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Saturday, July 18, 2026

19 जुलाई: बैंक राष्ट्रीयकरण—पर मनिंदर सिंह भाटिया का विशेष लेख

On Saturday 18th July 2026 at 22:37 WhatsApp Regarding Nationalisation of Banks By M S Bhatia

सार्वजनिक बैंकिंग की विरासत और आज की चुनौतियाँ

लुधियाना से बैंकिग इंडस्ट्री से रिटायर हुए मनिंदर सिंह भाटिया की कलम से 

AI image Regarding Banks Nationalisation 

इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं,
जो केवल किसी समय की सरकार की नीति नहीं होते, बल्कि पूरे राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक दिशा को नया मोड़ देते हैं। 19 जुलाई 1969 को देश के 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण ऐसा ही एक ऐतिहासिक निर्णय था। इसने भारतीय बैंकिंग को बड़े औद्योगिक घरानों और शहरी व्यापारिक हितों की सीमाओं से निकालकर किसानों, मज़दूरों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण जनता के विकास से जोड़ा।


1947 में
स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसमें बैंकिंग सेवाएँ मुख्यतः शहरों और बड़े व्यापारिक केंद्रों तक सीमित थीं। देश की अधिकांश आबादी—किसान, खेत मज़दूर, कारीगर और छोटे व्यापारी—औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर थी। उनकी ऋण आवश्यकताएँ साहूकारों और महाजनों से पूरी होती थीं, जो अत्यधिक ब्याज वसूलकर उनकी आर्थिक मजबूरी का शोषण करते थे।

स्वतंत्र भारत के सामने इसलिए एक बुनियादी प्रश्न था—क्या बैंकिंग व्यवस्था केवल निजी लाभ कमाने के लिए काम करेगी या उसे राष्ट्रीय विकास और सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जाएगा?

सामाजिक नियंत्रण का अधूरा प्रयोग

1960 के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया था कि निजी वाणिज्यिक बैंक देश की विकास संबंधी जरूरतों के अनुरूप अपनी ऋण नीति में आवश्यक परिवर्तन नहीं कर रहे थे। कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर व्यवसायों और ग्रामीण क्षेत्रों को संस्थागत ऋण बहुत सीमित मात्रा में मिलता था, जबकि बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक ऋण का बड़ा हिस्सा प्राप्त होता था।

इस असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 1967–68 में बैंकों पर “सामाजिक नियंत्रण” की नीति लागू की। इसका उद्देश्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना नहीं, बल्कि उनकी ऋण नीतियों को राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना था।

इस नीति के अंतर्गत बैंक निदेशक मंडलों में कृषि, लघु उद्योग, सहकारिता और अन्य जनहितकारी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रयास किया गया। आशा थी कि इससे बैंक ऋण का वितरण अधिक संतुलित होगा और जनता की जमा पूँजी का उपयोग व्यापक सामाजिक हित में किया जा सकेगा।

लेकिन यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया। बैंकों का स्वामित्व और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति निजी हाथों में ही बनी रही। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की ओर ऋण प्रवाह में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया। इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि केवल नियम बनाकर निजी स्वामित्व वाली बैंकिंग व्यवस्था के चरित्र को नहीं बदला जा सकता।

सामाजिक नियंत्रण राष्ट्रीयकरण का विकल्प सिद्ध नहीं हुआ; बल्कि उसकी असफलता ने बैंक राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया।

राष्ट्रीयकरण की माँग और जन आंदोलन

बैंक राष्ट्रीयकरण का निर्णय अचानक नहीं लिया गया था। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा ट्रेड यूनियनों, बैंक कर्मचारियों और वामपंथी दलों का आंदोलन भी था। कम्युनिस्ट आंदोलन ने बैंकिंग संसाधनों को बड़े औद्योगिक घरानों के नियंत्रण से निकालकर राष्ट्रीय विकास के लिए इस्तेमाल करने की माँग प्रमुखता से उठाई।

सांसद और प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन ने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार बैंक राष्ट्रीयकरण की माँग के समर्थन में लाखों लोगों के हस्ताक्षर एकत्र किए गए। इन हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापनों के बड़े-बड़े बंडल दिल्ली लाकर संसद के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

यह कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कई महीनों तक चला व्यापक जन अभियान था। इस आंदोलन ने बैंकिंग व्यवस्था के निजी चरित्र और बड़े पूँजीपति घरानों के साथ उसके संबंधों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया।

19 जुलाई 1969 का ऐतिहासिक फैसला

19 जुलाई 1969 की मध्यरात्रि को भारत सरकार ने अध्यादेश जारी करके ₹50 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। बाद में संसद ने इस निर्णय को कानूनी स्वीकृति प्रदान की।

राष्ट्रीयकृत किए गए बैंकों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनाइटेड कमर्शियल बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, देना बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, सिंडिकेट बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र शामिल थे।

इस निर्णय ने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का चरित्र बदल दिया। पहली बार स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया गया कि बैंक केवल निजी लाभ कमाने वाली व्यावसायिक संस्थाएँ नहीं हैं। जनता की बचत को एकत्र करके उसे कृषि, लघु उद्योग, ग्रामीण विकास, स्वरोज़गार और कमजोर वर्गों की आर्थिक उन्नति की ओर ले जाना भी बैंकिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

उस समय कुछ औद्योगिक घरानों और अर्थशास्त्रियों ने बैंक राष्ट्रीयकरण का विरोध किया। उनका तर्क था कि सरकारी नियंत्रण से बैंकों की कार्यकुशलता प्रभावित होगी और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। इसके विपरीत राष्ट्रीयकरण के समर्थकों का कहना था कि भारत जैसे विकासशील देश में बैंकिंग को पूरी तरह बाज़ार और निजी लाभ की शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

बैंकिंग को गाँवों और आम जनता तक पहुँचाना

राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र की प्राथमिकताएँ बदल गईं। इससे पहले बैंक मुख्य रूप से बड़े शहरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और औद्योगिक घरानों पर केंद्रित थे। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में हजारों नई बैंक शाखाएँ खोली गईं।

करोड़ों किसान, खेत मज़दूर, छोटे दुकानदार, कारीगर और स्वरोज़गार करने वाले लोग पहली बार औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। यह केवल शाखाओं की संख्या बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाने की प्रक्रिया थी।

हरित क्रांति के दौरान सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, ट्रैक्टर तथा अन्य कृषि उपकरणों के लिए बैंक ऋण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छोटे और कुटीर उद्योगों को भी संस्थागत वित्तीय सहायता मिलने लगी।

इसी दौर में प्राथमिकता क्षेत्र ऋण की नीति विकसित हुई। इसके अंतर्गत बैंकों को कृषि, लघु उद्योग, शिक्षा, आवास, स्वरोज़गार और समाज के कमजोर वर्गों को ऋण देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बैंकिंग को केवल लाभ कमाने की गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का माध्यम माना गया।

इस परिवर्तन में बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने दूर-दराज़ के इलाकों में शाखाएँ स्थापित कीं, लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित किया और बैंकिंग सेवाओं को आम नागरिकों तक पहुँचाया। आज जिस वित्तीय समावेशन की चर्चा की जाती है, उसकी वास्तविक नींव इसी दौर में रखी गई थी।

1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण

बैंक राष्ट्रीयकरण का दूसरा चरण 1980 में आया, जब ₹200 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले छह और प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इनमें आंध्रा बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, न्यू बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब एंड सिंध बैंक और विजया बैंक शामिल थे।

इसके बाद देश के लगभग 91 प्रतिशत बैंकिंग कारोबार पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण स्थापित हो गया। बैंकिंग का विस्तार शहरों से गाँवों तक हुआ और गरीब किसानों तथा छोटे व्यापारियों की साहूकारों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया गया।

राष्ट्रीयकरण की सफलता का मूल्यांकन केवल बैंकों के लाभ से नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने कितने लोगों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ा, कितने गाँवों में वित्तीय सेवाएँ पहुँचाईं और देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में कितना योगदान दिया।

उदारीकरण के बाद की बैंकिंग: नई चुनौतियाँ और सार्वजनिक बैंकों की भूमिका

1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित नई आर्थिक नीति अपनाई। बैंकिंग क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव किए गए। नए निजी बैंकों को लाइसेंस मिले, विदेशी बैंकों का विस्तार हुआ और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया।

इन परिवर्तनों से बैंकिंग तकनीक, डिजिटल भुगतान, ग्राहक सेवा और संचार व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार हुए। लेकिन इसके साथ एक पुराना प्रश्न फिर सामने आया—क्या बैंकिंग का उद्देश्य केवल अधिक लाभ कमाना है या उसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए?

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आज भी कृषि, शिक्षा, छोटे उद्योगों, स्वयं सहायता समूहों और कमजोर वर्गों को ऋण देने की प्रमुख जिम्मेदारी निभाते हैं। निजी बैंक स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों और ग्राहकों को अधिक प्राथमिकता देते हैं, जहाँ व्यावसायिक लाभ की संभावना अधिक होती है।

हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि बड़े बैंक अधिक मजबूत, पूँजी-संपन्न और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनेंगे। दूसरी ओर सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण की कोशिशों ने उनकी सामाजिक भूमिका के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं।

एनपीए और बड़े कर्जदारों का सवाल

भारतीय बैंकिंग की एक बड़ी समस्या गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की है। लेकिन इस समस्या को केवल सार्वजनिक बैंकिंग की विफलता बताना उचित नहीं होगा। बड़े औद्योगिक घरानों को दिए गए ऋणों का न लौटना, जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले बड़े कर्जदारों पर कमजोर कार्रवाई तथा कानूनी वसूली प्रक्रिया में देरी भी इस संकट के प्रमुख कारण हैं।

छोटे किसान या सामान्य ऋणधारक पर वसूली के लिए तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन हजारों करोड़ रुपये का ऋण न लौटाने वाले बड़े कर्जदार कई बार व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। इसलिए बैंकिंग सुधारों की वास्तविक दिशा बड़े कर्जदारों की जवाबदेही, पारदर्शी ऋण वितरण और प्रभावी वसूली तंत्र की स्थापना होनी चाहिए।

सार्वजनिक बैंकों की आज भी जरूरत

आज भी जनधन खाते खोलने, किसानों को ऋण देने, पेंशन और सरकारी सहायता पहुँचाने, स्वयं सहायता समूहों को वित्त उपलब्ध कराने तथा आर्थिक संकट के समय सरकारी नीतियों को लागू करने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक बैंकों ने राहत योजनाओं, ऋण सहायता और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे एक बार फिर स्पष्ट हुआ कि संकट के समय केवल लाभ आधारित बैंकिंग व्यवस्था समाज की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती।

सार्वजनिक बैंकों की कमियों को दूर करना आवश्यक है। उनमें पारदर्शिता, पेशेवर दक्षता, जवाबदेही और तकनीकी क्षमता बढ़नी चाहिए। राजनीतिक हस्तक्षेप तथा गलत ऋण वितरण पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन कमियों का समाधान निजीकरण नहीं है।

निष्कर्ष

19 जुलाई 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था। यह भारत की आर्थिक सोच में आया ऐतिहासिक परिवर्तन था, जिसने बैंकिंग व्यवस्था को बड़े व्यापारिक और औद्योगिक हितों की सीमाओं से निकालकर गाँवों, किसानों, छोटे उद्योगों और आम जनता से जोड़ा।

आज बैंकिंग क्षेत्र तकनीक, प्रतिस्पर्धा और नई आर्थिक परिस्थितियों के कारण तेजी से बदल रहा है। फिर भी सार्वजनिक बैंकों की सामाजिक जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी राष्ट्रीयकरण के समय थी।

वास्तविक चुनौती पुराने मॉडल पर आँख बंद करके लौटने या पूरी तरह निजीकरण की राह अपनाने की नहीं है। आवश्यकता ऐसी बैंकिंग व्यवस्था की है, जो कार्यकुशलता और पारदर्शिता को सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ सके।

इतिहास सिखाता है कि जब वित्तीय संस्थाएँ जनता से दूर हो जाती हैं, तो वे अपना वास्तविक उद्देश्य खो देती हैं। लेकिन जब बैंकिंग व्यवस्था समाज और उसकी आवश्यकताओं से जुड़ी रहती है, तब वह राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बनती है।

Sunday, July 19, 2020

19 जुलाई को उठाया गया आत्म निर्भरता के लिए दलेरी भरा कदम

बैंक राष्ट्रीयकरण जैसे कदमों से ही आ सकेगी सच्ची आत्मनिर्भरता 
राष्ट्रीयकरण के बाद सुश्री इंदिरा गांधी को बधाई देते हुए कामरेड पी एस सुंदरसेन 
लुधियाना: 18 जुलाई 2020: (*एम एस भाटिया//कामरेड स्क्रीन)::
ज़िंदगी यूं भी गुज़र सकती थी; जैसे आज के नेताओं की गुज़र रही है। गरीब मज़दूर लोग घरों में और सड़कों पर भूख से मरते रहें। बिना किसी दवा दारू के दम तोड़ते रहें, बिना किसी नौकरी के गुलामों की तरह जीवन व्यतीत करते रहें लेकिन उस वक़्त की प्रधानमंत्री सुश्री इंदिरा गांधी को यह सब मंजूर नहीं हुआ। इसलिए 19 जुलाई 1969 का दिन याद दिलाता है सच्ची आत्म निर्भरता की तरफ बढ़ाये गए उस महत्वपूर्ण कदम की।
वह महान दिन और महान फैसला  
लेखक एम एस भाटिया 
उस 19 जुलाई, 1969 का महान दिन जब देश को वास्तव में आत्मनिर्भर बनाने के लिए उठाया गया साहसी कदम और बैंकों के दरवाज़े आम जनता के लिए खुल गए। यह बिलकुल खुल जा सिमसिम जैसे जादू भरे  हालात ही थे। उस दिन एक निर्णय लिया गया जिसने न केवल देश की अर्थव्यवस्था को चरम पर पहुंचाया बल्कि हर आम नागरिक को भी प्रभावित किया। हर आम नागरिक बैंक आने जाने में सक्षम हो गया। बहुत कम पैसों के साथ, आम आदमी को बैंकों की मजबूत अर्थव्यवस्था का सहयोग भरा हाथ मिला। इसने देश के हर हिस्से को लंबे समय तक समृद्ध किया। यहां तक ​​कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी जीवन की दयनीय स्थिति को सुधारने के सपने देखने लगा और फिर उसने उन सपनों को साकार होते हुए भी देखा। किसी अगले जन्म के धोखे में नहीं, इसी जन्म में उसने सब कुछ पाया।  समृद्धि की रौशनी गरीब बस्तियों में जानवरों की तरह बस्ते गरीब लोगों के जीवन में भी पहुँचने लगी। मिट्टी के घर जल्द ही पक्के हो गए। पैदल चलने वालों को साइकिल मिलने लगी और साइकिल चालकों को मोपेड और स्कूटर मिलने लगे। जेब में पैसे आये तो उसकी रौशनी उनके चेहरों पर भी दिखाई दी। 
वह असली राष्ट्रवाद था
आम तौर पर सच्चे लोगों की तरफ से तथाकथित राष्ट्रवाद का नारा तब नहीं लगाया गया था बल्कि राष्ट्र के पक्ष में काम करके दिखाया जाता था। आज नारे बहुत लगाए जाते हैं, नाटक बहुत किए जाते हैं, भाषण बहुत दिए जाते हैं लेकिन व्यवहार में देश के बड़े संस्थानों को निजी हाथों में बेचने की दौड़ लगी हुई है। सत्ता में बैठे लोग देश के खजाने में से अपना सब कुछ बेचने की फिराक में हैं। बैंकों को भी लूट का निशाना मान लिया गया है। अपने चहेतों को ऋण दिलवाएं और फिर डिफ़ॉल्टर बनवा कर विदेशों में फुर्र कर दें। इसके बाद उल्टा बैंकों को डांटा डपटा जाये और धोखाधड़ी का शिकार हुए बैंकों पर दिवालिया होने का आरोप लगा जाता है। इसके बाद बैंकों का विलय  उठाए जाते हैं फिर उन्हें अपने पसंदीदा पूंजीपतियों के हाथों सौंप दिया जाता है। 
छोटे छोटे कारोबारी भी निशाने पर हैं 
सिद्धांत यह है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। इसी सिद्धांत के तहत, बड़े पूंजीपति सरकार का उपयोग करके छोटे पूंजीपतियों को खाने के लिए कर रहे हैं। इस तरह नुकसान केवल गरीबों का ही नहीं, बल्कि छोटे पूंजीपतियों का भी हो रहा है। 
आम जनता अभी भी नहीं समझ पा रही 
आम जनता अभी भी वर्तमान के इस सारे घटनाक्रम  को नहीं समझ पा रही है।  उसे दाल रोटी के चक्क्र में उलझा कर कुछ सोचने लायक छोड़ा ही नहीं जा रहा। अधिकांश लोग अभी तक 19 जुलाई, 1969 को हुए उस ऐतिहासिक चमत्कार को नहीं समझते हैं। जब आम जनता यह सब समझने लगेगी तब वह तत्कालीन प्रधान मंत्री, मैडम इंदिरा गांधी को सलाम करेगी। उसे आज के असली दुश्मन भी नज़र आने लगेंगे। वह महान इंदिरा गांधी जिन्होंने 56 इंच की छाती के रूप में कभी भी हल्के किस्म का प्रचार नहीं किया था।  इस तरह के प्रचार के बिना भी दुनिया मैडम इंदिरा गांधी को आयरन लेडी कहती थी।
कांग्रेस के बैंगलोर अधिवेशन में गरमागरम बहस
19 जुलाई 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक ऐसा निर्णय था जिसने साड़ी दुनिया को भारत में समाजवाद के दस्तक की झलक दी। अमेरिका समर्थक लोग मुँह ताकते रह गए। वास्तव में, यह लोगों की सरकार थी, कर्मचारियों की सरकार थी, जो उन लोगों की बात सुनती थी जो उनके खिलाफ आते थे और अपने विरोधी विचारों को खुलकर सरकार के सामने लाते थे। तब बुद्धिजीविओं को जेलों में डालने का चलन इतनी बुरी तरह शुरू नहीं हुआ था। आज तो वरवरा राव जैसे कवि और सुधा भारद्वाज जैसे बुद्धिजीवी भी जेलों में हैं। असहमति को कुचला जा रहा है। पुराने साथियों को याद होगा कि बैंगलोर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर गरमागरम बहस हुई थी और इस बात पर जोर दिया गया था कि राष्ट्रीयकरण अनिवार्य है। हालांकि उस समय मोरारजी देसाई इसके पक्ष में नहीं थे। एक तरह से वह  पूंजीपतियों के पक्ष में ही बात कर रहे थे। कांग्रेस के अंदर ही उस समय भी पूंजीवादी लोग मौजूद थे। जैसे-जैसे राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज़ हुई, लाल बाग-बैंगलोर में चल रही आल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक भी बहुत तनावपूर्ण हो गई। इसी फैसले ने देश के सिस्टम का फैसला करना था--समाजवादी ढांचा या पूंजवादी ढांचा?
बैंकों के राष्ट्रीयकरण की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शनों की जोरदार शुरुआत
12 जुलाई 1969 को कर्नाटक प्रदेश बैंक कर्मचारी महासंघ ने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण के हक में विरोध प्रदर्शन किया। लाल बाग राजनीतिक सभा में पम्फलेट भी वितरित किए गए और बड़ी संख्या में बड़े बड़े    दीवारी पोस्टर भी लगाए गए। राष्ट्रीयकरण की माँग सामने आई। यह वास्तविक राष्ट्रवादी मांग थी जिसमें  न किसी मंदिर को बनाने के बात थी न ही किसी मस्जिद को गिराने की बात ही।  केवल अपने परइ देश भारत के मंदिर को आर्थिक पहलू से मज़बूत बनाने की चाहत थी। 
राष्ट्रियकरण के समर्थन में विरोध प्रदर्शनों की संख्या बड़ी 
मांग में तेजी आई और 17 जुलाई को इस मुद्दे को लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। हर तरफ राष्ट्रीयकरण का माहौल तैयार हुआ। कोई मुफ्त बिजली या मुफ्त पानी नहीं मांग रहा था। कोई कर्ज माफी की बात नहीं कर रहा था और कोई नौकरी भी नहीं मांग रहा था। राष्ट्रीयकरण हो बस एकमात्र यही मांग थी। यह वास्तविक देशभक्ति की भावना थी क्योंकि उस समय अंधभक्त बहुत कम संख्या में थे और जागरूक लोग अधिक हुआ करते थे।
सरकार भी प्रभावित हुई
जब राष्ट्रीयकरण की मांग उठी, तो केंद्र में सरकार पर भी इसका असर पड़ा। पुराने साथियों को अभी भी पूरी घटना याद है जब 16 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया था। मुरारजी देसाई को उनके पद से अचानक हटा दिया गया था। मैडम इंदिरा गांधी की गति बहुत तेज थी। चलने के मामले में और देश चलाने के संदर्भ में भी। तीन दिन बाद, 19 जुलाई, 1969 को उन्होंने ऐतिहासिक कदम उठाया। एक साहसिक घोषणा की। नए बने माहौल में कार्यवाहक राष्ट्रपति वीवी गिरि ने 14 बड़े बैंकों को सरकारी हाथों में लेने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया। इंदिरा गांधी सरकार की यह उपलब्धि वास्तव में पूरे देश की उपलब्धि थी।
14 निजी बैंक राष्ट्रीयकृत हुए थे:
1. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड
2. बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड
3. पंजाब नेशनल बैंक लिमिटेड
4. बैंक ऑफ बड़ौदा लिमिटेड
5. संयुक्त वाणिज्यिक बैक लि
6. केनरा बैंक लिमिटेड
7. यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड
8. सिंडिकेट बैंक लिमिटेड
9. देना बैंक लि।
10. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड
11. इलाहाबाद बैंक लिमिटेड
12. इंडियन बैंक लिमिटेड
13. इंडियन ओवरसीज बैंक लि।
14. बैंक ऑफ महाराष्ट्र लिमिटेड
त्वरित आर्थिक विकास
उस समय यानी जुलाई 1969 में इन राष्ट्रीयकृत बैंकों की कुल जमा पूँजी 4,107 करोड़ रुपये थी। भारतीय स्टेट बैंक में उस समय 54,953 कर्मचारी थे। इसके बाद तेजी से विकास हुआ। इन राष्ट्रीयकृत बैंकों की जमा पूँजी में भी वृद्धि हुई। राष्ट्रीकरण के बाद इन बैंकों की शाखाएँ भी बढ़ीं और कर्मचारी भी बढ़े।
नए सलाहकार बोर्ड भी बने
इन बैंकों के चौदह प्रमुखों को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत मुख्य कार्यकारी के रूप में फिर से नियुक्त किया गया। बैंकों के निदेशकों के पुराने बोर्ड हटा दिए गए और उनकी जगह नए सलाहकार बोर्ड ने ले ली। शेयरधारकों को मुआवजा दिया गया था और बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों को सरकारी नौकरियों के लिए पक्का कर दिया गया था। यह एक ऐसा कदम था जिसने घर-घर में आर्थिक समृद्धि रौशनी पहुंचाई। अब तो 20 लाख करोड़ रुपये देने की घोषणा की जाती है लेकिन लगता नहीं है कि 20 रुपये भी किसी गरीब की जेब में जाते किसी को नज़र आये हों। पूरा 20 लाख करोड़ रुपये अम्बानियों शंभानियों की जेब में चला जाता है।
अध्यादेश का विरोध भी हुआ
आज जिन लोगों ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया है और अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान एक के बाद एक सरकारी संस्थान बेच रहे हैं वे  उस समय जनसंघ के नाम से चल रहे थे। चुनाव चिन्ह दीपक हुआ करता था लेकिन वास्तव में यह अंधेरे का ही प्रचार किया करते थे। लोगों के घरों में जलने वालेदीपक गुल करके हर रोशनी को बुझाना उस समय भी अभी भी इन लोगों की प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर था।
जनसंघ ने भी किया था राष्ट्रीकरण का तीखा विरोध
उस सैम की बीजेपी अर्थात जनसंघ ने उस समय भी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का तीखा विरोध किया था। तत्कालीन स्वतंत्र पार्टी ने भी जनसंघ का ही साथ दिया। जनसंघ के सांसद बलराज मधोक और निर्दलीय पार्टी के नेता एम आर मसानी खुले तौर पर देश के राष्ट्रीयकरण विरोधी आंदोलन में शामिल हो गए। पूंजीपतियों के लिए देश की आत्मनिर्भरता को गिराना उस समय भी उनका पहला काम था। जब इंदिरा गांधी सरकार फिर भी नहीं झुकी, तो रुस्तम कावासजी जो एक बैंक निदेशक भी थे, शेयरधारक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के जमाकर्ता भी थे ने खुले रूप से सरकार के फैसले के खिलाफ एक रिट याचिका दायर की। कई अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया। देश पूंजपतियों और आम जनता के दरम्यान बनता हुआ नज़र आने लगा। पूंजीपति उस सम भी संख्या में कम थे। 
उस समय भी वामपंथी ही मैदान में आये
जब फासीवादियों और पूँजीपतियों ने राष्ट्रीयकरण अध्यादेश के खिलाफ मोर्चा संभाला, तब 2 जुलाई, 1969 को प्रख्यात व्यापार संघवादियों और सांसदों कॉमरेड ए के गोपालन और श्रीमती सुशील गोपालन ने अध्यादेश के पक्ष में हस्तक्षेप करने वाली याचिकाएँ दायर कीं। साथ ही ऑल इंडिया बैंक एम्पलाइज एसोसिएशन ने अध्यादेश के पक्ष में अपना पक्ष रखा और तुरंत रिट याचिका दायर की। चैंबर ऑफ कॉमर्स जैसे संघों ने भी राष्ट्रीयकरण अध्यादेश का घोर विरोध किया। आखिरकार, सरकार की कुल्हाड़ी गरीबों के पक्ष में थी और बड़े अमीरों हितों पर थी। रातों रात राजाओं को उनके बैंकिंग रियासतों से बाहर कर दिया गया।
अप्रैल 1980 में भी हुआ राष्ट्रीकरण 
1.आंध्र बैंक लिमिटेड
2. कॉर्पोरेशन बैंक लिमिटेड
3. न्यू बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड
4. ओरिएंटल बैंक ऑफ इंडिया
5. पंजाब और सिंध बैंक ऑफ इंडिया
6. विजया बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड
इस बार भी बहुत शोर था। पंजाब और सिंध बैंक के बारे में सिख संसार की भावनाओं को बहुत प्रभावित किया गया था।
श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के पीछे आर्थिक सुधारों के विरोधी थे?
ब्लू स्टार ऑपरेशन के बाद, तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदर गांधी की हत्या कर दी गई थी। हालाँकि सिखों की धार्मिक भावनाओं को मुद्दा बनाया गया था, लेकिन क्या सभी सेनाएँ उस हत्या के लिए उत्सुक नहीं थीं जो श्रीमती इंदिरा गाँधी के इन आर्थिक सुधारों से बहुत दुखी थीं? श्रीमती गांधी की हत्या के कुछ समय बाद, इस देश के दरवाजे पूंजीपतियों के लिए खोलने की प्रक्रिया नियमित रूप से शुरू हुई। वही जनविरोधी प्रवृत्ति अभी भी जारी है।
अब फिर से स्थिति गंभीर है
यह एक दुखद संयोग है कि 19 जुलाई कल को ही एक बार फिर से आ रहा है और इस समय केंद्र में सत्ता उन लोगों के हाथों में है जो कभी जनसंघ के रूप में राष्ट्रीयकरण का विरोध करके कहके रूप में पूंजीपतियों के साथ थे। अब भारतीय जनता पार्टी के रूप में वही लोग एक-एक करके देश के सभी संस्थानों को बेच रहे हैं और आने वाले दिनों में अम्बानी अडानियों के चरणों में गिर रहे हैं। लाल किले से रेलवे तक की बोली लगाने वालों की सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर भी बुरी नजर है। वे इन बैंकों को फिर से पूंजीपतियों को सौंपने की कोशिश के प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीयकरण खतरे में है। देश की आत्मनिर्भरता दांव पर है। राष्ट्रीयकरण को बचाना अब देश को बचाना है। इस अभियान के लिए सभी देशभक्त बलों को आगे आना चाहिए। साधारण लोगों को भी यह समझने की जरूरत है कि न तो हिंदू और न ही मुस्लिम, सिख या ईसाई खतरे में हैं। वास्तव में, देश की आत्मनिर्भरता खतरे में है। देश खुद खतरे में है। सत्ता लुटेरों के हाथों में पड़ गई है इसलिए इन लुटेरों को हटाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
 किसी शायर का एक बहुत पुराना शेयर याद आ रहा है:
     न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिन्दोस्तां वालो!
     तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में!

यदि आप देश और देश की आम जनता को बचाने के लिए इस अभियान में शामिल होने के इच्छुक हैं, तो कृपया संपर्क करें: एमएस भाटिया (+918360894301)