Emailed on Saturday 1st November 2025 at 11:24 AM Regarding Bihar Election
चुनाव पर एक बेहद संतुलित विश्लेषण
![]() |
| लेखक संजय पराते |
वामपंथी आन्दोलन: उपलब्धियों और चुनौतियों पर नियमित चर्चा...आप भी लिख भेजिए Contact:medialink32@gmail.com
Emailed on Saturday 1st November 2025 at 11:24 AM Regarding Bihar Election
चुनाव पर एक बेहद संतुलित विश्लेषण
![]() |
| लेखक संजय पराते |
Received From Sanjay Prate on Sunday 7th Sep at 2025 at 11:26 PM Regarding Severe Shortage of Fertilizers
छत्तीसगढ़ में खाद संकट और कॉर्पोरेटप्रस्त सरकार
--विशेष आलेख : संजय पराते
![]() |
| Meta AI image |
![]() |
| लेखक-संजय पराते |
खरीफ सीजन में धान छत्तीसगढ़ की प्रमुख फसल है।धान की फसल के लिए यूरिया और डीएपी प्रमुख खाद है। कृषि वैज्ञानिक पी एन सिंह के अनुसार एक एकड़ धान की खेती के लिए 200 किलो यूरिया खाद चाहिए। इस हिसाब से छत्तीसगढ़ को कितना खाद चाहिए?
छत्तीसगढ़ में लगभग 39 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है। तो प्रदेश को 19 लाख टन यूरिया की जरूरत होगी, जबकि सहकारी सोसायटियों को केवल 7 लाख टन यूरिया उपलब्ध कराने का लक्ष्य ही राज्य सरकार ने रखा है। इस प्रकार प्रदेश में प्रति हेक्टेयर यूरिया की उपलब्धता केवल 122 किलो और प्रति एकड़ 49 किलो ही है। आप कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में इतनी उन्नत खेती नहीं होती कि 19 लाख टन यूरिया खाद की जरूरत पड़े। यह सही है। लेकिन क्या सरकार को उन्नत खेती की ओर नहीं बढ़ना चाहिए और इसके लिए जरूरी खाद उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं बनती?
देश मे रासायनिक खाद का पूरे वर्ष में प्रति एकड़ औसत उपभोग 68 किलो है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह मात्र 30 किलो ही है। वर्ष 2009 में यह उपभोग 38 किलो प्रति एकड़ था। स्पष्ट है कि उपलब्धता घटने के साथ खाद का उपभोग भी घटा है और इसका कृषि उत्पादन और उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। आदिवासी क्षेत्रों में तो यह उपभोग महज 10 किलो प्रति एकड़ ही है। क्या एक एकड़ में 10 किलो रासायनिक खाद के उपयोग से धान की खेती संभव है? आदिवासी क्षेत्रों में यदि खेती इतनी पिछड़ी हुई है, तो इसका कारण उनकी आर्थिक दुरावस्था भी है। सोसाइटियों के खाद तक उनकी पहुंच तो है ही नहीं।
छत्तीसगढ़ में धान की खेती सहित लगभग 48 लाख हेक्टेयर रकबा में कृषि कार्य होता है। धान की फसल मुख्य है, लेकिन गन्ना, मक्का और अन्य मोटे अनाज, चना और अन्य दलहन, तिल और अन्य तिलहन और सब्जी की खेती भी भरपूर होती है। भूमि की प्रकृति, मौसम और फसल की जरूरत के अनुसार विभिन्न प्रकार के खादों का उपयोग होता है।
छत्तीसगढ़ में सरकार खरीफ सीजन के लिए औसतन 14 लाख टन खाद उपलब्ध कराती है, जिसमें 7 लाख टन यूरिया, 3 लाख टन डीएपी और 2 लाख टन एसएसपी शामिल है। यह जरूरत से बहुत कम है। लेकिन इस उपलब्धता का भी 45 प्रतिशत निजी क्षेत्र के जरिए वितरित किया जाता है और यह खाद संकट की आड़ में कालाबाजार में ही बिकता है।
वर्तमान खाद संकट डीएपी की भारी कमी से पैदा हुआ है और सरकार ने डीएपी वितरण का लक्ष्य 3 लाख टन से घटाकर 1 लाख टन कर दिया है। सरकार का तर्क है कि 3 बोरी एसएसपी और 1 बोरी यूरिया के सम्मिलित उपयोग से 1 बोरी डीएपी की कमी की भरपाई हो सकती है। इस तर्क के अनुसार सरकार को आनुपातिक रूप से 2 लाख टन यूरिया और 6 लाख टन एसएसपी खाद अतिरिक्त उपलब्ध कराना चाहिए, लेकिन यूरिया की मात्रा बढ़ाई नहीं गई है और एसएसपी 3.5 लाख टन ही अतिरिक्त उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्रकार, प्रदेश में अब डीएपी के साथ ही यूरिया और एसएसपी की भी कमी हो गई है।
डीएपी की कमी के बाद अब छत्तीसगढ़ को कम से कम 22 लाख टन खाद की जरूरत है, लेकिन उपलब्ध केवल 17 लाख टन ही है। 5 लाख टन खाद की कमी है, जिससे खेती प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगी। सरकार का दावा है कि उसने इस कमी की पूर्ति भी नैनो यूरिया और नैनों डीएपी के जरिए कर दी है। उसने सहकारी और निजी क्षेत्र को कुल 2.91 लाख बोतल (500 मिली.) नैनो यूरिया की और 2.93 लाख बोतल (500 मिली.) नैनो डीएपी उपलब्ध कराई है। किसानों के मन में नैनो खाद की उपयोगिता और प्रभावशीलता के बारे में काफी संदेह है। लेकिन यदि मजबूरी में भी वे इन तरल उर्वरकों का उपयोग करते हैं, तो भी इसका कुल प्रभाव 7245 टन खाद के बराबर ही होगा, जो उर्वरकों की कुल कमी के केवल नगण्य हिस्से (1.5 प्रतिशत) की ही भरपाई करेंगे। डीएपी की कमी की भरपाई के लिए उसने जो कदम उठाने का दिखावा किया है, उसके कारण खाद संकट और गहरा गया है, क्योंकि अब केवल डीएपी की नहीं, यूरिया और एसएसपी की भी कमी हो गई है। लेकिन सरकार 5 लाख टन खाद की कमी की पूर्ति का दावा नैनो खाद से करने के दावे पर अड़ी है, तो फिर सरकार के इस चमत्कार को सराहा जाएं या फिर नमस्कार किया जाये!
छत्तीसगढ़ की 1333 सहकारी सोसाइटियों में सदस्यों की संख्या 14 लाख है, जिसमें से 9 लाख सदस्य ही इन सोसाइटियों से लाभ प्राप्त करते हैं। प्रदेश में 8 लाख बड़े और मध्यम किसान है, जो इन सोसाइटियों की पूरी सुविधा हड़प कर जाते हैं। इन सोसाइटियों से जुड़े 5 लाख सदस्य और इसके दायरे के बाहर के 20 लाख किसान, कुल मिलाकर 25 लाख लघु व सीमांत किसान इनके लाभों से वंचित हैं और बाजार के रहमो-करम पर निर्भर है। उनकी हैसियत इतनी नहीं है कि वे बाजार जाकर सरकारी दरों से दुगुनी-तिगुनी कीमत पर कालाबाजारी में बिक रहे खाद को खरीद सके।
यदि किसानों को खाद सहज रूप से मिले, तो भी डीएपी की जगह यूरिया और एसएसपी खाद के उपयोग से प्रति एकड़ लागत 1000 रूपये बढ़ जाएगी। लेकिन यदि कालाबाजारी में उन्हें खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो खेती-किसानी पर 2000 रुपए प्रति एकड़ की अतिरिक्त लागत बैठेगी। यदि प्रति एकड़ औसतन 1500 रुपए अतिरिक्त लागत को ही गणना में लें, तो 1800 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार किसान समुदाय पर पड़ेगा। इससे खेती-किसानी और ज्यादा घाटे में जायेगी। प्रधानमंत्री किसान योजना में या बोनस में भी इतनी राशि किसानों को नहीं मिलती। यह इस हाथ ले, उस हाथ दे वाली स्थिति है।
किसान आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ अग्रणी राज्यों में से एक है। जब तक एनसीआरबी के आंकड़े उपलब्ध थे, उसके विश्लेषण से पता चलता है कि यहां हर साल एक लाख किसान परिवारों के बीच 45 किसान आत्महत्या कर रहे थे। मोदी राज में जितने बड़े पैमाने पर कृषि का कॉरपोरेटीकरण हुआ है और भाजपा के 'सायं-सायं' राज में इस प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों को कॉरपोरेटों के हाथों में सौंपा जा रहा है, उससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि संकट और बढ़ गया है और प्रदेश में किसान आत्महत्याओं में और बढ़ोतरी हो गई होगी।
किसानों की दुर्दशा के लिए मोदी सरकार की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियां जिम्मेदार हैं। मोदी सरकार उर्वरक क्षेत्र में निजीकरण की जिन नीतियों पर चल रही है, उसके कारण खाद की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण खत्म हो गया है। इन नीतियों की कीमत किसान अपनी जान देकर चुका रहे हैं। वे लाइन में खड़े-खड़े मर रहे हैं, वे साहूकारी और माइक्रोफाइनेंस कर्ज के मकड़जाल में फंसकर मर रहे हैं या फिर वे आत्महत्या कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की खेती-किसानी के लिए यह खतरनाक स्थिति है।
लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। उनके साथ बात करने के लिए उनका संपर्क नंबर है: 94242-31650
Sanjay Parate//Badal Saroj//10th November 2024 at 12:30 PM//An International Writeup on Humanity//Email
असभ्यता को क्रूरता से निर्ममता होते हुए बर्बरता को श्रेष्ठता बताने की हद तक....
वाम दुनिया से:10 नवंबर 2024 (भोपाल से बादल सरोज//कामरेड स्क्रीन// झंकझोरता आलेख)::
एक ऐसी महापरियोजना है, जिसका मकसद अब तक की उगी सारी फसल को चौपट करना भर नहीं, धरती को बंजर बनाना और मानव समाज द्वारा अभी तक विकसित, संकलित, परिवर्धित कर संग्रहित किये गये सभी बीजों को भी हमेशा के लिए नष्ट कर देना है। यह परियोजना महा परियोजना इसलिए है कि इस काम में सत्ता के सारे साधन और संसाधन, प्रतिष्ठान और संस्थान पूरी शक्ति के साथ चौबीसों घंटा, सातों दिन भिड़े हुए हैं ; ऐसा कोई उपाय नहीं है जिसे छोड़ा हो, ऐसा कोई करम नहीं है जो किया न हो। वे मनुष्य से उसके स्वाभाविक गुणों, अनुभूति और अहसासों, आचरण और बर्तावों के मानवीय संस्कारों को छीन लेना चाहते हैं, एक नया मनुष्य गढ़ना चाहते हैं, ऐसा प्राणी जो दिखने में तो हो मनुष्य जैसा, मगर सिर्फ दिखने में हो, वास्तव में मनुष्य जैसा न बचे।
हालांकि इसमें कुछ नया नहीं हैं; स्थापित सत्य पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का यह लक्ष्य है कि वह लोगों के लिए माल पैदा करने तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि उसी के साथ-साथ अपने माल के लिए लोग भी पैदा करती है। इस बार नया यह है कि यह काम कुछ ज्यादा ही बेशर्मी और कुछ ज्यादा ही तेज रफ़्तार से किया जा रहा है। इतनी धड़ाधड़ और ऐसी योजनाबद्धता के साथ किया जा रहा है कि जिन बातों, घटनाओं पर अब तक स्तब्ध, आहत और आक्रोशित होने का भाव उमड़ना एकमात्र स्वभाव होता था, उन्हें पहले आम बनाया गया ; फिर धीमी, किन्तु लगातार तेज होती गति से बर्दाश्त करने तक लाया गया और अब उसका आनंद लेने, उसे एन्जॉय करने की हद तक पहुंचा दिया गया है। यदि यह यहीं नहीं थमा, तो अगली स्टेज उनमे शामिल करवाने की होने वाली है ; जो शुरू भी हो चुकी है।
राजनीतिक मंचों से इस परियोजना को दिनों दिन छीजते और नीचे से नीचे गिरते स्तर तक लाने की जैसे भाजपा ने सुपारी ही ले ली है। झारखण्ड के चुनाव अभियान में इसके सह चुनाव प्रभारी असम के मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे हिमंता विषशर्मा धड़ल्ले के साथ विष फैलाने में लगे हैं। नफरती अभियान को उग्र से उग्रतर करते हुए वे जिस तरह की भाषा का उपयोग कर रहे हैं, वह खुद भाजपा के अपने पैमाने से भी ज्यादा ही आक्रामक और उकसावेपूर्ण है। यह इस एक अकेले बंदे या निशिकांत दुबे जैसे दूसरे उत्पाती भाजपाईयों तक सीमित नहीं रहा, स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ‘घुसपैठिया’ के रूपक के जरिये इसके साथ जुगलबंदी कर रहे हैं ; इस बार तो उन्होंने जैसे सारी दिखावटी मर्यादाओं की भी कपाल क्रिया करने की ठान ली है । मंगलसूत्र छीन लेंगे, भैंस छीन लेने के अब तक के न्यूनतम स्तर को उन्होंने झारखण्ड की सभाओं में ‘बेटियाँ छीन लेंगे’ की बात कहकर और भी अधिक नीचाई तक पहुंचा दिया है। यह सिर्फ मुंहबोली बातें नहीं रही, इनके साथ ताल से ताल मिलाकर मैदानी कार्यवाहियां भी जारी हैं। सीमांचल के जिलों में निकाली गयी केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की आग लगाऊ यात्रा के बाद अब बिहार में भी बहराईच दोहराया जाना शुरू हो गया है। भागलपुर की एक मस्जिद में घुसकर उसमे तोड़फोड़ करना और भगवा झंडा लहराने की हरकत इसी की कड़ी में है और उनका इरादा सिर्फ प्रतीकात्मक कार्यवाहियों तक सीमित नहीं रहने वाला, सिर्फ झारखंड चुनाव भर तक नहीं चलने वाला; संघ के शताब्दी वर्ष को यह कुनबा इसी तरह मनाने का इरादा रखता है।
पहले इस तरह की बयानबाजी बकवास मानी जाती जाती रही, लोग इनसे कतराते रहे, ऐसा करने वालों को हाशिये पर ही समेट कर बिठाये रहे। मगर अब इन्हें स्वीकार्यता प्रदान करवाने के लायक माहौल बनाने के लिए पूरी सत्ता अपनी अष्ट से लेकर चौंसठ भुजाओं को सिम्फनी की तरह लयबद्ध बनाने में लगी हुई है। समय-समय पर न्यायालयों, यहाँ तक कि उच्च न्यायालयों तक के जजों की निराधार, गैर जिम्मेदार और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम जज के अपने फैसलों के बारे में दी गयी अजीब और हैरत में डाल देने वाली स्वीकारोक्ति, संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से वर्जित किये जाने के बाद भी सत्ता के साथ खुल्लमखुल्ला मेल मिलाप, इसी तरह के अनुकूलन, धीरे-धीरे लोगों के मानस ढालने की परियोजना का एक अंग है। इस सबके बीच ढाला जा रहा है वह प्राणी, जो बिना किसी शर्म के मुंबई में भंडारे का प्रसाद देने के पहले, चार या उससे भी कम पूड़ियों को देने, पहले से 'जै श्रीराम' बुलवाने की शर्त लगाने की बेशर्मी दिखाता है।
असभ्यता को क्रूरता से निर्ममता होते हुए बर्बरता को श्रेष्ठता बताने की हद तक ले जाना, जघन्यों को अभयदान देते हुए उन्हें प्रतिष्ठित करना समाज को उस दिशा में धकेल देने की महापरियोजना है जिसे राजनीतिक भाषा में दक्षिणपंथ कहा जाता है। पिछले तीन दशक से खरपतवार की तरह फ़ैल रहा यह रोग अब भांति-भांति की विषबेलों के रूप में समाज और उसके अब तक के हासिल को जकड़ रहा है। लोकतंत्र से बैर, विवेक और तर्क, तथ्यों पर आधारित सत्य से चिढ़, गरीब, वंचित, असहाय और उपेक्षितों से नफरत इसकी विशेषता है। कहीं अश्वेत, कहीं मैक्सिकन या अफ्रीकी, सभी जगह निर्धन और महिला, शरणार्थी, बच्चे और विकलांग--भारत में इनके अलावा जाति, वर्ण, संप्रदाय आदि निशाना चुनने के इनके आधार हैं।
यूं तो इसके अनेक उदाहरण हैं, मगर फिलहाल इस सप्ताह घटी कुछ घटनाओं को देखने से ही इस महापरियोजना की झलक मिल जाती है। फ़िलिस्तीन की गज़ा पट्टी में अमरीका की गोद में बैठी इजरायली फौजों की वहशी दरिंदगी का एक और घिनौना नमूना फिलिस्तीनी बच्चों के नरसंहार के बाद उनके खिलौनों को अपनी ‘जीत की ट्राफी’ की तरह टैंकों और तोपों पर सजाकर दिखाना, मारे गए बच्चों के खिलौनों पर झूला झूलते हुए वीडियो बनाकर उन्हें सार्वजनिक करना और खुद को विश्व लोकतंत्र के स्वयंभू दरोगा दीवान मानने वाले अमरीका, ब्रिटेन जैसे देशों के शासकों और मीडिया द्वारा इस ‘कारनामे’ पर या तो चुप्प रहना या उसकी हिमायत करना, इसी तरह के अनुकूलन का हिस्सा है।
इसी का एक और विद्रूप रूप एक बार और अमरीका का राष्ट्रपति बन चुके डोनाल्ड ट्रम्प का हैती के शरणार्थियों, आप्रवासियों के प्रति नफरत भड़काने की नीयत से दिया गया बयान है। पहले ट्रम्प के सोशल मीडिया गैंग ने यह फैलाया, बाद में खुद उसने राष्ट्रपति उम्मीदवारों की राष्ट्रीय बहस में आव्रजन के बारे में एक सवाल के जवाब में कहा कि "हैती से आये आप्रवासी कुत्तों को खा रहे हैं, वे बिल्लियों को खा रहे हैं। वे वहां रहने वाले लोगों के पालतू जानवरों को खा रहे हैं, और यही हमारे देश में हो रहा है, और यह शर्मनाक है।" इस तरह की बकवास करने वाले ट्रम्प अकेले नहीं हैं, उनके जैसे अनेक शासक हैं, जो अपने-अपने निजाम की असफलताओं को ढांकने के लिए इस या उस बहाने किसी न किसी वंचित समूह के खिलाफ उन्माद भड़का रहे हैं। इस तरह के झूठ में विश्वास करने वाले लोग तैयार कर रहे हैं।
यह किस महीनता से किया जाता है, इसकी एक देसी मिसाल अम्बाला रेलवे स्टेशन की चर्चा में आयी और खूब वायरल हुई एक तस्वीर के उदाहरण से समझा जा सकता है। इसमें रेलगाड़ी में जगह न मिलने के चलते दो युवा प्रवासी मजदूर एक खिड़की से अपने बैग और पोटलियां बाँध लेते हैं और रेल के डब्बे की खिड़की के बाहर दोनों तरफ गमछा बांधकर खुद को लटका लेते हैं और इस तरह नवम्बर की सर्दी में अपनी कम-से-कम 24 घंटे की यात्रा शुरू कर देते हैं। यह विचलित करने वाली तस्वीर देश के सबसे बड़े सार्वजनिक परिवहन रेलवे की मोदी राज में हुई दुर्दशा और देश के नागरिकों के साथ किये गए आपराधिक बर्ताव का दस्तावेजी सबूत है। मगर बजाय इसकी समीक्षा कर असली कारणों की पड़ताल कर इस स्थिति के दोषियों की शिनाख्त करने के, बजाय इस पर बहस करने के कि किस तरह रेल परिवहन का अभिजात्यीकरण किया जा रहा है, अनारक्षित जनरल डब्बे ख़त्म करके, स्लीपर कोच की संख्याओं को आधा या उससे भी कम करके, ए सी डब्बों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा करके और आम प्रचलन की रेल गाड़ियों को बंद कर उनकी जगह गतिमान, अन्दे वन्दे भारत, नमो भारत, नमो भारत रैपिड रेल जैसी सुपर अभिजात्य गाड़ियों की भरमार कर देश की लाइफ लाइन कही जाने वाली भारतीय रेल को कितनी योजनाबद्ध साजिश से देश की 80-90 फीसदी जनता की पहुंच से बाहर किया जा रहा है। यही काम सड़क परिवहन की बसों के साथ भी हो रहा है, राज्य सरकारों के परिवहन महकमे बंद करने के बाद शुरू हुई प्रक्रिया परिवहन के सस्ते और उपलब्ध वाहनों को महंगे और अत्यंत महंगे वाहनों से प्रस्थापित कर बहुमत जनता तक उनकी पहुँच को बाधित कर चुकी है।
चर्चा इस पर होनी चाहिये थी कि जब दुनिया के कई विकसित देश दोबारा से सस्ते सार्वजनिक परिवहन की बहाली की ओर लौट रहे हैं, तो यहाँ क्यों उल्टी गंगा में बाढ़ लाई जा रही है। मगर ऐसा करने की बजाय पीड़ित को ही दोषी ठहराते हुए यह निष्कर्ष परोसा जाता है कि "लेकिन बोगी में बैठे किसी यात्री ने इन दोनों को भीतर लाने की कोशिश तक नहीं की।" और यही बात बाकियों द्वारा भी जस की तस दोहराई जाने लगती है। इस तरह फ़िक्र पैदा करने वाली इस तस्वीर से भी ज्यादा चिंतित करती है इस छवि को पढ़ने या उसे पढ़वाने की कोशिश, उसके जरिये बनाया जाने वाला मानस, ढाला जा रहा सोचने-विचारने, देखने और समझने का ख़ास नजरिया। मतलब ये कि गुनहगार रेल के इस डिब्बे में 'बैठी' सवारियाँ हैँ। उन्हें ही दोषी मानिये, उन्हें ही धिक्कारिये, उन्हें ही गरियाइये। जिस तरह दिखाया जा रहा है, उसी तरह देखिए और दिखाइये। क्या सच में उस बोगी के दरवाजे के खुलने की कोई गुंजाइश थी? जिस खिड़की से बैग बांधे गये हैँ, उसे ध्यान से देखिये, जरा सी जगह में कम-से-कम कम तीन प्राणी नजर आ रहे हैँ, जो एक वर्ग फुट से भी कम स्थान में खिड़की से चिपके खडे हैँ। उनके आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, दाँए, बांए कितने होंगे? जिन्होंने कभी इस तरह के डब्बो में सफऱ नहीं किया, वे इसका अनुमान भी नहीं लगा सकते कि इस तरह तरह ठसकर, आलू-प्याज के बोरों से भी बुरी हालत में लिपट कर, सिमट कर क्यों जा रहे हैँ ये लोग?
इस तरह की मिसाल और भी हैं, बल्कि हाल के दिनों में कुछ ज्यादा ही हैं। इस महापरियोजना के सूत्रधार दक्षिणपंथ के भेड़िये को जिस उत्तर आधुनिकता के लबादे में छुपाकर, उसे विचारधारा बताकर गले उतारना चाहते हैं, वह और कुछ नहीं, पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में बदलने के बाद उसके फासिज्म तक पहुँचने का जीपीएस है, जिसका इरादा मनुष्यता का निषेध कर दुनिया को पाषाणकाल में पहुंचा देने का है। विज्ञान और तकनीक की आधुनिकतम खोजों को इसे और तेजी देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। ए आई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता को यह भस्मासुर अपना नया औजार बनाने की फ़िराक में है। एलन मस्क ने एलान किया है कि वह एक ऐसा मोबाइल बनाने जा रहा है, जिसे न बैटरी चार्जर की जरूरत होगी, न इन्टरनेट की ; इस तरह दुनिया के पूरे सूचनातंत्र पर एक दुष्ट का कब्ज़ा होने की आशंका सामने दिखाई दे रही है। इसके क्या असर होंगे, इसे पिछले 10-12 वर्षों में भारत के मीडिया के प्रभाव से समझा जा सकता है ।
दुनिया में पूंजीवाद का यह भस्मासुरी अवतार उस उजाले और चमक को खत्म कर देना चाहता है, जिसे मनुष्य समाज ने 1917 की 7 नवम्बर को हुई उस महान समाजवादी क्रांति के बाद देखा था, जिसने दुनिया हमेशा के लिए बदल दी थी। इस दिन जो हुआ था, वह पृथ्वी के एक देश रूस में हुई और उसके बाद सोवियत संघ के रूप में अस्तित्व में आई एक राजनीतिक क्रान्ति भर नहीं थी। यह एक ऐसा विप्लव था, जिसने राज और सामाजिक ढांचे को चलाने के बारे में तब तक की सारी मान्यताओं की पुंगी बनाकर मुट्ठी भर शोषकों के राज को अंतिम सत्य मानने वालों को थमा दी थी। 1917 को पहली बार कायम हुआ मजदूरों का राज सिर्फ एक देश के मेहनतकशों की उपलब्धि नहीं थी, यह समता, समानता और शोषणविहीन समाज बनाने के हजारों साल पुराने उस सपने का साकार होना था, जिसने नया समाज ही नहीं, नए तरह का बेहतर और संस्कारित मनुष्य भी तैयार किये था।
*सोवियत समाजवाद के न रहने के पूरे 33 वर्ष बाद भी, अपना वर्चस्व कायम करने के लिए खुला मैदान मिलने के बाद भी साम्राज्यवाद क्रांति के डर से कांप रहा है और इसीलिए मनुष्यों के अमानवीयकरण की महापरियोजना में जुटा है, क्योंकि उसे पता है कि अगर जिसका इलाज इस क्रान्ति ने किया था, यदि बीमारी वही है, तो आगे भी उसका इलाज वही होगा, जिसे मनुष्यता एक शताब्दी पहले देख चुकी है।*
लेखक 'लोकजतन' के सम्पादक तथा अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।
संपर्क : 94250-06716)*
प्रकाशनार्थ आलेख//संजय पराते//WhatsApp//Monday//27th October 2024//11:33 AM//आलेख:वृंदा करात//कामरेड स्क्रीन
आरजी कर मामले में संघर्ष के कुछ 'अद्वितीय' पहलू
छत्तीसगढ़ से संजय पराते: 27 अक्टूबर 2024: (कामरेड स्क्रीन डेस्क)::
बलात्कार पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई के सामूहिक अनुभव की रोशनी में, आर.जी. कर मामले में बंगाल का आंदोलन कई मायनों में अनूठा है। पिछली बार भारत में 2012 में निर्भया मामले में अत्याचार के खिलाफ व्यापक सार्वजनिक प्रतिक्रिया देखी गई थी, जो राजनीतिक या संगठनात्मक लामबंदी की सीमाओं को पार कर गई थी। हाल ही में, दिल्ली में महिला पहलवानों ने संस्थागत यौन उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष किया था, जिसे पूरे भारत में उदाहरणीय समर्थन मिला था। लेकिन बंगाल का संघर्ष बहुत अलग है। इस भयावह घटना के ढाई महीने बाद भी इस संघर्ष में जन भागीदारिता और इसकी ताजगी उल्लेखनीय और अनूठी है। यह एक व्यापक आधार वाला और मुख्य रूप से स्वयं-संगठित भागीदारी पर आधारित व्यापक संघर्ष है। "व्यापक" शब्द का उपयोग मैं सामाजिक अर्थ में कर रही हूं--हालांकि यह संघर्ष शहरी और मध्यम वर्ग पर आधारित है, जैसा कि कुछ टिप्पणीकारों ने कहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इस आंदोलन के फैलाव से सभी तबकों के लोगों में इसकी गूंज देखी जा सकती है। इस आंदोलन में महिलाओं और युवाओं की उल्लेखनीय भागीदारी है। इसे एक "स्वतःस्फूर्त" संघर्ष बताया जा रहा है। हो सकता है कि ऐसा ही हो।
लेकिन सवाल यह है कि कैसे और क्यों? इस्तीफा देने वाले एक टीएमसी सांसद जवाहर सरकार ने राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी की तीखी आलोचना की है और सटीक आकलन किया है कि "यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन जितना अभया (पीड़िता का नाम) के लिए है, उतना ही राज्य सरकार के खिलाफ भी है।" उन्होंने भ्रष्टाचार को एक प्रमुख मुद्दे के रूप में, जिसमें स्वास्थ्य का क्षेत्र भी शामिल है और "नेताओं के एक हिस्से में बढ़ती बाहुबल की रणनीति" को भी चिन्हित किया है।
“बाहुबल की रणनीति” का यौन आयाम
सरकार ने जो लिखा है, उसमें कुछ महत्वपूर्ण अतिरिक्त तथ्य हैं, जो सार्वजनिक आक्रोश की निरंतर अभिव्यक्ति को समझने में मदद करते हैं। “भ्रष्टाचार” और “बाहुबल की रणनीति” का एक मजबूत यौन आयाम है, जिसे बंगाल की महिलाओं ने पिछले दशक में अनुभव किया है। भ्रष्टाचार और “बाहुबल की रणनीति” सीधे तौर पर अपराधीकरण से जुड़ी हुई है। टीएमसी द्वारा पूरे बंगाल में अपराधियों को दिए जाने वाले संरक्षण के कारण सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं, खासकर युवा लड़कियों, की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। यौन इरादे वाली “बाहुबल की रणनीति” एक वास्तविकता है। “बाहुबल” के तरीकों का इस्तेमाल शुरू में वामपंथ के खिलाफ किया गया था -- वामपंथी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आतंकित करने के लिए। वामपंथ से जुड़ी महिलाएं खास तौर पर इसके निशाने पर थीं। एक तत्कालीन टीएमसी सांसद ने घोषणा की थी कि उनके लोग माकपाई महिलाओं का बलात्कार करेंगे। एक बार जब अपराधियों को राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ यौन अत्याचार करने का लाइसेंस और राज्य का संरक्षण मिल जाता है, तो यह यहीं तक नहीं रुकता। आरजी कर मामले में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का अपनी गर्भवती पत्नी के साथ हिंसक दुर्व्यवहार का ज्ञात रिकॉर्ड है। फिर भी उसे पुलिस ने “नागरिक स्वयंसेवक” के तौर पर सुरक्षा दी और पूरे अस्पताल में घूमने-घुसने की अनुमति दी।
अतीत में बंगाल एक मजबूत सामाजिक चेतना के लिए जाना जाता था, जहां आम लोग सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए हस्तक्षेप करते थे। हालांकि आज भी यह चेतना बनी हुई है, लेकिन लोग ऐसे गुंडों को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण के कारण हस्तक्षेप करने से डरने लगे हैं। आज बंगाल में ऐसे आवश्यक सामाजिक हस्तक्षेपों को समर्थन मिलने के बजाय उनके खिलाफ हिंसा होने की संभावना अधिक होती है। ऐसे माहौल में अपराधी फलते-फूलते हैं।
इसके अलावा, कई मामलों में यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं या उनके परिवार के सदस्यों को स्थानीय टीएमसी नेताओं द्वारा किए गए “समझौते” को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। कई मामलों में, अपराधी का खुद टीएमसी से सीधा संबंध होता है। अपराधी को दंड से बचाने में पुलिस की घोर मिलीभगत, महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न और हमले के अपराधों को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कारक है। संदेशखाली की भयावह घटना में, जिन महिलाओं ने टीएमसी अपराधियों के खिलाफ थाने में यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी, उनसे कहा गया था कि आपराधिक गिरोह के टीएमसी प्रमुख की अनुमति के बिना कोई शिकायत दर्ज नहीं की जाएगी। आरजी कर का मामला दिखाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर फैला अपराधीकरण अब राज्य सरकार द्वारा संचालित कार्य संस्थानों तक फैल गया है। यह विशेष रूप से कामकाजी महिलाओं के लिए सबसे परेशान करने वाली बात है। अगर किसी महिला का उत्पीड़न एक सार्वजनिक अस्पताल, उसके काम करने की जगह में हो सकता है -- तो फिर उनके लिए कौन सी जगह सुरक्षित मानी जा सकती है?
वर्तमान विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं की भारी-भरकम भागीदारी, जो कि काफी हद तक स्वतः संगठित है, महिलाओं द्वारा तिलोत्तमा (पीड़िता को दिया गया यह दूसरा नाम है।) के साथ स्वयं की पहचान का हिस्सा है, जो उनके अपने जीवंत अनुभव या उनके किसी जानने वाले के अनुभव पर आधारित है। मैं ही तिलोत्तमा हूँ और तिलोत्तमा में मैं ही थी, जो उसके साथ हुआ, वह मेरे साथ भी हो सकता है -- यह भावना इस संघर्ष की एक मजबूत और प्रमुख विशेषता है।
इस प्रकार तिलोत्तमा के लिए न्याय का संघर्ष प्रत्येक महिला प्रतिभागी का स्वयं के लिए संघर्ष है -- बंगाल में महिलाओं के लिए बढ़ती असुरक्षा के विरुद्ध न्याय का संघर्ष।
व्यक्तिगत विचलन नहीं
इसके अलावा, हालांकि यह आंदोलन “पार्टी राजनीति” पर आधारित नहीं है, क्योंकि यह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है, लेकिन यह राजनीति से गहराई तक जुड़ी है, क्योंकि यह इस लोकप्रिय धारणा पर आधारित है कि आरजी कर का मामला व्यक्तिगत विचलन नहीं है, बल्कि टीएमसी के तहत बंगाल को प्रभावित करने वाली गहरी अस्वस्थता का प्रतिबिंब है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के नेतृत्व में आपराधिक और भ्रष्ट गठजोड़ का पर्दाफाश हो गया है। यह संघर्ष अब जवाबदेही और सजा की मांग कर रहा है।
एक परिवार का साहस
एक और कारक, जिसने आंदोलन को प्रेरित किया है, वह है पीड़िता के परिवार की भूमिका। किसी भी माता-पिता की, जिसने ऐसी परिस्थितियों में अपनी प्यारी बच्ची को खो दिया हो, की अथाह पीड़ा का अनुभव किया जा सकता है। इस मामले में, पीड़िता के परिवार की भूमिका इस संघर्ष के विस्तार और जनता की भारी प्रतिक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण कारक रही है। वे शुरू से ही अपने एक लक्ष्य पर अडिग रहे हैं -- अपनी बेटी के लिए न्याय। उनकी गरिमा, उनका आत्म-संयम और सत्ताधारी शासन के क्षत्रपों द्वारा दिखाई गई शत्रुता और संकीर्णता से ऊपर उठने की उनकी क्षमता काफी प्रेरणादायक है। हाल ही में, मुझे उनके साथ समय बिताने का अवसर मिला, जब मैं अपनी एकजुटता व्यक्त करने के लिए उनके घर गई थी। मैंने तिलोत्तमा की चाची से भी मुलाकात की, जो उस समय घर में मौजूद थीं। बेशक, ऐसे कई माता-पिता हैं, जिन्होंने अपनी बेटियों के लिए न्याय की लड़ाई में जबरदस्त साहस दिखाया है, जैसे निर्भया की मां आशा देवी ने दिखाया था। लेकिन तिलोत्तमा के माता-पिता के सामने आने वाली बाधाएं पूरी तरह से अलग स्तर पर हैं, क्योंकि राज्य सरकार आपराधिक गठजोड़ में प्रत्यक्ष रूप से शामिल है और दोषियों को बचाने का प्रयास कर रही है।
जब उन्हें अस्पताल के अधिकारियों ने अपनी बेटी की हत्या के बारे में बताया, तब से लेकर आज तक, उन्हें राज्य समर्थित क्रूरता का सामना करना पड़ रहा है, जो उन्हें चुप कराने के लिए डिज़ाइन की गई है। मां ने उस सुबह करीब 8 बजे अस्पताल में ड्यूटी पर अपनी बेटी को एक बार नहीं, बल्कि दो बार फोन किया था। “मैं संपर्क नहीं कर सकी” – वह कहती है, “मुझे लगा कि वह अपने मरीजों के साथ व्यस्त है।” अस्पताल से फोन आया, उनकी बेटी के साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार और हत्या के कई घंटे बाद। स्वयं को आप एक मां और पिता की जगह पर रखकर देखें, जिन्हें एक घंटे के भीतर फोन पर बताया जाता है -- “जल्दी आओ, आपकी बेटी बीमार है।" फिर एक और फोन आता है -- "आपकी बेटी गंभीर है।" फिर तीसरा, "वह मर चुकी है -- उसने आत्महत्या कर ली है।" अपने घर से एक घंटे से अधिक की दूरी पर स्थित अस्पताल पहुंचने के बाद, उन्हें तीन घंटे तक एक कमरे में बैठाए रखा जाता और उन्हें अपनी बेटी को देखने की अनुमति नहीं दी जाती। बहुत बाद में, जब वह अपनी प्यारी बच्ची को बेजान देखती है -- उसे उसके पति से अलग करके एक कमरे में बैठा दिया जाता है। दोनों को आपस में किसी भी तरह की बातचीत करने की अनुमति नहीं दी जाती। इस बीच उसके परिवार के सदस्य अस्पताल पहुँच जाते हैं। उन्हें मृतक बच्ची के माता-पिता से मिलने की अनुमति नहीं दी जाती। अधिकारी किस बात से डरे हुए थे? वे क्यों जानबूझकर दुखी, सदमे में डूबे असहाय माता-पिता और उनके परिवार के सदस्यों को उस समय अलग कर रहे थे, जब उन्हें एक-दूसरे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी?
फिर माता-पिता से पोस्टमार्टम के लिए कागज़ात पर दस्तखत करवाए गए। मां चाहती थी कि पोस्टमार्टम कहीं और हो। उसने यह बात वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों से कही। पुलिस ने उसे दरकिनार कर दिया और उन्होंने माता-पिता को कागज़ात पर जबरदस्ती दस्तखत करने के लिए बाध्य किया। पोस्टमार्टम के बाद शव को एंबुलेंस में रख दिया गया। एंबुलेंस में परिवार के किसी भी सदस्य को बैठने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बजाय इलाके के एक बिन बुलाए टीएमसी पार्षद एंबुलेंस में बैठ गए और उसने ड्राइवर को निर्देश देना शुरू कर दिया।
माता-पिता ने अधिकारियों से दूसरे अस्पताल में दोबारा पोस्टमार्टम की अनुमति देने की विनती की। लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। लड़की के माता-पिता की हिम्मत की कल्पना कीजिए -- उस समय भी, उन्होंने स्थानीय थाने में जाकर अनुरोध किया कि जब तक दूसरा पोस्टमार्टम न हो जाए, उनकी बेटी का अंतिम संस्कार न किया जाए। थाना प्रभारी ने इंकार कर दिया। हारकर माता-पिता घर पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि उनकी बेटी की एम्बुलेंस पहले से ही उनके बंद घर के बाहर खड़ी थी।
वहां पुलिस की एक बड़ी टुकड़ी मौजूद थी। किसी को भी घर के पास जाने की अनुमति नहीं थी। इस बीच परिवार के अन्य सदस्य किसी तरह पुलिस की घेराबंदी को तोड़कर घर पहुंचे। उनके लिए यह खौफनाक था कि उन्हें अपने घर में अकेले में अपनी बेटी के लिए शोक मनाने का समय नहीं दिया जा रहा था। उन्हें बताया गया कि सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं और देर रात उन्हें अपनी बेटी का अंतिम संस्कार करने के लिए मजबूर किया गया। इलाके के टीएमसी नेताओं ने परिवार की अनुमति के बिना ही श्मशान के कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए थे।
यह पूरी प्रक्रिया कानून का उल्लंघन थी, यह बलात्कार और हत्या की पीड़िता के परिवार के अधिकारों पर हमला था, यह मानवता की हत्या थी। यह सब सीधे टीएमसी सरकार और मुख्यमंत्री के नेतृत्व में शीर्ष अधिकारियों द्वारा किया गया था। यह वैसा ही काम था, जैसा कि हाथरस मामले में भाजपा के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने किया था -- परिवार के विरोध के बावजूद बलात्कार और हत्या की पीड़िता का जबरन अंतिम संस्कार कर दिया गया था। बंगाल में ऐसा होना केवल इस बात को रेखांकित करता है कि टीएमसी सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ है।
तब से लेकर अब तक उस माता-पिता और उनके परिवार ने कई स्तरों पर आए दबावों का विरोध किया है और अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई में कभी समझौता नहीं किया है। माता-पिता और परिवार के इस जबरदस्त साहस ने उन हजारों लोगों को प्रेरित किया है, जो "हमें न्याय चाहिए" के नारे के साथ सड़कों पर उतरते हैं। उनकी शांत, गरिमामय, मजबूत और ईमानदारी से भरी भूमिका संघर्ष को जारी रखने के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। उन्होंने दस सूत्री चार्टर पर जूनियर डॉक्टरों के संघर्ष को अपना समर्थन दिया है। मां कहती है, "ये मेरी बेटी जैसी अन्य युवतियों की रक्षा और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मांगें हैं। किसी अन्य महिला को अपने कार्यस्थल पर इस तरह के डर का सामना नहीं करना चाहिए। वह मर गई, लेकिन अगर मांगें पूरी हो जाती हैं, तो अन्य लोग जीवित रहेंगे।"
और पीड़िता की सबसे महत्वपूर्ण बात
वह उनकी इकलौती बेटी थी। मां कहती है कि जब वह छोटी लड़की थी--कक्षा 3 या 4 में, तब से वह हमेशा डॉक्टर बनना चाहती थी। परिवार उसके पिता की छोटी-सी कमाई पर निर्भर था, जिन्होंने एक दर्जी के रूप में शुरुआत की थी और अब स्कूल यूनिफॉर्म सिलने का एक छोटा-सा व्यवसाय है। तिलोत्तमा एक स्थानीय बंगाली माध्यम स्कूल में गई। वह एक शांत बच्ची थी, जो डॉक्टर बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करती थी। वे आर्थिक रूप से परिवार के लिए कठिन दिन थे, लेकिन उसके माता-पिता ने अपनी बेटी की पढ़ाई और एमबीबीएस प्रवेश के लिए खुद को तैयार करने के लिए उसके ट्यूशन के रास्ते में कोई बाधा नहीं आने दी। यह परिवार के लिए सबसे ज्यादा खुशी का दिन था, जब उसे पहली बार में ही अपनी परीक्षा पास करके कल्याणी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स में दाखिला मिला था। उसने पल्मोनोलॉजी में विशेष रुचि के साथ एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी।
यह संयोग ही था कि इसी समय कोविड महामारी फैली। एमबीबीएस पास करने और आरजी कर कॉलेज में दाखिला लेने के बीच के दो सालों में इस युवती ने खुद को कोविड मरीजों की मदद के लिए समर्पित कर दिया। उसकी मां कहती है कि अगर कोई मरीज बहुत घबराया हुआ होता, तो तिलोत्तमा उसे देखने के लिए गाड़ी चलाकर जाती और उसे आश्वस्त करती। उसे खुद तीन बार कोविड हुआ--यह मरीजों के प्रति उसके समर्पण का सबूत था। मुझे उसकी मां बताती है कि मेरे आने से एक दिन पहले ही एक बीमार बुजुर्ग, जिसकी देखभाल तिलोत्तमा ने आरजी कर अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के तौर पर की थी, वह माता-पिता से मिलने बहुत दूर से आया था और उसने उन्हें बताया था कि कैसे उनकी प्यारी बेटी ने उसकी जान बचाने में मदद की थी। उसकी मौत के बाद से, पिछले दो महीनों में, तिलोत्तमा द्वारा इलाज किए गए ऐसे कई मरीज माता-पिता से मिलने और उसे श्रद्धांजलि देने के लिए आए हैं। उसके सहकर्मियों ने उसके माता-पिता को बताया है कि उन सब में तिलोत्तमा सबसे ज्यादा मेहनत करती थी और किसी विशेष रूप से अस्वस्थ मरीज की देखभाल के लिए वह स्वेच्छा से अपनी ड्यूटी के घंटे बढ़ा देती थी।
यह एक ऐसी युवा महिला थी, जो अपने मरीजों का जीवन बचाने और उनकी सेवा करने के लिए एक डॉक्टर के रूप में अपने पेशे के प्रति समर्पित थी। उसका क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई -- यह एक भ्रष्ट गठजोड़ द्वारा समर्थित एक संस्थागत अपराध है।
यह उन जूनियर डॉक्टरों के लिए न्याय की लड़ाई है, जो उसके सहयोगियों के नेतृत्व में किए जा रहे अनूठे संघर्ष का केंद्र बिंदु है और बना रहना चाहिए -- जिन्होंने उसके नाम पर अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया है। उन्हें और ताकत मिलनी चाहिए, इस एकजुट संघर्ष को और मज़बूत होना चाहिए।
(लेखिका माकपा के शीर्षस्थ निकाय पोलिट ब्यूरो की सदस्य हैं। अनुवादक अ. भा. किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)
Wednesday 27th September 2023 at 4:18 PM An Article by Sanjay Parate
आज की चुनौतियां और भगत सिंह//संजय पराते
भगत सिंह जयंती पर असली मुद्दों को उठाता विशेष आलेख संजय पराते की गहन खोज का ही परिणाम है। अपनी शहादत से बहुत पहले भगत सिंह ने अपने क्रन्तिकारी विचार दुनिया के सामने रखे। उस महान शख्सियत ने जिन चुनौतियों और समस्याओं की बात उस दौर में की थी वे सभी समय गुज़रने के साथ साथ और भी ज़्यादा गंभीर और प्रासंगिक हो गई हैं। इसके साथ ही अलग अलग रंग की सियासत रखने वालों ने भगत सिंह और उसकी महान शहादत को अपने रंग में रंग कर दुनिया के सामने लाने की नाकाम और नापाक कोशिश की लेकिन उस की महान शख्सियत इतनी विराट है कि उसे किसी विशेष दायरे या सीमा में बांधना किसी के बस में ही नहीं। आज उस दौर के इतने दशकों के बाद भगत सिंह की ज़रूरत बहुत बढ़ गई है। कौन बनेगा आज का भगत सिंह? कौन आएगा आगे? शहीद की विचारधारा का रंग बदलने की कोशिशें नाकाम करनी ही होंगीं। इस दिशा में एक बहुत ही जोरदार प्रयास है यह आलेख जो लिखा हुआ है कामरेड संजय पराते का। इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा तांकि इसका संदेश आप तक भी पहुंचे .आपके विचारों की इंतज़ार भी हमेशा की तरह रहेगी ही। इसी विषय पर अगर आप भी कुछ कहना चाहते हैं तो आपके बताए गए पहलू का भी सम्मान होगा। -रेक्टर कथूरिया (सम्पादक)
इसी कारण वे वैज्ञानिक समाजवाद की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने मार्क्सवाद का अध्ययन किया, सोवियत संघ की मजदूर क्रांति का स्वागत किया और अपने विषद अध्ययन के क्रम में उनका रूपांतरण एक आतंकवादी से एक क्रांतिकारी में और फिर एक कम्युनिस्ट के रूप में हुआ। अपनी फांसी के चंद मिनट पहले वे ‘लेनिन की जीवनी‘ को पढ़ रहे थे और उनके ही शब्दों में एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा था।
उल्लेखनीय है कि लेनिन ही वह क्रांतिकारी थे, जिन्होने रूस में वहां के राजा जार का तख्ता पलट कर दुनिया में पहली बार किसी देश में मजदूर-किसान राज की स्थापना की थी, सोवियत संघ का गठन किया था और मार्क्सवादी प्रस्थापनाओं के आधार पर शोषणविहीन समाज के गठन की ओर कदम बढ़ाया था। लेनिन के नेतृत्व में यह कार्य वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने ही किया था। इसलिए वैज्ञानिक समाजवाद के दर्शन को मार्क्सवाद-लेनिनवाद के नाम से ही पूरी दुनिया में जाना जाता है। स्पष्ट है कि भगतसिंह भी इस देश से अंग्रेजी साम्राज्यवाद को भगाकर मार्क्सवादी-लेनिनवादी प्रस्थापनाओं के आधार पर ही ऐसे समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहते थे, जहां मनुष्य, मनुष्य का शोषण न कर सके। अपने वैज्ञानिक अध्ययन और क्रांतिकारी अनुभवों के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि यह काम कोई बुर्जुआ-पूंजीवादी दल नही कर सकता, बल्कि केवल और केवल कम्युनिस्ट पार्टी ही समाज का ऐसा रूपान्तरण कर सकती है।
इस प्रकार, भगतसिंह हमारे देश की आजादी के आंदोलन के क्रांतिकारी-वैचारिक प्रतिनिधि बनकर उभरते हैं, जिन्होनें हमारे देश की आजादी की लड़ाई को केवल अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति तक सीमित नही रखा, बल्कि उसे वर्गीय शोषण के खिलाफ लड़ाई से भी जोड़ा और पूंजीवादी-भूस्वामी सत्ता तथा पूंजीवादी-सामंती विचारों से मुक्ति की अवधारणा से भी जोड़ा। मानव समाज के लिए ऐसी मुक्ति तभी संभव है, जब उन्हें धार्मिक आधार पर बांटने वाली सांप्रदायिक ताकतों और विचारों को जड़ मूल से उखाड़ फेंका जाये, जातिवाद का समूल नाश हो, धर्म को पूरी तरह से निजी विश्वासों तक सीमित कर दिया जाय और आर्थिक न्याय को सामाजिक न्याय के साथ कड़ाई से जोड़ा जाय। ऐसा सामाजिक न्याय -- जो जातिप्रथा उन्मूलन की ओर बढ़े और जो स्त्री-पुरूष असमानता को खत्म करें, व्यापक भूमि सुधारों के बल पर सांमती विचारों की सभी अभिव्यक्तियों व प्रतीकों के खिलाफ लड़कर ही हासिल किया जा सकता है।
भारतीय समाज बहुरंगी है, कई धर्म हैं, कई भाषाएं हैं, सांस्कृतिक रूप से धनी इस देश में सदियों से कई संस्कृतियां आकर घुलती-मिलती रही है। लोगों के पहनावे ,खान-पान तथा आचार-व्यवहार भी अलग-अलग है। इसलिए भारतीय संस्कृति बहुलतावादी संस्कृति है, हमारी विविधता में एकता यही है कि इतनी भिन्नताओं के बावजूद हमारी मानवीय समस्याएं, सुख-दुख, आशा-आकांक्षाएं एक है। हमारे देश की एकता और अखण्डता की रक्षा तभी की जा सकती है, जब हम इस विविधता का सम्मान करना सीखें और इसके बहुरंगीपन को खत्म कर एक रंगत्व में ढालनें की कोशिशों को मात दी जाय। इसी विविधता में हमारा सामूहिक अस्तित्व और संप्रभुता सुरक्षित है। भगत सिंह का संघर्ष भारत की एकता के लिए इसी विविधता की रक्षा करने का संघर्ष था। इस संघर्ष के क्रम में वे सांप्रदायिक-जातिवादी संगठनों व उसके नेताओं की तीखी आलोचना भी करते है। भगत सिंह गांधीजी और कांगेस की आलोचना भी इसी प्ररिप्रेक्ष्य में करते हैं कि उनकी नीतियां अंग्रेजी साम्राज्यवाद से समझौता करके गोरे शोषकों की जगह काले शोषकों को तो बैठा सकती है, लेकिन एक समता मूलक समाज की स्थापना नहीं कर सकती।
इस प्रकार भगतसिंह देश की आजादी की लड़ाई को साम्राज्यवाद से मुक्ति, सांप्रदायिकता और जातिवाद से मुक्ति, वर्गीय शोषण से मुक्ति तथा देश की एकता-अखंडता की रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्षता व विविधता की रक्षा के लिये संघर्ष से जोड़ते है और इसमें कमजोरी दिखाने के लिए आजादी के तत्कालीन नेतृत्व की आलोचना करते हैं।
भगतसिंह की मार्क्सवादी दृष्टि कितनी सटीक थी, आज हम यह देख रहे हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद चला गया, लेकिन वर्गीय शोषण बदस्तूर जारी है। हमने राजनैतिक आजादी तो हासिल कर ली, किन्तु गांधीजी के ही 'अंतिम व्यक्ति' के आंसू पोंछने का काम ठप्प पड़ा हुआ है, क्योंकि इस राजनैतिक आजादी को अपने साथ आर्थिक आजादी तो लाना ही नहीं था। इस आर्थिक आजादी के बिना सामाजिक न्याय की लड़ाई भी आगे बढ़ नही सकती और हमारे राष्ट्रीय जीवन में सामाजिक अन्याय के विभिन्न रूपों का बोलबाला हो चुका है।
आर्थिक-सामाजिक न्याय के अभाव में हमारे देश की विविधता भी खतरे में पड़ गई है और सांप्रदायिक-फांसीवादी विचारधारा फल-फूल रही है, जिससे देश की एकता-अखंडता-संप्रभुता ही खतरे में पड़ती जा रही है। स्पष्ट है कि कांग्रेस और गांधीजी के नेतृत्व में जो राजनैतिक आजादी हासिल की गई, उसने हमारे देश-समाज की समस्याओं को हल नहीं किया। इसे हल करने के लिए तो हमें भगतसिंह की मार्क्सवादी दृष्टि से ही जुड़ना होगा और इसी दृष्टि पर आधारित वैकल्पिक नीतियों के इर्द-गिर्द जनलामबंदी व संघर्षों को तेज करना होगा और पूंजीवादी-सांमती सत्ता को ही उखाड़ फेंकने की लड़ाई लड़ना होगा।
भगतसिंह की विचारधारा के बारे में इतनी लंबी टिप्पणी इसलिए कि आज जब राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की तस्वीरें लगातार धुंधली होती जा रही है और जब आजादी के आंदोलन के दूसरे नेता जनता की स्मृति से गायब होते जा रहे है, भारतीय जनमानस में और विशेषकर वर्तमान युवा पीढ़ी में आज भी भगत सिंह किंवदंती बनकर जिंदा है और उनकी शहादत से प्रेरणा ग्रहण करती है।
यही कारण है कि आज देश में भगतसिंह को उनकी विचारधारा से काटकर पेश करने की कोशिश हो रही है। यह षड़यंत्र कितना गहरा है, उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन लोगों का और जिन संगठनों और दलों का भी भगत सिंह की विचारधारा से दूर-दूर तक संबंध नही है, वे ही भगतसिंह की विरासत को हडपने की कोशिश कर रहे हैं। इस क्रम में वे भगतसिंह को सिख समाज के नायक के रूप में पेश करते हैं, जबकि भगतसिंह पूरे देश के क्रांतिकारी आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं और वास्तव में वे नास्तिक थे। इस क्रम में वो भगतसिंह को आंतकवादी के रूप में पेश करते हैं, जबकि आतंकवाद से उनका दूर दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। कोर्ट में अपने मुकदमें के दौरान उन्होने स्पष्ट रूप से बयान दिया है -- ‘‘क्रांति के लिए खूनी लड़ाईयां अनिवार्य नही है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है -- अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।‘‘ स्पष्ट है कि भगतसिंह की क्रांतिकारी विरासत का ‘‘माओवादी‘‘ उग्र-वामपंथी विचारधारा से भी कोई संबंध नही है, जो सशस्त्र क्रांति के नाम पर केवल निरीह लोंगो की हत्या तक सीमित रह गया है।
इस प्रकार भगतसिंह का जमीनी और वैचारिक संघर्ष देश की आजादी के लिए साम्राज्यवाद के खिलाफ तो था ही, वर्गीय शोषण से मुक्ति और समाजवाद की स्थापना के लिए सांप्रदायिकता, जातिवाद और असमानता के खिलाफ भी था और देश की एकता-अखंडता-संप्रभुता की रक्षा के लिए आतंकवाद के खिलाफ भी था। देश के सुनहरे भविष्य के लिए भगतसिंह की यह सोच उन्हें अपने समकालीन स्वाधीनता संग्राम के नेताओं से अलग करती है तथा उन्हें उत्कृष्ट दर्जे पर रखती है। एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए उन्होने जो वैचारिक जमीन तैयार की तथा इसके लिए जो संघर्ष किया, उसी के कारण भगतसिंह आज भी हिन्दुस्तानी भारतीय-पाकिस्तानी जनमानस में जिंदा है।
भगतसिंह ने मात्र 23 साल की उम्र में शहादत पायी, लेकिन शोषण मुक्त समाज की स्थापना के लिए यह उनकी वैचारिक प्रखरता ही थी कि अंग्रेजी जेलों से मुक्त होने के बाद उनके साथ काम करने वाले अधिकांश साथी कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गये। शिव वर्मा, किशोरीलाल, अजय घोष, विजय कुमार सिन्हा तथा जयदेव कपूर आदि इनमें शामिल थे। अजय घोष तो 1951-62 के दौरान संयुक्त सीपीआई के महासचिव भी बने। शिव वर्मा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रखर नेता बने। उन्होनें भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू आदि के बारें में उनकी मानवीय कमजोरियों और खूबियों के साथ बेहतरीन संस्मरण भी लिखे हैं। भगतसिंह और उनके साथियों की यह लड़ाई आज भी देश की प्रगतिशील जनवादी-वामपंथी ताकतें ही आगे बढ़ा रही है। वे ही आज भगतसिंह की क्रांतिकारी विरासत के सच्चे वाहक हैं।
भगतसिंह ने तीन प्रमुख नारें दिये -- इंकलाब जिंदाबाद! मजदूर वर्ग जिंदाबाद!! और साम्राज्यवाद का नाश हो!!! ये नारे आज भी देश के क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख नारे हैं और 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा तो लोक प्रसिद्ध नारा बन चुका है। ये तीनों नारे उनके संघर्षों के सार सूत्र है। अपने मुकदमे में उन्होने अदालत से कहा -- ‘‘समाज का प्रमुख अंग होते हुये भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन पूंजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज है। दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया कराने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन को ढंकने को भी कपड़ा नही पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हैं। इसके विपरित समाज में जोंक रूपी शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुंत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नही रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक वर्ग एक भयानक ज्वालामुखी के मुंह पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है।
सभ्यता का यह प्रासाद यदि समय रहते संभाला नही गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं, उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाज का पुनर्निर्माण करें।
क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है, जिसका अपहरण नही किया जा सकता। स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अंतिम लक्ष्य है।
इन आदर्शों और विश्वास के लिए हमें जो भी दण्ड दिया जायेगा, हम उसका सहर्ष स्वागत करेंगे। क्रांति की इस पूजा वेदी पर हम अपना यौवन नैवद्य के रूप में लाए हैं, क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है।‘‘
भगतसिंह के इस बयान से साफ है कि जनसाधारण और मेहनतकश मजदूर-किसानों के लिए जीवन स्थितियां और ज्यादा प्रतिकूल हुई है, क्योकि साम्राज्यवादी शोषकों की जगह पूंजीवादी-सामंती शोषकों ने लिया है। ये काले शोषक अपनी तिजोरियां भरने के लिए साम्राज्यवादपरस्त उदारीकरण की नीतियों को बड़ी तेजी से लागू कर रहे हैं और हमारे देश का बाजार उनकी लूट के लिए खोल रहे हैं। अमीरों और गरीबों की बीच की असमानता, शोषक और शोषितों के बीच का संघर्ष भगतसिंह के बाद के 92 सालों में सैकड़ों गुना बढ़ गया है। इसलिए समाजवादी क्रान्ति की आवश्यकता और समानता के सिद्धान्त पर आधारित शोषणविहीन समाज की स्थापना की जरूरत पहले की अपेक्षा और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। लेकिन समाज का यह पुनर्गठन मजदूर-किसानों और समाज के तमाम उत्पीड़ित-दलित तबकों की एकता के बिना और इसके बल पर व्यापक जनसंघर्षों को संगठित किये बिना संभव नही है। वैज्ञानिक समाजवाद पर आधारित मार्क्सवादी-लेनिनवादी दृष्टिकोण ही इस एकता और संघर्ष को विकसित करने का हथियार बनेगा। लेकिन व्यवस्था में ऐसे आमूलचूल परिवर्तनों के लिए आवश्यक साधनों का संगठन आसान काम नही है और राजनैतिक कार्यकर्ताओं से बहुंत बड़ी कुर्बानियों की मांग करता है। ये रास्ता कांटों भरा है, जिसमें यंत्रणा, उत्पीड़न, दमन और जेल है। लेकिन केवल इसी रास्ते से होकर क्रांति का रास्ता आगे बढ़ता है।
ऐसा क्यों? इसलिए कि भगतसिंह के समय में जो साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद के रूप में जिंदा था, आज वह वैश्वीकरण के रूप में फल-फूल रहा है। भगतसिंह के समय में विश्व स्तर पर समाजवाद की ताकते आगे बढ़ रही थी, सोवियत संघ के पतन के बाद आज वह कमजोर हो गया है। स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रवादी मूल्यों ने जाति भेद की दीवारों ने कमजोर किया था और सांप्रदायिक ताकतों को पीछे हटने के लिए मजबूर किया था, लेकिन आजादी के बाद सत्ताधारी पूंजीपति-सामंती वर्ग ने ठीक उन्हीं ताकतों से समझौता किया, नतीजन समाज में जाति आधारित उत्पीड़न और जातिवादी विचारों को फिर फलने-फूलने का मौका मिला और सांप्रदायिक-फासीवादी विचारों की वाहक ताकतें तो सीधे केन्द्र की सत्ता में ही है। विश्व स्तर पर समाजवाद की ताकतों के कमजोर होने और इस देश में वामपंथ की संसदीय ताकत में कमी आने के कारण कार्पोरेट मीडिया को पूंजीवाद के अमरत्व का प्रचार करने का मौका मिल गया। इस प्रकार आज के समय में भगतसिंह के विचारों और समाजवादी क्रांति की प्रासंगगिकता तो बढ़ी है, लेकिन इस रास्ते पर अमल की दुश्वारियां तो कई गुना ज्यादा बढ़ गई है।
1990 के दशक से हमारे देश में वैश्वीकरण-उदारीकरण की जिन नीतियों को लागू किया गया जा रहा है, उसका चौतरफा दुष्प्रभाव समाज और अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में पड़ा है। ये ऐसे दुष्प्रभाव हैं कि एक-दूसरे के फलने-फूलने का कारण भी बनते हैं और हमारा सामाजिक-आर्थिक जीवन चौतरफा संकटों से घिरता जाता है। इससे उबरने, बाहर निकलने का कोई उपाय आसानी से नजर नही आता। हमारे देश की शासक पार्टियां विशेषकर कांग्रेस और भाजपा इन संकटों से उबरने का जो नुख्सा पेश करती है, उससे एक नया संकट और पैदा हो जाता है। वास्तव में उनकी नीतियां संकट को हल करने की नही, देश को संकटग्रस्त करने की ही होती है।
हमारा देश कृषि प्रधान देश है और इस देश के विकास की कोई भी परिकल्पना कृषि को दरकिनार करके नहीं की जा सकती। इस देश में कृषि और किसानों का विकास करना है, तो भूमिहीन व गरीब किसानों को खेती व आवास के लिए जमीन देना होगा। आज देश में तीन-चौथाई भूमि का स्वामित्व केवल एक तिहाई संपन्न किसानों के हाथों में है। आजादी के बाद भूमि सुधार कानून बनाए गये, लेकिन लागू नही किए गए। इसलिए गरीबों को देने के लिए जमीन की कोई कमी नहीं है। इसी प्रकार लगभग दो करोड़ आदिवासी परिवारों का वनभूमि पर कब्जा है। आदिवासी वनाधिकार कानून तो बना, लेकिन इसका भी सही तरीके से क्रियान्वयन नही किया गया और आज भी वे जंगलों से बेदखल किये जा रहे हैं। इन गरीबों को जमीन दिये जाने के साथ ही उन्हें खेती करने की सुविधाएं यथा सस्ती दरों पर बैंक कर्ज, बीज, खाद, दवाई, बिजली, पानी देना चाहिये। खेती-किसानी के मौसम के बाद इन्हें मनरेगा में गांव में ही काम मिलना चाहिये। इसके लिए ग्रामीण विकास के कार्यो में सरकार को निवेश करना होगा। किसानों की पूरी फसल को लाभकारी दामों पर खरीदने की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिये। इस अनाज को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ते दामों पर देश के सभी नागरिकों को वितरित करना चाहिये, ताकि गरीब लोग बाजार के उतार-चढ़ाव के झटकों तथा कालाबाजारी व महंगाई से बच सके ।
इन उपायों से कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और उसका वितरण भी सुनिश्चित हो सकेगा। इससे ग्रामीण जनता की आय में वृद्धि होगी और बाजार में उनके खरीदने की ताकत बढ़ेगी। इससे औद्योगिक मालों की मांग बढ़ेगी, नये कारखाने खुलेंगे तथा बेरोजगारों को काम मिलेगा। शहरी बेरोजगारों को काम मिलने से और पुनः उनकी भी क्रय शक्ति बढ़ने से अर्थव्यवस्था को और गति मिलेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का यही सीधा-सरल सूत्र है।
लेकिन आजादी के बाद और खासकर वैश्वीकरण-उदारीकरण के इस जमाने में हो उल्टा रहा है। किसानों को जमीन नही दी गई और जिनके पास थोड़ी-बहुत जमीन है, उसे कानून बदलकर या षड़यंत्र रचकर पूंजीपतियों के लिए छीना जा रहा है। आदिवासी, दलितों व आर्थिक रूप से वंचितों पर इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ रही है। कृषि सामग्रियों पर सब्सिडी खत्म की जा रही है, जिससे फसल का लागत मूल्य बढ़ रहा है। सरकार न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए तैयार और न ही उसका अनाज खरीदने के लिए। बाजार में लुटने के सिवा उनके पास कोई चारा नही है। मनरेगा कानून को भी खत्म कर उन्हें ग्रामीण रोजगार से वंचित किया जा रहा है। सस्ते राशन की प्रणाली से सभी गरीब व जरूरतमंद धीरे-धीरे बाहर किये जा रहे हैं और उन्हें बाजार में महंगे दरों पर खाद्यान्न खरीदनें के लिए बाध्य किया जा रहा है। इससे ग्रामीण जनता की क्रय शक्ति में भंयकर गिरावट आ रही है, वे कर्ज के मकड़जाल में फंस रहे हैं, खेती-किसानी छोड़ रहे हैं और पलायन करने या आत्महत्या करने को विवश हो रहे हैं। जब 75 प्रतिशत जनता की खरीदने की शक्ति कमजोर होगी, तो मांग भी घटेगी। मांग घटने से कारखाने बंद होंगे और जिन लोंगो के पास काम है, वे भी बेरोजगारी की दलदल में ढकेले जायेंगे। इससे पूरे देश की अर्थव्यवस्था मंदी फंस जायेगी। वास्तव में यही हो रहा है। खेती-किसानी भी बर्बाद हो रही है और कारखानें भी बच नही रहे हैं।
इस मंदी और संकट के लिए जिम्मेदार कौन है? निश्चित ही वे पूंजीवादी पार्टियां, जिन्होंने आजादी के बाद इस देश पर राज किया है और लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस और भाजपा भी इसमें शामिल है। इन्हीं के राज में विश्व व्यापार संगठन से समझौता किया गया था कि हमारे देश के बाजार में विदेशी जितना चाहे, जो चाहें, बेच सकते हैं और यहां के अनाज मगरमच्छों को भारी सब्सिडी देकर। इसलिए इस देश के किसानों का अनाज खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं है। इन्हीं के राज में मांग घटने पर सरकारी कारखानें बंद किये जा रहे है, ताकि पूंजीपतियों के कारखाने चलते रहे और वे भारी मुनाफा बटोरते रहें। बेरोजगारी बढ़ने का फायदा वे उठाते हैं मजदूरी में और कमी कर, ज्यादा मुनाफा बटोरने के लिए। वे इसी कारण से स्थानीय मजदूरों को जानबूझकर काम नही देते, बल्कि बाहर से मजदूर मंगाते है और ठेकेदारों के जरिए काम करवाते हैं। ये पूंजीपति विदेशी पूंजीपतियों से सांठगाठ करते हैं और इनके जरिये बाजार में निवेश करते हैं, जिसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) कहते हैं। खुदरा व्यापार में ये निवेश कर रहे हैं और 4 करोड़ खुदरा व्यापारियों, जिनमें ठेले वाले से लेकर सड़क पर बैठने वाले खुदरा कारोबारी और छोटे-मोटे दुकानदार शामिल हैं, की रोजी-रोटी संकट में है। विदेशी पैसो की ताकत इन सबको तबाह करने में पर तुली है। वे इस देश के बीमा क्षेत्र को, बैंक को, रेल को, रक्षा क्षेत्र को -- अर्थव्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों को -- हड़पनें में लगे हैं। जनता तबाह हो जाए, लेकिन इनका मुनाफा बढ़ता रहे, यही इन सरकारों की नीति है ।
इस संकट का एक और आयाम है। ये कारखाना बनाने के नाम पर केवल किसानों की जमीन ही नहीं, इस देश की प्राकृतिक संपदा को भी छीन रहे हैं। बिजली, सीमेंट या इस्पात कारखाना बनाने के लिए कोयला खदानों की मांग वे करते हैं। कोयला खोदने के लिए जंगलों को उजाड़ते हैं और वहां बसे आदिवासियों को भगाते हैं। कोयला खदानों के स्वामित्व के बल पर वे अपनी कंपनियों के शेयरों के भाव बढ़ाकर जमकर मुनाफा कमाते है। बिजली, सीमेंट, इस्पात आदि बने या ना बने, कोयला खोदकर मुनाफा कमाते हैं। यदि कारखाने शुरू हो जाये, तो इसे चलाने के लिए नदियों पर कब्जा करते हैं और समाज को नदियों के जल के उपयोग तक से वंचित करते हैं। और ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए वे पूरा औद्योगिक कचरा नदियों में बहाते हैं, पर्यावरण व जैव-पारिस्थितिकी को बर्बाद करते हैं। इस कारखाने को चलाने के लिए वे बैंको से कर्ज लेते हैं, जहां हमारा ही पैसा जमा होता है। यानी, इन पूंजीपतियों की गांठ से कुछ नही जाता, वे हमारे ही पैसे से हमको उजाड़ने का खेल खेलते हैं और मुनाफा, मुनाफा ...और मुनाफा ही कमाते हैं। इस सबके बावजूद, इस मुनाफे पर वे कानूनी टैक्स भी नही देते और वर्तमान भाजपा की सरकार हर साल 6 लाख करोड़ रूपयों का टैक्स वसूलना छोड़ देने की घोषणा करती है। जन साधारण के लिए, समाज कल्याण के कार्यो के लिए इन सरकारों के पास फंड नही होते, लेकिन पूंजीपतियों को लुटाने के लिए पूरा बजट है। इस लूट को और तेज करने के लिए आम जनता के हित में बनाये गये तमाम कानूनों को वो खत्म कर रहे हैं, तोड़-मरोड़ रहे हैं, या कमजोर कर रहे है। इनमें तमाम श्रम कानून शामिल है, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून है, मनरेगा कानून है, आदिवासी वनाधिकार कानून, पेसा कानून आदि सभी शामिल है। प्राकृतिक संपदा की हड़प नीति को इस सरकार का संरक्षण मिला हुआ है, जिसने लाखों करोड़ों रूपयों के घोटालों को जन्म दिया है।
मानव सभ्यता का इतिहास शोषण के खिलाफ संघर्ष का इतिहास है और जब इतने बड़े पैमाने पर समाज को उसके नैसर्गिक अधिकार से वंचित किया जायेगा, उसके कानूनी आधिकार छीने जायेंगे और उनकी भावी पीढ़ियों को भी संचित निधि से वंचित कर उनको बरबाद करने की साजिश रची जायेगी, तो निश्चित ही जनसंघर्ष भी विकसित होंगे। इन जनसंघर्षों को कुचलने की साजिश भी पूंजीवादी सत्ताएं करती है। कानून और इसकी व्याख्या शोषकों के हितों में काम करती है। लेकिन जब इससे भी काम नही चलता, तो जनता को धार्मिक-जातिगत आधार पर बांटने की कोशिश की जाती है। सांप्रदायिक और जातीय दंगे भड़काये जाते हैं, नफरत की दीवार खड़ी करके एक गरीब को दूसरे गरीब के खिलाफ भड़काया जाता है। भगतसिंह के समय अंग्रेजो की जो ‘‘बांटो और राज करो'' की नीति थी, वही नीति आज भी चल रही है। सांप्रदायिक और धार्मिक तत्ववादी ताकतें अपना खुला खेल खेल रही है। सवर्णो का अवर्णो पर जातीय उत्पीड़न जारी है। सामाजिक न्याय की लड़ाई को कुचलनें के लिए ‘‘कमंडल में कमल'' खिलाया जा रहा है।
इसलिये साम्राज्यवाद के खिलाफ, सांप्रदायिकता, जातिवाद व सामाजिक अन्याय के खिलाफ, आर्थिक विषमता के खिलाफ--और इस सबके लिए जिम्मेदार पूंजीवादी-भूस्वामी सत्ता के खिलाफ लड़ाई और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। आज समाज में जो बीमारियां दिख रही हैं, उसका इलाज भगतसिंह के दिखाए रास्ते पर ही चलकर हो सकता है। और वह रास्ता है मार्क्सवाद-लेनिनवाद की अवधारणाओं और वैज्ञानिक समाजवाद के बुनियादी सिद्धान्तों के आधार पर समाज के आमूलचूल बदलाव का रास्ता। इस रास्ते पर इस देश की वामपंथी ताकतें और जनसंगठन ही चल रहे है, जो अपने उदयकाल से आज तक वर्गहीन, शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिए संघर्ष कर रही हैं। राजनैतिक आजादी को आर्थिक आजादी व सामाजिक न्याय की दिशा में आगें ले जाने की कोशिश कर रही है।
लेकिन यह संघर्ष आसान नहीं है। यह भारी कुर्बानियों, धैर्य और अहं को त्यागने की मांग करता है। भगतसिंह के ही प्रेरणास्पद शब्दों में -- ‘‘अगर आप इस दिशा में काम शुरू करते है, तो आपको बहुत संयत होना पड़ेगा। क्रांति के लिए न तो भावनाओं में बहने की जरूरत है, न मौत की। इसके लिए दरकार है अनवरत संघर्ष, पीड़ा तथा कुर्बानियों से भरे जीवन की। सबसे पहले अपने ‘अहं‘ को खत्म करो। व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के सपने को छोड़ दो! इसके बाद काम शुरू करो। आपको इंच-दर-इंच बढ़ना होगा। इसके लिए साहस, दृढता और बहुत दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए। कोई मुश्किल, कोई बाधा आपको हतोत्साहित न कर पाये। कोई असफलता व विश्वासघात आपको हताश न कर पाये। आप पर ढाया गया जुल्म आपकी क्रांतिकारी लगन को खत्म न कर पाये। तकलीफों व कुर्बानियों की पीड़ा के बीच आप विजयी निकलें। और यह अलग-अलग जीतें क्रांति की मूल्यवान संपति बनें।‘‘
वर्तमान अन्यायकारी राजसत्ता से लड़ने और समाज को बदलने के लिए भगतसिंह के आव्हान पर ऐसे ही राजनैतिक कार्यकर्ता और वैज्ञानिक समाजवाद के दर्शन की समझ को विकसित करने की जरूरत है। समाजवाद के सिद्धान्त को भगतसिंह की व्यवहारिक समझ से जोड़कर ही इस संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सकता है।
आइए, शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए हम सब वामपंथ के साथ एकजुट हों।
(इस आलेख के लेखक कामरेड संजय पराते एस एफ आई के पूर्व राज्य अध्यक्ष और छत्तीसगढ़ किसान सभा के संयोजक हैं। उनका संपर्क नंबर है: 094242-31650)
निरंतर सामाजिक चेतना और जनहित ब्लॉग मीडिया में योगदान दें। हर दिन, हर हफ्ते, हर महीने या कभी-कभी इस शुभ कार्य के लिए आप जो भी राशि खर्च कर सकते हैं, उसे अवश्य ही खर्च करना चाहिए। आप इसे नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके आसानी से कर सकते हैं।