुयायी सम्राट अशोक ने अपने एक शिलालेख में लिखा है कि केवल इतने जानवर और पक्षी मारे जाने चाहिए जो रसोईघर के लिए पर्याप्त हों।  इसका उद्धेश्य ब्राहम्णवादी रीति-रिवाजों के भाग के रूप में पशुबलि को रोकना था. इसके बाद ब्राम्हणवाद ने भी यह दिखाने के लिए कि उसे भी मवेशियों की चिंता है, गाय को माता घोषित कर दिया. समय के साथ गाय का माता का दर्जा ब्राम्हणवाद का हिस्सा बन गया और इस पर राजनीति शुरू हो गई। 

जहां तक यह प्रश्न है कि क्या किसी व्यक्ति का स्वभाव और प्रवृत्तियां उसके भोजन से प्रभावित होती हैं इसके बारे में कोई वैज्ञानिक अध्ययन या तथ्य उपलब्ध नहीं है। हिंसक प्रवृत्ति किसी के व्यक्तित्व का भाग होती है और यह उसकी पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का परिणाम होती है। एक ही व्यक्ति कई बार अपने जीवन के कुछ हिस्से में हिंसक और कुछ हिस्से में सहिष्णु और अहिंसक हो सकता है। 

कुछ पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां भोजन को सात्विक, तामसिक और राजसिक में विभाजित करती हैं. परंतु इस वर्गीकरण का भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. भले ही कुछ लोग यह मानते हों कि किसी मनुष्य का स्वभाव उसके भोजन पर निर्भर करता है परंतु किसी भी आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन से यह सिद्ध नहीं हो सका है। हिटलर, जिसने आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ा कत्लेआम किया था, शुद्ध शाकाहारी था। 

कुछ लोग आज शाकाहार को अपना रहे हैं। कुछ इससे भी आगे बढ़कर वीगन बन रहे हैं। परंतु वे धार्मिक कारणों से ऐसा नहीं कर रहे हैं और ना ही वे उन लोगों से नाराज रहते हैं जो मांसाहारी भोजन करते हैं। परंतु समाज का एक तबका, जो साम्प्रदायिक सोच से प्रभावित है, मांसाहार को धार्मिकता से जोड़ रहा है और शाकाहार को राजनैतिक एजेंडा बनाने पर उतारू है। जब खानपान की आदतों को धर्म से जोड़ दिया जाता है तब वे कई तरह की दुष्प्रवृत्तियों को जन्म देती हैं। लोग अपने आसपास मांसाहारियों को रहने देना नहीं चाहते और कई हाऊसिंग सोसाटियों में मांसाहारियों को घर खरीदने या किराए पर लेने नहीं दिया जाता। 

अहमदाबाद में मैंने स्वयं देखा है कि मकान मालिक किरायेदारों के रसोईघर पर अचानक छापा मारते हैं ताकि वे यह सुनिश्चित कर सकें कि वहां मांसाहारी भोजन नहीं पकाया जा रहा। अब इन मुद्दों को मुसलमानों के दानवीकरण का उपकरण बना लिया गया है। गुजरात के कुछ हिस्सों में जिस आक्रामकता से शाकाहार का प्रचार किया जा रहा है वह सचमुच अजीब और डरावना है। हम निश्चित तौर पर यह कह सकते हैं कि इस तरह से शाकाहार का प्रचार करने वाले असहिष्णु हैं।  (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

(यह लेख डाक्टर राम पुनियानी ने दिसंबर के आरम्भ में ही मूलतः अंग्रेजी में लिखा था इस लिए कुछ अंग्रेजी पत्रिकाओं में यह पहले छपा। इसका हिंदी अनुवाद हमारे üपास दिसंबर के आखिरी सप्ताह में ही पहुँच पाया। इसलिए हमें इसके प्रकाशन में भी देरी हुई। इसलिए क्षमा प्रार्थी हैं--रेक्टर कथूरिया-सम्पादक)

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अगर भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं है, तो भारत, भारत ही नहीं है।

                       – अटल बिहारी वाजपेयी

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 कोई भी भारत की धर्मनिरपेक्षता को चुनौती न दें।

                   – अटल बिहारी वाजपेयी

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Wednesday, November 24, 2021

कंगना का बयान आर एस एस के विचारों की ही पुष्टि करता है

भाकपा(माले) ने की पद्मश्री वापिस लेने की मांग 

पद्मश्री टवीट 

नई दिल्ली
: 25 नवंबर 2021: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

कंगना रनौत के बयान से पैदा हुई नाराज़गी निरंतर बढ़ती ही जा रही है। देश की आज़ादी और स्वतंत्रता का इस तरह खुलेआम अपमान होने के बावजूद सत्ता ने उसके खिलाफ कोई ऐसा एक्शन नहीं लिया जो लिया जाना चाहिए था। इस मुद्दे को लेकर सी पी आई एम एल लिबरेशन भी खुल कर सामने आई है। पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने इसे लेकर सत्ता को भी आड़े हाथों लिया है और कंगना को भी। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक, पद्मश्री प्राप्त करने के तुरंत बाद अभिनेत्री और भाजपा समर्थक खेमे की प्रमुख हस्ती-कंगना रनौत ने घोषित कर दिया कि 1947 में जो देश ने हासिल की, वह तो महज भीख थी और असल आज़ादी  2014 में आई जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री चुने गए। कंगना मैडम ने यह बात टाइम्स नाउ द्वारा आयोजित कॉन्क्लेव में कही (गौरतलब है कि यह चैनल भी मोदी सरकार के पक्ष पोषण करने के प्रति समर्पित चैनलों में से एक है) यानि कि गोदी मीडिया का ही हिस्सा है। 

पार्टी के बयान ने यह भी याद दिलाया है कि कंगना रनौत का बयान हालांकि अफ़सोसजनक है पर यह आरएसएस द्वारा आज़ादी के आंदोलन के दौरान और आज़ादी के तत्काल बाद अभिव्यक्त भावनाओं के साथ ही आरएसएस के संस्थापक विचारक गोलवलकर के इन विचारों से मेल खाता है, जिसमें वे घोषित करते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन के शहीद असफल लोग हैं और उनको आदर्श नहीं माना जाना चाहिए। गोलवलकर ने तो यहां तक कहा कि आज़ादी का ब्रिटिश विरोधी दृष्टिकोण “विनाशकारी” है. आज़ादी के वक्त  आरएसएस ने तिरंगे झंडे और संविधान के प्रति भी घोर अवमाननाकारी दृष्टिकोण प्रदर्शित किया और इनके बजाय भगवा झंडे व मनुस्मृति को अपनाने की मंशा जाहिर की। आर एस एस की सोच और इरादे कंगना के बयान में भी झलक रहे हैं। 

पार्टी ने कंगना के बयान का गहन विश्लेषण भी किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि कंगना रनौत के लिए औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता अवमाननाकारी है। लगता है कि आज़ादी का मतलब वे समझती हैं- मॉब लिंचिंग की आज़ादी, कट्टरता व रूढ़िवाद की अभिव्यक्ति व प्रसार की आज़ादी और आरएसएस के खानपान, पहनावे,धर्म और आचार-व्यवहार संबंधी विचारों को बेहद हिंसक तरीके से पूरे देश पर थोपना। इस तरह इस बयान में बहुत कुछ छुपा है जो ज़ाहिर हुआ है। 

सीपीआई एम एल लिबरेशन ने “अमृत महोत्सव” मनाने का भी गंभीर नोटिस लिया है। देश की आज़ादी और उसके शहीदों का अपमान करने के लिए केंद्र सरकार को कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि वह, कंगना रनौत का पद्मश्री वापस ले ले। सरकार एक तरफ आज़ादी का “अमृत महोत्सव” मनाने का दावा करे और दूसरी तरफ ऐसे लोगों को प्रश्रय और सम्मान दे जो भारत की आज़ादी और आज़ादी के आंदोलन का अपमान करे, ये दोनों बातें एक साथ तो नहीं चल सकती। 

Sunday, November 7, 2021

आज के भारत पर रीतू कलसी की काव्य रचना

यह कैसा भारत है जहाँ खून पानी हो रहा 

तब ट्रेक्टर और किसान नोट पर था-अब ट्रेक्टर और किसान रोड पर है-#जय_जवान_जय_किसान

रूस में इंकलाब आया तो सब कुछ बदल गया। काफी देर तक बदला रहा।  वहां भी खुली हवाओं ने अपना रंग नहीं दिखाया वहां सब कुछ लाला स्लैम के रंग जैसा ही रहा। रूस के उस  इंकलाब  को आज भी अक्टूबर इंकलाब के नाम से याद किया जाता है। कैलेंडर बदलते रहते हैं शायद इनको भी इंसान की नज़र लग गई है। अक्टूबर इंकलाब की तारीख आज भी बदले हुए कैलंडर के कारण सात नवंबर को आती है। इसी तारीख को याद अत है हमारे यहाँ सच्चा इंकलाब कब आएगा? रीतू कलसी कम्युनिस्ट पार्ट की सदस्य भी नहीं। किसी ट्रेड यूनियन की सदया भी नहीं लेकिन उसकी कलम बहुत कुछ याद करवाती रहती है। मन चाहता है इस बार सात नवंबर को रीतू कलसी की कलम से कुछा कहा जाए। प्रस्तुत है एक काव्य रचना जो बहुत कुछ याद दिला रही है। -रेक्टर कथूरिया।  

रीतू कलसी गंभीर चिंतन के मूड में 

जो खुद थे मवाली 

वह दूसरे पर लगाने लगे इल्ज़ाम।

 अभी और क्या-क्या देखना सुनना बाकी है।

 देखते जाएं आगे-आगे

अभी पिक्चर बाकी है।

 

हर फिल्म में होती है बुराई पर अच्छाई की जीत।

इसी आस पर जीते जाते हैं 

रब्ब करेगा सब ठीक 

इसलिए हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

हमे नहीं करना विरोध 

हमे नहीं आना नज़रों में 

हमारे घर न जल जाएं कहीं 

इसलिए आँख कान मुँह बंद कर के बैठना है।

 

रोटी के पड़े चाहे हमे सौ लाले 

पर घर से हमें नहीं निकलना है 

सच के साथ तो खड़े ही नहीं होना। 

बस झूठ की जय जय करनी है।

रामायण-महाभारत को भूल गए हम 

पर हिंदुत्व की बात सब के मुख पर है 

यह कैसा भारत है जहाँ खून पानी हो रहा 

जो जाना जाता था भगत सिंह से, 

बाल गंगाधर से , मंगल पांडे से 

रानी लक्ष्मीबाई,  गुलाब कौर,  किटटूर रानी चेन्नम्मा

सभी को भूल गए

तो अब 

शर्म से मर जाना चाहिए हम सभी को

                          --रीतू कलसी