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Saturday, March 27, 2021

मज़बूती के लिए गीत संगीत के जादू को दोबारा जगायेगा वाम

झारखंड में लिए गए अहम फैसले को अन्य राज्य भी शीघ्र अपनाएंगे 

रामगढ़ (झारखंड): 27 मार्च 2021: (कामरेड स्क्रीन ब्यूरो)::

वाम आंदोलन को मज़बूत करने और इस जन काफिले में नए लोगों को एक बार फिर तेज़ी से लाने के लिए गीत, संगीत, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों का उल्लेखनीय योगदान रहा है। मैक्सिम गोर्की के मां को पढ़ कर न जाने कितने ही युवा  वाम आंदोलन की तरफ खिंचे चले आए थे।
पंजाबी में प्रीतलड़ी नामक पत्रिका ने भी युवाओं को वाम लहर से परिचित भी कराया और।  अमरजीत गुरदासपुरी साहिब के गीतों ने भी  सादगी  एक गहरी चेतना जगाई और इसे विकसित भी किया। जनाब तेरा सिंह चन्न ने तो एक तूफ़ान  किया। इसी तरह चुंबकीय शख्सियत शीला दीदी और उनका परिवार भी इसी क्षेत्र में जुटा रहा। अब भी संजीवन, इंद्रजीत रूपोवाली,अमन भोगल और बहुत से अन्य लोग इस परम्परा को बहुत सी कठिनाईओं के बावजूद आगे बढ़ा रहे हैं।
गीत संगीत का जादू अभी तक वाम आंदोलन के विभिन्न अभियानों का एक सक्रिय हिस्सा है। आयोजन देश भगत हाल जालंधर में हो या फिर टिकरी या सिंघु बॉर्डर पर गीत संगीत वहां मौजूद श्रोताओं और दर्शकों को अपने  विचारों के साथ बाँधने में पूरी तरह सफल रहता है। अब एक बार फिर अभियान को तेज़ करने का निर्णय लिया गया है झारखंड में। निश्चय ही इस निर्णय अन्य हिस्सों में भी फैलाया जायेगा। झारखंड में वाम के सक्रिय नेता सुशील स्वतंत्र इसे लेकर बेहद उत्साह में भी हैं।
रामगढ़ (झारखण्ड) से आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मंजूर भवन, रामगढ़ में जनवादी गीत कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का उद्देश्य पार्टी के कार्यकर्ताओं को क्रांतिकारी और जनवादी गीतों का प्रशिक्षण देना और सांस्कृतिक मंडली की स्थापना करना था। इससे स्थानीय प्रतिभाओं पहचान भी होगी। कला के क्षेत्र में सक्रिय कलाकारों को जहां  एकजुट होने का सशक्त मंच मिलेगा वहीँ उनकी रोज़ी रोटी के  संसाधन भी बढ़ाये जा सकेंगे।
रामगढ़ वाले इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भाकपा राज्य सहायक सचिव महेंद्र पाठक ने की। कार्यशाला को मुख्य वक्ता के तौर पर संस्कृतिकर्मी उमेश नजीर, सुशील स्वतंत्र, फरजाना, गौतम चौधरी ने संबोधित किया। कार्यशाला को संबोधित करते हुए भाकपा राज्य परिषद के सदस्य सुशील स्वतंत्र ने स्वागत भाषण में कहा कि कम्युनिस्ट आंदोलन में जनवादी गीतों का विशेष महत्व रहा है। कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक जनसंगठन इप्टा से जुड़े कलाकारों की तरफ से आम लोगों से जुड़े हुए गीतों के माध्यम से कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूत किया जाएगा।  सुशील स्वतंत्र ने बताया कि इस मामले में भी  विचारधारा से   कलाकारों का स्वर्णिम इतिहास रहा है। रामगढ़ की धरती कम्युनिस्टों के संघर्ष और शहादत की धरती रही है। इस धरती पर इंकलाब का तराना गाने वालों की मंडली का होना बहुत आवश्यक है। आज का दिन रामगढ़ के लिए ऐतिहासिक दिन है क्योंकि आज के ही दिन 19 मार्च 1940 में रामगढ़ में ‘अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन‘ हुआ था जिनमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में नेताजी ने ऐलान किया था कि ‘सम्पूर्ण आजादी के लिए कोई समझौता नहीं।‘ रामगढ़ की इसी संघर्ष की ज़मीन पर आज के ऐतिहासिक दिन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सांस्कृतिक आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास जरूर सफल होगा। असर अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा।
संस्कृतिकर्मी एवं भाकपा राज्य परिषद सदस्य उमेश नजीर ने कहा कि क्रांतिकारी शायर मखदूम मोहिउद्दीन की याद में आयोजित इस जनवादी गीत कार्यशाला रामगढ़ के कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूती देगी। क्रांतिकारी गीतों ने देश की आजादी में बहुत महत्वपूर्ण योगदान निभाया है। इंकलाबी के होंठों पर तराना न हो तो वो क्रांतिकारी हो ही नहीं सकता। गौतम चौधरी ने कहा कि नाटक और गीतों के माध्यम से जनता के नजदीक पहुंचा जा सकता है। फरजाना ने कहा कि सांस्कृतिक मोर्चे को मजबूत बनाकर हम महिलाओं, नौजवानों और गरीबों को आसानी से लामबंद कर सकते हैं।
अध्यक्षीय भाषण में बोलते हुए महेंद्र पाठक ने कहा कि रामगढ़ भाकपा से जुड़े संस्कृतिकर्मियों का केंद्र बनेगा। रामगढ़ में सांस्कृतिक आंदोलन को साथ लेकर कम्युनिस्ट आंदोलन आगे बढ़ेगा। नए गीत लिखे जाएंगें, स्थानीय समस्याओं पर नाटक तैयार किये जायेंगे और लोगों को जागरूक बनाया जाएगा। लइयो इप्टा के साथियों ने कार्यशाला में जनवादी गीतों का प्रशिक्षण उपस्थित साथियों को दिया। इप्टा के साथियों दुर्गा, राजू, प्रह्लाद ने क्रांतिकारी गीत गाये और प्रशिक्षण दिया। कार्यशाला में इंकलाबी शायर मखदूम मोहिउद्दीन के जीवन और उनके मशहूर गजलों पर एक घण्टे की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गई। इस अवसर पर बबलू उराँव, कय्यूम मलिक, मेवालाल प्रसाद, महेंद्र पाठक, सुशील स्वतंत्र, गौतम चौधरी, उमेश नजीर, फरजाना, रोहन, किशोरी गुप्ता, नेमन यादव, रविकांत प्रसाद, संजू गोयनका, चन्द्रभानु मुन्ना, सईद अंसारी, तेजन महतो सहित अन्य साथी उपस्थित थे। 

Tuesday, April 2, 2019

"लोकवाणी" ने पूछा क्या कॉमरेड अजित याद हैं कन्हैया?

जिसे आपके नए साथी पप्पू यादव ने 80 गोलियां मरवाई थीं! 
Sachin Jha Shekhar Posted on March 31, 2019: लोकवाणी 
अजित सरकार याद हैं आपको? अजित सरकार CPIM के पूर्णिया से विधायक थे। जून 1998 में,पूर्णिया के खजांची हाट थाना क्षेत्र के काली फ्लावर मिल के पास अपराधियों ने AK47 से अजित सरकार पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी। जिसमें उनकी मौत हो गई। गोलीबारी की इस घटना में उनकी पार्टी के कार्यकर्ता अशफाकुल रहमान और ड्राइवर हरेन्द्र शर्मा की भी मौत हो गई थी।
कॉमरेड अजीत को लगभग 80 गोली लगी थी। गोली इतनी मारी गयी थी कि उनका शरीर का हिस्सा टूट कर जगह-जगह अलग हो गया था। अजीत सरकार के हत्याकांड में वर्तमान में अपने आप को जननेता और बात–बात में रोने वाले पप्पू यादव की संलिप्तता पायी गयी थी।
वर्ष 2009 में पटना की अदालत ने पप्पू को अजीत हत्याकांड का दोषी बताते हुए सजा सुनाया था। बाद में कांग्रेस की सरकार जब केंद्र में थी और पप्पू की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस की संसद थी। तब CBI ऊपरी अदालत में सबूत नहीं पेश कर सकी और पप्पू यादव सजा से मुक्त हो गए।
अजित सरकार को पूर्णिया का रोबिन हुड कहा जाता था। व्यक्तिगत रूप से ईमानदार अजीत चुनाव लड़ने के लिए जनता से 1-1 रुपया चंदा लेते थे। 1 रुपया से अधिक वो किसी से नहीं लेते थे। उनका कहना होता था कि उन्हें इससे अनुमान चल जाता है कि कितने लोग उनके साथ हैं। अजित के अंतिम दर्शन के लिए पूर्णिया में अब तक की रिकॉर्ड तोड़ भीड़ उमड़ी थी।
आज पप्पू यादव कोसी क्षेत्र में जैसी राजनीति करते हैं। वो राजनीति 2 दशक पूर्व अजित सरकार की मजबूती थी। पप्पू यादव उस समय पूर्णिया क्षेत्र में अपनी दबंगई के लिए ही सिर्फ जाने जाते थे।
अजीत सरकार का परिवार आज नैपथ्य की जिंदगी जी रहा है। अपनी परम्परा के अनुसार वामपंथियों ने अजीत के शहादत को भुला दिया। संसदीय राजनीति में अपने आप को बचाने के लिए। वामपंथी संगठन आज अजीत के कथित हत्यारे के साथ खड़े होने को भी तैयार रह रहे हैं। 
अजीत सरकार के हत्याकांड की कहानी दर्दनाक है, और उससे भी दर्दनाक और खौफनाक है जिंदा समाज का मुर्दा हो जाना।   (लोकवाणी से साभार)

Tuesday, May 1, 2018

CPI: स्थापना की जगह और वर्ष को लेकर मतभेद क्यों?

समाजवादी समाज के निर्माण के लिए समर्पित भाकपा
भारत की भूमि पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सम्मेलन उत्तर प्रदेश के कानपुर में 90 साल पहले 26-28 दिसम्बर, 1925 को सम्पन्न हुआ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिव मंडल सदस्य रहे तथा वर्षों तक गहन अनुसंधान के बाद कई खंडों में प्रकाशित पार्टी इतिहास का सम्पादन करने वाले डॉ. गंगाधर अधिकारी ने ‘डाक्युमेंट्स ऑफ दि हिस्ट्री ऑफ दि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ के द्वितीय खंड (1923-1925) में लिखा है कि सबसे पहले कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कम्युनिस्ट गुटों के नेताओं ने, विशेषकर कॉ. एस.ए. डांगे को ऐसा सम्मेलन कराने का विचार आया था। कम्युनिस्ट रहे एस. सत्यभक्त ने इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव के नाम पर जारी एक परिपत्र द्वारा देश के विभिन्न शहरों में कार्यरत कम्युनिस्ट गुटों के सदस्यों तथा उन सभी को जिनको पार्टी के कार्यों पर विश्वास था, आग्रह किया था कि वे सभी कानपुर में 26 से 28 दिसम्बर, 1925 को आयोजित इस सम्मेलन में भाग लें। 20 सितम्बर, 1925 को हुई बैठक में इस सम्मेलन के लिए स्वागत समिति का गठन किया गया। उसके अध्यक्ष बने मौलाना हसरत मोहानी और सचिव गणेश शंकर विद्यार्थी। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में वहाँ के पार्लियामेंट में चुने गए एक भारतीय कॉ. शापुरजी सकलतवाला को सत्यभक्त ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता करने का आमंत्रण पत्र भेजा था। उनके असमर्थता जताने पर मद्रास के कम्युनिस्ट नेता कॉ. सिंगारावेलु चेट्टीयार को अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। कॉ. सकलतवाला द्वारा भेजे गए संदेश को सम्मेलन में पढ़कर सुनाया गया। कॉ. सिंगारावेलु ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पढ़ा-ऐसे समय जबकि कम्युनिज्म के विरोधी लोग इस धरती पर बसने वाले सभी मनुष्यों के लिए दुनिया को ज्यादा से ज्यादा खुशहाल और सुख-सम्पन्न बनाने वाले हमारे लोकोपकारी आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं, भारत के हम कम्युनिस्ट भारत की राजनैतिक और आर्थिक स्थिति पर सामान्य रूप से विचार करने आज इस हॉल में एकत्र हुए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इस सम्मेलन में होने वाले विचार-विमर्शों के माध्यम से हमारे देशवासी और हमारे शासक दोनों ही हमारे शांतिपूर्ण आंदोलन को अच्छी तरह समझेंगे तथा हम अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं कि सामान्य जनता, खासकर उद्योग-धंधों और कृषि क्षेत्रों के मजदूर, जिनके लाभ के लिए ही यह सम्मेलन हो रहा है, हमारे कार्यों का भली-भाँति मूल्यांकन करेंगे।
   के.मुरुगेसन और सी.एस. सुब्रह्मण्यम द्वारा लिखित, ‘सिंगारावेलु दक्षिण भारत में कम्युनिज्म के अग्रदूत’ अंग्रेजी पुस्तक जिसका हिन्दी अनुवाद श्री कन्हैया द्वारा किया गया, उसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 50वें वर्षगाँठ के अवसर पर पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई थी। उसे पढ़ने से हम जान पाते हैं कि, सिंगारावेलु दक्षिण में कम्युनिज्म के जनक थे। वे अपने कम्युनिस्ट विचारों को मजदूर-वर्ग के संघर्षों के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में, कांग्रेस के आत्मगौरव आंदोलन में और नागरिक मामलों में भी लागू करते थे। 1860 में मद्रास के एक मछेरे परिवार में जन्मे सिंगारावेलु ने कानून की डिग्री हासिल की और हाईकोर्ट में वकालत की। 1902 में इंग्लैंड की यात्रा कर वहाँ विश्व बौद्ध सम्मेलन में भाग लिया। जब वह भारत लौटकर आए, तो उनके घर में ही महाबोधि सोसायटी की बैठक होने लगी। बाद में वे रूस की 1905 की क्रांति के समाचार से प्रेरित हुए, जलियांवाला बाग हत्याकांड और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए गांधीजी के आह्वान के बाद मद्रास शहर में नौजवानों के एक दल का नेतृत्व करना शुरू किया। उन्होंने 1922 में कांग्रेस प्रतिनिधि के रूप में गया-अधिवेशन में भी भाग लिया। सिंगारावेलु ने 1923 में मद्रास में हिन्दुस्तान मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना की और मद्रास नगर में मई दिवस सभा का आयोजन किया। इतिहास में भारत में आयोजित पहला मई दिवस वही था। दैनिक समाचार पत्र कीर्ति के अनुसार कानपुर में आयोजित कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन पंडाल के पास ही सड़क के दूसरी तरफ विशेष रूप से बनाए गए अस्थायी सभागृह में कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन में 300 से ऊपर प्रतिनिधि उपस्थित थे। 25 दिसम्बर को सम्मेलन उद्घाटन अधिवेशन हुआ था। 26 दिसम्बर की शाम को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विधिवत स्थापना का प्रस्ताव भी था। 27 दिसम्बर को पार्टी संविधान पारित किया गया और केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति व पदाधिकारियों का चुनाव हुआ। महाराष्ट्र, बंगाल, लाहौर, उत्तर प्रदेश, पंजाब व मद्रास के कम्युनिस्ट गुटों के प्रतिनिधि शामिल थे। मुजफ्फर अहमद द्वारा 1969 में बंगाली में लिखित पुस्तक अमार जीवन आर. भारतेर कम्युनिस्ट पार्टी के मुताबिक इस सम्मेलन से एस.व्ही. घाटे और जानकी प्रसाद बगरेहट्टा संयुक्त महासचिव चुने गए और घाटे को बम्बई केन्द्रीय कार्यालय संचालन की जिम्मेदारी दी गई। पार्टी का 11 सदस्यीय केन्द्रीय कार्यकारिणी का भी चुनाव हुआ, जिसमें से एक थे कॉ. मुजफ्फर अहमद। बाद में कॉ. मुजफ्फर अहमद ने उसी पुस्तक में, जिसे पार्टी का 1964 में विभाजन के बाद 1969 में लिखा गया था, लिखा कि कानपुर में कम्युनिस्ट सम्मेलन एक बच्चों का खेल था और वे इसे एक शर्मनाक घटना मानते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में 26 दिसम्बर 1925 को नहीं, बल्कि ताशकंद में एम.एन. राय के नेतृत्व में 17 अक्टूबर, 1920 को 7 सदस्यों की एक बैठक आयोजित की गई थी। सन 1964 में बनी सीपीआई (एम) के नेताओं ने उनकी पार्टी का कलकत्ता में सम्पन्न सप्तम पार्टी कांग्रेस (31 अक्टूबर से 7 नवंबर, 1964) में सीपीआई (एम)  के जिस पार्टी कार्यक्रम को पास करवाया गया, उसकी भूमिका में लिखा गया कि सन् 1920 में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और 1920 के दशक में पार्टी गठित होने के बाद पार्टी गैरकानूनी घोषित हो गई। सीपीआई (एम) के स्थापना वर्ष को 1920 दर्शाते हुए उस पार्टी ने अपने को सीपीआई से अलग दिखाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि सन 2014 में सीपीआई से अलग होने का 50वीं वर्षगाँठ मनाते हुए इस बात की बहुत खुशी जाहिर की कि उनकी पार्टी को सीपीआई के संशोधनवाद से मुक्ति मिली थी। वहीं अपने लक्ष्य के बारे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा, पार्टी ऐसे न्यायपूर्ण समाजवादी समाज के लक्ष्य के लिए दृढ़तापूर्वक समर्पित है जो हर किस्म के शोषण और वर्ग, जाति एवं लिंग अंतरों के कारण पैदा होने वाले सामाजिक उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए रास्ता साफ करेगी। पार्टी ऐसे समाजवादी समाज के निर्माण के लिए समर्पित है, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण अंततः समाप्त हो जाएगा। तमाम मतांध और मात्र सिद्धांतवादी एवं मताग्राही सोच एवं संशोधनवादी रूझानों को अस्वीकार करते हुए, पार्टी एक ऐसे नये समाजवादी समाज के लिए रास्ते की रूपरेखा तैयार करने के लिए भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार मार्क्सवादी लेनिनवाद के विज्ञान को लागू करेगी। यह रास्ता सामने उपस्थित विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों और साथ ही हमारे स्वयं के देश की विशेष विशिष्टताओं एवं लक्षणों, इसके इतिहास, परंपरा, संस्कृति, सामाजिक बनावट एवं विकास के स्तर से तय होगा। यह किसी मॉडल पर आधारित नहीं होगा। यह अद्वितीय और विशेषतः इस 21वीं सदी में समाजवाद का भारतीय रास्ता होगा। मुख्य तत्व है उत्पादन के मुख्य साधनों का समाजीकरण। सीपीआई के राजनैतिक प्रस्ताव-2015 में कहा गया कि, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दृढ़तापूर्वक विश्वास करती है कि अपनी समृद्ध विरासत के साथ जनता के उद्देश्यों के लिए संघर्ष और अभियान से समाजवादी समाज के लिए पथ प्रशस्त करके एक जनविकल्प का निर्माण होगा। समाजवादी हमारा भविष्य है।

-चित्तरंजन बक्शी
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल-2018 विशेषांक में प्रकाशित

Friday, April 22, 2016

जनाब कैफी आज़मी साहिब की एक दुर्लभ रचना-लेनिन

एक पत्थर से तराशी थी जो तुमने दीवार,
इक खतरनाक शिगाफ़ उसमें नज़र आता है।
ह वह दर्द है जिसे जनाब कैफी साहिब ने बहुत पहले महसूस कर लिया था। तभी उनके दिल से निकला--
हादसा कितना कड़ा है कि सर-ए-मंज़िल-ए शौक,
काफिला चंद गिरोहों में बंटा जाता है। 
अधिकतर कम्युनिस्ट कहनी और करनी के एक रहे। मैंने बहुत से जानेमाने कम्युनिस्ट नेतायों को नज़दीक से देखा। जिनकी चर्चा किसी अलग पोस्ट में जल्द की जाएगी। वे चाहते तो अपनी सात पुश्तों के लिए अपार धन जमा कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुद भी सादगी से जीवन व्यतीत किया और उनके परिवारों ने भी। हमेशां मेहनत पर यकीन रखा और जन संघर्षों के लिए हर पल तैयार रहे। इसके बावजूद लाल झंडे की कई पार्टियां बन गईं।  ऐसी हालत में कैफी साहिब के लेनिन को सम्बोधित शब्द बहुत अधिक महत्वपूर्ण बन जाते हैं--
देखते हो तो कोई सुलह की तदबीर करो,
हो सके ज़ख्म रफू जिससे वो तकरीर करो। 
लेनिन के जन्म दिन पर सभी वे लोग एकजुट होकर लाल झंडे की लहर को मज़बूत करें जिनको किसी भी तरह इस झंडे और इसके मकसद से ज़रा सा भी लगाव है। -- रेक्टर कथूरिया  
आसमां और भी ऊपर को उठा जाता है 
तुमने सौ साल में इंसां  को किया कितना बुलंद। 
*पुश्त पर बाँध दिया था जिन्हें जल्लादों ने, 
फेंकते हैं वही हाथ आज सितारों पे कमन्द। 
                                  देखते हो कि नहीं !
जगमगा उठी है मेहनत के पसीने से *जबीं,
अब कोई खत, खत-ए -तक़दीर नहीं हो सकता। 
तुमको हर मुल्क की सरहद पे खड़े देखा है,
अब कोई मुल्क हो तसखीर नहीं हो सकता। 
Comrade Screen
खैर हो बाज़ू-ए-कातिल की मगर खैर नहीं!
आज *मकतल में बहुत भीड़ नज़र आती है। 
कर दिया था कभी हल्का सा इशारा जिस *सम्त,
सारी दुनिया उसी *जानिब को मुड़ी जाती है। 
Comrade Screen
हादसा कितना कड़ा है कि सर-ए-मंज़िल-ए शौक,
काफिला चंद गिरोहों में बंटा जाता है।  
एक पत्थर से तराशी थी जो तुमने दीवार,
इक खतरनाक *शिगाफ़ उसमें नज़र आता है। 
Comrade Screen
देखते हो तो कोई सुलह की तदबीर करो,
हो सके ज़ख्म रफू जिससे वो तकरीर करो। 
*एहद-ए-पे पेचीदा *मसाईल हैं सवा पेचीदा,
उनको सुलझाओ, सहीफा कोई तहरीर करो। 
Comrade Screen
रूहें आवारा हैं दे दो इन्हें *पैकर अपना,
भर दो हर पारा-ए-फौलाद में जौहर अपना। 
रहनुमा फिरते हैं या फिरती हैं बेसर लाशें?
रख दो हर अकड़ी हुई लाश पे तुम सर अपना। 
Comrade Screen
*पुश्त-पीठ, *जबीं-माथा, *मकतल-कत्लगाह, *सम्त-दिशा, *जानिब-तरफ, *एहद-ए-पे पेचीदा-उलझा हुआ समय, *मसाईल-समस्याएं, *शिगाफ़-सेंध/दरार,  *पैकर-जिस्म 
जनाब कैफी आज़मी साहिब की एक दुर्लभ रचना-लेनिन-

Monday, April 1, 2013

मेरी आख़ि‍री इच्‍छा

 (एक क्रान्तिकारी का वसीयतनामा)   -- शालिनी 

कम्‍युनिस्‍ट हर लड़ाई अपनी पूरी ताक़त के साथ लड़ते हैं।
एक सांघातिक रोग है मेटास्‍टैटिक कैंसर -- मैं जानती हूँ
इसलिए मैं लड़ रही हूँ इसके विरुद्ध अपनी सम्‍पूर्ण इच्‍छाशक्ति के साथ।
मैं अभी भरपूर जीना चाहती हूँ और मुझे विश्‍वास है
कि मेरी जिजीविषा मृत्‍यु को परास्‍त कर देगी
और अगर ऐसा न भी हुआ
तो भी मैं यह तो सिद्ध कर ही दूँगी
कि सच्‍चे क्रान्तिकारी न तो कठिन समय के सामने
हथियार डालते हैं, न ही मौत के सामने
कातर होकर आत्‍मसमर्पण करते हैं।

मुझे भरोसा है अपनी संकल्‍पशक्ति और युयुत्‍सा पर
और मैं जानती हूँ कि मुझे यह जंग जीतकर
फिर उस मोर्चे पर वापस लौटना है
जिस पर ताज़ि‍न्‍दगी तैनात रहने का
अपनी आत्‍मा से करार है।
इसलिए, पूरी सम्‍भावना है कि मेरी इस आख़ि‍री इच्‍छा का,
मेरे इस वैचारिक वसीयतनामे का
कल कोई मतलब ही न रह जाये,
लेकिन पूरी बहादुरी से लड़ने के बावजूद,
अन्तिम साँस तक, एक सच्‍चे कम्‍युनिस्‍ट की तरह,
हारना ही पड़े अगर कहीं मुझको,
तो उस सूरत में यह अन्तिम-इच्‍छा पत्र
मैं अपने कामरेडों-दोस्‍तों के नाम छोड़ना चाहती हूँ।

मैं जानती हूँ, कैंसर को पराजित करना ही है मुझे।
मेरे कामरेडों का प्‍यार और दर्द मेरे साथ है।
मुझे लौटना ही है पूँजी के विरुद्ध जारी युद्ध में
अपने मोर्चे पर, आने वाली पीढ़ि‍यों की ख़ातिर।
फिर भी यदि ऐसा न हो सका,
तो मेरे साथी इस बात का पूरा ख़्याल रखेंगे
कि मेरे शरीर को छू न सकें उनके गन्‍दे हाथ
जिन्‍होंने हमारे लाल झण्‍डे पर गन्‍दगी फेंकी
जिन्‍होंने हड्डियाँ गलाकर खड़े किये गये
हमारे प्रयोगों को कुत्‍सा-प्रचारों से लांछित और कलंकित किया,
जिन्‍होंने 'जनचेतना' और हमारे प्रकाशनों को
मुनाफ़ा कमाने का उपक्रम बताया, सच्‍चाई जानते हुए भी।

मेरे शरीर के आसपास भी फटकने नहीं चाहिए
वे कीड़े, जिन्‍होंने अपने पतन को ढँकने के लिए
हम पर तरह-तरह की घृणित तोहमतें लगायीं और कम्‍युनिस्‍ट क्रान्तिकारी कतारों के बीच
अविश्‍वास का ज़हरीला धुआँ फैलाने की भरपूर कोशिश की।
कठिन समय में धुआँ छोड़ते हुए भागकर माँदों में घुस जाने वाले
भगोड़े न जाने किस मुँह से सिद्धान्‍तों की दुहाई देते हैं।

कुछ ऐसे भी पतित अवसरवादी हैं जो अपनी अहंतुष्टि के लिए
और पेट पालने के लिए अभी भी राजनीतिक दुकानें चलाते हैं।
ये घृणित लोग मौत और बीमारी को भी राजनीतिक हथियार बनाकर
हम लोगों को निशाना बनाते रहे हैं।
मेरा धनपशु पिता भी इसी गिरोह में शामिल है
जो अपने वर्गीय अहं और निहित स्‍वार्थों के चलते
अन्‍धा होकर हमारे कामों को नुकसान पहुँचाने की
हर सम्‍भव कोशिश करता रहा है,
उसकी भी अपनी वर्गीय प्रतिबद्धता है
और वह कभी भी नहीं बदलेगा।
साथियो! ऐसे लोग कत्तई नहीं आयें
मेरे निष्‍प्राण शरीर के निकट भी,
इसका ध्‍यान आप सबको रखना होगा,
यह मेरी आख़ि‍री इच्‍छा है।
साथियो! मैं जन्‍म से मज़दूर की बेटी नहीं हूँ।
मैं एक सूदख़ोर, व्‍यापारी, भूस्‍वामी, परजीवी
धनपशुओं के परिवार में पैदा हुई।
कम्‍युनिज़्म की भावना जैसे-जैसे समझ में आयी,
मैंने ख़ुद को मज़दूर की बेटी समझने की कोशिश की,
मज़दूर की तरह क्रान्ति के मोर्चे पर खटने की कोशिश की।
नहीं जानती मैं कितना कर्ज़ उतार पायी हूँ जनता का,
कितना पाप धो पायी हूँ पूर्वजों का --
इसका फ़ैसला मेरे बाद के लोग करेंगे।
मैं बस इतना भरोसा दिला सकती हूँ
कि घर-वापसी का ख़्याल मेरे दिल में कभी नहीं आया,
तूफानों से पीछे हटकर
घोंसला बनाने का विचार मुझे कभी नहीं भाया।
एक आम कम्‍युनिस्‍ट की तरह
मेरी भी रही हैं सहज मानवीय कमज़ोरियाँ,
और पृष्‍ठभूमि से अर्जित कुछ वर्गीय कमज़ोरियाँ भी।

मेरा यह दावा नहीं कि कभी मेरे भीतर
निराशा का कोई झोंका नहीं आया,
ऐसा भी नहीं कि साथियों से कभी कोई
शिकायत ही न रही हो,
फिर भी मैं विश्‍वास दिला सकती हूँ कि
मैं बेहतर कम्‍युनिस्‍ट बनने की कोशिशों में ही
सन्‍तोष और ख़ुशी हासिल करती रही हूँ,
मैं अपने साथियों को ही दुनिया में सबसे अधिक
प्‍यार करती हूँ और भरोसेमन्‍द मानती हूँ
और मैं अभी भी ज़ि‍न्‍दगी से बेपनाह मुहब्‍बत करती हूँ
और ज़्यादा से ज़्यादा जीना चाहती हूँ।
इसीलिए, मुझे विश्‍वास है कि मेरी ही जीत होगी
मृत्‍यु के विरुद्ध मेरे इस संघर्ष में
कैंसर को हारना ही है मेरी कम्‍युनिस्‍ट संकल्‍पशक्ति के आगे।

लेकिन फिर भी एक सच्‍चे कम्‍युनिस्‍ट की तरह मैं तैयार हूँ
हर प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के लिए
और इसीलिए अपनी यह हार्दिक इच्‍छा भी लिख दे रही हूँ
कि यदि मैं ज़ि‍न्‍दगी की जंग हार जाती हूँ
तो मेरे पार्थिव शरीर को
हम लोगों के प्‍यारे लाल झण्‍डे में अवश्‍य लपेटा जाये
और फिर उसे वैज्ञानिक प्रयोग या ग़रीब ज़रूरतमन्‍दों को अंगदान के उद्देश्‍य से
किसी सरकारी अस्‍पताल या मेडिकल कालेज को
समर्पित कर दिया जाये।
इस पर अमल का दायित्‍व विधि अनुसार
दो कामरेडों को मैं सौंप जाऊँगी।
यदि किसी कारणवश यह सम्‍भव न हो सके
तो मेरा पार्थिव शरीर
मेरे कामरेडों के कन्‍धों पर विद्युत शवदाहगृह तक जाना चाहिए
और मेरा अन्तिम संस्‍कार
बिना किसी धार्मिक रीति-रिवाज के,
इण्‍टरनेशनल की धुन और तनी मुट्ठियों के साथ होना चाहिए।
यह भी ध्‍यान रहे कि
ऐसा कोई भी पतित भगोड़ा इसमें शामिल नहीं होना चाहिए,
उसे मेरे पार्थिव शरीर के निकट भी नहीं आने देना होगा।
मैं जानती हूँ, जो आज कहते हैं कि
मेरा 'ब्रेनवॉश' कर दिया गया है (जो मेरे लिए सबसे बड़ी गाली है),
वही मेरी मृत्‍यु पर भी राजनीति करने से बाज़