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Saturday, July 18, 2026

19 जुलाई: बैंक राष्ट्रीयकरण—पर मनिंदर सिंह भाटिया का विशेष लेख

On Saturday 18th July 2026 at 22:37 WhatsApp Regarding Nationalisation of Banks By M S Bhatia

सार्वजनिक बैंकिंग की विरासत और आज की चुनौतियाँ

लुधियाना से बैंकिग इंडस्ट्री से रिटायर हुए मनिंदर सिंह भाटिया की कलम से 

AI image Regarding Banks Nationalisation 

इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं,
जो केवल किसी समय की सरकार की नीति नहीं होते, बल्कि पूरे राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक दिशा को नया मोड़ देते हैं। 19 जुलाई 1969 को देश के 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण ऐसा ही एक ऐतिहासिक निर्णय था। इसने भारतीय बैंकिंग को बड़े औद्योगिक घरानों और शहरी व्यापारिक हितों की सीमाओं से निकालकर किसानों, मज़दूरों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण जनता के विकास से जोड़ा।


1947 में
स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसमें बैंकिंग सेवाएँ मुख्यतः शहरों और बड़े व्यापारिक केंद्रों तक सीमित थीं। देश की अधिकांश आबादी—किसान, खेत मज़दूर, कारीगर और छोटे व्यापारी—औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर थी। उनकी ऋण आवश्यकताएँ साहूकारों और महाजनों से पूरी होती थीं, जो अत्यधिक ब्याज वसूलकर उनकी आर्थिक मजबूरी का शोषण करते थे।

स्वतंत्र भारत के सामने इसलिए एक बुनियादी प्रश्न था—क्या बैंकिंग व्यवस्था केवल निजी लाभ कमाने के लिए काम करेगी या उसे राष्ट्रीय विकास और सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जाएगा?

सामाजिक नियंत्रण का अधूरा प्रयोग

1960 के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया था कि निजी वाणिज्यिक बैंक देश की विकास संबंधी जरूरतों के अनुरूप अपनी ऋण नीति में आवश्यक परिवर्तन नहीं कर रहे थे। कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर व्यवसायों और ग्रामीण क्षेत्रों को संस्थागत ऋण बहुत सीमित मात्रा में मिलता था, जबकि बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक ऋण का बड़ा हिस्सा प्राप्त होता था।

इस असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 1967–68 में बैंकों पर “सामाजिक नियंत्रण” की नीति लागू की। इसका उद्देश्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना नहीं, बल्कि उनकी ऋण नीतियों को राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना था।

इस नीति के अंतर्गत बैंक निदेशक मंडलों में कृषि, लघु उद्योग, सहकारिता और अन्य जनहितकारी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रयास किया गया। आशा थी कि इससे बैंक ऋण का वितरण अधिक संतुलित होगा और जनता की जमा पूँजी का उपयोग व्यापक सामाजिक हित में किया जा सकेगा।

लेकिन यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया। बैंकों का स्वामित्व और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति निजी हाथों में ही बनी रही। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की ओर ऋण प्रवाह में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया। इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि केवल नियम बनाकर निजी स्वामित्व वाली बैंकिंग व्यवस्था के चरित्र को नहीं बदला जा सकता।

सामाजिक नियंत्रण राष्ट्रीयकरण का विकल्प सिद्ध नहीं हुआ; बल्कि उसकी असफलता ने बैंक राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया।

राष्ट्रीयकरण की माँग और जन आंदोलन

बैंक राष्ट्रीयकरण का निर्णय अचानक नहीं लिया गया था। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा ट्रेड यूनियनों, बैंक कर्मचारियों और वामपंथी दलों का आंदोलन भी था। कम्युनिस्ट आंदोलन ने बैंकिंग संसाधनों को बड़े औद्योगिक घरानों के नियंत्रण से निकालकर राष्ट्रीय विकास के लिए इस्तेमाल करने की माँग प्रमुखता से उठाई।

सांसद और प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन ने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार बैंक राष्ट्रीयकरण की माँग के समर्थन में लाखों लोगों के हस्ताक्षर एकत्र किए गए। इन हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापनों के बड़े-बड़े बंडल दिल्ली लाकर संसद के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

यह कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कई महीनों तक चला व्यापक जन अभियान था। इस आंदोलन ने बैंकिंग व्यवस्था के निजी चरित्र और बड़े पूँजीपति घरानों के साथ उसके संबंधों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया।

19 जुलाई 1969 का ऐतिहासिक फैसला

19 जुलाई 1969 की मध्यरात्रि को भारत सरकार ने अध्यादेश जारी करके ₹50 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। बाद में संसद ने इस निर्णय को कानूनी स्वीकृति प्रदान की।

राष्ट्रीयकृत किए गए बैंकों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनाइटेड कमर्शियल बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, देना बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, सिंडिकेट बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र शामिल थे।

इस निर्णय ने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का चरित्र बदल दिया। पहली बार स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया गया कि बैंक केवल निजी लाभ कमाने वाली व्यावसायिक संस्थाएँ नहीं हैं। जनता की बचत को एकत्र करके उसे कृषि, लघु उद्योग, ग्रामीण विकास, स्वरोज़गार और कमजोर वर्गों की आर्थिक उन्नति की ओर ले जाना भी बैंकिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

उस समय कुछ औद्योगिक घरानों और अर्थशास्त्रियों ने बैंक राष्ट्रीयकरण का विरोध किया। उनका तर्क था कि सरकारी नियंत्रण से बैंकों की कार्यकुशलता प्रभावित होगी और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। इसके विपरीत राष्ट्रीयकरण के समर्थकों का कहना था कि भारत जैसे विकासशील देश में बैंकिंग को पूरी तरह बाज़ार और निजी लाभ की शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

बैंकिंग को गाँवों और आम जनता तक पहुँचाना

राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र की प्राथमिकताएँ बदल गईं। इससे पहले बैंक मुख्य रूप से बड़े शहरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और औद्योगिक घरानों पर केंद्रित थे। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में हजारों नई बैंक शाखाएँ खोली गईं।

करोड़ों किसान, खेत मज़दूर, छोटे दुकानदार, कारीगर और स्वरोज़गार करने वाले लोग पहली बार औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। यह केवल शाखाओं की संख्या बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाने की प्रक्रिया थी।

हरित क्रांति के दौरान सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, ट्रैक्टर तथा अन्य कृषि उपकरणों के लिए बैंक ऋण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छोटे और कुटीर उद्योगों को भी संस्थागत वित्तीय सहायता मिलने लगी।

इसी दौर में प्राथमिकता क्षेत्र ऋण की नीति विकसित हुई। इसके अंतर्गत बैंकों को कृषि, लघु उद्योग, शिक्षा, आवास, स्वरोज़गार और समाज के कमजोर वर्गों को ऋण देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बैंकिंग को केवल लाभ कमाने की गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का माध्यम माना गया।

इस परिवर्तन में बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने दूर-दराज़ के इलाकों में शाखाएँ स्थापित कीं, लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित किया और बैंकिंग सेवाओं को आम नागरिकों तक पहुँचाया। आज जिस वित्तीय समावेशन की चर्चा की जाती है, उसकी वास्तविक नींव इसी दौर में रखी गई थी।

1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण

बैंक राष्ट्रीयकरण का दूसरा चरण 1980 में आया, जब ₹200 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले छह और प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इनमें आंध्रा बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, न्यू बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब एंड सिंध बैंक और विजया बैंक शामिल थे।

इसके बाद देश के लगभग 91 प्रतिशत बैंकिंग कारोबार पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण स्थापित हो गया। बैंकिंग का विस्तार शहरों से गाँवों तक हुआ और गरीब किसानों तथा छोटे व्यापारियों की साहूकारों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया गया।

राष्ट्रीयकरण की सफलता का मूल्यांकन केवल बैंकों के लाभ से नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने कितने लोगों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ा, कितने गाँवों में वित्तीय सेवाएँ पहुँचाईं और देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में कितना योगदान दिया।

उदारीकरण के बाद की बैंकिंग: नई चुनौतियाँ और सार्वजनिक बैंकों की भूमिका

1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित नई आर्थिक नीति अपनाई। बैंकिंग क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव किए गए। नए निजी बैंकों को लाइसेंस मिले, विदेशी बैंकों का विस्तार हुआ और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया।

इन परिवर्तनों से बैंकिंग तकनीक, डिजिटल भुगतान, ग्राहक सेवा और संचार व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार हुए। लेकिन इसके साथ एक पुराना प्रश्न फिर सामने आया—क्या बैंकिंग का उद्देश्य केवल अधिक लाभ कमाना है या उसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए?

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आज भी कृषि, शिक्षा, छोटे उद्योगों, स्वयं सहायता समूहों और कमजोर वर्गों को ऋण देने की प्रमुख जिम्मेदारी निभाते हैं। निजी बैंक स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों और ग्राहकों को अधिक प्राथमिकता देते हैं, जहाँ व्यावसायिक लाभ की संभावना अधिक होती है।

हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि बड़े बैंक अधिक मजबूत, पूँजी-संपन्न और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनेंगे। दूसरी ओर सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण की कोशिशों ने उनकी सामाजिक भूमिका के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं।

एनपीए और बड़े कर्जदारों का सवाल

भारतीय बैंकिंग की एक बड़ी समस्या गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की है। लेकिन इस समस्या को केवल सार्वजनिक बैंकिंग की विफलता बताना उचित नहीं होगा। बड़े औद्योगिक घरानों को दिए गए ऋणों का न लौटना, जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले बड़े कर्जदारों पर कमजोर कार्रवाई तथा कानूनी वसूली प्रक्रिया में देरी भी इस संकट के प्रमुख कारण हैं।

छोटे किसान या सामान्य ऋणधारक पर वसूली के लिए तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन हजारों करोड़ रुपये का ऋण न लौटाने वाले बड़े कर्जदार कई बार व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। इसलिए बैंकिंग सुधारों की वास्तविक दिशा बड़े कर्जदारों की जवाबदेही, पारदर्शी ऋण वितरण और प्रभावी वसूली तंत्र की स्थापना होनी चाहिए।

सार्वजनिक बैंकों की आज भी जरूरत

आज भी जनधन खाते खोलने, किसानों को ऋण देने, पेंशन और सरकारी सहायता पहुँचाने, स्वयं सहायता समूहों को वित्त उपलब्ध कराने तथा आर्थिक संकट के समय सरकारी नीतियों को लागू करने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक बैंकों ने राहत योजनाओं, ऋण सहायता और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे एक बार फिर स्पष्ट हुआ कि संकट के समय केवल लाभ आधारित बैंकिंग व्यवस्था समाज की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती।

सार्वजनिक बैंकों की कमियों को दूर करना आवश्यक है। उनमें पारदर्शिता, पेशेवर दक्षता, जवाबदेही और तकनीकी क्षमता बढ़नी चाहिए। राजनीतिक हस्तक्षेप तथा गलत ऋण वितरण पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन कमियों का समाधान निजीकरण नहीं है।

निष्कर्ष

19 जुलाई 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था। यह भारत की आर्थिक सोच में आया ऐतिहासिक परिवर्तन था, जिसने बैंकिंग व्यवस्था को बड़े व्यापारिक और औद्योगिक हितों की सीमाओं से निकालकर गाँवों, किसानों, छोटे उद्योगों और आम जनता से जोड़ा।

आज बैंकिंग क्षेत्र तकनीक, प्रतिस्पर्धा और नई आर्थिक परिस्थितियों के कारण तेजी से बदल रहा है। फिर भी सार्वजनिक बैंकों की सामाजिक जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी राष्ट्रीयकरण के समय थी।

वास्तविक चुनौती पुराने मॉडल पर आँख बंद करके लौटने या पूरी तरह निजीकरण की राह अपनाने की नहीं है। आवश्यकता ऐसी बैंकिंग व्यवस्था की है, जो कार्यकुशलता और पारदर्शिता को सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ सके।

इतिहास सिखाता है कि जब वित्तीय संस्थाएँ जनता से दूर हो जाती हैं, तो वे अपना वास्तविक उद्देश्य खो देती हैं। लेकिन जब बैंकिंग व्यवस्था समाज और उसकी आवश्यकताओं से जुड़ी रहती है, तब वह राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बनती है।

Tuesday, March 31, 2026

वामपंथी विचारधारा की उपज है नक्सलवाद--केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह

प्रविष्टि तिथि: 30 March 2026 at 10:03 PM by PIB Delhi

"नक्सलवाद का समर्थन नरसंहार का समर्थन है"

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नक्सलमुक्त भारत पर विशेष चर्चा का जवाब दिया 

आज लोक सभा में वामपंथी उग्रवाद (LWE) से देश को मुक्त कराने के प्रयास पर चर्चा का जवाब दिया

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नई दिल्ली
: 30 मार्च 2026: (PIB Delhi//कामरेड स्क्रीन डेस्क):: 

चालू बरस 2026 का मार्च का महीना समाप्त हो रहा है। देश और दुनिया की निगाहें नक्लवाद उन्मूलन के उस एलान पर थी जो केंद्र सरकार ने पहले ही किया हुआ था। इस महीने के अंत में 30 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मस्से पर बहुत से पहलु स्पष्ट किए और बहुत सी बातें बेबाकी से कहीं। 

उन्होंने स्पष्ट कहा कि वामपंथी विचारधारा की उपज है नक्सलवाद। साथ ही यह भी कहा कि गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, नक्सलवाद के कारण गरीबी फैली है। 

केंद्रीय गृह मंत्री ने सीधे शब्दों में कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी अन्याय का विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि हमारी संसदीय प्रणाली का विरोध करने के लिए बनी है। इसके साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि नक्सली हिंसा करने वालों के दिन अब लद गए हैं। 

उन्होंने दोहराया कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की कमी नहीं बल्कि वामपंथी विचारधारा है, जिसे 1969 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ दल की नेता ने इसे स्वीकार कर लिया था। 

उन्होंने यह दावा भी किया कि नक्सल-मुक्त भारत मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। 

सके साथ ही उन्होंने इतिहास की चर्चा करते हुए कहा कि जिस कम्युनिस्ट पार्टी की नींव ही दूसरे देश की विचारधारा से प्रेरित हो, वो भारत का भला कैसे करेगी?

माओवादियों ने रेड कॉरिडोर भेदभाव का विरोध करने के लिए  नहीं बल्कि सरकार की पहुँच कम होने के कारण चुना था। 

वामपंथी विचारधारा के समर्थकों ने भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस को नहीं बल्कि “MAO” को अपना आदर्श माना। 

इधर ये मोदी सरकार है जो हथियार उठायेगा उसको हिसाब देना पड़ेगा। 

चूंकि इस इलाके पर लाल आतंक की परछाई थी इसलिए बस्तर विकास से पिछड़ गया था, लाल आतंक की परछाई हट गई, अब बस्तर विकसित हो रहा है। 

नक्सलमुक्त भारत मोदी सरकार के सबसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण सफलता। 

इसका पूरा श्रेय केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, विशेषकर कोबरा और CRPF के जवानों, राज्य पुलिस, छत्तीसगढ़ पुलिस और DRG जवानों और स्थानीय आदिवासियों को जाता है। 

वामपंथी उग्रवादियों ने दशकों तक जहाँ विकास नहीं पहुंचने दिया, वहां मोदी सरकार घर-घर विकास पहुंचा रही है। 

मोदी सरकार डरने वाली नहीं बल्कि सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। 

सत्ता के समर्थन के बिना देश के बीचो-बीच, तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक, रेड कॉरिडोर संभव ही नहीं था। 

वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है इसलिए सारे वामपंथी अलग-अलग थ्योरी रच-रच कर अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं। 

स्टेट, गवर्नेंस, संविधान और सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा कर रक्तपात करना ही वामपंथी विचारधारा का उद्देश्य है, जो अब सफल नहीं होगा। 

नक्सलियों ने गांवों में स्कूल, दवाखाने और बैंक जला दिए, फिर लोगों को बरगला कर बोलते थे विकास नहीं पहुंचा। 

मैंने बहुत से बुद्धिजीवियों के आर्टिकल्स पढ़े जो नक्सलियों के मानव अधिकार की बात कर रहे थे, उनमें से एक भी आर्टिकल उस माँ के लिए नहीं था जिसके बच्चे को नक्सली जबरदस्ती उठा ले गए या उन शहीदों की विधवाओं के लिए जिनको नक्सालियों ने मारा।   

वामपंथी विचारधारा का ध्रुव वाक्य "सत्यमेव जयते" नहीं बल्कि ये है कि “सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।”

नक्सलियों के साथ रहते-रहते मुख्य  विपक्षी पार्टी और उसके नेता खुद नक्सली बन गए हैं। 

नक्सलियों के कारण हुए नरसंहार में नक्सलियों के समर्थक भी उतने ही भागीदार हैं जितना हिंसा करने वाले हैं। 

मुख्य विपक्षी दल के शासनकाल में बनी NAC में भरे पड़े थे नक्सल समर्थक। 

सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी ऑपरेशन को अन्याय की लड़ाई बताने वालों को बस्तर ओलिंपिक और बस्तर पंडूम में जरुर जाना चाहिए।   

चाहे नक्सलियों से मिलना हो या उनका समर्थन करना हो, मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता हमेशा नक्सलियों के साथ खड़े दिखते हैं।  

एक समान्तर सरकार और न्याय व्यवस्था चला कर आदिवासियों का शोषण करने वाले नक्सली लोकतंत्र के घोर विरोधी हैं। 

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज लोक सभा में नियम 193 के अंतर्गत वामपंथी उग्रवाद (LWE) से देश को मुक्त कराने के प्रयास पर चर्चा का जवाब दिया।

चर्चा का जवाब देते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों और उनके समर्थकों ने भोले भाले आदिवासियों के सामने एक गलत प्रकार का नेरेटिव रखा गया था कि वे उनके अधिकारों और उन्हे न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है और वहां हर गांव में स्कूल बनाने और राशन की दुकान खोलने की मुहिम शुरू हो चुकी है। गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलवाद की वकाल करने वाले बताएं कि 1970 से अब तक यह सब क्यों नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार आने के बाद पूरे देश के हर गरीब को घर, गैस, पीने का पानी, 5 लाख तक का बीमा, 5 किलो मुफ्त अनाज मिला, लेकिन बस्तर वाले छूट गए क्योंकि सत्य को झुठलाया गया और लाल आतंक की परछाई के कारण वहां विकास नहीं पहुंचा था। श्री शाह ने कहा कि लाल आतंक इसीलिए नहीं था कि वहां विकास नहीं था, बल्कि लाल आतंक के कारण वहां विकास नहीं हुआ था, लेकिन आज लाल आतंक की परछाई हट गई है और बस्तर विकसित हो रहा है।

श्री अमित शाह ने कहा कि यह नरेन्द्र मोदी जी की सरकार है और जो भी हथियार उठाएगा उसे हिसाब चुकता करना पड़ेगा। गृह मंत्री ने कहा कि सरकार संवेदनशील है और सभी समस्याओं को सुनना और उनका निराकरण करना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने योजनाएं बनाई हैं लेकिन उन पर अमल नहीं करने देंगे क्योंकि वामपंथी उग्रवादी और उनके समर्थकों की  आइडियोलॉजी यानी उनका अवैध शासन वहां चलता रहे। श्री शाह ने  कहा कि आजादी के बाद 75 साल में से 60 साल तक देश में मुख्य़ विपक्षी पार्टी का शासन रहा तब भी आदिवासी विकास से महरूम कैसे रहे। उन्होंने कहा कि विकास तो अब नरेन्द्र मोदी जी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टी को अपने अंदर झांककर देखना चाहिए कि दोषी कौन है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार, बंगाल, केरल, कर्नाटक के कुछ हिस्से और उत्तर प्रदेश के 3 ज़िलों सहित 12 राज्यों में  पूरा रेड कॉरिडोर बनाकर रखा था। इन क्षेत्रों में 12 करोड़ लोग सालों तक गरीबी में जीते रहे और 20,000 युवा मारे गए इसके लिए कौन जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की मांग नहीं बल्कि एक आइडियोलॉजी है। नक्सलवाद का मूल कारण विकास की कमी नहीं बल्कि वामपंथी विचारधारा है, जिसे 1969 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ दल की नेता ने स्वीकार कर लिया था।

श्री अमित शाह ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने पूरे देश के सामने स्वीकारा किया था कि कश्मीर और नॉर्थईस्ट की तुलना में देश की आंतरिक सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी समस्या हथियारबंद माओवादी हैं। उन्होंने कहा कि 2014 में परिवर्तन हुआ और प्रधानमंत्री मोदी जी के शासन में कई वर्षों पुरानी समस्याओं का निराकरण हुआ, धारा 370 और 35A हट गई, राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बन चुका है, GST आज वास्तविकता बन चुका है, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) बन चुका है, विधायी मंडलों में मातृशक्ति को 33% आरक्षण दिया गया है। उन्होंने कहा कि आजादी के वक्त से इस देश की जनता जो कई सारे बड़े काम चाहती थी वे सभी काम नरेन्द्र मोदी जी के शासन के 12 साल में हुए और अब नक्सलवाद से मुक्त भारत की रचना भी नरेन्द्र मोदी जी के शासन के अंदर ही होगी। श्री शाह ने कहा कि पिछले 12 साल देश के लिए बहुत शुभ साबित हुए हैं। देश को गरीबी से मुक्ति दिलाने, युवाओं के लिए नई शिक्षा पद्धति लाने, आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने, देश के मूलों से न जुड़ी नीतियों को दरकिनार करने के लिए गत  12 साल में बहुत कुछ हुआ है। उन्होंने कहा कि अगर सबसे अधिक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले को देखा जाए तो निसंकोच नक्सलमुक्त भारत सबसे ऊपर होगा।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलमुक्त भारत जो बड़ी घटना देश में आकार लेने जा रही है, उसका पूरा श्रेय हमारे केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, विशेषकर कोबरा और सीआरपीएफ के जवानों, राज्य पुलिस, विशेषकर छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस और डीआरजी के जवानों और स्थानीय आदिवासियों को जाता है। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवाद के समाप्त होने में जनता का भी बड़ा योगदान है।

श्री अमित शाह ने कहा कि इस विचारधारा का विकास और विकास की मांग से भी कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि यह कौन सी विचारधारा है? क्या है माओवादी विचारधारा? इसका ध्रुव वाक्य क्या है? इनका ध्रुव वाक्य है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। ये विकास के लिए नहीं बल्कि अपनी आइडियोलॉजी के अस्तित्व, उसकी विजय और आइडियोलॉजी को भोले-भाले आदिवासियों में फैलाकर कर सत्ता हासिल करने के लिए है। इनका लोकतंत्र पर कोई विश्वास नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने इनकी तुलना भगत सिंह जी और बिरसा मुंडा से कर दी। शहीद भगत सिंह और भगवान बिरसा मुंडा, जो अंग्रेजों के सामने लड़े, उनकी तुलना आप संविधान तोड़कर हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों की हत्या करने वालों लोगों के साथ कर रहे हैं? यह विचारधारा कहती है कि दीर्घकालीन युद्ध ही उनकी विचारधारा को फैला सकता है। उनको अपने लोगों  का खून बहाने से भी कोई परहेज़ नहीं है। इस विचारधारा के समर्थकों ने भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस को नहीं बल्कि माओं को अपना आदर्श माना है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि सच्चाई यह है कि इन्होंने पूरे रेड कॉरिडोर को इसीलिए चुना था क्योंकि वहां राज्य की पहुंच कम थी। भोले भाले आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथों में हथियार पकड़ा दिए गए। उन्होंने कहा कि जो आदिवासी 15 अगस्त 1947 से पहले भगवान बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, मुर्मू बंधुओं को हीरो मानकर चलता था, वह आदिवासी 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो कैसे मानने लगा? श्री शाह ने कहा कि विकास और अन्याय के कारण नहीं बल्कि कठिन भूगोल और राज्य की अनुपस्थिति के कारण अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने इस क्षेत्र को चुना और भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाना शुरू किया। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों ने सालों तक उस क्षेत्र में विकास को पहुंचने नहीं दिया, लेकिन अब नरेन्द्र मोदी जी के शासन में वहां घर-घर विकास पहुंच रहा है। गृह मंत्री ने कहा कि गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इस पूरे क्षेत्र में वर्षों तक गरीबी रही। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से नहीं जुड़ी बल्कि वैचारिक हैं।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलबाड़ी में साक्षरता का दर 32%, बस्तर में 23%, सहरसा, बिहार में 33% और बलिया, उत्तर प्रदेश में 31% था। इसी प्रकार, नक्सलबाड़ी में प्रति व्यक्ति आय ₹500, बस्तर में ₹190, सहरसा में ₹299 और बलिया में ₹374 थी। उन्होंने कहा कि चारों क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय भी एक समान थी, लेकिन नक्सलबाड़ी और बस्तर में वामपंथी उग्रवाद पनपा और सहरसा और बलिया में नहीं। ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि सहरसा और बलिया का भूगोल उनके अनुकूल नहीं था, वहां घने जंगल, नदी नाले, छुपने की पहाड़ियां नहीं थी, हथियार लेकर अपनी मूवमेंट करने, आदिवासियों को दबाने और उनको जबरदस्ती अपनी आइडियोलॉजी के साथ जोड़ने की अनुकूलता नहीं थी। उन्होंने कहा कि अगर विकास ही पैमाना होता, अगर प्रति व्यक्ति आय ही पैमाना होता, तो देश के बहुत सारे हिस्से ऐसे थे जहां 1970 में विकास नहीं पहुंचा था, लेकिन वहाँ नक्सलवाद क्यों नहीं फैला?

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि ये डरने वाली नहीं बल्कि सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलबाड़ी और बंगाल से हुई। 1971 के एक ही वर्ष में वहां 3620 हिंसा की घटनाएं हुई थीं,1980 का दशक आते-आते पीपल्स वॉर ग्रुप बन गया और फिर यह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा राज्यों में फैला। 1990 के दशक में वामपंथी विचारधारा सिकुड़ती गई और यहां पर भी उग्रवादी गुटों और वामपंथी पार्टियों में विलय शुरू हुआ। 2004 में दो प्रमुख गुट मिल गए और सीपीआई माओवादी का गठन किया। 1970 से 2004 के कालखंड में चार साल छोड़कर पूरा समय मुख्य विपक्षी पार्टी का शासन रहा है।

श्री अमित शाह ने कहा कि यही समय है जब नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ ये आंदोलन 12 राज्यों, देश के 17% भूभाग और 10% से ज्यादा आबादी में पहुंच गया। उन्होंने कहा कि सत्ता के समर्थन के बगैर देश के बीचो-बीच, तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक, रेड कॉरिडोर संभव ही नहीं था। उन्होंने कहा कि जो हथियार पकड़े गए हैं, उसमें से 92% हथियार पुलिस से लूटे हुए थे। थाने लूट लिए गए, गोलियां लूट ली गई और उनका उपयोग निर्दोष जवानों, बच्चों, कृषकों को मारने के लिए किया गया। वामपंथी विचारधारा ने इसे एक भ्रांति की तरह प्रोपेगेंडा के माध्यम से अपनी विचारधारा को टिकाने के लिए फैलाया कि अन्याय से बचने के लिए हथियार हाथ में उठाए।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि किसी भी समस्या का समाधान बहस से निकल सकता है, हथियारों से नहीं। उन्होंने कहा कि नक्सलियों ने इस देश में वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया, स्टेट का वैक्यूम, सारी व्यवस्थाएं नष्ट कर गवर्नेंस का वैक्यूम, संविधान से श्रद्धा खत्म कर संविधान का वैक्यूम और पुलिस थानों को जलाकर सिक्योरिटी वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया है। गृह मंत्री ने कहा कि माओवादी और नक्सली  हिंसा करने वालों के दिन अब लद गए हैं और मोदी सरकार में ये लंबे समय नहीं चलेगा।

श्री अमित शाह ने कहा कि माओवादी उग्रवादियों को अन्याय के खिलाफ हथियारों की लड़ाई लडने वालों की तरह मानने की गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है इसलिए सारे वामपंथी अलग-अलग थ्योरी रच-रच कर अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं। इनका एकमात्र एजेंडा है, देश में वैक्यूम खड़ा करना है। स्टेट, गवर्नेंस, संविधान और सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा कर रक्तपात करना ही उनका उद्देश्य है जो अब सफल नहीं होगा। श्री शाह ने कहा कि नक्सलियों ने कई सारे भोले-भाले ग्रामीणों को एनिमी इन्फॉर्मर बताकर फांसी पर चढ़ा दिया। इन्होंने जनता अदालत के नाम से एक दिखावा किया जहां न कोई वकील है, न जज है, वे स्वयं बैठे हैं, स्वयं फैसले करते हैं और फांसी देते हैं।

 केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलियों ने ना जनता ना सरकार के नाम से एक भ्रांति खड़ी की और विकास योजनाओं को रोकने का काम किया। इन्हें संविधान और न्याय व्यवस्था को निशाना बनाकर संविधान का वैक्यूम खड़ा करना था। जो लोग अब कह रहे हैं बातचीत करो, उनको पता होना ताहिए कि मैं 50 बार सार्वजनिक मंचों पर बस्तर में जाकर कह चुका हूं कि हथियार डाल दीजिए, सरकार आपके पूरे पुनर्वास की व्यवस्था करेगी। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की पॉलिसी है, चर्चा उसी से होती है जो हथियार डालता है, लेकिन जो गोली चलाता है, उसको जवाब गोली से ही दिया जाता है।

श्री अमित शाह ने कहा कि जैसे ही रूस में साम्यवादियों की सरकार का गठन हुआ, यहां पर 1925 में सीपीआई की स्थापना हुई। जब रूस में कम्युनिस्टों की सरकार बनी, उसी वक्त यहां सीपीआई की स्थापना हुई। इसके बीच में कोई रिलेशनशिप है क्या? रूस की सरकार ने स्पॉन्सर कर दुनियाभर में कम्युनिस्ट पार्टी की रचना की। अब जिस पार्टी की नींव ही किसी दूसरे देश की प्रेरणा से की गई है, वो हमारे देश का भला कैसे सोचेगी? इन्होंने तो अंग्रेजों का भी समर्थन किया था। 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सिस्ट बनी, ये भी समझने की बात है कि सीपीआईएम क्यों बना? यह भी समझना पड़ेगा कि जब सीपीआई थी, तो फिर सीपीआईएम क्यों बनी? 1964 में सोवियत रूस और चीन के बीच झगड़ा हुआ तो दोनों साम्यवादी राष्ट्र के अंदर अलग-अलग विचारधारा की साम्यवादी सरकारें आई। जैसे ही अलग-अलग विचारधारा की सरकारें आई, तो यहां पर चीन की एक समर्थित पार्टी सीपीआई मार्क्सिस्ट बना दी। इसके बाद 1969 में संसदीय राजनीति का विरोध करने के लिए सीपीआई एमएल मार्क्सिस्ट की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विकास का वैक्यूम बनाना या अधिकारों की रक्षा नहीं था बल्कि उसके संविधान में उद्देश्य था संसदीय राजनीति का विरोध कर सशस्त्र क्रांति करना।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इन्होंने सशस्त्र क्रांति और संसदीय राजनीति का विरोध करने के दो उद्देश्यों के साथ सीपीआई मार्क्सिस्ट बनाई और यही आज के माओइस्ट हैं। उसके बाद 1975 में जैसे ही कांग्रेस का समर्थन मिला, एमसीसी माओइस्ट बनी और बिहार झारखंड केंद्रीय पार्टी बनी। फिर पीडब्ल्यूजी 1980 में बना। वह आंध्र केंद्रित बना। 1982 में दलित किसान केंद्रीय सशस्त्र संघर्ष सीपीआई एमएल पार्टी यूनिटी बिहार में बनी। दलित किसान केंद्रीय संघर्ष उनका उद्देश्य था। 1998 में पीपल्स वॉर ग्रुप बना और उसमें माओवादियों का एकत्रीकरण हुआ। इतना सब करने के बाद भी वह सफल नहीं हुए और 2000 में पीएलजीए बना, गुरिल्ला फोर्स बनाई और 2004 में ये पीडब्ल्यूजी एमसीसी का विलय हो गया। 2014 में मोदी जी आए और 2026 में सब की समाप्ति हो गई। ये 1925 से लेकर 2026 तक 101 साल का उनका इतिहास है। इसे अन्याय के खिलाफ संघर्ष का स्वरूप मानकर महिमामंडित मत करो। ये लोग वोट की जगह बुलेट से शासन प्राप्त करना चाहते हैं। कुछ लोग चर्चा से मानते नहीं है, वहां बल प्रयोग कर उनके अत्याचार से निर्दोष नागरिकों को बचाना पड़ता है। ये हमारी पार्टी की सरकार है और हर नागरिक की सुरक्षा नरेन्द्र मोदी जी ने सुनिश्चित की है। जो भी नागरिकों के साथ अन्याय करेगा, समझा तो ठीक है वरना ये फोर्स इसी के लिए बनाई गई है। इसका उपयोग भी होगा, परिणाम भी आएगा और आज आ भी गया है

श्री अमित शाह ने कहा कि अर्बन नक्सली कहते हैं कि हथियार उठाकर घूमने वाले माओवादियों के साथ चर्चा करो क्योंकि वो अन्याय के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें मारना नहीं चाहिए और इनके प्रति सिंपैथी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक भी बुद्धिजीवी दिव्यांग बनने वाले किसान, 5000 से ज्यादा सिक्योरिटी फोर्सेज के जवानों, उनकी विधवाओं के लिए नहीं है, इनके अनाथ बच्चों के लिए नहीं लिखता। उन्होंने कहा कि इनकी मानवता संविधान तोड़कर हथियार लेकर घूमने वालों के लिए ही है। इनके हथियारों से जो नागरिक मारे जा रहे हैं, इनके लिए आपकी मानवता नहीं है। मानवता के दोहरे चरित्र को स्वीकार नहीं कर सकते, यह मानवतावादी नहीं हैं, बल्कि नक्सलियों के समर्थक हैं। ये लोग गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा को फैलाना चाहते हैं, मगर उनके भी दिन लद गए हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सलवा जुडूम की शुरुआत 2005 में सरकार समर्थित जनआंदोलन के रूप में हुई। आदिवासी युवाओं को एसपीओ बनाया गया और उनको आतंक फैलाने वालों के सामने लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी गई। सलवा जुडूम की शुरुआत श्रीमान कर्मा ने की थी जिन्हें नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था। 5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च अदालत ने नंदिनी सुंदर और अन्य लोगों ने एक विवाद दायर किया और सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सुदर्शन रेड्डी के नेतृत्व में तय किया कि नक्सलियों के खिलाफ राज्य की ये लड़ाई गैरकानूनी है और तुरंत ही इनको हथियार वापस देने का ऑर्डर कर दिया। इसका परिणाम हुआ उनके हथियार वापस दिए गए और इन्होंने चुन-चुन कर सलवा जुडूम से जुड़े हुए लोगों को मार दिया और वही सुदर्शन रेड्डी विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बने। जो देश की कानून और व्यवस्था को मानते हैं, वो सुदर्शन रेड्डी को कभी अपना प्रत्याशी नहीं बनाते। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति जज बनकर अपनी व्यक्तिगत आइडियोलॉजी का उपयोग कर, संवैधानिक कपड़े पहनकर, अपनी आइडियोलॉजी को ऑर्डर में कन्वर्ट कर, हजारों बेगुनाह आदिवासियों की जान जाए ऐसा फैसला देता है, तो इस जजमेंट की घोर निंदा करते हैं। आइडियोलॉजी जनता के कल्याण से ऊपर नहीं है।

श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में 2014 के बाद नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में 17,589 किलोमीटर सड़कें बनाने की मंजूरी दी है, जिसमें 12,000 किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं। विकास इसीलिए हो रहा है कि धीरे-धीरे-धीरे नक्सलवाद समाप्त हो रहा है। लगभग-लगभग 5,000 मोबाइल टावर, ₹6,000 करोड़ के खर्चे से हम लगा चुके हैं। दो अन्य योजनाओं में और 8,000 4G टावर बनाने का फैसला नरेन्द्र मोदी जी ने किया है। 1804 बैंक शाखाएं 12 साल में खुली हैं, 1321 एटीएम खुले हैं, 37,850 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंस बनाए गए और 6025 डाकघर खुले। यह सब सिर्फ 12 साल में हुआ है। हमने माओवादियों के साथ चर्चा नहीं की, उन्हें समाप्त किया और विकास को आगे बढ़ाया। 259 एकलव्य आदर्श विद्यालय बनाए, इसके साथ-साथ 46 आईटीआई, 49 स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए, 16 कौशल विकास केंद्र बनाए और लगभग इस सबके लिए 800 करोड़ रुपए का खर्च 12 साल में हमने किया है। सिविक प्रोग्राम में 212 करोड़ के कार्य किए जो स्वास्थ्य शिविर और दवाओं से जुड़े हुए हैं और जनजाति युवा एक्सचेंज के कार्यक्रम भी हमने बनाए। सिक्योरिटी के लिए राज्यों की सहायता के लिए एसआरई लेकर आए जिसमें 10 साल में 3000 करोड़ दिया। स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम लेकर आए और इसमें 5000 करोड़ दिया। उन्होंने पूछा कि ये सब 1970 से अब तक क्यों नहीं हुआ था? पिछली सरकारें करने जाती थीं तो वो धमाके कर मार देते थे। हमने धमाके करने वालों को समाप्त किया, तो अब विकास हो रहा है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि 2014 के बाद क्लियर पॉलिसी और स्ट्रॉन्ग पॉलिटिकल विल इस काम में जुड़ी है। उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी जी ने ये स्पष्ट कर दिया इस देश के किसी भी कोने में चाहे कश्मीर हो, उत्तर पूर्व हो, या वामपंथी उग्रवादी प्रभावित क्षेत्र हो, गैरकानूनी प्रवृत्ति नहीं चलेगी और इस पर कठोर हाथों से काम होगा। केन्द्र और राज्यों के बीच में अलाइनमेंट हुआ। स्टेट की कैपेसिटी में गवर्नमेंट, गवर्नेंस और पुलिसिंग में हमने सुधार किया। सीएपीएफ और स्टेट पुलिस का समन्वय बढ़ाया। एक्शनेबल इंटेलिजेंस को नीचे तक परकोलेट करने की व्यवस्था की और जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कर दी। ऑल एजेंसी अप्रोच शुरू किया और सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि एनआईए, ईडी, इंटेलिजेंस एजेंसी, जैसे सभी नेटवर्क, फंडिंग और सपोर्ट सिस्टम, पर हमने प्रहार किया। इफेक्टिव सरेंडर पॉलिसी लेकर आए। डेवलपमेंट और गवर्नेंस में हमने कोई वैक्यूम नहीं छोड़ा और अब पहले जहां राज्य की उपस्थिति नहीं थी, वहां आज राज्य की उपस्थिति है और नक्सलवाद की हार का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य अब हर गांव में पहुंच चुका है, वहां पंचायत बन चुकी है। विकास के लिए हमने Whole of Government अप्रोच लिया और सुरक्षा नकेल कसने के लिए Whole of Agency अप्रोच लिया।

श्री अमित शाह ने कहा कि 20 अगस्त, 2019, 24 अगस्त 2024 और कल 31 मार्च 2026 की तीन महत्वपूर्ण तारीखों के बारे में बताना चाहूंगा। 20 अगस्त 2019 को गृह मंत्रालय में एक मीटिंग हुई और पूरा पुलिस कोऑर्डिनेशन, मॉडर्नाइजेशन, रिटायर्ड नक्सलियों को पुलिस फोर्स में लेना, इनका कोऑर्डिनेशन खुफिया एजेंसी के साथ, ये सब 20 अगस्त को डिजाइन किया। छत्तीसगढ़ में विपक्षी पार्टी की सरकार थी जिसने सहयोग नहीं दिया। बिहार 2024 के पहले नक्सलमुक्त हो चुका था, महाराष्ट्र एक तहसील छोड़कर 2024 के पहले नक्सल मुक्त हो चुका था। ओडिशा 2024 के पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। झारखंड एक जिला छोड़कर 2024 के पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। सिर्फ छत्तीसगढ़ बचा हुआ था क्योंकि छत्तीसगढ़ की विपक्षा पार्टी की सरकार ने नक्सलवादियों को बचा कर रखा था। जनवरी 2024 में छत्तीसगढ़ में हमारी सरकार बनी और दूसरे ही दिन, वहां पूरे समर्थन का भरोसा मिल गया। साझा रणनीति बनी और 24 अगस्त 2024 को हमने घोषित किया था कि 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद पूरे देश से समाप्त कर देंगे।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इसके बाद हमने सुरक्षा घेरे में बढ़ोतरी की। प्रधानमंत्री मोदी जी के 11 साल में 596 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बने। नक्सल प्रभावित जिले जो 2014 में 126 थे, आज सिर्फ दो बचे हैं। मोस्ट इफेक्टेड जिले 2014 में 35 थे, आज शून्य है। नक्सल घटनाएं दर्ज करने वाले पुलिस स्टेशन जो 350 थे, आज 60 हैं। पिछले 6 साल में 406 नए सीएपीएफ के कैंप बनाए, 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड बनाए, 400 बुलेट प्रूफ, ब्लास्ट प्रूफ गाड़ियां हमारे जवानों को दी गई, पांच अस्पताल हमारे जवानों के लिए बनाए गए और कम्युनिकेशन की सारी व्यवस्था दुरुस्त कर दी गई।

श्री अमित शाह ने कहा कि 2024, 2025 और 2026 का संयुक्त आंकड़ा देखें तो तीन सालों में मारे गए नक्सली, 2026 के मार्च तक 706 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए। 2218 गिरफ्तार हुए, उनको पकड़कर हमने जेलों में डाला है, अदालतों की शरण में ले गए और 4839 लोगों ने आत्मसमर्पण किया है। उन्होंने कहा कि विपक्ष संवाद की बात करता है। शासन का यही अप्रोच होना चाहिए जो वार्ता करना चाहता है, उसके साथ वार्ता करनी चाहिए और जो हमारे जवानों, किसानों, आदिवासियों, बच्चों पर गोली चलाता है, उसका जवाब गोली से देना चाहिए। हमने संवाद, सुरक्षा और समन्वय तीनों का उपयोग किया है। नवीनतम टेक्नोलॉजी का उपयोग कर सटीक निगरानी और ढेर सारे टेलीफोन बिलों का विश्लेषण किया है। लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम, मोबाइल फोन की गतिविधियां, साइंटिफिक कॉल लॉग्स, सोशल मीडिया एनालिसिस, फॉरेंसिक और तकनीकी संस्थानों की सहायता लेकर इस पूरे अभियान का गृह मंत्रालय ने नेतृत्व किया है। ड्रोन सर्वेलेंस, सैटेलाइट उपयोग, इमेजिंग टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा एनालिसिस से ये सफलता प्राप्त हुई है।

बूढ़ा पहाड़ क्षेत्र में बिहार में 2022 में ऑपरेशन ऑक्टोपस चला। ऑपरेशन डबल बुल गुमला, लोहरदगा और लातेहार जिलों में चला 8 से 25 फरवरी, 2022 में, तीनों जिले नक्सलवाद से मुक्त हो गए। ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म झारखंड के सरायकेला, पश्चिमी सिंहभूम और खूंटी जिले में 1 से 3 सितंबर 2022 में चला। ऑपरेशन भीमबर्ग मुंगेर जिले के जून व जुलाई 2022 में चला। ऑपरेशन चक्रबांधा बिहार के गया और औरंगाबाद जिलों में 2022 में चला और ये सारे एरिया इससे मुक्त हो गए। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा में 50 किलोमीटर लंबी और 37 किलोमीटर चौड़ी एक पहाड़ी पर चला। वहां पर नक्सलियों ने अपना एक परमानेंट कैंप बनाया था और वहां 5 साल लड़ सकने के लिए हथियार, सोलर लाइट की व्यवस्थाएं, ढेर सारी आईडी बनाने की फैक्ट्रियां और 5 साल का अनाज था। इसके अलावा 400 से 500 कैडर वहां पर एकत्रित थे। गृह मंत्री ने कहा कि 45 डिग्री टेंपरेचर पहाड़ पर पत्थर गर्म हो जाता था। शरीर में से 2 लीटर, 3 लीटर पसीना बह जाता था लेकिन जवानों ने उफ तक नहीं की और 21 दिन तक ऑपरेशन चला। 30 से ज्यादा माओवादी मारे गए, बाकी नीचे उतरते ही पुलिस के साथ मुठभेड़ों में मारे गए या सरेंडर कर दिया और यह पूरा असला हमने जब्त कर लिया। इसी ने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मतलब बस्तर और तेलंगाना में माओवादी आंदोलन का अंत कर दिया। श्री शाह ने कहा कि कोबरा, सीआरपीएफ, डीआरजी और छत्तीसगढ़ पुलिस के जवानों ने अमानवीय धैर्य के साथ इनके किले को तोड़ा है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सेंट्रल कमिटी मेंबर और पोलित ब्यूरो मेंबर 2024 की शुरुआत में कुल 21 थे, जो इनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व है। एक पकड़ा गया है, सात सरेंडर हुए हैं, 12 मारे गए हैं और एक फरार है, उसके साथ भी वार्ता चल रही है। 21 के 21 सेंट्रल कमिटी मेंबर और पोलित ब्यूरो मेंबर समाप्त हो चुके हैं और उनकी केंद्रीय व्यवस्था टूट चुकी है। दंडकारण्य में 27 की स्टेट कमेटी थी, तीन अरेस्ट हुए, 20 सरेंडर हुए, 11 मारे गए और दो से बातचीत जारी है। दंडकारण्य की उनकी मुख्य स्टेट कमेटी थी, वो समाप्त हो चुकी है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, एमएमसी स्टेट कमेटी, तीन सरेंडर कर गए, तीन की ही बची थी। ओडिशा, चार बचे थे, एक सरेंडर हुआ, तीन मारे गए। ओएससी, ओडिशा, पांच ने सरेंडर किया, पांच मारे गए, 10 ही थे। डिस्टर्ब रीजन ब्यूरो, अरेस्ट एक हुआ, तीन मारे गए, एक फरार है। तेलंगाना में छह सरेंडर हो गए, तीन मारे गए, एक भी नहीं बचा है तो उनकी पोलित ब्यूरो मेंबर और सीएमसी पूरा समाप्त हो चुका है। हमने लक्ष्य रखा था कि 31 मार्च को देश को नक्सलवाद मुक्त करेंगे और हम नक्सलमुक्त हो गए हैं, ऐसा कहने में अब कोई संकोच नहीं है। बसव राजू उनके महासचिव न्यूट्रलाइज हुए, हिड़मा जिन्होंने 27 लोगों को मारा था, गजुरल्ला रवि 11 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए।कदारी सत्यनारायण रेड्डी 46 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। गणेश उइके 44 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। वेणुगोपाल आत्मसमर्पण किया। 46 वर्ष से एक्टिव थे। वासुदेव आत्मसमर्पण किया, 36 वर्ष से एक्टिव थे। पल्लूरी प्रसाद राव चंदना 46 वर्ष से एक्टिव थे, आत्मसमर्पण किया। रामदेव मांझी देबू 36 वर्ष से एक्टिव थे, समर्पण किया। टिपरी तिरुपति 44 वर्ष से एक्टिव थे, उन्होंने भी सरेंडर कर दिया है। सभी मुख्य हथियारी माओवादी समाप्त हो चुके हैं। हमने ल्यूक्रेटिव पुनर्वास पॉलिसी को अपनाया है, जिसमें आत्मसमर्पण की प्रोत्साहन राशि 50,000 घोषित की गई है, जो सामूहिक सरेंडर पर दोगुना कर देते हैं। मोबाइल सबको सरकार की ओर से देते हैं। हथियार जमा कराने पर और मुआवजा देते हैं। पुनर्वासन केंद्र पर कौशल प्रशिक्षण व टूल किट का वितरण करते हैं। ₹10,000 प्रति माह 36 माह तक हम उनको देते हैं। सभी को मोदी जी ने प्रधानमंत्री आवास योजना की गिफ्ट दी है। नक्सल मुक्त पंचायत होते ही गांव के विकास के लिए ₹1 करोड़ दिया जाता है।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों ने 15000 बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया इसका जिम्मेदार कौन है? उन्होंने कहा कि आप तो एसी चेंबर में बैठकर कोर्ट के प्रोटेक्शन के तहत आर्टिकल लिखते हैं और वहां जीवन के जीवन उजड़ गए हैं और किसी को परवाह नहीं है। उन्होंने कहा कि जो अपने आप को ह्यूमन राइट का चैंपियन मानते हैं उनसे पूछा जाए कि 32 साल की आयु तक मेहंदी ना लगाने वाली बच्ची के ह्यूमन राइट की कौन चिंता करेगा? उन्होंने कहा कि उसकी चिंता नरेन्द्र मोदी जी करेंगे और कोई नहीं। उन्होंने कहा कि इन लोगों का अधिकार छीन लिया है, इसका हिसाब कभी न कभी देना पड़ेगा। श्री शाह ने कहा कि जिन्होंने भी शब्द या प्रच्छन्न रूप से नक्सलियों का समर्थन किया है, वह सब इस पाप के उतने ही भागीदार हैं जितना बंदूक लेकर घूमने वाले हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इनकी नौकरी और रोजगार के लिए हमने ढेर सारे प्रयास किए हैं, कौशल केंद्र बनाए हैं। बारहवीं तक इनके बच्चों के लिए बारहवीं तक की मुक्त मुफ्त शिक्षा करी है। महिलाओं को 2 लाख और पुरुषों को 5 लाख के ऋण की व्यवस्था की है। वहां बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम के माध्यम से संस्कृति और खेल को बढ़ावा दे रहे हैं। वहां अब 1 लाख 20 हजार कलाकारों ने बस्तर पंडुम में भागीदारी की और 5 लाख 50 हजार आदिवासी खेले हैं। जो इसको न्याय की लड़ाई कहते हैं, वो बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक में जाएं। श्री शाह ने कहा कि पीड़ितों पर जुल्म ढाने वालों के लिए भाषण करने के लिए आपके पास बहुत समय है।

श्री अमित शाह ने कहा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की सरकार बनी, तब एक नेशनल एडवाइजरी काउंसिलबनी थी। एक नई नेशनल एडवाइजरी काउंसिल एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल फोरम खड़ा किया गया जो देश के कानून बनाता था। उन्होंने कहा कि हर्ष मंदर इसके सदस्य थे, जिनके एनजीओ अमन वेदिका में शीर्ष नक्सली नेता की पत्नी को जिम्मेदारी दी गई थी और रिकॉर्ड है कि वह उन नक्सलियों में शामिल थी जिन्होंने अपहरण के केस अर्बन एरिया में किए थे। उन्होंने कहा कि ये एनएससी देश का नीति निर्धारण करती थी। उन्होंने कहा कि रामदयाल मुंडा कहते थे कि नक्सल ऑपरेशन जरूरत से ज्यादा कठोर है। उन्होंने कहा कि इस प्रच्छन्न समर्थन ने ही नक्सलियों की हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने कहा कि नंदिनी सुंदर, रामचंद्र गुहा, ई ए एस शर्मा, ये सारे लोग सलवा जुडूम के केस के साथ भी जुड़े थे। जब सरकार की एक एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी, जो पीएम से भी ऊपर थी, उसके सदस्य अगर नक्सलवाद के समर्थक हों तो किस तरह से नक्सलियों का हौसला टूटेगा? कैसे टूटेगा? उन्होंने कहा कि यह मुख्य विपक्षी पार्टी ने किया था। ये तो इतिहास है और जो लोग इस बात का विरोध करते हैं, आने वाले दिनों में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जाएगी जो आपके कारनामों से भरी हुई होगी।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलियों और उनके हमदर्दों के साथ देखे गए हैं। उन्होंने कहा कि भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठनों ने हिस्सा लिया, इसका रिकॉर्ड है। उन्होंने कहा कि वे 2010 में ओडिशा में लाडो सिकोका के साथ मंच पर दिखे। सिकोका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और उन्हें माला भी पहनाई। उन्होंने कहा कि 2018 में हैदराबाद में गुम्मांडी विट्ठल राव उर्फ गद्दार से नेता प्रतिपक्ष ने मुलाकात की जो विचारधारा के करीब रहे। मई 2025 में कोऑर्डिनेशन कमिटी ऑफ पीस के साथ मुलाकात की। आज जब 172 जवानों को मारने वाला हिडमा मारा गया तब इंडिया गेट पर नारे लगे, कितने हिडमा मारोगे? हर घर से निकलेंगे हिड़मा और इस वीडियो को नेता प्रतिपक्ष ने स्वयं शेयर किया है।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों के समर्थकों ने 1970 से लेकर मार्च 2026 तक नक्सलवाद का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ये नरसंहार का समर्थन है और 20 हजार लोग जो मारे गए, इसका दोषी अगर कोई एक है तो मुख्य विपक्षी पार्टी की वामपंथी विचारधारा है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों के साथ रहते-रहते, ये पार्टी और उसके नेता खुद नक्सलवादी बन गए हैं। उन्होंने कहा कि इसका जवाब इस देश की जनता को चुनाव में देना पड़ेगा क्योंकि ये बात यहां रुकेगी नहीं, बल्कि जनता की अदालत में जाएगी।

*****//आरके / आरआर / पीआर


Wednesday, February 4, 2026

मज़दूरों के दिल दिमाग में बसा रहता है यह नारा

बॉलीवुड से भी गहरा रिश्ता है इस नारे का 

लुधियाना: 3 फरवरी 2026: (मीडिया लिंक टीम//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::


"हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है"
बहुत दिलचस्प कहानी है इस नारे की भी। इस नारे ने कई बार इतिहास रचा है। वास्तव में यह नारा मशहूर शायर जनाब शैलेंद्र द्वारा रचित एक क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन का नारा है। बुझ गए निराश दिलों में यह नारा एक नया जोश भर देता है। यह नारा दमन, शोषण और मँहगाई के खिलाफ एकजुटता और संघर्ष का एक ऐसा ज़ोरदार प्रतीक भी है जिसे संघर्षशील लोगों ने हमेशां याद रखा। जब जब भी आंदोलन चले और हड़तालें हुईं तब तब इस नारे को अक्सर मज़दूरों, युवाओं और राजनीतिक प्रदर्शनों में हक़ की आवाज़ उठाने के लिए बड़े उत्साह और जोशोखरोश के साथ बुलंद किया।  

इस नारे की मुख्य बातें सीधा मज़दूर हित की बात करती हैं शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करती हैं। नारे में कोई चल नहीं - -कोई भविष्य में वाली बात भी नहीं। शोषण के खिलाफ यह नारा सीधी उंगली उठा कर आंख से आंख मिलाकर बात करता है। मज़दूरों और उनकी मेहनत पर होते हमलों को बड़ी बेबाकी से बेनकाब भी करता है यह नारा।  

इसी नारे को कुछ और गहराई से देखें तो यह नारा पूंजीवादी शोषण, छँटनी, और सरकारी वादों के टूटने के खिलाफ मज़दूर वर्ग की बहुत ही ज़बरदस्त ललकार भी है। आपको हैरानी होगी कि जानेमाने शोमैन राजकपूर और जानेमाने शायर शैलेन्द्र के नज़दीक आने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। वाम विचारधारा और शोषण का विरोध इन्हें नज़दीक ले कर आया। इन्होने मिल कर फिल्म संसार को उन विचारों और गीतों से बेहद अमीर बना दिया। वाम विचारधारा का ज़ोरदार प्रचार कम्युनिस्ट वर्करों और नेताओं से ज़्यादा तो ऐसे गीतों ने किया।  इस तरह के गीतों और कहानियों के चलते ही लेफ्ट के विचारों ने उस जनता में ज़ोरदार ज़मीन पकड़ ली जहां अत्यधिक बौद्धिकता के चलते लीडरों के भाषण आम जनता के सिर के ऊपर से गुज़र जाते थे। गीतों के बोल जनता के दिल दिमाग में घर कर जाते थे। 

शैलेंद्र और राज कपूर की ऐतिहासिक जोड़ी 1940 के दशक के अंत में एक मुशायरे में बनी, जब राज कपूर ने शैलेंद्र की कविता 'जलता है पंजाब' सुनी और प्रभावित हुए। शुरू में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर शैलेंद्र ने फिल्म में लिखने से इनकार किया, लेकिन बाद में आर्थिक तंगी के कारण 'बरसात' (1949) फिल्म के लिए 'बरसात में तुमसे मिले' व 'पतली कमर है' जैसे गानों से उन्होंने करियर की शुरुआत की। 

इस प्रसिद्ध जोड़ी की कहानी के मुख्य पहलू न केवल शायरी बल्कि समाज के नवनिर्माण से जुड़े अभियान के संबंध में भी बहुत कुछ बताते हैं। विचारों का मिलना ही इस जोड़ी के लिए उम्र भर महत्वपूर्ण रहा। दबे कुचले लोगों के दर्द की बात दोनों के दिल में थी। इसके साथ ही राजकपूर साहिब के इश्क और प्रेम ने भी एक नया रंग उभारा। यहां याद आता है कि शुरुआती मुलाकात भी बहुत ख़ास थी लेकिन शैलेन्द्र ने फिल्मों के लिए गत्त लिखने से साफ़ इंकार कर दिया था। उनदिनों गंभीर लोग फिल्मों वाले काम को अच्छा नहीं समझते तहे। शैलेन्द्र साहिब के इस इनकार के बावजूद राज कपूर साहिब ने न कोशिश छोड़ी है और न ही इस सोच को का ही अपने दिमाग से निकाला। वह एक ऐतिहासिक वक़्त कहा जा सकता है जब राजकपूर साहिब ने शैलेंद्र को अपनी पहली फिल्म आग (1948) के लिए गाने लिखने का प्रस्ताव दिया था। शोमैन राजकपूर के प्रस्ताव को ठुकराना भी सबके बस में नहीं होता लेकिन शैलेन्द्र अपने आदर्श के साथ प्रतिबद्ध रहे कि फिल्मों के लिए नहीं लिखना। लेकिन प्रकृति हमें वहीं ले जाती है जहां हम नहीं जाना चाहते। 

ज़िंदगी के रंग बदलते रहते हैं। शैलेन्द्र साहिब के हालात और ज़िंदगी भी गर्दिश में आ गए। परिवार में एक बहुत बड़ी मजबूरी उनकी न टाले जा सकने वाली आर्थिक जरूरत भी बन गई। ऐसे में शैलेन्द्र को राजकपूर ही याद आए। जब शैलेंद्र को पैसों की तंगी हुई तब वह स्वयं राज कपूर साहिब के पास गए। सुना है की वह तो उधार मांगने गए थे उस समय बरसात (1949) फिल्म बन रही थी।

सफल सफर: 'बरसात' के गानों की सफलता के बाद, राज कपूर ने शैलेंद्र को अपनी फिल्मों का मुख्य गीतकार बना लिया।

सदाबहार गाने: इस जोड़ी ने आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी, और अनारी जैसी फिल्मों में 'आवारा हूं', 'प्यार हुआ इकरार हुआ', और 'मेरा जूता है जापानी' जैसे अमर गीत दिए।

गहरी दोस्ती: राज कपूर उन्हें 'कविराज' या 'पुष्किन' कहकर बुलाते थे। शैलेंद्र की मौत (14 दिसंबर 1966) पर राज कपूर ने कहा था, "मेरी आत्मा मुझसे बिछड़ गई"। 

तीसरी कसम (1966) जैसी फिल्मों में उनके बीच के रचनात्मक तालमेल का भी गहरा असर दिखा। 

ज़िंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जिसे शैलेन्द्र जी ने अपनी कलम से कवर न किया हो। यही कारण है कि उनके गीत आज भी लोगों के दिल दिमाग में बसते हैं।

Saturday, December 27, 2025

संघर्ष की एक सदी। नए विरोध और उम्मीद का भविष्य।

From MSB on Saturday 27th December 2025 at 10:03 Regarding CPI 100th Anniversary Celebration

CPI की सौवीं सालगिरह के मौके पर जगह जगह हुव आयोजन 

“कम्युनिस्ट मूवमेंट एट 100: लिगेसी एंड द फ्यूचर” पर एक चर्चा हुई

नई दिल्ली: 27 दिसंबर 2025: (एम एस भाटिया के सौजन्य से//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सौवीं सालगिरह के मौके पर, CPI हेडक्वार्टर के अजय भवन में SV घाटे हॉल में “कम्युनिस्ट मूवमेंट एट 100: लिगेसी एंड द फ्यूचर” पर एक चर्चा हुई।

मीटिंग को संबोधित करते हुए, CPI जनरल सेक्रेटरी डी. राजा, CPI नेशनल सेक्रेटरी और AITUC जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर, CPI नेशनल सेक्रेटरी एनी राजा, CPI नेशनल सेक्रेटरी के. प्रकाश बाबू, और CPI दिल्ली सेक्रेटरी और नेशनल एग्जीक्यूटिव मेंबर प्रो. दिनेश वार्ष्णेय ने आज़ादी की लड़ाई में कम्युनिस्ट मूवमेंट की ऐतिहासिक भूमिका और प्रोग्रेसिव, लोगों के हक वाली पॉलिसी में इसके हमेशा रहने वाले योगदान पर बात की।

स्पीकर्स ने डेमोक्रेसी, सेक्युलरिज्म, सोशल जस्टिस और मज़दूरों के अधिकारों के सामने आज की चुनौतियों पर ज़ोर दिया, और संवैधानिक मूल्यों और लोगों की रोज़ी-रोटी पर आज के हमले का सामना करने के लिए कम्युनिस्ट मूवमेंट को मज़बूत करने के काम पर ज़ोर दिया।

संघर्ष की एक सदी। नए विरोध और उम्मीद का भविष्य। CPI भारत में कम्युनिस्ट मूवमेंट की अगली सदी में गर्व से लाल झंडा उठाएगी।

Saturday, November 1, 2025

पलटू राम की अवसरवादी राजनीति का अंत निश्चित है//*संजय पराते

Emailed on Saturday 1st November 2025 at 11:24 AM Regarding Bihar Election 

चुनाव पर एक बेहद संतुलित विश्लेषण 



कांग्रेस की अहंकारी राजनीति ने महागठबंधन को जो झटका देने की धमकी दी थी, वह महागठबंधन की जीत के बाद तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की महागठबंधन की सहमति की घोषणा के बाद टल गया है। दूसरी ओर, एनडीए गठबंधन की ओर से भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका मुख्यमंत्री चुनाव के बाद ही चुना जाएगा।
लेखक संजय पराते 
इसका स्पष्ट अर्थ है कि
भले ही भाजपा नीतीश कुमार को अपना चेहरा बनाकर चुनाव लड़ रही हो, लेकिन अगर एनडीए जीतता है, जो कि बेहद असंभव लगता है, तो नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बनना मुश्किल है। नीतीश कुमार अब उस जाल से बच नहीं सकते जिसमें वे खुद फंस गए हैं, और अगर चुनाव के बाद उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की, तो उनकी अपनी पार्टी उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंकेगी। भाजपा जेडी(यू) को निगलने के लिए पूरी तरह तैयार है। तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा के साथ ही नीतीश कुमार के पीछे हटने की संभावना भी खत्म हो गई है। नीतीश का भविष्य अब भाजपा-आरएसएस ने तय कर दिया है, और चुनाव परिणाम चाहे जिस तरफ जाएँ, एक निष्कर्ष बिल्कुल साफ़ है: बिहार अब "सुशासन बाबू" की "पलटू राम राजनीति" से मुक्त होने वाला है। बिहार की आम जनता, जिसने वर्षों से नीतीश कुमार की अवसरवादी राजनीति को झेला है, ने भी यह तय कर लिया है। ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने भाजपा जैसी सांप्रदायिक, भ्रष्ट और आपराधिक पार्टी को, जिसका रास्ता लालू प्रसाद यादव ने रोका था, बिहार में पैर जमाने का मौका दिया।

पिछले चुनाव में महागठबंधन और एनडीए के बीच केवल 12,000-13,000 वोटों का अंतर था, लेकिन इस अंतर ने एनडीए की सीटों की संख्या में 15 का इजाफा कर दिया। कई सीटों पर मतगणना के दौरान भाजपा के पक्ष में प्रशासनिक धांधली के आरोप लगे। हालाँकि, बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के चुनाव आयोग के आदेश के बाद मचे हंगामे और देश भर से आए निष्कर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग और विभिन्न प्रकार की व्यवस्थित धांधलियों ने पिछले लोकसभा चुनावों सहित भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस खुलासे ने भाजपा के करिश्मे और प्रभाव को काफी प्रभावित किया है, और वास्तव में, जनता की नज़र में इसकी राजनीतिक विश्वसनीयता गिर गई है। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप और जन जागरूकता के साथ, बिहार चुनाव में सत्तारूढ़ दल द्वारा बड़े पैमाने पर धांधली की संभावना कम हो गई है। इसका भाजपा-जद(यू) खेमे के चुनाव परिणामों पर सीधा असर पड़ेगा।

पाँच साल पहले 12-13 हज़ार वोटों के अंतर को अगर इस बार महागठबंधन के पक्ष में 12-13 लाख वोटों के अंतर के रूप में देखा जाए, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। इन पाँच सालों में गंगा नदी में बहुत पानी बह चुका है। बिहार में यह नदी 445 किलोमीटर लंबी है और राज्य के मध्य से होकर बहती है। जिन 12 प्रमुख जिलों से गंगा बहती है, उनमें बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुंगेर, खगड़िया, कटिहार, भागलपुर और लखीसराय शामिल हैं। इन सभी जिलों में भाजपा-जद(यू) गठबंधन की हालत खस्ता है। स्थिति इतनी विकट है कि अगर प्रधानमंत्री मोदी यहाँ आकर "माँ गंगा ने बुलाया है" का नारा भी लगाएँ, तो भी माँ गंगा शायद ही उनकी मदद करने को तैयार होंगी। इस बार माँ गंगा का आशीर्वाद महागठबंधन पर बना हुआ दिख रहा है। अब प्रधानमंत्री जी अपनी अभद्र भाषा में इसे "महाठगबंधन" कहें या "महालठबंधन", या इससे जुड़े दलों को "आटक-झटक-भटक-लटक दल" या कुछ और कहें। आम जनता जानती है कि आज नीतीश-मोदी गठबंधन "महा लूटबंधन" है, जो चारा और जाल बिछाकर शिकार की ताक में रहता है।

पिछली बार महागठबंधन की हार का एक बड़ा कारण यह था कि कांग्रेस ने अपनी क्षमता से ज़्यादा 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल 19 सीटें ही जीत पाई थी। वामपंथी दलों ने बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ा था और उनकी जीत दर कांग्रेस से लगभग दोगुनी थी। संदेश स्पष्ट था: अगर वामपंथी दलों को ज़्यादा सीटें दी जातीं, तो चुनाव नतीजे महागठबंधन के पक्ष में हो सकते थे। हालाँकि, कांग्रेस इस संदेश को समझने में विफल रही और कुछ सीटों पर वामपंथी दलों और राजद के साथ उसका टकराव हुआ। इसने भाजपा के खिलाफ और धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने की कांग्रेस की समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिहार में कांग्रेस और वामपंथियों का चुनावी समर्थन आधार लगभग बराबर है। हालाँकि, वामपंथियों ने इस बार भी ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई है। इस बार, वामपंथ पहले से कहीं ज़्यादा एकता और ताकत के साथ लड़ रहा है, और उसका उभार पिछली बार से भी ज़्यादा दिखाई दे रहा है। महागठबंधन के स्थायी भविष्य के लिए वामपंथियों की बड़ी सफलता ज़रूरी है।

ऐसा लगता है कि "मतदाता अधिकार यात्रा" के केंद्र में रहने वाला SIR का मुद्दा चुनाव से गायब हो गया है। आधार कार्ड स्वीकार करने के चुनाव आयोग को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश और इस आधार पर हटाए गए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में जोड़ने के आयोग के फैसले ने इस मुद्दे को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है। हालाँकि, SIR के कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाता, जिनमें से अधिकांश सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित आदिवासी, दलित और पिछड़े समुदायों के गरीब सदस्य हैं, मतदाता सूची से बाहर होने का खतरा अभी भी बरकरार है। आगामी विधानसभा चुनावों के साथ, इस मुद्दे पर चुनाव आयोग के साथ एक और राष्ट्रव्यापी टकराव देखने को मिल सकता है, क्योंकि यह अब एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय से भाजपा-आरएसएस के एक छोटे से संगठन में बदल गया है। इसलिए, बिहार चुनाव प्रचार के दौरान, महागठबंधन को इस मुद्दे पर फिर से ध्यान केंद्रित करना होगा, जिसने उसे भाजपा-जद(यू) पर बढ़त हासिल करने में मदद की थी। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और कृषि, ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जिनसे महागठबंधन को जूझना होगा, और भाजपा उन्हें पीछे धकेलने की साजिश रच रही है। हालाँकि, गठबंधन को तुच्छ व्यक्तिगत मुद्दों पर सत्तारूढ़ दल पर हमलों से बचना चाहिए, यहाँ तक कि उन्हें नज़रअंदाज़ भी करना चाहिए, क्योंकि मोदी-शाह और पूरा एनडीए अपनी अश्लीलता और नीचता में बेजोड़ है। गोदी मीडिया उनकी अश्लीलता को और बढ़ाने के लिए मौजूद है।

इस बीच, महागठबंधन ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया है। इस घोषणापत्र में वामपंथ का प्रभाव साफ़ दिखाई दे रहा है। भूमि का मुद्दा वामपंथी दलों के लिए बेहद अहम है और घोषणापत्र में भूमि हदबंदी के ज़रिए अधिग्रहित अतिरिक्त ज़मीन को भूमिहीन और गरीब किसानों में बाँटने का वादा किया गया है। नीतीश कुमार ने भी यह वादा किया था और इसके लिए उन्होंने बंद्योपाध्याय समिति का गठन भी किया था, लेकिन बाद में उसकी सिफ़ारिशों को लागू करने से मुकर गए। अगर महागठबंधन सामाजिक न्याय के अपने वादे पर खरा उतरता है, तो भूमि सुधार नीतियों के लागू होने से बिहार का सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य बदल जाएगा। भूमि सुधार कार्यक्रम से आम लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि से न केवल घरेलू बाज़ार का विस्तार होगा, बल्कि औद्योगिक विकास के साथ रोज़गार के नए अवसर भी पैदा होंगे। भूमि सुधार एजेंडा बिहार को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकालने की क्षमता रखता है। महागठबंधन ने बेरोज़गारी को आज बिहार की जनता के सामने एक बड़ा मुद्दा बनाया है और अपने घोषणापत्र में इसके लिए कल्पनाशील समाधान पेश करने की कोशिश की है।

भाजपा पिछले 11 सालों से जिस विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है, उसे लेकर वह क्यों चुनाव लड़ने से बच रही है, इसकी वजह साफ़ है। नीति आयोग की रिपोर्ट (2021) बताती है कि आज बिहार में 6.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, 6.58 करोड़ लोग कुपोषित हैं, जिनमें 43.9% बच्चे और 60.3% महिलाएँ शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार, 2022 में भारत का औसत मानव विकास सूचकांक (HDI) स्कोर 0.644 था, जबकि बिहार का 0.609 था। इन आँकड़ों में बिहार देश के 29 राज्यों में सबसे निचले पायदान पर है।

यहां 41% महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी। इस मानदंड पर बिहार 28वें स्थान पर है। बिहारी महिलाओं की यह स्थिति उनके बच्चों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, जबकि भारत की शिशु मृत्यु दर (प्रति 1,000 जीवित जन्म) 35.2 है, बिहार 46.8 की दर के साथ 27वें स्थान पर है। बिहार सबसे ज्यादा अविकसित बच्चों (42.9%) के साथ 27वें स्थान पर और सबसे ज्यादा कम वजन वाले बच्चों (22.9%) के साथ 29वें स्थान पर है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार 9-10वीं कक्षा में स्कूल छोड़ने वालों (20.5%) के मामले में भी 27वें स्थान पर है बिहार (29वें स्थान) में केवल 14.6% परिवारों को स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्राप्त है।

बिहार में सुशासन की हालत चुनाव प्रचार के दौरान लगातार हो रही हिंसा से साफ़ ज़ाहिर है। पकौड़े तलने के बाद, भाजपा अब बिहारी युवाओं को रील बनाकर रोज़गार के सपने दिखा रही है। इससे पता चलता है कि भाजपा के पास न तो मुद्दे हैं और न ही उपलब्धियाँ। इसलिए, विपक्षी गठबंधन के पास अब चुनाव के बहाने देश भर की आम जनता को संबोधित करने का मौका है।

लोकसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक की एकजुटता ने भाजपा को स्पष्ट बहुमत हासिल करने से रोक दिया। देश की विपक्षी ताकतों में इस तरह पैदा हुए उत्साह को भाजपा खेमे ने महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में सुनियोजित धांधली के ज़रिए ठंडा कर दिया। अब, बिहार चुनाव एनडीए ब्लॉक को राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का एक और मौका देते हैं, बशर्ते कांग्रेस अपने दलगत हितों से ज़्यादा बिहार के गरीबों के हितों को प्राथमिकता दे। मोदी ने नीतीश का भविष्य तय कर दिया है। महागठबंधन के ज़रिए इंडिया ब्लॉक का भविष्य बिहार की जनता अपनी एकता और आचरण के आधार पर तय करेगी। फ़िलहाल, अटकलों के लिए अभी पूरे दो हफ़्ते बाकी हैं।

लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। 
उनके मोबाइल फोन संपर्क: 94242-31650)

Monday, September 8, 2025

सीपीआई सांसद द्वारा बाढ़ प्रभावित पंजाब के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग

Received from MS Bhatia on Monday 8th September 2025 at 16:42 Regarding CPI MP

 सीपीआई नेता संतोष कुमार पी. ने केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह को पत्र लिखा 

*राज्यसभा में सीपीआई नेता संतोष कुमार पी.

*बाढ़ प्रभावित पंजाब के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग उठाई गई

*राज्यसभा में सीपीआई नेता ने विशेष पैकेज की मांग की

*बाढ़ प्रभावित पंजाब के लिए विशेष राहत पैकेज की मांग की गई

*उन्होंने स्वयं गाँवों का दौरा किया


लुधियाना: 8 सितंबर 2025: (एमएस भाटिया//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब के फाजिल्का जिले के बाढ़ प्रभावित गाँवों के अपने दौरे के दौरान, राज्यसभा में सीपीआई नेता कॉमरेड संतोष कुमार पी. ने स्वयं गाँवों का दौरा किया और अभूतपूर्व बाढ़ से हुई तबाही को देखा। इस संवेदनशील दौर के बाद, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पंजाब के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए पैकेज की मांग की है।

उन्होंने कहा, "पूरे खेत जलमग्न हो गए हैं, फसलें बर्बाद हो गई हैं, मवेशी मर गए हैं और घर मलबे में तब्दील हो गए हैं। परिवार बाढ़ग्रस्त इलाकों में फंसे हुए हैं, उनकी आजीविका नष्ट हो गई है और हर जगह पानी जमा होने से बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित उन किसानों की आँखों में निराशा ने किया जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया है और आश्रय और जीविका की तलाश कर रहे परिवारों की लाचारी ने किया है। इस बेहद संवेदनशील स्थिति में भी किसान फल-फूल रहे हैं। वे एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं।"

अपनी यात्रा के दौरान, भाकपा सांसद संतोष ने प्रभावितों की मदद के लिए आगे आए अनगिनत स्वयंसेवकों से भी बातचीत की। एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, भारतीय सेना और अन्य एजेंसियां, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत जन संगठन भी शामिल हैं, बेहद कठिन परिस्थितियों में अथक परिश्रम कर रही हैं। प्रभावित गाँवों में जान बचाने और भोजन व दवाइयाँ पहुँचाने में उनका साहस और एकजुटता सराहनीय है। वे प्रशंसा से भी बढ़कर हैं।

फिर भी, इतने प्रयासों के बावजूद, इस आपदा की तबाही वास्तव में सरकारी राहत के पैमाने से कहीं ज़्यादा है। यह राहत बहुत कम है। फाजिल्का, गुरदासपुर, अमृतसर, कपूरथला, फिरोजपुर, तरनतारन, होशियारपुर, लुधियाना, मानसा और पटियाला पूरी तरह जलमग्न हैं। जलमग्न या बुरी तरह क्षतिग्रस्त। इसके साथ ही, लाखों लोग भूख, बीमारी और विस्थापन से पीड़ित हैं। उनकी पीड़ा को गिनना लगभग असंभव है।

उन्होंने आगे लिखा कि इन परिस्थितियों में, मैं केंद्र सरकार से तत्काल और सहानुभूतिपूर्वक कार्रवाई करने की अपील करता हूँ। पंजाब को नियमित वितरण के अलावा, तुरंत पर्याप्त राहत राशि जारी करने की आवश्यकता है, साथ ही एक व्यापक पैकेज भी जारी करना चाहिए जो फसल और पशुधन के नुकसान, घरों और आजीविका के विनाश और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की पूरी सीमा को कवर करे। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अगले फसल सीजन के लिए रियायती दरों पर बीज, उर्वरक और अन्य कृषि आदानों की आपूर्ति सुनिश्चित करके विशेष व्यवस्था की जाए। महामारी को रोकने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, स्कूलों और सार्वजनिक सुविधाओं का जीर्णोद्धार, और इन बाढ़ों से तबाह हुए सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने का समय पर पुनर्निर्माण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भाकपा राज्य इकाई के सदस्य ने भी लोगों का उत्साहवर्धन किया।

अपने पत्र के अंत में, उन्होंने लिखा कि मैं आपसे व्यक्तिगत हस्तक्षेप का अनुरोध करता हूँ ताकि राहत और पुनर्वास सुनिश्चित हो सके। पंजाब के लोगों तक बिना किसी देरी के पहुँचें। लोगों का धैर्य मज़बूत है और स्वयंसेवकों में एकता की भावना प्रेरणादायक है, लेकिन अभी केंद्र सरकार से निर्णायक समर्थन की तत्काल आवश्यकता है।

आवश्यक राहत पैकेज के बाद ही बाढ़ प्रभावित परिवार सम्मान के साथ अपने जीवन के पुनर्निर्माण की कठिन यात्रा शुरू कर सकते हैं।

गरीब किसान दो-दो दिनों तक भूखे-प्यासे लाइन में खड़े है

Received From Sanjay Prate on Sunday 7th Sep at 2025 at 11:26 PM Regarding Severe Shortage of Fertilizers

 छत्तीसगढ़ में खाद संकट और कॉर्पोरेटप्रस्त  सरकार 

                                                                           --विशेष आलेख : संजय पराते

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रायपुर:(छत्तीसगढ़): 7 सितम्बर 2025: (*संजय पराते//कामरेड स्क्रीन)::

लेखक-संजय पराते 

हर साल की तरह इस बार भी पूरे देश में किसान खाद की भयंकर कमी का सामना कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है। इस साल भी छत्तीसगढ़ की सहकारी सोसाइटियों में यूरिया और डीएपी खाद की कमी हो गई है। गरीब किसान दो-दो दिनों तक भूखे-प्यासे लाइन में खड़े है और फिर उन्हें निराश होकर वापस होना पड़ रहा है। सरकार उन्हें आश्वासन ही दे रही है कि पर्याप्त स्टॉक है, चिंता न करे। किसान अपने अनुभव से जानता है कि मात्र आश्वासन से उसे खाद नहीं मिलने वाला। और यदि वह जद्दोजहद न करें, तो धरती माता भी उसे माफ नहीं करेगी और पूरी फसल बर्बाद हो जाएगी। अपनी फसल बचाने के लिए अब उसके पास एक सप्ताह का भी समय नहीं है। इसलिए वह सड़कों पर है। प्रशासन की लाठियां भी खा रहा है और अधिकारियों की गालियां भी। यह सब इसलिए कि अपना और इस दुनिया का पेट भरने के लिए उसे धरती माता का पेट भरना है।

खरीफ सीजन में धान छत्तीसगढ़ की प्रमुख फसल है।धान की फसल के लिए यूरिया और डीएपी प्रमुख खाद है। कृषि वैज्ञानिक पी एन सिंह के अनुसार एक एकड़ धान की खेती के लिए 200 किलो यूरिया खाद चाहिए। इस हिसाब से छत्तीसगढ़ को कितना खाद चाहिए?

छत्तीसगढ़ में लगभग 39 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है। तो प्रदेश को 19 लाख टन यूरिया की जरूरत होगी,  जबकि सहकारी सोसायटियों को केवल 7 लाख टन यूरिया उपलब्ध कराने का लक्ष्य ही राज्य सरकार ने रखा है। इस प्रकार प्रदेश में प्रति हेक्टेयर यूरिया की उपलब्धता केवल 122 किलो और प्रति एकड़ 49 किलो ही है। आप कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में इतनी उन्नत खेती नहीं होती कि 19 लाख टन यूरिया खाद की जरूरत पड़े। यह सही है। लेकिन क्या सरकार को उन्नत खेती की ओर नहीं बढ़ना चाहिए और इसके लिए जरूरी खाद उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं बनती?

देश मे रासायनिक खाद का पूरे वर्ष में प्रति एकड़ औसत उपभोग 68 किलो है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह मात्र 30 किलो ही है। वर्ष 2009 में यह उपभोग 38 किलो प्रति एकड़ था। स्पष्ट है कि उपलब्धता घटने के साथ खाद का उपभोग भी घटा है और इसका कृषि उत्पादन और उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। आदिवासी क्षेत्रों में तो यह उपभोग महज 10 किलो प्रति एकड़ ही है। क्या एक एकड़ में 10 किलो रासायनिक खाद के उपयोग से धान की खेती संभव है? आदिवासी क्षेत्रों में यदि खेती इतनी पिछड़ी हुई है, तो इसका कारण उनकी आर्थिक दुरावस्था भी है। सोसाइटियों के खाद तक उनकी पहुंच तो है ही नहीं।


छत्तीसगढ़ में डीएपी और यूरिया की कमी से
खाद की कालाबाजारी बढ़ी है और 266 रुपए बोरी की यूरिया 1000 रुपए में और 1350 रुपए की कीमत वाली डीएपी की बोरी 2000 रुपए में बिक रही है। भाजपा सरकार इस कालाबाजारी को रोकने में असफल साबित हुई है। इससे फसल की लागत बढ़ जाने से खेती-किसानी प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई है।  यह संकट इस तथ्य के बावजूद है कि छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ खाद का उपयोग अखिल भारतीय औसत की तुलना में बहुत कम है। इस समय सभी प्रकार के खाद के उपयोग का अखिल भारतीय औसत 120 किलो प्रति एकड़ है, जबकि छत्तीसगढ़ में मात्र 38 किलो।

छत्तीसगढ़ में धान की खेती सहित लगभग 48 लाख हेक्टेयर रकबा में कृषि कार्य होता है। धान की फसल मुख्य है, लेकिन गन्ना, मक्का और अन्य मोटे अनाज, चना और अन्य दलहन, तिल और अन्य तिलहन और सब्जी की खेती भी भरपूर होती है। भूमि की प्रकृति, मौसम और फसल की जरूरत के अनुसार विभिन्न प्रकार के खादों का उपयोग होता है।

छत्तीसगढ़ में सरकार खरीफ सीजन के लिए औसतन 14 लाख टन खाद उपलब्ध कराती है, जिसमें 7 लाख टन यूरिया, 3 लाख टन डीएपी और 2 लाख टन एसएसपी शामिल है। यह जरूरत से बहुत कम है। लेकिन इस उपलब्धता का भी 45 प्रतिशत निजी क्षेत्र के जरिए वितरित किया जाता है और यह खाद संकट की आड़ में कालाबाजार में ही बिकता है।

वर्तमान खाद संकट डीएपी की भारी कमी से पैदा हुआ है और सरकार ने डीएपी वितरण का लक्ष्य 3 लाख टन से घटाकर 1 लाख टन कर दिया है। सरकार का तर्क है कि 3 बोरी एसएसपी और 1 बोरी यूरिया के सम्मिलित उपयोग से 1 बोरी डीएपी की कमी की भरपाई हो सकती है। इस तर्क के अनुसार सरकार को आनुपातिक रूप से 2 लाख टन यूरिया और 6 लाख टन एसएसपी खाद अतिरिक्त उपलब्ध कराना चाहिए, लेकिन यूरिया की मात्रा बढ़ाई नहीं गई है और एसएसपी 3.5 लाख टन ही अतिरिक्त उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्रकार, प्रदेश में अब डीएपी के साथ ही यूरिया और एसएसपी की भी कमी हो गई है।

डीएपी की कमी के बाद अब छत्तीसगढ़ को कम से कम 22 लाख टन खाद की जरूरत है, लेकिन उपलब्ध केवल 17 लाख टन ही है। 5 लाख टन खाद की कमी है, जिससे खेती प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगी। सरकार का दावा है कि उसने इस कमी की पूर्ति भी नैनो यूरिया और नैनों डीएपी के जरिए कर दी है। उसने सहकारी और निजी क्षेत्र को कुल 2.91 लाख बोतल (500 मिली.) नैनो यूरिया की और 2.93 लाख बोतल (500 मिली.) नैनो डीएपी उपलब्ध कराई है। किसानों के मन में नैनो खाद की उपयोगिता और प्रभावशीलता के बारे में काफी संदेह है। लेकिन यदि मजबूरी में भी वे इन तरल उर्वरकों का उपयोग करते हैं, तो भी इसका कुल प्रभाव 7245 टन खाद के बराबर ही होगा, जो उर्वरकों की कुल कमी के केवल नगण्य हिस्से (1.5 प्रतिशत) की ही भरपाई करेंगे। डीएपी की कमी की भरपाई के लिए उसने जो कदम उठाने का दिखावा किया है, उसके कारण खाद संकट और गहरा गया है, क्योंकि अब केवल डीएपी की नहीं, यूरिया और एसएसपी की भी कमी हो गई है। लेकिन सरकार 5 लाख टन खाद की कमी की पूर्ति का दावा नैनो खाद से करने के दावे पर अड़ी है, तो फिर सरकार के इस चमत्कार को सराहा जाएं या फिर नमस्कार किया जाये!

छत्तीसगढ़ की 1333 सहकारी सोसाइटियों में सदस्यों की संख्या 14 लाख है, जिसमें से 9 लाख सदस्य ही इन सोसाइटियों से लाभ प्राप्त करते हैं। प्रदेश में 8 लाख बड़े और मध्यम किसान है, जो इन सोसाइटियों की पूरी सुविधा हड़प कर जाते हैं। इन सोसाइटियों से जुड़े 5 लाख सदस्य और इसके दायरे के बाहर के 20 लाख किसान, कुल मिलाकर 25 लाख लघु व सीमांत किसान इनके लाभों से वंचित हैं और बाजार के रहमो-करम पर निर्भर है। उनकी हैसियत इतनी नहीं है कि वे बाजार जाकर सरकारी दरों से दुगुनी-तिगुनी कीमत पर कालाबाजारी में बिक रहे खाद को खरीद सके। 

यदि किसानों को खाद सहज रूप से मिले, तो भी डीएपी की जगह यूरिया और एसएसपी खाद के उपयोग से प्रति एकड़ लागत 1000 रूपये बढ़ जाएगी। लेकिन यदि कालाबाजारी में उन्हें खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो खेती-किसानी पर 2000 रुपए प्रति एकड़ की अतिरिक्त लागत बैठेगी। यदि प्रति एकड़ औसतन 1500 रुपए अतिरिक्त लागत को ही गणना में लें, तो 1800 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार किसान समुदाय पर पड़ेगा। इससे खेती-किसानी और ज्यादा घाटे में जायेगी। प्रधानमंत्री किसान योजना में या बोनस में भी इतनी राशि किसानों को नहीं मिलती। यह इस हाथ ले, उस हाथ दे वाली स्थिति है।

किसान आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ अग्रणी राज्यों में से एक है। जब तक एनसीआरबी के आंकड़े उपलब्ध थे, उसके विश्लेषण से पता चलता है कि यहां हर साल एक लाख किसान परिवारों के बीच 45 किसान आत्महत्या कर रहे थे। मोदी राज में जितने बड़े पैमाने पर कृषि का कॉरपोरेटीकरण हुआ है और भाजपा के 'सायं-सायं' राज में इस प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों को कॉरपोरेटों के हाथों में सौंपा जा रहा है, उससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि संकट और बढ़ गया है और प्रदेश में किसान आत्महत्याओं में और बढ़ोतरी हो गई होगी। 

किसानों की दुर्दशा के लिए मोदी सरकार की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियां जिम्मेदार हैं। मोदी सरकार उर्वरक क्षेत्र में निजीकरण की जिन नीतियों पर चल रही है, उसके कारण खाद की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण खत्म हो गया है। इन नीतियों की कीमत किसान अपनी जान देकर चुका रहे हैं। वे लाइन में खड़े-खड़े मर रहे हैं, वे साहूकारी और माइक्रोफाइनेंस कर्ज के मकड़जाल में फंसकर मर रहे हैं या फिर वे आत्महत्या कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की खेती-किसानी के लिए यह खतरनाक स्थिति है।

लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। उनके साथ बात करने के लिए उनका संपर्क नंबर है: 94242-31650

Saturday, March 29, 2025

निर्माण मज़दूर हाशिये पर हैं और सरकार लगातार उदासीन बनी हुई है

 From M S Bhatia on Friday 28th March 2025 at 19:25 Regarding Pretest at Jantar Mantar New Delhi 

प्रेस विज्ञप्ति में बताई मज़दूर नेता *विजयन कुनिसरी ने मज़दूरों की दयनीय हालत

नई दिल्ली के जंतर मंत्र में निर्माण श्रमिकों द्वारा बड़े पैमाने पर मोर्चा 


नई दिल्ली: 28 मार्च 2025: (एम एस भाटिया//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस से संबद्ध भवन और निर्माण श्रमिकों के अखिल भारतीय परिसंघ ने आज एक संसद मोर्चा, यानी 28 मार्च 2025 को देश भर के लगभग 25 राज्यों और केंद्र क्षेत्रों से, 5000 निर्माण श्रमिक जंतर मंतर नई दिल्ली पर एकत्रित हुए ताकि सरकार पर दबाव डाला जा सके केवल निर्माण मजदूरों के प्रति बेपरवाही छोड़ दे।

एआईसीबीसीडब्ल्यू के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बासुदेब गुप्ता ने मोर्च की अध्यक्षता की। विजयन कुनिसरी के महासचिव (AICBCW) ने डिमांड चार्टर  प्रस्तुत किया। एम प्रवीण कुमार महासचिव ने सभी का स्वागत किया। अमरजीत कौर, महासचिव, AITUC ने धरना कार्यक्रम का उद्घाटन किया। के सुब्बारायण सांसद (सीपीआई), संथोश कुमार सांसद (सीपीआई, राज्यसभा) और वाहिधा निज़ाम और रामकृष्ण पांडा एटक के राष्ट्रीय सचिवों ने सभा को संबोधित किया।   

निर्माण क्षेत्र भारत में महिलाओं और बच्चों सहित 10 करोड़ से अधिक लोगों को नौकरी प्रदान करता है। अधिकांश कार्यबल असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। विधायी संरक्षण का अभाव उन्हें सभी प्रकार के शोषण के लिए सबसे कमजोर बनाता है। मौजूदा कानूनों में से कोई भी जैसे कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, मातृत्व लाभ, अनुबंध श्रम अधिनियम आदि के हक में श्रमिकों को नहीं मिलते। वे सामाजिक रूप से उत्पीड़ित और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के बहुमत को बनाते हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में, BOCW अधिनियम 1996 के गैर-निष्पादन और भवन और अन्य निर्माण श्रमिकों के कल्याण सेस अधिनियम, 1996 के बारे में अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। संसद द्वारा लागू किए गए इन कानूनों को काफी हद तक राज्य सरकारों और संघ क्षेत्र प्रशासनों द्वारा  अवहेलना की गई है। 

यहां तक ​​कि जब मौजूदा कानून कार्यबल की रक्षा करने में विफल हुए हैं, पर श्रम कोड इस स्थिति को  बदतर बना देंगे। निर्माण श्रमिक लगातार अपने कानूनी अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहते हैं। यह संसद मोर्चा आजीविका के लिए गंभीर संघर्षों की श्रृंखला में एक और है।

के सुब्बारायण-सांसद ने श्रम और रोजगार मंत्री से मुलाकात की और AICBCW की मांगों के चार्टर का एक ज्ञापन सौंपा। मांगों में शामिल हैं:

1। श्रम कोड को निरस्त करें और सख्ती से BOC अधिनियम को लागू करें 

2। काम की खतरनाक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए ईएसआई के तहत सभी बीओसी श्रमिकों को शामिल किया जाए।

3। BOC श्रमिकों के लिए बोनस, पीएफ, ग्रेच्युटी और त्योहार भत्ता के लिए कानूनी प्रावधान करें

4। न्यूनतम मजदूरी को  36000/ रुपए प्रति माह तक बढ़ाया जाना चाहिए ( जो कि 15 वें ILC के दिशानिर्देशों और रैप्टकोस और ब्रेट केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार है)

5। न्यूनतम पेंशन को बढ़ाया जाना चाहिए रुपए 6000/- प्रति माह तक ।

6। सभी भूमिहीन बीओ सी श्रमिकों के लिए भूमि और आवास प्रदान करें

7। अलग -अलग कानूनों के माध्यम से व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य उपायों को सुनिश्चित करें।

8। सेस राशि को 2%तक बढ़ाएं, फंड को बढ़ाने के लिए उचित संग्रह सुनिश्चित करें

9। फंड के उचित उपयोग के लिए निगरानी समितियों की स्थापना करें।

10। कल्याण बोर्डों के माध्यम से मातृत्व लाभ अधिनियम में निर्धारित मातृत्व लाभ का भुगतान सुनिश्चित करें।

संसद मोर्चा व्यापक और मजबूत भागीदारी के संबंध में सफल है। लेकिन इस मामले का अल हाल  श्रमिकों की वास्तविक आजीविका के मुद्दों को संबोधित करने के लिए भाजपा सरकार की नीतियों में बदलाव पर निर्भर करता है। 

*विजयन कुनिसरी ऑल इंडिया कन्फेडरेशन ऑफ बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (AICBCW) महासचिव हैं और यह संगठन  AITUCसे  सबंधित है। 

Friday, February 16, 2024

भारत बंद ने दिखाया देश और दुनिया को अपनी जनशक्ति का जोश और जलवा

Friday 16th February 2024 at 4:43 PM

मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे

आंदोलनकारी किसानों/मजदूरों पर जारी अत्याचार की भी कड़ी निंदा

*चुनावी बांड को ख़त्म करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी चर्चा में रहा

*सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी सरकार के कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार को उजागर किया 


लुधियाना
: 16 फरवरी 2024: (मीडिया लिंक//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::

आम जनता और मीडिया में लगातार छाए हुए किसान आंदोलन की चर्चा को आज कुछ विराम दिया भारत बंद की खबरों ने। सुबह से लेकर शाम तक तकरीबन सभी शहरों और गांवों में भारत बंद का असर देखने को मिला। लुधियाना,मोहाली, मानसा, फरीदकोट, खरड़, जालंधर--बहुत से स्थानों पर इस भारत बंद का असर देखा गया। 

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा की देशव्यापी हड़ताल और भारत बंद के आह्वान पर मजदूर किसान एकता के गगनभेदी नारों के बीच सेक्टोरल फेडरेशन/एसोसिएशनों ने बस स्टैंड लुधियाना में भी एक विशाल रैली की।  

इस भारत बंद का यह आह्वान मोदी सरकार की मजदूर विरोधी, कर्मचारी विरोधी, किसान विरोधी और अधिकार मांग रहे लोगों पर दमनकारी नीतियों के खिलाफ किया गया है.  रैली की अध्यक्षता एम एस भाटिया, जोगिंदर राम और जगदीश चंद की कमेटी ने की।  रैली के बाद श्रमिकों, कर्मचारियों, किसानों और समाज के अन्य वर्गों के लोगों ने मिनी सचिवालय की ओर मार्च भी किया, जहां रैली भी आयोजित की गई थी। 

दोनों जगहों पर आयोजित रैलियों को एटक,सीटू तथा सीटीयू पंजाब समेत विभिन्न संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया.  वक्ताओं ने मोदी सरकार द्वारा शंभू सीमा पर किसानों पर अत्याचार और शांतिपूर्वक विरोध कर रहे किसानों पर ड्रोन के इस्तेमाल से आंसू गैस के गोले और प्लास्टिक की गोलियां चलाने की भी निंदा की। 

उन्होंने कहा कि यह हमारे देश के संविधान के तहत सभी नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति और विरोध की स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां तीन कृषि बिल वापस ले लिए, वहीं सरकार किसानों की मांगों पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने से पूरी तरह पीछे हट गई है।  

रैली में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि लगातार मजदूरों के खिलाफ कानून बनाये जा रहे हैं और सरकार कॉरपोरेट की सेवा करने पर तुली है.  जबकि गरीब लोगों को उनकी आजीविका और नौकरियों के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और अनियंत्रित मुद्रास्फीति से पीड़ित हैं, उनके अवैतनिक ऋणों को कर कटौती के रूप में एनपीए घोषित करके कॉर्पोरेट क्षेत्र को बड़ी रियायतें दी गई हैं और ऋण माफ किए जा रहे हैं। जिसकी भरपाई आम जनता पर अतिरिक्त कर लगाकर की जा रही है।

मज़दूर, कर्मचारी, किसान, छात्र, युवा, महिलाएं, छोटे-मझोले व्यवसायी, छोटे दुकानदार समेत अन्य लोगों ने इसके खिलाफ बिगुल बजा दिया है। आज का आह्वान, जिसमें किसानों ने गांव-गांव में बंद रखा और देशभर में मजदूर हड़ताल पर चले गये, लोगों में बढ़ते गुस्से का प्रतीक है। 

हर मोर्चे पर विफल होने के बाद सरकार वोट हासिल करने के लिए समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने और सांप्रदायिक दंगे कराने का खतरनाक खेल अपना रही है। वे सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को नष्ट कर रहे हैं और उन्हें अपनी कठपुतली बना रहे हैं।  देश का संघीय ढांचा गंभीर खतरे में है.  वक्ताओं ने चुनावी बांड योजना को असंवैधानिक घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया है और कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि यह सदी की सबसे भ्रष्ट सरकार है।

प्रदर्शनकारियों ने अन्य मांगों के अलावा निम्नलिखित प्रमुख मांगों पर जोर दिया:

 • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण रोका जाए।

 • चार श्रम संहिताएं रद्द करें और 44 कानून लागू करें

 • किसानों की उपज के लिए एमएसपी के फार्मूले @ C2+50% के अनुसार कानूनी गारंटी एवं खरीद गारंटी प्रदान की जाए।

 •श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 26000/- प्रति माह किया जाए।

 • आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं, मध्याह्न भोजन कार्यकर्ताओं और अन्य को नियमित किया जाना चाहिए और न्यूनतम मजदूरी के तहत लाया जाना चाहिए और श्रमिकों के रूप में सभी लाभ दिए जाने चाहिए।

• सेना में अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की अस्थाई भर्ती को वापस लिया जाए और पहले की तरह स्थाई भर्ती की जाए।

 • अमीर समर्थक और जनविरोधी नई शिक्षा नीति 2020 को खारिज किया जाना चाहिए।

 • नई पेंशन योजना को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए।

 • सेवानिवृत कर्मियों की मानी गई मांगों को लागू किया जाए।

• सभी निर्माण श्रमिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा के लिए ईएसआई योजना के तहत लाया जाना चाहिए।

 • हिट एंड रन कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए और संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद ही बनाया जाना चाहिए।

 • विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2022 को वापस लिया जाए।  प्री-पेड स्मार्ट मीटर न लगाए जाएं।

 • मनरेगा के तहत प्रति वर्ष 200 दिन के काम और 700/- प्रति दिन की गारंटी।

 • 8 घंटे की जगह 12 घंटे की अधिसूचना तुरंत रद्द की जाए।

 • न्यूनतम वेतन को संशोधित किया जाना चाहिए।

 • ईएसआई को पटियाला या पीजीआई चंडीगढ़ के बजाय लुधियाना के अस्पतालों को ही रेफर करना चाहिए।

 • खाद्य सुरक्षा की गारंटी करें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करें।

 • सिंघु बॉर्डर पर सभी शहीद किसानों की यादगार बनाई जाए, मुआवजा दिया जाए और उनके परिवारों का पुनर्वास किया जाए, सभी लंबित मामले वापस लिए जाएं।

 • केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त कर मुकदमा चलाया जाए।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 2024 में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को दोबारा सत्ता में आने से रोकना बहुत जरूरी हो गया है, अन्यथा इस देश में न केवल किसानों और मजदूरों के अधिकारों का हनन करने की नीति जारी रहेगी, बल्कि सरकारी संपत्तियों को  कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों सस्ते दाम पर बेचा जाएगा।  

धर्म के नाम पर समाज में फूट डालने से हमारे देश की एकता, अखंडता और संविधान को खतरा होगा।  

रैली को संबोधित करने वालों में एटक पंजाब के अध्यक्ष बंत सिंह बराड़, सीटीयू पंजाब के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंगत राम पासला, डी पी मौड, सुखविंदर सिंह लोटे, जगदीश चंद, विजय कुमार, चमकौर सिंह बरमी, डॉ. राजिंदर पाल सिंह औलख, डॉ. अरुण मित्रा, बलराम सिंह, राम लाल, चरण सराभा, सुभाष रानी, जोगिंदर राम, तहसीलदार यादव, हरबंस सिंह पंधेर, शमशेर सिंह, तहसीलदार, प्रोफेसर जगमोहन सिंह जम्हूरी अधिकार सभा, बलदेव कृष्ण मोदगिल इंटक, महिंदर पाल सिंह मोहाली, हरजिंदर सिंह मोल्डर्स एंड स्टील वर्कर्स यूनियन शामिल थे।