Saturday, June 20, 2020

CPI ने बजाया तीखे जनआंदोलनों का बिगुल

20th June 2020 at 5:52 PM
 भाकपा की राज्य कार्यकारिणी के बैठक में लिए गए कई अहम फैसले 
चंडीगढ़//लुधियाना: 20 जून 2020: (एम एस भाटिया//कार्तिका सिंह//कामरेड स्क्रीन)::
कोरोना और लॉक डाउन के चलते छाई सहम भरी ख़ामोशी को सफलता पूर्वक तोड़ने के बाद अन तीखे जन आंदोलनों का बिगुल भी बजा दिया है। पैट्रोल डीज़ल की कीमतों में गत 13 दिनों से हो रही वृद्धि, यूपी सरकार की तरफ से पंजाबी किसानों को उजाड़ने का दमनचक्र, भाजपा सरकार की फाशीवादी नीतियों के अंतर्गत बढ़ रहे हमले, लोकतान्त्रिक और मानवी अधिकारों की बात करने वाले कार्यकर्ताओं की ग्रिफ्तारियां इत्यादि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर बोलना आम लोग भूल चुके हैं। स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या शिक्षा का हालत बेहद बुरी है। देश की प्रभुसत्ता और अखंडता की रक्षा का मुद्दा, शहीद हुए बहादुर सैनिकों का मुद्दा, किसान विरोधी तीन आर्डिनेंस वापिस करवाने का संघर्ष, मनरेगा क्षेत्र की समस्याएं और मांगे और ऐसे बहुत से मुद्दे जिन  आवाज़ बुलंद करने की बात एक साजिश के अंतर्गत सपना बन चुकी है उन सभी मुद्दों को उठाएगी अब सीपीआइ। पूरा सप्ताह चलेगा रोष एक्श्नों का यह सिलसिला जो दमन का सहारा लिए चल रही सत्ता को हिला कर रख देगा। 
सीपीआई की पंजाब इकाई के सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ भी इस बैठक में शामिल होने के लिए विशेष तौर लुधियाना स्थि पार्टी कार्यालय में पहुंचे। अध्यक्षता की पूर्व विधायक कामरेड हरदेव अर्शी ने। गौरतलब है की कोरोना संकट और लॉक डाउन के चलते यह बैठक साढ़े तीन महीनों के बाद हो सकी। शहीद करनैल सिंह ईसड़ू भवन में इस बैठक को बाकायदा सैनेटाईज़र का इस्तेमाल करने के बाद आयजित किया गया। सोशल डिस्टेंस  
के नियम की पालना भी की गई।  इस बैठक के फैसले कामरेड बंत सिंह बराड़ ने मीडिया को जारी किये। कामरेड डीपी मौड़ ने बैठक शुरू होने से पहले ही अपनी देखरेख में हाल को पूरी तरह सैनेटाईज़ किया।  
पार्टी के प्रांतीय सचिव कामरेड बंत सिंह बराड़ ने इस बैठक में राष्ट्रिय मुद्दों के साथ साथ पंजाब की गंभीर साथी पर भी चिंता व्यक्त की। कोविड-19 को लेकर स्थिति और भी भयानक हुई। उन्होंने कहा कि इस बेहद नाज़ुक स्थिति के बावजूद प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए सीपीआई के सभी यूनिटों ने जो सक्रियता दिखाई उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। ह वह स्थिति थी जब ज़िंदगी जीना कठिन हो गया था। इस तरह की भयानक स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों ने जो मुजरमाना लापरवाही दिखाई उसे हमेशां काळा अक्षरों में लिखा जाएगा। इस पर तुरंत और तीव्र प्रतिक्रिया करते हुए 9 वाम दलों ने ज़ोरदार रोष प्रदर्शन किये। ट्रेड यूनियन और श्रमिक अधिकारों पर किये गए हमलों का मुँहतोड़ उत्तर दिया जिसने सारे संसार को दिखा दिया की कोरोना और लॉक डाउन की आड़ में यह सरकार श्रमिकों के साथ क्या क्या करने की हद तक जा सकती है। इसके साथ ही उन लोकतान्त्रिक कार्यकर्ताओं की रिहाई की भी आवाज़ उठाई गई जिन को मानवी अधिकारों की बात करने पर जेलों में ठूंस दिया गया। सड़कों पर पैदल चलते मज़दूरों के साथ साथ अपने गांव जाने को तरस रहे मज़दूरों के दर्द पर भी सीपीआई खुल कर सामने आई। 
 इसी बैठक में लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी को लेकर हुए घटनाक्रम पर भी चर्चा हुई। देश की प्रभुसत्ता और अखंडता की रक्षा के शहीद हुए 20 सैनिकों को भी श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए।  गौरतलब है की इन २० सैनिकों में से चार सैनिक पंजाब के मानसा, संगरूर, पटियाला और गुरदासपुर के हैं। 
सीपीआई ने इस बात को गंभीरता से लिया है कि इन सैनिकों को बिना हथियारों के सीमा पर चीन किसने से लड़ने के लिए भेजा गया। फिर इस बात कई दिनों तक दबाया गया छुपाया गया। सीपीआई ने इस सारे निंदनीय घटनाक्रम की तीखे शब्दों में आलोचना की है। सीपीआई ने कहा कि पूरी हालत जनता  रखी जाये। साथ ही भारत और चीन दोनों सरकारों से मांग की गई कि सीमा के झगड़ों का समाधान बातचीत के ज़रिये निकाला जाये। 
इन सभी मुद्दों पर चर्चा करते हुए सीपीआई की एग्ज़ेक्युटिव कमेटी मीटिंग ने मीडिया को भी अड़े हाथों लिया। पार्टी ने कहा देश में गोदी मीडिया जिस तरह तीसरी विश्व जंग को भड़काने के मकसद की खबरें और रिपोर्टें दिखा रहा है वह एक गहरी साज़िश है। हम इस मानवता विरोधी साज़िश पर भी नज़र रख रहे हैं।  
कार्यकारिणी की बैठक में मौजूद वाम नेतायों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बुलाई गई सर्व दलीय बैठक में शामिल होने को लेकर जो मतभेद दिखाया है वह निंदनीय है। यह बेहद दुखद है कि चार सांसदों दिल्ली की सरकार के मुख्य मंत्री पर काम करती आम आदमी पार्टी को आमंत्रित ही नहीं किया गया। इसी तरह चार सांसदों वाली आर जे डी को भी नहीं बुलाया गया। तीन सांसदों और केरल सरकार में भागीदार सीपीआई को भी नहीं बुलाया गया। लेकिन दूसरी रफ चार सांसदों वाली पार्टी अकाली दाल को बुलाया गया। (सुखदेव ढींडसा पार्टी से बाहर हैं) सीपीआई ने कहा कि हमें इस बात का एतराज़ नहीं अकाली दाल को क्यों बुलाया गया। हमें ेराज़ यह है कि देश की दहलीज़ पर खड़ी दस्तक दे रही जंग, 20 सैनिओं के शहीद होने और 10 के कैदी बने होने के नाज़ुक सवालों पर भी महत्वपूर्ण दलों को विचार विमर्श से बाहर रखा गया।साफ़ ज़ाहिर है कि इतनी बड़ी बहुसंख्या होने के बावजूद केंद्र सरकार सैद्धांतिक स्टैंड लेने वाली पार्टियों के विरोधी सुर से डरती है और इस तरह के वक़्त में भी निमंत्रण देने में मतभेद का काम लेती है। यह पक्षपात पूरी दुनिया ने देखा और इसे भारत की जनता याद भी रखेगी। 
बिना कोई योजना बनाये लॉक डाउन और कर्फ्यू जैसे आदेशों को भी सीपीआई ने निशाने पर रखा। करोड़ों मज़दूरों को बेरोज़गार करने, उन्हें घर से बेघर करने, उन्हें सड़कों पर हज़ारों मील पैदल चलने को मजबूर करने, उन्हें भूखों मारने और्व राहत के नाम पर सारा धन मज़दूरों का नाम ले कर अपने लोगों के हवाले करने के सारे घटनाक्रम की उच्च सत्रीय जांच की भी मांग की। 
 इसके आलावा यूपी में उजाड़े जा रहे पंजाबी किसानों का मुद्दा भी मीटिंग में गहनता से  विचारा गया। ये वही पंजाबी किसान हैं जिन्होंने बंजर ज़मीनों को दशकों तक मेहनत करके उपजाऊ बनाया। बेहद दुखद है कि इस अतिमहत्वपूर्ण मुद्दे पर भी अकालीदल अपनी कुर्सियों से चिपका हुआ है और इस मामले पर लोलो पोपो करके बेहद निंदनीय भूमिका निभा रहा है। 
किसान विरोधी आर्डिनेंसों की भी इस भाकपा बैठक में तीखी आलोचना हुई। सीपीआई ने कहा कि एम एस पी से पीछे हटने के कुप्रासों का हम विरोध करते हैं और करते रहेंगे। बैठक ने कहा कि यह आर्डिनेंस किसानों को कार्पोरेटी मगरमच्छ के मुँह में डाल देंगें। ऐसे में एम एस पी  का मिलना नामुमकिन हो जायेगा। इस बैठक में किसान संगठनों के संघर्ष का समर्थन भी किआ गया। 
इसी कार्यकारिणी बैठक में 8 जुलाई को पंजाब के 9 वाम दलों के संघर्ष का भी ज़ोरदार समर्थन किया। सीपीआई ने अपने सभी यूनिटों से कहा कि मौके की नज़ाकत को देखते हुए कोविड-19 की शर्तों का भी पालन करें। सभी पहलुओं को देखते हुए अन्य पार्टियों के सम्पर्क और सहयोग में रहते हुए अपने अपने एक्शन करें। 
इसी बैठक में 3 जुलाई को अखिल भारतीय स्तर की ट्रेड यूनियनों की तरफ से श्रमिक अधिकारों की रक्षा के लिए, ठेका प्रबंधों को समाप्त करने के लिए, न्यूनतम वेतन में वृद्धि, मनरेगा वर्करों के अधिकारों की रक्षा, आशा वर्करों स्कीम वर्करों के वेतन बढ़ाने के लिए हर वर्कर के कहते में 7500/- रूपये डालने के लिए और अन्य मांगों के लिए किये जा रहे अखिल भारतीय स्तर के रोष एक्शन का भी समर्थन किया। इन रोष प्रदर्शनों में भाग लेने को भी कहा गया। 
इसी कार्यकारिणी बैठक में कहा गया कि माइक्रो फाईनांस कम्पनीआं जो गरीबों को क़र्ज़ देने के मामले में अब गड़बड़गहताला कर रही हैं। इस धक्केशाही को बंद कराया जाये। नीले कार्डों के मुद्दे पर लोगों के साथ हो रहे मतभेद को भी बंद करने की मांग की गई। बिजली के बढ़ाये गए रेट भी वापिस लेने की बात कही गई। डीज़ल-पैट्रोल के हर रोज़ बढ़ रहे भावों पर भी चिंता व्यक्त की गई और इसकी निंदा हुई। इनके खिलाफ जन अभियान की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिए गया। 
बैठक में उन सभी कामरेड साथियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए जो हाल ही के दिनों में हमसे हमेशां के लिए बिछड़ गए। इस मौके पर सर्वश्री कामरेड ईशर सिंह दलेर सिंह वाला, अमरनाथ, नौनिहाल सिंह, गुरबख्श मुल्लां, प्यारा सिंह राओ-के-कलां, मिहर सिंह बद्दोवाल और सुखराज कौर भी श्रद्धांजलि दी गई। 
कोरोना काल में लॉक डाउन के कारण लम्बे अंतराल के बाद हुई इस बैठक में 24 प्रमुख कामरेड साथियों ने अपने विचार व्यक्त किये। इनमें कामरेड राज्य सचिव-कामरेड बंत सिंह बराड़ के साथ साथ पूर्व विधायक-हरदेव अर्शी, डाक्टर जोगिंदर दयाल, निर्मल धालीवाल, भूपिंदर सांबर, हरभजन सिंह, पृथीपाल माड़ीमेघा, अमरजीत आसल, सुखदेव शर्मा, कुलदीप भोला, लखबीर निजामपुरा, डीपी मौड़, रमेश रत्न, कृष्ण चौहान,  गदाईयां, कुलवंत मौलवीवाला, गुलज़ार सिंह, मैडम कुशल भौरा इत्यादि भी शामिल रहे। 
अब देखना है कि  सीपीआई का यह संघर्ष केंद्र और राज सरकारों को कितनी बड़ी चुनौती देने में सफल रहता है। 

Wednesday, June 3, 2020

कॉमरेड और लाल सलाम का मतलब क्या है?

Posted on Wednesday: 3rd June 2020 at 8:43 AM FB
 कामरेड:यह शब्द पूर्ण समानता दर्शाता है 
कॉमरेड का मतलब है साथीदार (साथी)  दुनियाभर के कम्युनिस्ट एक दूसरे को "कॉमरेड" संबोधन से बुलाते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी में "सर-मेडम" नहीं, कॉमरेड कहा जाता है। पार्टी के बडे से बडे नेता को छोटे से छोटा कार्यकर्ता कॉमरेड कहकर बुला सकता है। पुकार सकता है। माननीय, आदरणीय, महामना, महामहिम जैसे शब्दों की जरूरत नहीं है। आप कॉमरेड सीताराम येचुरी कह सकते हो। कोमरेड व्रृंदा करात कह सकते हो। कॉमरेड_लेनिन कह सकते हो। यह शब्द पूर्ण समानता दर्शाता है। दुनिया की हर कम्युनिस्ट पार्टी में कॉमरेड शब्द का प्रचलन है।
लाल सलाम का मतलब है कि क्रांति को सलाम। क्रांति के लिए दिये गये बलिदान को सलाम। क्रांति के लिए बहाए गये क्रांतिकारियों के लाल लहू को सलाम। लाल सलाम में बलिदान के लिए आदर है। शहीदों के बलिदान की कद्र है। इसलिए दुनियाभर के कम्युनिस्ट एक दूसरे को "लाल सलाम" शब्द से अभिवादन करते हैं। अंग्रेजी में Red Salute कहते हैं । 
इसलिए आप किसी भी कम्युनिस्ट को "कोमरेड, लाल सलाम" कह सकते हैं। मुझे भी। Bindeshwar Ray

Tuesday, June 2, 2020

कामरेड ताराकेश्वर-एक दूरदर्शी नेता

एक तरफ हड़ताल-दूसरी तरफ पिता का देहांत 
लुधियाना: 1 जून 2020 (*एम.एस.भाटिया//कामरेड स्क्रीन)::
कामरेड ताराकेश्वर चक्रवर्ती, जिसको सारे प्यार से कामरेड तारक या कामरेड तारकदा कहकर बुलाते थे। वह ना सिर्फ भारत की बैंक कर्मचारियों की यूनियन के महान नेता थे, बल्कि दुनियां भर के बैंकों के नेताओं में से एक थे। कामरेड परवाना और कामरेड प्रभातकार के जाने के बाद उन्होंने बैंक कर्मचारी आन्दोलन की कमान संभाली और इसको शिखरों तक पहुंचाया। 
कामरेड तारक का जन्म 2 जून 1926 को एक मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में नौखाली जिले के छोटे से कस्बे लक्ष्मीपुर में हुआ जो आजकल बंगला देश में है। उनके पिता श्री शशिकांत चक्रवर्ती खजाना विभाग के वकील के कलर्क थे और माता श्रीमति हिरनोई देवी घरेलू महिला थीं। विभाजन के बाद वह पश्चिम बंगाल आ गये व अगरपारा में रहने लगे जहां वह 1996 तक रहे और बाद में कलकत्ते आ गये। कामरेड तारक का संयुक्त परिवार रूढिवादी विचारधारा का धारणी था व पूरी तरह धार्मिक था। उनके परिवार में मांसाहारी की तो बात छोड़ो प्याज तक नही इस्तेमाल किया जाता था। पढ़ाई के नाम पर संस्कृति और शास्त्रों का ज्ञान दिया जाता था। हर रोज सालिग्रामशिला की पूजा जरूरी थी। ऐसे माहौल में भी कामरेड तारक के पिता ने फैसला किया व बेटे को अंग्रेजी स्कूल में दाखिल करवा दिया गया। उन्होंने 1941 में दूसरे दर्जे में दसवीं उत्तीर्ण की। 
कामरेड तारक उस समय कलकत्ते में थे जब दूसरे विश्वयुद्ध के समय 7 दिसंबर 1941 को जापान ने परल बन्दरगाह पर हमला करके अमेरिका के तीन जंगी बेड़े तबाह कर दिये व तब कलकत्ते के लोग बमबारी से डरते शहर छोड कर चले गये। वह भी अपने अंकल के परिवार सहित छोड कर बैलडांगा  (मुरशदाबाद) चले गये व 1942 में कलकत्ते वापिस आये। कामरेड तारक ने 28 दिसंबर 1945  में सैट्रल बैंक आफ इण्डिया की भोवानीपोर शाखा में नौकरी शुरू की। जो आशुतोष कालेज जहां कामरेड तारक एम.ऐ की पढ़ाई कर रहे थे के नजदीक था। यह वह समय था जब बैंकों में यूनियनों का गठन होने लगा। उन्होंने देखा कि उनके साथ के कर्मचारियों का बैंक के प्रबन्धकों द्वारा शोषण किया जा रहा है। कर्मचारियों को अनावश्यक सजाएं दी जाती थी। इन हालातों ने नौजवान तारक के मन पर गहरा असर डाला जिसको वह अपने आखिरी दिनों तक भी नही भूल पाए। वे यूनियन के सदस्य बन गये। 20 अप्रैल 1946 को कलकत्ते में आल इण्डिया बैंक इम्पलाईज ऐसोसियेशन (ई.आई.बी.ई.ऐ) जो बैंक कर्मचारियों की सब से बड़ी जत्थेबंदी थी, का गठन हुआ। कामरेड तारक -इन हिज आउन वर्डज नाम की पुस्तक में छपे लेख में उन्होंने कहा था कि ’’मै अंधरें में रास्ते ढूंढ रहा नौजवान था और 1949 के अंत तक मै पूरी तरह समझ गया था कि सारी बुराईयों की जड़ आर्थिक ढांचा व शोषण है। मेरी अपनी जिन्दी की मजबूरियों ने मुझे एक दिन वहां लाकर खड़ा कर दिया कि मै भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का  सदस्य बन गया। ठीक उसी समय मैने यूनियन में अपनी गतिविधियों को और बढ़ा दिया क्योंकि उस समय बैंक कर्मचारियों के नेता कामरेड नरेश पाल गिरफतार कर लिये गये व नौकरी से निकाले गये जो कि बैंक कर्मचारी आन्दोलन को सही दिशा की ओर ले जा रहे नेताओं में सिरमौर थे।’’ जेल से बाहर आने पर कामरेड नरेश पाल ने कामरेड तारक पर दबाव डाला कि वह यूनियन के सचिव का स्थायी तौर पर पद संभाले क्योंकि उनके जेल जाने के बाद अस्थायी तौर पर कामरेड तारक को सचिव बनाया गया था। इससे पहले सैंट्रल बैंक कर्मचारी जो 5 अगस्त 1948 से अनिश्चित समय की हड़ताल पर थे, बंगाल प्रोविन्शियल बैंक इम्पलाईज ऐसोसियेशन (बी.पी.बी.ई.ऐ) ने उनके पक्ष में हड़ताल का निमंत्रण दिया। हड़ताल कामयाब रही पर इस हड़ताल को गैर कानूनी करार दिया गया और 17 अगस्त 1948 को कामरेड प्रभातकार और साथियों के खिलाफ लायड बैंक के प्रबन्धकों द्वारा इस हड़ताल में हिस्सा लेने स्वरूप कार्यवाही शुरू की गई। कामरेड तारक बी.पी.बी.ई.ऐ. की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। यह वह दिन था जब कामरेड प्रभातकार, कामरेड नरेश  पाल और कई साथी बैंक की  नौकरी से  बरखास्त कर दिये गये थे। सेन अवार्ड को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया और शास्त्री ट्रिब्यूनल नियुक्त किया गया। सन 1951 में ऐ.आई.बी.ई.ऐ का स्पैशल सैशन कानपुर में बुलाया गया। कामरेड तारक उसमें शामिल हुये व उन्होंने अपना पहला भाषण वहां दिया और वह वहां कामरेड परवाना व अन्य बैंक कर्मचारी आन्दोलन के नेताओं को मिले। सन 1956 में कामरेड तारक के जीवन में कई घटनाएं घटित हुई। फरवरी में जब कामरेड तारक ऐ.आई.बी.ई.ऐ की दो दिनों की हड़ताल में व्यस्त थे तो उनके पिता का देहान्त हो गया। तीन महीने बाद उनकी शादी बानी के साथ हो गई जो इस परिवार की पहली ग्रेजूएट थी। उनकी तीन बेटियां थी जो काफी पढ़ी लिखी थीं।
सन 1980 से लेकर 2 मई 2003 तक का समय उनका ऐ.आई.बी.ई.ऐ के महासचिव के तौर पर दूरदर्शी और मजबूत फैसले लेने से भरा हुआ था। पब्लिक सैक्टर बैंकों की दरपेश चुनौतियों को देखते हुये 1985 में बैंगलौर में हुई ऐ.आई.बी.ई.ऐ. की कान्फ्रैन्स में लिये फैसले अनुसार तारक ने 40000 बैंक कर्मचारियों के, जो देश के विभिन्न हिस्सों से आये थे, के प्रभावशाली पार्लीमैंट मार्च की अगवाई की। उनके मजबूत इरादे का इस बात से पता चलता है कि उन्होंने पहली बार बैंक कर्जों के बड़े-बड़े डिफाल्टरों के नाम छापे। वह इतने मजबूत थे कि 5वें तनखाह समझौते को दस्तखत करने के बाद भी रिलेटीविटी के मुद्दें को दोबारा खोल कर उसे विचारने के लिये आई.बी.ऐ. को मजबूर किया। जबकि सभी यह कह रहे थे कि यह किस तरह हो सकता है कि दस्तखत करके अंतिम रूप के बाद कोई समझौता दोबारा कैसे विचारा जा सकता है। पर यह हुआ और बैंक कर्मचारियों को अपने तनखाह-स्लैब में बढौतरी मिली।
सन 1990-91 में अपनी अमेरिका फेरी दौरान उन्होंने देखा कि उनकी ब्याज की दर बहुत कम है और वापिस आकर उन्होंने बैंक कर्मचारियों के लिये पैंशन का मुद्दा उठाया। 1994 की जयपुर में हुई कान्फ्रैन्स में कामरेड तारक ने पैंशन समझौते की प्राप्ति हेतू, बावजूद अन्य सभी जत्थेबंदियों की विरोधता के, मजबूत इरादे को उजागर किया। यह उनकी दूरदर्शिता ही थी कि बाद में उसने सभी यूनियनों को 1996 में कलकत्ते में यूनाईटिड फार्म आफ बैंक यूनियन्ज (यू.एफ.बी.यू.) के झण्डे तले एकत्र किया और बैंक कर्मचारियेां को दरपेश चुनौतियों से लड़ने के लिये मंच तैयार किया। सन 2000 को मुम्बई में ऐ.आई.बी.ई.ऐ. की कान्फ्रैन्स दौरान कामरेड तारक ने नारे दिये- नौकरियां बचाओ-नौकरियों को दरपेश खतरों को भांज दो और पबिल्क सैक्टर बैंकों को बचाओ-निजीकरण की कोशिशों को नाकाम करो। आज हम समझ सकते हैं कि कितने दूरदर्शी थे कामरेड तारक दा। कामरेड तारक एक ऐसे अद्भुत नेता थे जो समय की नज़ाकत को समझते थे। आने वाली चुनौतियों को भांपते हुये तैयारी करते थे। बैंक कर्मचारी उनको ’दादा’ कह कर भी सम्बोधित करते थे। उन्होंने अपनी सारी जिन्दगी बैंक कर्मचारियों और ऐ.आई.बी.ई.ऐ को समर्पित की। वह विश्वप्रसिद्ध नेता थे। ट्रेड यूनियन में अपने योगदान के कारण उन्होंने विश्व के कई देशों का दौरा किया। कामरेड तारक पश्चिम बंगाल कम्यूनिस्ट पार्टी की स्टेट कमेटी के दो दशकों से सदस्य रहे। वह कम्यूनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कोंसिल के 18 वर्ष से भी अधिक समय तक  सदस्य रहे। वह कहते थे कि पार्टी में मेरी पुजीशन यूनियन में मेरी पुजीशन होने के कारण है।
2 मई 2003 के दिन कामरेड तारक हमें सदा के लिये छोड़ कर चले गये। अपने मजबूत इरादे और दूरदर्शिता के कारण कामरेड तारक हमेशा हमें जत्थेबंदी को और ऊंचाईयों की ओर लेकर जाने के लिये व हर प्रकार की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिये संदेश देते रहेंगे।
आज के दिन हम उनको सलाम करते हैं।
*एम.एस.भाटिया सेंट्रल बैंक आफ इंडिया में कार्यरत्त रहे और रिटायर होने के बाद सीपीआई और एटक में सक्रिय हैं। उनका मोबाईल सम्पर्क है: +91 9988491002


Saturday, May 30, 2020

श्रमिक कानूनों पर कामरेड अमरजीत कौर ने जगाई जोशीली आशा

 एटक ने कराया लुधियाना में विशेष सेमिनार 
लुधियाना: 30 मई 2020: (कामरेड स्क्रीन टीम):: 
आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस अर्थात (एटक) की तरफ से शहीद करनैल सिंह ईसड़ू भवन लुधियाना में कराया गया सेमिनार बहुत गहरे संकेत छोड़ गया जिनका प्रभाव अभी भी जारी है। इस सेमिनार का विषय था कोविड-19 की आड़ में श्रमिक कानूनों में हुई तब्दीलियों से ट्रेड यूनियनों को पैदा हुई चुनौतियां। मुख्य वक्ता रहीं एटक की राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अमरजीत कौर। उन्होंने जहां श्रमिक कानूनों में हो रही तब्दीलियों की चर्चा की वहीं अतीत के हवाले भी दिए। कार्ल मार्क्स के फलसफे से बहुत सारी कुटेशन भी दी गयीं और इन्हें मंच से बार बार दोहराया भी गया। यह सेमिनार भी निकट भविष्य में इस मुद्दे को लेकर किसी बड़े आंदोलन का संकेत लगता है।
वास्तव में कोरोना की आपदा आई तो हर तरफ दर्द के सैलाब नजर आये। शायद अतीत में ऐसा कभी भी न हुआ था। सड़कों पर पैदल चलते मज़दूर देश का एक आम दृश्य बन गया लेकिन सत्ता को यह नज़र ही नहीं आ रहा था। रेलवे लाइनों पर ट्रेनों के नीचे कुचले जाते मज़दूर समाज और सिस्टम पर हमेशां के लिए एक दाग छोड़ गए। सड़कों पर हुए हादसों में मरते मज़दूर बहुत से सवाल खड़े कर गए। यूं लगने लगा कि सबसे सस्ता है यहाँ मज़दूर और गरीब का खून।
सड़कों पर मजदूरों की गर्भवती पत्नियों के बच्चों का जन्म हुआ। जब ये बच्चे अगर कभी भाग्य से बड़े हुए तो क्या सुनेंगे अपने जन्म की व्यथा कथाएं। तब उनको असलियत मालूम होगी की असलियत में यह देश उस दौर में कितना महान था।
न जाने कितने ही ह्रदय विदारक दृश्य इस दौर ने दुनिया के सामने रखे। विश्व रंगमंच पर मज़दूर केन्द्रीय बिंदु बन कर उभरा। लोगों ने देखा कि कौन हैं नायक और कौन हैं खलनायक। उनकी जेब का पैसा किस किस की जेब में पहुंचा यह लूट सभी ने देखी। जब उनके घर में रोटी नहीं थी उस समय उनके साथ क़र्ज़ बाँटने के बेहूदा मज़ाक किये गए। लोन मेले जैसा व्यवहार हुआ उनको राहत देने के नाम पर।
श्रमिक वर्ग के लिए काला युग बन गया यह दौर। हर तरफ निराशा और हताशा। क्या बनेगा श्रमिक वर्ग का?पूरे संसार को घर और दफ्तर जैसी बड़ी बड़ी इमारतें बना कर देने वाले मज़दूर खुद क्या बेघर ही रहेंगे? न घर अपना न दफ्तर अपना। सड़कों पर निकले तो अत्याचार का डंडा। पुलिस के डंडे उनकी ज़िंदगी की अटूट याद बन गए। इस सब से सवाल तो कई पैदा हुए लेकिन जवाब कहीं न था। सियासी लोग राशन बांटने और कर्फ्यू पास बनाने की कमेटियों में चौधरी बन कर संतुष्ट हो गए। राशन बांटनेवाले खुद को किंग समझने लगे और उन्होंने राशन मांग रहे लोगों अपने दरवाज़े पर खड़ा को भिखारी समझ लिया। माहौल में अंधेरा ही अंधेरा छा गया। आंसूयों में डूब गया श्रमिकों का यह पूरा संसार। उन्हें एक बार फिर लगा कि खुशहाली मेहनत करने से नहीं मिलती न ही ईमानदारी से मिलती है। खुशहाली तो सत्ता में भागीदार बन कर या सत्ता वालों के नज़दीक रह कर मिलती है। यह खुशहाली ताकतवर लोगों के साथ मिल कर दलाली खाने से मिलती है। ज़िंदा रहने के लिए राशन ज़रूरी और राशन के लिए भिखारियों की तरफ पंक्तियों में लगना ज़रूरी है। सोच में ऐसा बदलाव आया कि क्रान्ति की बात ही भूलने लगी। कोई वक़्त था जब कहा जाता था-
इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं;
हम सारी दुनिया मांगेंगे!
इस मौजूदा माहौल ने ऐसे सभी नारे भुला दिए। एक ही बात याद रही राशन कैसे जुटाना है? दूध और सब्ज़ी कैसे खरीदने हैं? दवा चाहिए तो पैसे कहाँ से लाने हैं? क्रांति और दुनिया बदलने के सपने चकनाचूर हो गए। लॉक डाऊन में वो सब भूल गया कि कभी हम लोग गाया करते थे साहिर लुधियानवी साहिब का लोकप्रिय गीत
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी...
वो सुबह कभी तो आएगी...!
जेलों के बिना सरकार का सपना तो सपना ही रह गया। लॉक डाउन में तो हर घर जेल की तरह ही हो गया था। हर गली मोहल्ले में जगह जगह बैरियर बन गए जैसे किसी दुश्मन देश के बॉर्डर पर खड़े हों। किसी की बेटी बीमार हुई तो वह दुसरे शहर पता लेने नहीं पहुंच सका और बेटी दम तोड़ गई। उस मज़दूर पिता के लिए कोरोना से ज़्यादा बुरा वक़्त ले कर आया था लॉक डाउन। बेटी के देहांत की खबर आई तो अंतिम संस्कार में कैसे पहुंचे? दोस्तों मित्रों और कामरेड साथियों ने राज्य तक पहुंचने की आज्ञा का सरकारी पास बनवा कर दिया। टेक्सी पता की तो उसने 18 हज़ार रूपये मांगें जिसका भुगतान उसने अपने गांव पहुंच कर घर के सभी गहने बेच कर किया। यह सब कुछ बहुत से लोगों के साथ हुआ। अपने अपनों से दूर हो गए। लॉक डाउन ने रिश्तों पर ही ताले लगा दिए जो शायद अब कभी न खुलें।
बहुत पहले गीत सुना करते थे--
रात भर का है मेहमां अंधेरा;
किस के रोके रुका है सवेरा!
लेकिन अब सब कुछ भूलने लगा है। यूं लगने लगा है कि अब मज़दूर और गरीब की सुबह तो कभी न होगी। ऐसे लगता है जैसे सारी दुनिया की रौशनी, ख़ुशी और सूरज किसी ने अम्बानियों, अडानियों के घरों में जा कर छुपा दिए हैं। गरीब और श्रमिक के हिस्से का कुछ बचा ही नहीं। ऐसे में आशा की किरन ले कर आई एटक की राष्ट्रीय महासचिव और लोकप्रिय लीडर कामरेड अमरजीत कौर। बोलते बोलते कभी कभी गला भर्रा जाता। फिर अचानक ही जोश भी आता। नारे लगाती बुलंद बाज़ुओं में कम्पन सी भी होती। इन्हीं शब्दों ने एक बार फिर यकीन दिलाया कि हम क्रान्ति ला कर रहेंगे। एक बार फिर वही अहसास हर दिल में जगा:
हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिस का वादा है जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ रूई की तरह उड़ जाएँगे हम महकूमों के पाँव-तले जब धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे बस नाम रहेगा अल्लाह का जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी जो मंज़र भी है नाज़िर भी उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो (--फैज़ अहमद फैज़ साहिब)
इसके साथ ही कामरेड अमरजीत कौर के भाषण का एक छोटा सा अंश भी है। सुनिए देखिये वह अंश। इसके साथ कामरेड स्क्रीन को रैगुलर पढ़िए और सब्सक्राईब भी कीजिये। वीडियो दिखने वाले मीडिया लिंक के चैनल को भी सब्सक्राईब करना मत भूलिए। इस काफिले में आपका शामिल होना भी ज़रूरी है। -रेक्टर कथूरिया
    

Friday, May 22, 2020

कोरोना की आड़ में साज़िशी दमन का आरोप-देश भर में रोष

Friday: 22nd May 2020 at 4:38 PM 
 देश स्तरीय आह्वान पर 16 जन संगठनों द्धारा पंजाब भर में रोष प्रदर्शन 
चण्डीगढ़: 22 मई 2020: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::
आज ट्रेड यूनियनों द्वारा देश भर में रोष प्रदर्शन करने के आह्वान के तहत पंजाब के 16 मज़दूर-मुलाज़िम, किसान, नौजवान, विद्यार्थी संगठनों ने 16 जिलों में 56 जगहों पर रोष प्रदर्शन किए। कई जगहों पर इनमें शामिल संगठनों द्वारा ट्रेड यूनियनों के साथ संयुक्त रोष प्रदर्शन भी किए गए। यह जानकारी आज मज़दूर नेताओं राजविन्दर सिंह, लछमण सिंह सेवेवाला, जगरूप सिंह, प्रमोद कुमार और किसान नेताओं जोगिन्द्र सिंह उगराहाँ, कंवलप्रीत सिंह पन्नू ने अपनी एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में दी।  
रोष प्रदर्शनों को संबोधित करते हुए इन लोकप्रिय जननेताओं ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने कोरोना संकट को बहाना बना कर मज़दूर वर्ग पर तीखा राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक हमला किया है। विभिन्न राज्यों में 8 घंटों की जगह 12 घंटे कार्यदिवस लागू करने समेत अन्य क़ानूनी श्रम अधिकारों का हनन किया गया है और किया जा रहा है। पंजाब में भी बारह घंटे कार्यदिवस लागू करने तैयारी है। भाजपा की उत्तर-प्रदेश सरकार ने तो लगभग सभी श्रम कानून ख़त्म करने का ऐलान कर दिया है। ज़रूरत तो इसकी थी कि कमज़ोर श्रम कानूनों को मज़दूरों के पक्ष में मज़बूत बनाया जाये परन्तु सरकारें न सिर्फ़ इनको और कमज़ोर बनाने पर तुलीं थी बल्कि अब तो ख़त्म ही कर रही हैं। यह प्रक्रिया पहले ही जारी थी परन्तु कोरोना संकट के बहाने और लॉकडाउन का फ़ायदा उठा कर इस मज़दूर विरोधी और देशी-विदेशी पूँजीवादी एजंडे को अंजाम दिया रहा है। इस तरह सरकारें पूँजीपतियों को मज़दूरों से जैसे मर्ज़ी लूट-खसोट और अन्य बेइन्साफ़ी करने की पूरी छुट दे रही हैं। 
नेताओं ने कहा कि सरकारों ने कोरोना संकट के हल के लिए उचित कदम उठाने की जगह इसको और भी गंभीर बनाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि हुकूमत द्वारा कोरोना से बचाव के बहाने जनता पर थोपे गए ग़ैर-जनवादी और दमनकारी लॉकडाउन के ज़रिए मज़दूरों-मेहनतकशों को भुखमरी, शारीरक कमज़ोरी, कोरोना और अन्य बीमारियों से नुकसान का ख़तरा बढ़ाने, पैदल व साईकिलों के ज़रिए लंबे सफरों, पुलिस दमन, नाजायज गिरफ़्तारियों, हादसों, आत्महत्यों आदि मुसीबतों के मुँह में धकेलने की आपराधिक भूमिका निभाई गई है जिसके लंबे समय तक भयानक नतीजे मज़दूरों तथा अन्य जनता को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जनता की समस्याएँ दूर करने की जगह सरकारें ‘‘देश’’ तथा ‘‘राज्य ’’ को कोरोना और लॉकडाउन से हुए नुकसान का बहाना बना कर आर्थिक पैकेज के नाम पर पूँजीपतियों को सरकारी ख़ज़ाना लुटा रही हैं और बिजली क्षेत्र समेत तमाम जन-सेवाओं के उपक्रमों के मुकम्मल निजीकरण के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। सरकारें जनता पर नए टेक्स थोपने की तैयारी कर रही हैं। खेती को राहत के नाम पर खेती उपभोग उत्पाद के उद्योगपतियों को लुटाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ़ जनता को कोरोना संकट, लॉकडाउन और अन्य भयानक मुसीबतों के मुँह में धकेल कर बड़ा राजनीतिक-आर्थिक हमला किया जा रहा है। 
रोष प्रदर्शनों को टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन, पॉवर कॉम एंड ट्रांसको ठेका मुलाज़िम यूनियन, पंजाब खेत मज़दूर यूनियन, टेक्नीकल सर्विसज़ यूनियन, भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहाँ), किसान संघर्ष कमेटी पंजाब, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्ज़ यूनियन, जल स्पलाई एवं सेनिटेशन कंट्रैक्ट वर्कर्ज़ यूनियन पंजाब (रजि. नं 31), नौजवान भारत सभा (ललकार), पी.एस.यू. (शहीद रंधावा), नौजवान भारत सभा, पी.एस.यू. (ललकार), कारख़ाना मज़दूर यूनियन, गुरू हरगोबिंद थर्मल प्लांट लहरा मोहब्बत ठेका मुलाज़िम यूनियन आज़ाद, ठेका मुलाज़िम संघर्ष कमेटी पॉवर कॉम (ज़ोन बठिंडा) और पंजाब रोडवेज़ /पनबस कंट्रैक्ट वर्कर्ज़ यूनियन के नेताओं जसविंदर सिंह सोमा, रछपाल सिंह, हरजिंदर सिंह, लखविंदर सिंह, सुखवंत सिंह, गुरपाल सिंह नंगल, अश्वनी कुमार घुद्दा, छिंदरपाल सिंह, हरिंदर कौर बिंदु, बलिहार सिंह, हरमेश मालड़ी, वरिंदर सिंह मोमी, गुरविंदर सिंह पन्नु, रेशम सिंह, हुशियार सिंह सलेमगढ़, गुरप्रीत सिंह, सुखविंदर सिंह सुख्खी आदि ने संबोधित किया।

Monday, May 18, 2020

मज़दूरों की सुरक्षित वापिसी में व्यस्त CPI से सबंधित वाम नेता

सुबह तीन बजे बस स्टैंड पर पहुंचते हैं एम एस भाटिया साथियों को लेकर 
लुधियाना: 18 मई 2020: (पीपुल्ज़ मीडिया लिंक टीम)::
कामरेड एम एस भाटिया 
वाम के पास साधन संसाधन बेहद कम हैं और ज़िम्मेदारियां सबसे अधिक।  ऐसे में वाम के लोग न गर्मी देख रहे हैं और न ही बारिश। लॉक डाउन शुरू हुआ तो उनका पहला प्रयास था कि कहीं भी कोई मज़दूर भूखा न रह जाये। इस मकसद के लिए स्थानीय स्तर पर फंड बनाये गए और इस कुलेक्शन से राशन खरीदा गया। कुछ दिन तो इसी तरह चला लेकिन इसके बाद समस्या फिर भी विकराल होती चली गयी। 
अनाज कम था और मज़दूरों की संख्या बहुत ही ज़्यादा। बहुत से मज़दूर घबरा कर अपने घरों की तरफ ही पैदल चल पड़े। अच्छे दिनों के सब्ज़बाग देखते देखते लम्बी इंतज़ार कर चुके बेचारे इन गरीब मज़दूरों को स्वतंत्र भारत में पहली बार इतने बुरे दिन देखने पड़े। कहीं मज़दूरों को रेलगाड़ी ने कुचल दिया और कहीं बसों ने और कहीं पर वे तर्क हादसों का शिकार हो गए। मज़दूरों को लाख समझाया गया कि इस तरह पैदल मत निकलो लेकिन वे नहीं माने। 
उनका कहना था कि रेल और बसों में बैठने के लिए बिचौलिए इतने इतने पैसे मांगते हैं कि वे किसी भी तरह नहीं दे सकते। मजबूरी और बेबसी में यह नई तरह का शोषण था जो सरकारी दावों को ठेंगा दिखाते हुए सबके सामने घटित हो रहा था।  लुधियाना में सी पी आई के स्थानीय नेता डाक्टर अरुण मित्रा, डीपी मौड़, रमेश रत्न और अन्य लोगों ने इसे बहुत ही गंभीरता से लिया। कामरेड चमकौर सिंह और कामरेड विजय कुमार ने फील्ड से ग्राउंड रिपोर्ट भी ला कर दी। अब मज़दूरों को सुरक्षित घर भेजने का काम कार्यसूची में पहले स्थान पर आ गया। काम बेहद मुश्किल था। जगह जगह घूमना आसान न था। 
डयूटी लगाई गयी वाम पत्रकार कामरेड एम एस भाटिया की। श्री भाटिया पंजाब स्क्रीन मीडिया के साथ साथ दैनिक नवां ज़माना (जालंधर) के लिए भी कार्य करते हैं। डयूटी लगने पर उन्होंने ठान लिया की अब किसी मज़दूर को शोषण का शिकार नहीं होने देना। प्रशासन ने भी उन्हें सहयोग दिया। 
आज सुबह जब वह लुधियाना के बस स्टैंड पर गए तो वहां मज़दूर भारी संख्या में मौजूद थे। उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग जैसे सभी नियमों की जानकारी परिपक्व कराते हुए पंक्तियों में बिठाया गया।  उनकी टिकट कटवाई और रास्ते के लिए भोजन का प्रबंध भी किया।
इस सारी प्रक्रिया की तस्वीरें भी हमें श्री भाटिया ने ही क्लिक करके भेजी।  स्थान है लुधियाना का बस स्टैंड और समय है आज सुबह 6:44 की हैं। इस मकसद के लिए कामरेड एम एस  भाटिया, दफ्तर के निगरान कामरेड रामचंद और अन्य साथी सहयोगी सुबह तीन बजे ही बस स्टैंड पर पहुंच गए थे। इन्होने भी जाने के लिए तैयार बैठे मज़दूरों को भरे दिल से देखा। 
इधर मज़दूर भी उदासी में थे। अपनी कर्मभूमि से अपनी जन्मभूमि की तरफ भीगी आंखों के साथ जाते हुए मज़दूरों के चेहरों पर जाने की ख़ुशी भी है। उन्हें लगता है शायद वहां उनके गांव में बहुत खुशहाली होगी लेकिन यह भी तो उनकी गलतफ़हमी ही है। जब तक मज़दूरों का अपना शासन नहीं आता तब तक उसकी ज़िंदगी में इसी तरह की मुश्किलें लिखीं हैं। इसलिए किस्मत को अब खुद लिखना होगा। -रेक्टर कथूरिया 

Wednesday, May 6, 2020

ज़रुरतमंदों की सेवा के लिए अग्रणी पंक्ति में है हैल्पिंग हैण्डज़ संगठन

 वक़्त सब कुछ देख रहा है--वक़्त सब कुछ बदलेगा भी !
लुधियाना: 6 मई 2020: (एम एस भाटिया//मीडिया लिंक रविंद्र//कामरेड स्क्रीन):: 
ज़िंदगी और दुनिया को बहुत ही पत्थर दिल हो कर भी देखा जा सकता था। बहुत ही बेरुखी के साथ। बहुत ही बेरहमी के साथ। सरकार ने लॉक डाउन लागू करने से पहले आम गरीब और मध्यवर्गीय लोगों के लिए कुछ नहीं सोचा। समाज के सम्पन्न लोग भी ऐसा ही सोच सकते थे। कोई मरे कोई जिए। कोई भूख से मरे या आत्महत्या करके हमें क्या लेना देना। यहां किसी का क्या जाता था। पर समाज के अंदर ज़िंदा इंसानियत का सबूत है कि 
सम्पन्न लोग तो दूर गरीब और मध्य वर्गीय लोगों ने भी ऐसी बेरुखी नहीं दिखाई। इनके दिल में संवेदना जगी। इनके दिल को कुछ महसूस हुआ। इन्होने सरकार की तरह नहीं एक सच्चे इंसान की तरह सोचा।  आम जनता पर मुसीबत बन के टूटे लॉक डाउन पर इन लोगों ने आम जनता के दुःख दर्द को बहुत ही शिद्दत के साथ महसूस किया। 
आज के युग में जब बड़े बड़े सियासतदान भी खुद को व्यापारी बताते हुए हर चीज़ का कारोबार करते हैं उस दौर में इस तरह के संवेदनशील लोगों ने धर्म कर्म और पार्टी लाईन से ऊपर उठ कर सोचा।एक दुसरे को फोन खड़काये। वीडियो काले कीं। सबसे पहले सबसे आगे आये पूरी तरह से खामोश रह कर समाज के लिए बहुत कुछ करने वाले ईएनटी के स्पेशलिस्ट सर्जन डाक्टर अरुण मित्रा। उन्होंने वही लोग ढूंढे जो उनकी सोच के भी नज़दीक थे। एक सहयोगी मिले पीएयू में बरसों तक यूनियन प्रधान रहने वाले कामरेड डीपी मौड़। एक अन्य मित्र इस मकसद के लिए सामने आये स्टेट बैंक आफ इण्डिया में काम करने वाले कामरेड नरेश गौड़। सीपीआई की जिला शहरी इकाई के सचिव कामरेड रमेश रत्न भी इस टीम के सहयोगी आ बने। ब्ल्यू स्टार ऑपरेशन से ले कर अब तक बहुत ही ख़ामोशी से समाज सेवा में जुटे डीएमसी अस्पताल के पूर्व मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डाक्टर बलबीर शाह भी बहुत ही उत्साह के साथ इस काफिले से आ जुड़े। जब जब भी वकीलों को कोई कठिनाई आई या समाज के किसी भी अन्य वर्ग को क़ानूनी सेवा की आवश्यकता पड़ी तो तुरंत अपना सहयोग और मार्गदर्शन देने वाले वकील नवल छिब्बर भी इनसे आ मिले। समाज सेवा के लिए परिवार की नाराज़गी मौल ले कर हर पल जन सेवा को तैयार रहने वाले रिटायर्ड बैंक मुलाज़िम एम एस भाटिया (सेंट्रल बैंक आफ इण्डिया) भी इस टीम में आ मिले। 
एक संगठन बनाया गया-"हैल्पिंग हैन्डज़"। इस टीम ने कुछ अन्य लोगों को भी साथ लिया और शुरू किया प्रयास कि कहीं कोई भूखा न रह जाये। आरम्भ में 400 परिवारों का चुनाव हुआ। मतलब दो हज़ार लोग। इनको राशन पहुंचने का काम शुरू कर दिया गया। बस अचानक इलाके में गए। ज़रूरतमंद परिवार का दरवाज़ा खटखटाया और दरवाज़ा खुलते ही उसे राशन की किट थमा कर वहां से निकल लिए। न कोई शोर शराबा न ही कोई फोटो। बस लिस्ट के मुताबिक अगले ज़रूरतमंद घर तक पहुंचने की जल्दी। इस किट में रसोई का थोड़ा थोड़ा सब कुछ था। 
यह एक कोशिश थी अपनी जानकारी में आये ज़रूरतमंद लोगों को भूख के विकराल दानव  से बचाने की। एक तरफ कोरोना--दूसरी तरफ भूख। इस नाज़ुक माहौल में भी जब बहुत से सियासतदान अपनी राजनीती की रोटियां सेंक रहे थे तब हैल्पिंग हैन्डज़ घर घर पहुँच कर लोगों को दिलासा दे रहा था कि घबराओ मत--सब कुछ जल्द ही ठीक हो जायेगा। 
सबसे पहले तो पैसे एकत्र करना ही बहुत मुश्किल काम था। उसके बाद राशन खरीदना, उसे पैक करना और ज़रूरतमंदों तक पहुंचाना भी बेहद मुश्किल था। इस मकसद के लिए आगे आये डाक्टर अरुण मित्रा के युवा  सहयोगियों की सक्रिय टीम के सदस्य डाक्टर कुलदीप बिन्द्र, डाक्टर रामाधार, अनोद कुमार, अनिल कुमार, अजय कुमार और कुछ अन्य लोग। 
युवा लोगों की यह टोली मन में कुछ करने की ठान कर जुट गयी। न रविवार देखा न सोमवार। न दिन देखा न रात। हर पल यही सोच कि कोई भूखा न रह जाये। 
इस टीम के लोग थोड़ा सा समय नाश्ते पानी के लिए निकालते और नहाने के नियम का पालन भी करते। इसके साथ ही अपने घरों की ज़िम्मेदारियां और कामकाज भी निपटाते। अधिकतर समय इस राशन के मिशन पर ही लगता। पैक किये राशन को अलग अलग स्थानों पर पहुंचाने की बारी आयी तो यह काम भी बेहद मुश्किल था। 
राजा टैंट हाऊस के सरदार भगवंत सिंह और गगनदीप सिंह ने यह ज़िम्मेदारी उठायी। सीता राम ड्राइवर और संजीव मैनेजर ने इस सारे नेक काम को बहुत ही मेहनत और प्रेम से निभाया। 
 गदरी बाबा दुल्ला सिंह और ज्ञानी निहाल सिंह फाउंडेशन जलालदीवाल, सीआईआई फाउंडेशन, सीआईआई और पैक्सीको ने भी इसमें बहुत सहयोग दिया। डाक्टर हरमिंदर सिंह सिद्धु के ज़रिए लुधियाना के 127 परिवारों को डेढ़ महीने का राशन दिया गया। अलग अलग धार्मिक संस्थानों ने भी इस मकसद के लिए बहुत सेहोग दिया। हमारे निवेदन पर भाई घणईया सेवा सोसायटी, राधा स्वामी सतसंग ब्यास-प्रताप सिंह वाला, सावन कृपाल रूहानी आश्रम रख बाग, दण्डी स्वामी और जैन स्थानक समिट्री रोड ने भी जनसेवा के इस मिशन में सक्रिय सहयोग दिया। इसी तरह डा. जगमेल सिंह ने 35 परिवारों के लिए राशन दिया। बहुत से अन्य संगठन और व्यक्ति भी हैं जिनका यहां उल्लेख नहीं किया जा सका। 
वक़्त की एक बहुत बड़ी खूबी है कि जैसे भी हो यह निकल जाता है। गुज़र जाता है। रुकता कभी नहीं। अब भी समय गुज़र जायेगा। याद रहेंगे तो वे लोग जिन्होंने लॉक डाउन जैसे फैसले सुनाते वक़्त भी कोई योजना न बनाई। बिलकुल न सोचा कि लोग गुज़ारा कैसे करेंगे। इसके साथ ही याद रहेंगे वे लोग जिन्होंने अपने दो वक़्त की रोटी में से भी आधी रोटी निकाल कर दुसरे ज़रूरतमंद लोगों को खिलाई। उन लोगों को जिनकी जेब भी खाली थी और रसोई भी। मज़दूरों को पैदल निकलते देखने वाले भी याद रखे जायेंगे। भूख से कराहते लोगों का मज़ाक उड़ाते हुए छतों पर चढ़ कर थालियां खड़काते हुए आतिशबाज़ी चलाने वाले भी याद रखे जायेंगे। लोग जाग रहे हैं। बाज़ निगाहों से सब देख भी रहे हैं। एक दिन एक एक बात का हिसाब मांगेंगे लोग। वक़्त भी सब कुछ देख रहा है, सब कुछ बताएगा भी एक दिन सब कुछ बदलेगा भी।

ऐ खाकनशीनों उठ बैठो, वह वक्त करीब आ पहुंचा है,
जब तख्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे।   --जनाब फैज़ अहमद फैज़ साहिब