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Tuesday, May 1, 2018

CPI: स्थापना की जगह और वर्ष को लेकर मतभेद क्यों?

समाजवादी समाज के निर्माण के लिए समर्पित भाकपा
भारत की भूमि पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सम्मेलन उत्तर प्रदेश के कानपुर में 90 साल पहले 26-28 दिसम्बर, 1925 को सम्पन्न हुआ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिव मंडल सदस्य रहे तथा वर्षों तक गहन अनुसंधान के बाद कई खंडों में प्रकाशित पार्टी इतिहास का सम्पादन करने वाले डॉ. गंगाधर अधिकारी ने ‘डाक्युमेंट्स ऑफ दि हिस्ट्री ऑफ दि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ के द्वितीय खंड (1923-1925) में लिखा है कि सबसे पहले कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कम्युनिस्ट गुटों के नेताओं ने, विशेषकर कॉ. एस.ए. डांगे को ऐसा सम्मेलन कराने का विचार आया था। कम्युनिस्ट रहे एस. सत्यभक्त ने इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव के नाम पर जारी एक परिपत्र द्वारा देश के विभिन्न शहरों में कार्यरत कम्युनिस्ट गुटों के सदस्यों तथा उन सभी को जिनको पार्टी के कार्यों पर विश्वास था, आग्रह किया था कि वे सभी कानपुर में 26 से 28 दिसम्बर, 1925 को आयोजित इस सम्मेलन में भाग लें। 20 सितम्बर, 1925 को हुई बैठक में इस सम्मेलन के लिए स्वागत समिति का गठन किया गया। उसके अध्यक्ष बने मौलाना हसरत मोहानी और सचिव गणेश शंकर विद्यार्थी। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में वहाँ के पार्लियामेंट में चुने गए एक भारतीय कॉ. शापुरजी सकलतवाला को सत्यभक्त ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता करने का आमंत्रण पत्र भेजा था। उनके असमर्थता जताने पर मद्रास के कम्युनिस्ट नेता कॉ. सिंगारावेलु चेट्टीयार को अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। कॉ. सकलतवाला द्वारा भेजे गए संदेश को सम्मेलन में पढ़कर सुनाया गया। कॉ. सिंगारावेलु ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पढ़ा-ऐसे समय जबकि कम्युनिज्म के विरोधी लोग इस धरती पर बसने वाले सभी मनुष्यों के लिए दुनिया को ज्यादा से ज्यादा खुशहाल और सुख-सम्पन्न बनाने वाले हमारे लोकोपकारी आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं, भारत के हम कम्युनिस्ट भारत की राजनैतिक और आर्थिक स्थिति पर सामान्य रूप से विचार करने आज इस हॉल में एकत्र हुए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इस सम्मेलन में होने वाले विचार-विमर्शों के माध्यम से हमारे देशवासी और हमारे शासक दोनों ही हमारे शांतिपूर्ण आंदोलन को अच्छी तरह समझेंगे तथा हम अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं कि सामान्य जनता, खासकर उद्योग-धंधों और कृषि क्षेत्रों के मजदूर, जिनके लाभ के लिए ही यह सम्मेलन हो रहा है, हमारे कार्यों का भली-भाँति मूल्यांकन करेंगे।
   के.मुरुगेसन और सी.एस. सुब्रह्मण्यम द्वारा लिखित, ‘सिंगारावेलु दक्षिण भारत में कम्युनिज्म के अग्रदूत’ अंग्रेजी पुस्तक जिसका हिन्दी अनुवाद श्री कन्हैया द्वारा किया गया, उसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 50वें वर्षगाँठ के अवसर पर पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई थी। उसे पढ़ने से हम जान पाते हैं कि, सिंगारावेलु दक्षिण में कम्युनिज्म के जनक थे। वे अपने कम्युनिस्ट विचारों को मजदूर-वर्ग के संघर्षों के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में, कांग्रेस के आत्मगौरव आंदोलन में और नागरिक मामलों में भी लागू करते थे। 1860 में मद्रास के एक मछेरे परिवार में जन्मे सिंगारावेलु ने कानून की डिग्री हासिल की और हाईकोर्ट में वकालत की। 1902 में इंग्लैंड की यात्रा कर वहाँ विश्व बौद्ध सम्मेलन में भाग लिया। जब वह भारत लौटकर आए, तो उनके घर में ही महाबोधि सोसायटी की बैठक होने लगी। बाद में वे रूस की 1905 की क्रांति के समाचार से प्रेरित हुए, जलियांवाला बाग हत्याकांड और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए गांधीजी के आह्वान के बाद मद्रास शहर में नौजवानों के एक दल का नेतृत्व करना शुरू किया। उन्होंने 1922 में कांग्रेस प्रतिनिधि के रूप में गया-अधिवेशन में भी भाग लिया। सिंगारावेलु ने 1923 में मद्रास में हिन्दुस्तान मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना की और मद्रास नगर में मई दिवस सभा का आयोजन किया। इतिहास में भारत में आयोजित पहला मई दिवस वही था। दैनिक समाचार पत्र कीर्ति के अनुसार कानपुर में आयोजित कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन पंडाल के पास ही सड़क के दूसरी तरफ विशेष रूप से बनाए गए अस्थायी सभागृह में कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन में 300 से ऊपर प्रतिनिधि उपस्थित थे। 25 दिसम्बर को सम्मेलन उद्घाटन अधिवेशन हुआ था। 26 दिसम्बर की शाम को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विधिवत स्थापना का प्रस्ताव भी था। 27 दिसम्बर को पार्टी संविधान पारित किया गया और केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति व पदाधिकारियों का चुनाव हुआ। महाराष्ट्र, बंगाल, लाहौर, उत्तर प्रदेश, पंजाब व मद्रास के कम्युनिस्ट गुटों के प्रतिनिधि शामिल थे। मुजफ्फर अहमद द्वारा 1969 में बंगाली में लिखित पुस्तक अमार जीवन आर. भारतेर कम्युनिस्ट पार्टी के मुताबिक इस सम्मेलन से एस.व्ही. घाटे और जानकी प्रसाद बगरेहट्टा संयुक्त महासचिव चुने गए और घाटे को बम्बई केन्द्रीय कार्यालय संचालन की जिम्मेदारी दी गई। पार्टी का 11 सदस्यीय केन्द्रीय कार्यकारिणी का भी चुनाव हुआ, जिसमें से एक थे कॉ. मुजफ्फर अहमद। बाद में कॉ. मुजफ्फर अहमद ने उसी पुस्तक में, जिसे पार्टी का 1964 में विभाजन के बाद 1969 में लिखा गया था, लिखा कि कानपुर में कम्युनिस्ट सम्मेलन एक बच्चों का खेल था और वे इसे एक शर्मनाक घटना मानते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में 26 दिसम्बर 1925 को नहीं, बल्कि ताशकंद में एम.एन. राय के नेतृत्व में 17 अक्टूबर, 1920 को 7 सदस्यों की एक बैठक आयोजित की गई थी। सन 1964 में बनी सीपीआई (एम) के नेताओं ने उनकी पार्टी का कलकत्ता में सम्पन्न सप्तम पार्टी कांग्रेस (31 अक्टूबर से 7 नवंबर, 1964) में सीपीआई (एम)  के जिस पार्टी कार्यक्रम को पास करवाया गया, उसकी भूमिका में लिखा गया कि सन् 1920 में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और 1920 के दशक में पार्टी गठित होने के बाद पार्टी गैरकानूनी घोषित हो गई। सीपीआई (एम) के स्थापना वर्ष को 1920 दर्शाते हुए उस पार्टी ने अपने को सीपीआई से अलग दिखाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि सन 2014 में सीपीआई से अलग होने का 50वीं वर्षगाँठ मनाते हुए इस बात की बहुत खुशी जाहिर की कि उनकी पार्टी को सीपीआई के संशोधनवाद से मुक्ति मिली थी। वहीं अपने लक्ष्य के बारे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा, पार्टी ऐसे न्यायपूर्ण समाजवादी समाज के लक्ष्य के लिए दृढ़तापूर्वक समर्पित है जो हर किस्म के शोषण और वर्ग, जाति एवं लिंग अंतरों के कारण पैदा होने वाले सामाजिक उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए रास्ता साफ करेगी। पार्टी ऐसे समाजवादी समाज के निर्माण के लिए समर्पित है, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण अंततः समाप्त हो जाएगा। तमाम मतांध और मात्र सिद्धांतवादी एवं मताग्राही सोच एवं संशोधनवादी रूझानों को अस्वीकार करते हुए, पार्टी एक ऐसे नये समाजवादी समाज के लिए रास्ते की रूपरेखा तैयार करने के लिए भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार मार्क्सवादी लेनिनवाद के विज्ञान को लागू करेगी। यह रास्ता सामने उपस्थित विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों और साथ ही हमारे स्वयं के देश की विशेष विशिष्टताओं एवं लक्षणों, इसके इतिहास, परंपरा, संस्कृति, सामाजिक बनावट एवं विकास के स्तर से तय होगा। यह किसी मॉडल पर आधारित नहीं होगा। यह अद्वितीय और विशेषतः इस 21वीं सदी में समाजवाद का भारतीय रास्ता होगा। मुख्य तत्व है उत्पादन के मुख्य साधनों का समाजीकरण। सीपीआई के राजनैतिक प्रस्ताव-2015 में कहा गया कि, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दृढ़तापूर्वक विश्वास करती है कि अपनी समृद्ध विरासत के साथ जनता के उद्देश्यों के लिए संघर्ष और अभियान से समाजवादी समाज के लिए पथ प्रशस्त करके एक जनविकल्प का निर्माण होगा। समाजवादी हमारा भविष्य है।

-चित्तरंजन बक्शी
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल-2018 विशेषांक में प्रकाशित

Sunday, April 7, 2013

देखते ही देखते यह क्या हुआ ?

कोई भी नेता भूखा-नंगा नही है
आज़ादी आने के बाद हिन्दोस्तान की राजनीती में एक ऐसा वक्त भी आया था जब सीपीएम के वरिष्ठ नेता कामरेड ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनने वाले थे। घटनाक्रम इतनी तेज़ी से घटा की सब देखते ही रह गए।  किसी वजह से पार्टी ने  उन्हें  यह पद लेने से मना कर दिया। बस पार्टी का एक आदेश और कामरेड ज्योति बसु ने  इस पद के बहुत निकट पहुँच कर तुरंत अपने कदम पीछे हटा लिए। मुझे आज सुबह ही इसकी याद दिलाई पंजाब के वरिष्ठ वामपंथी पत्रकार कामरेरमेश कौशल ने जो आजकल दैनिक पंजाब केसरी पत्र समूह के पंजाबी दैनिक जग बाणी में कार्यरत हैं। उन्होंने सवाल भी किया कि क्या आज ऐसा सम्भव है? पार्षद पद की टिकट न मिलने पर पार्टी बदल लेने या फिर बगावत करके आज़ाद खड़े होने का सिलसिला अब आम हो चूका है। राजनीती के क्षेत्र में आई  इस नैतिक गिरावट पर चर्चा कर रहे हैं पंजाब स्क्रीन के बहुत ही पुराने स्नेही कलमकार बोद्धिसत्व कस्तूरिया। आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारीं की इंतजार बनी रहेगी। ---रेक्टर कथूरिया 
प्रजातंत्र और समाजवाद का सपना
क्या इसी प्रजातंत्र और समाजवाद का सपना गाँधी और संविधान निर्माताओं ने देखा था?
समय और सत्ता परिवर्तन के साथ ही नेताओं की सोच संकुचित होती जा रही है ! देश की आज़ादी के लिये न्यौछावर होने की सामर्थ्य रखने वाले नेताओं की कमी ने इस देश के प्रजातंत्र की जडों को खोखला कर दिया है,धर्म निर्पेछ समाज वादी समाज की अवधारणा को ध्व्स्त कर दिया है ! अब धर्म निर्पेछता की चादर ओढ जातिवाद, भाई-भतीजावाद का खूनी खेल खेला जा रहा है,परिणामतः टिकट के आवंटन से लेकर मंत्री-पद आवंटन भी इससे अछूता नही रहा है !
जान की बाजी लगाने वाले नेताओं का स्थान ऐसे नेताओं ने ले लिये है जो सी०बी०आई०और जेल जाने  के भय से सत्ता पक्ष को स्वार्थ भाव से समर्थन दे रहे है,क्यों कि अपने काले कारनामों के कारण उनमे इतना मनोबल ही नही है कि वे जनहित की सोच सही निर्णय ले सकें! समाज्वाद का बिगुल बेशक बजाते हों ,दलितों की मसीहा,धरती पुत्र बेशक कहलाते हो परन्तु उनका  समाज केवल उनका परिवार और ज़्यादा से ज़्यादा उनकी बिरादरी तक ही सीमित है! नेता इतने संकीर्ण विचार-धारा के हो गये है कि जन हित मे लगने वाले धन को किसी वर्ग विशेष मे बाँट ,किसी राज्य को विशेष पैकेज देकर घाटे का बज़ट पेश करने से भी नही डरते परिणामतः हर भारतीय पैदा होने से पहले ही हज़ारो रुपयों के कर्ज़ के तहत ही इस धरा पर अवतीर्ण होता है !राज्य सरकार का कर्ज़ अलग और केन्द्र सरकार का अलग क्योंकि संविधान मे भी तो अलग -अल्ग विषयो की अलग सूची है! हाँ राज्य सकार का कर्ज़ा रुपयों मे और केन्द्र का डालर मे हो जाता है ! अभी उ०प्र० मे क्न्या शिक्षा धन बँटा,लैप-टाप बँटा,"मेरी बेटी उसका कल"मे एक -एक मुस्लिम बालिका को ३०००० हज़ार बँटे परन्तु जन सामान्य के गले पर टैक्स की रेती चला कर ! कोई सरकार चाहे वो विकास  के लिये ,सडकों की बात करे,गरीबों के लिये सस्ते भवनों की बात करे,उसका प्रतिफ़ल नेताओं को ही मिलता है परिणामतः ४-५ वर्षों मे ही उनकी पूजी ४००-५०० गुना तक बढ जाती है और सरकार का घाटा बढ कर दूना हो जाता है ,तो फ़िर विकास कैसे हो रहा है यही चिन्तन का विषय है! अरबो रुपया तो माननीयों के भवन और सुरक्षा पर खर्च हो रहा है यदि वही समाप्त कर दिया जावे तो घाटे की राज्नीति समाप्त हो सकती है,लैकिन आज वे जन सेवक की परिभाषा भूल कर राजा भैया बन गये है! यदि वे जनता के नुमाइन्दे है तो जनता से इतने भयाक्रान्त क्यो हैकि उनकी सुरक्षा के लिये दिन रात लाखों पुलिस वाले तैनात है और प्रजातंत्र मे प्रजा के लिये अपराअधियों की धर-पकड के लिये पुलिस का अकाल पड जाता है!
सताधारी कोई भी नेता भूखा-नंगा नही है ,फ़िर उन्हे इतनी मोटी-मोटी तन्खाह, भत्ते, रेल,हवाई किरायॊ मे छूट,बसों मे फ़्री पास क्यों?क्या यह धन जनता पर लगाये जाने वाले टैक्स की बर्बादी नही है ? क्या इसी प्रजातंत्र और समाजवाद का सपना गाँधी और संविधान निर्माताओं ने देखा था?

Friday, April 5, 2013

कॉमरेड शालिनी को भावभीनी श्रद्धांजलि

साथियों ने लिया अधूरे कार्यों और सपनों को पूरा करने का संकल्‍प 
लखनऊ, 4 अप्रैल। कॉमरेड शालिनी जैसी युवा सांस्कृतिक संगठनकर्ता के अचानक हमारे बीच से चले जाने से जो रिक्तता पैदा हुई है उसे भरना आसान नहीं होगा। उन्होंने एक साथ अनेक मोर्चों पर काम करते हुए लखनऊ ही नहीं पूरे देश में प्रगतिशील और क्रान्तिकारी साहित्य तथा संस्कृति के प्रचार-प्रसार में जो योगदान दिया वह अविस्मरणीय रहेगा।
का. शालिनी की स्मृति में आज यहाँ जनचेतनातथा राहुल फ़ाउण्डेशनकी ओर से आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शहर के बुद्धिजीवियों तथा नागरिकों के साथ ही दिल्ली, पंजाब, मुम्बई, इलाहाबाद, पटना, गोरखपुर सहित विभिन्न स्थानों से आये लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्यप्रेमियों ने उन्हें बेहद आत्मीयता के साथ याद किया। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही सभा में उन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया गया जिनके लिए शालिनी अन्तिम समय तक समर्पित रहीं।
शालिनी पिछले तीन महीनों से पैंक्रियास के कैंसर से जूझ रही थीं और गत 29 मार्च को दिल्ली के धर्मशिला कैंसर अस्पताल में उनका निधन हो गया था। वे केवल 38 वर्ष की थीं।
राहुल फ़ाउण्‍डेशन के सचिव सत्‍यम ने कहा कि का. शालिनी का राजनीतिक-सामाजिक जीवन बीस वर्ष की उम्र में ही शुरू हो चुका था। गोरखपुर, इलाहाबाद और लखनऊ में प्रगतिशील साहित्य के प्रकाशन एवं वितरण के कामों में भागीदारी के साथ ही शालिनी जन अभियानों, आन्दोलनों, धरना-प्रदर्शनों आदि में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती रहीं। जनचेतना पुस्तक केन्द्र के साथ ही वे अन्य साथियों के साथ झोलों में किताबें और पत्रिकाएँ लेकर घर-घर और दफ़्तरों में जाती थीं, लोगों को प्रगतिशील साहित्य के बारे में बताती थीं, नये पाठक तैयार करती थीं। गोरखपुर में युवा महिला कॉमरेडों के एक कम्यून में तीन वर्षों तक रहने के दौरान शालिनी स्‍त्री मोर्चे पर, सांस्कृतिक मोर्चे पर और छात्र मोर्चे पर काम करती रहीं। एक पूरावक़्ती क्रान्तिकारी कार्यकर्ता  के रूप में काम करने का निर्णय वह 1995 में ही ले चुकी थीं।
इलाहाबाद में जनचेतनाके प्रभारी के रूप में काम करने के दौरान भी अन्य स्‍त्री कार्यकर्ताओं की टीम के साथ वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच और इलाहाबाद शहर में युवाओं तथा नागरिकों के बीच विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक गतिविध्यिों में हिस्सा लेती रहीं। इलाहाबाद के अनेक लेखक और संस्कृतिकर्मी आज भी उन्हें याद करते हैं।
पिछले लगभग एक दशक से लखनऊ उनकी कर्मस्थली था। लखनऊ स्थित जनचेतनाके केन्द्रीय कार्यालय और पुस्तक प्रतिष्ठान का काम सँभालने के साथ ही वह परिकल्पना,’ ‘राहुल फ़ाउण्डेशनऔर अनुराग ट्रस्टके प्रकाशन सम्बन्धी कामों में भी हाथ बँटाती रहीं। अनुराग ट्रस्टके मुख्यालय की गतिविधियों, पुस्तकालय, वाचनालय, बाल कार्यशालाएँ आदि की ज़िम्मेदारी उठाने के साथ ही कॉ. शालिनी ने ट्रस्ट की वयोवृद्ध मुख्य न्यासी दिवंगत कॉ. कमला पाण्डेय की जिस लगन और लगाव के साथ सेवा और देखभाल की, वह कोई सच्चा सेवाभावी कम्युनिस्ट ही कर सकता था। 2011 में अरविन्द स्मृति न्यासका केन्द्रीय पुस्तकालय लखनऊ में तैयार करने का जब निर्णय लिया गया तो उसकी व्यवस्था की भी मुख्य जिम्मेदारी शालिनी ने ही उठायी। वह जनचेतनापुस्तक प्रतिष्ठान की सोसायटी की अध्यक्ष, ‘अनुराग ट्रस्टके न्यासी मण्डल की सदस्य, ‘राहुल फ़ाउण्डेशनकी कार्यकारिणी सदस्य और परिकल्पना प्रकाशन की निदेशक थीं। ग़ौरतलब है कि इतनी सारी विभागीय ज़िम्मेदारियों के साथ ही शालिनी आम राजनीतिक प्रचार और आन्दोलनात्मक सरगर्मियों में भी यथासम्भव हिस्सा लेती रहती थीं। बीच-बीच में वह लखनऊ की ग़रीब बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने भी जाती थीं। लखनऊ के हज़रतगंज में रोज़ शाम को लगने वाले जनचेतना के स्‍टॉल पर पिछले कई वर्षों से सबसे ज़्यादा शालिनी ही खड़ी होती थीं।
कवयित्री कात्यायनी ने उन्हें बेहद हार्दिकता से याद करते हुए कहा कि हर पल मौत से जूझते हुए शालिनी हमें सिखा गयी कि असली इंसान की तरह जीना क्या होता है। आख़िरी दिनों तक शालिनी अपनी ज़िम्मेदारियों और राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों के बारे में ही सोचती रहती थीं। अक्सर फोन पर वे साथियों को कुछ न कुछ जानकारी या सलाह दिया करती थीं। शुरू से ही उन्हें अपने से कई गुना ज़्यादा दूसरों का ख़्याल रहता था। उन्हें मालूम था कि मौत दहलीज़ के पार खड़ी है मगर मौत का भय या निराशा उन्हें छू तक नहीं गयी थी। स्वस्थ होकर ज़िम्मेदारियों के मोर्चे पर वापस लौटने में उनका विश्वास और इसे लेकर उनका उत्साह हममें भी आशा का संचार करता था।
कॉ. शालिनी एक कर्मठ, युवा कम्युनिस्ट संगठनकर्ता थीं। आज के दौर में बहुत से लोगों की आस्‍थाएं खंडित हो रही हैं, लोग तरह-तरह के समझौते कर रहे हैं, बुर्जुआ संस्‍कृति का हमला युवा कार्यकर्ताओं के एक अच्‍छे-खासे हिस्‍से को कमज़ोर कर रहा है, मगर शालिनी इन सबसे रत्तीभर भी प्रभावित हुए बिना अपनी राह चलती रहीं। एक बार जीवन लक्ष्य तय करने के बाद पीछे मुड़कर उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया। उसूलों की ख़ातिर पारिवारिक और सम्‍पत्ति-सम्‍बन्‍धों से  पूर्ण विच्छेद कर लेने में भी शालिनी ने देरी नहीं की। एक सूदख़ोर व्यापारी और भूस्वामी परिवार की पृष्ठभूमि से आकर, शालिनी ने जिस दृढ़ता के साथ पुराने मूल्‍यों को छोड़ा और जिस निष्कपटता के साथ कम्युनिस्ट जीवन-मूल्यों को अपनाया, वह आज जैसे समय में दुर्लभ है और अनुकरणीय भी।
अनुराग ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष और चित्रकार रामबाबू, आह्वान के सम्‍पादक अभिनव सिन्‍हा, आख़ि‍री दिनों में शालिनी के साथ रहीं उनकी दोस्‍त और कॉमरेड कविता और शाकम्‍भरी, जनचेतना की गीतिका, लेखिका सुशीला पुरी, नम्रता सचान, आरडीएसओ के ए.एम. रिज़वी आदि ने शालिनी के व्‍यक्तित्‍व के अलग-अलग पहलुओं को याद किया। 
भारतीय महिला फेडरेशन की आशा मिश्रा ने कहा कि शालिनी जिन मूल्यों और जिस विचारधारा के लिए लड़ती रहीं, आखिरी सांस तक उस पर डटी रहीं। छोटी उम्र में जितनी वैचारिक समझदारी, कामों के प्रति गहरी निष्ठा शालिनी में दिखती थी, इसके उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं। 
देश के अलग-अलग हिस्सों से बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एक्टिविस्टों द्वारा भेजे गये कुछ चुनिन्‍दा  शोक-संदेशों को उनके आग्रह पर उनकी ओर से पढ़ा गया। एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सांस्‍कृतिक प्रभाग के प्रमुख निनु चपागाईं ने कहा कि उनकी पार्टी के सांस्कृतिक कार्यकर्ता जनचेतना, अनुराग ट्रस्ट और राहुल फ़ाउण्डेशन के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं ताकि वे कामरेड शालिनी के अनेक दायित्वों को पूरा कर सकें। उन असंख्य लोगों के ज़रिए जिनके लिए उन्होंने क्रान्तिकारी साहित्य उपलब्ध तथा कराया तथा सांस्कृतिक संघर्ष के अनेक मोर्चों पर उनके कार्यों से आने वाले अनेक वर्षों तक परिणाम मिलते रहेंगे। 'पहल' के सम्‍पादक ज्ञानरंजन ने कहा कि हमारे सारे वैचारिक मोर्चों पर काम करते हुए शालिनी ने जो बलिदान दिया वो अपने आप में एक मिसाल है। इतने कठिन समय में ऐसा कोई और उदाहरण हमारे सामने नहीं है। साहित्‍यकार शिवमूर्ति ने अपने संदेश में कहा कि कामरेड शालिनी का निधन संघर्षशील आम जन के लिए एक अपूरणीय क्षति है। एक लम्बे समय से मैं उनके व्यक्तित्व के विभिन्न कोणों से परिचित था। उनकी मृत्यु पूर्व लिखी गयी लम्बी कविता मेरी आखिरी इच्छापढ़ने से उनके निडर और क्रान्तिकारी विचारों और दृढ़ इच्छाशक्ति का पता चलता है।
पी.यू.सी.एल. की कविता श्रीवास्तव ने शालिनी, उनके कार्यों, उनके लेखन, उनके विचार और उनके साहस को क्रान्तिकारी सलाम करते हुए कहा कि शालिनी का ब्‍लॉग मेरे जीवन में हुई कुछ सबसे अच्छी बातों में से एक है। वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि मेरे लिए शालिनी और लखनऊ में हज़रतगंज के गलियारे जनचेतना पुस्तक स्‍टॉल जैसे एक-दूसरे के पर्याय बन गये थे। शालिनी हमेशा हल्की व दोस्ताना मुस्कान से स्वागत करतीं, और नयी-पुरानी किताबों व पत्रिकाओं के बारे में बताती थीं। स्टूल पर सीधी, तनी हुई बैठी शालिनी की मुद्रा मेरे ज़ेहन में अंकित है। प्रगतिशील वसुधा के सम्‍पादक राजेन्‍द्र शर्मा ने अपने सन्‍देश में कहा कि कामरेड शालिनी ने एक साथ कई मोर्चों पर जूझते हुए जनसंघर्ष की एक व्यापक परिभाषा गढ़ी थी। उन जैसी ईमानदार साथी का इतना आकस्मिक निधन स्तब्धकारी दुर्घटना है। हमारी कतारों से एक उज्ज्वल ध्रुवतारा अस्त हो गया।
कवि नरेश सक्सेना, मलय, विजेन्‍द्र, नरेश चन्द्रकर, कपिलेश भोज, लेखक सुभाष गाताड़े, डा. आनन्द तेलतुम्बडे, चन्‍द्रेश्‍वर, वीरेन्‍द्र यादव, मदनमोहन, भगवानस्‍वरूप कटियार, प्रताप दीक्षित, शालिनी माथुर, शकील सिद्दीकी, गिरीशचन्‍द्र श्रीवास्‍तव, अजित पुष्‍कल, फिल्‍मकार फ़ैज़ा अहमद ख़ान, उद्भावना के सम्‍पादक अजेय कुमार, बया के सम्‍पादक गौरीनाथ, सबलोग के सम्‍पादक किशन कालजयी, समयान्‍तर के सम्‍पादक पंकज बिष्‍ट, जनपथ के सम्‍पादक ओमप्रकाश मिश्र, प्रो. चमनलाल, पत्रकार जावेद नकवी, दिव्‍या आर्य, डा. सदानन्‍द शाही, शम्‍सुल इस्‍लाम, मुम्‍बई के हर्ष ठाकौर, लोकायत, पुणे के नीरज जैन, सीसीआई की ओर से पार्थ सरकार, जन संस्‍कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्‍ण, जलेस के प्रमोद कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता अशोक चौधरी, वी.आर. रमण, डा. मीना काला, मोहिनी मांगलिक, हरगोपाल सिंह, नाट्यकर्मी  राजेश, डा.  साधना  गुप्‍ता सहित अनेक व्‍यक्तियों ने का. शालिनी के लिए अपने शोक-संदेशों में कहा कि उन्होंने तमाम कठिनाइयों से लड़ते हुए जिस तरह जीने की जद्दोजहद जारी रखी वह सभी नौजवानों और खासकर उन स्त्रियों के लिए एक मूल्यवान शिक्षा है जो इस देश को बेड़ियों से आज़ाद कराने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। क्रान्तिकारी आन्दोलन की दशा को ध्यान में रखते हुए, उनकी कमी को पूरा करना आसान नहीं होगा।
इस अवसर पर शालिनी के अन्तिम अवशेषों की मिट्टी पर उनकी स्मृति में एक पौधा लगाया गया।

पोस्ट स्क्रिप्ट: शालिनी भी ज़िंदगी के सभी मजे लूट सकती थी पर उसने अपने सभी सुख आराम छोड़ दिए तांकि इंसानों के रहने लायक स्वस्थ समाज का निर्माण किया जा सके। अपनी आखिरी सांस तक मौत के लिए भी चुनौती बनी रही शालिनी अभी भी ज़िंदा है। अपने साथियों, सहयोगियों के दिलों की धडकन में, उनके विचारों में, उनके संकल्पों में। वह उनके कार्यों में नजर भी आएगी। शालिनी के सपनों की चर्चा जन चेतना प्रकाशन, अनुराग ट्रस्ट और राहुल फाऊंडेशन से सबंधित राम बाबू और सत्यम से की जा सकती है। उनके फोन सम्पर्क नम्बर हैं: 0522-2786782 / 8853093555 / 8960022288 / 9910462009 


मेरी आख़ि‍री इच्‍छा



Wednesday, February 27, 2013

हड़ताल के मायने !----------------अजय स्वामी

क्या हडताल रस्म अदायगी बन गई है?
लाल झंडे के साथ कांग्रेस का तिरंगा-हड़ताल के दिन लुधियाना में माईक पर इंटक नेता गुरजीत सिंह जगपाल फोटो-रेक्टर कथूरिया 
इन्कलाब के नारे लगते दशकों गुज़र गए।नारे लगाने वाले बहुत से लोग बूढ़े हो गए और कई इस दुनिया से रुखसत भी हो गए। इन्कलाब दूर होता गया और जिस पूंजीवाद के खिलाफ आन्दोलन चलते रहे वह मजबूत होता महसूस हुआ। जिनके घर परिवार लाल झंडे को समर्पित हुआ करते थे अब उनमें से बहुत से लोगों की संतानें खुद को इन आंदोलनों से भी दूर कर चुकी हैं और इस वाद से भी। नई पीढी क्रांति के इस रास्ते और ढंग तरीके से अब निराश हुई लगती है। आखिर कौन है ज़िम्मेदार? कुछ इशारा दे रहे हैं हस्तक्षेप में अजय स्वामी। लीजिये आप भी देखिये उनका आलेख।--रेक्टर कथूरिया 
सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें किसी न किसी चुनावबाज पार्टी से जुड़ी हैं !
लेखक अजय स्वामी 
हड़ताल के मायने !अजय स्वामी
20-21 फरवरी को 11 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी हड़ताल की, जिसका मिला-जुला असर रहा। लेकिन दो दिवसीय हड़ताल ने कई सवाल हमारे सामने उपस्थित किये हैं मजदूर आन्दोलन से जुड़े ज्यादातर लोग जानते हैं कि हड़ताल मजदूरों का कारगार हथियार है इसलिये हड़ताल का इस्तेमाल सही उद्देश्य और सही ताकत के साथ किया जाना चाहिये।
आइये पहला हम मौजूद ट्रेड यूनियन आन्दोलन के उद्देश्य पर नजर डालते हैं। पिछले दो दशक से उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों का विरोध करने के उद्देश्य से केन्द्रीय ट्रेड यूनियन सालाना देशव्यापी बन्द की रस्म अदायगी करती हैं ये सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें किसी न किसी चुनावबाज पार्टी से जुड़ी हुयी हैं और इस विरोध का सबसे भद्दा मजाक यह है कि इन जन-विरोधी नीतियों को सरेआम लागू करने वाली काँग्रेस और बीजेपी से जुड़ी यूनियन भी हड़ताल में शामिल हैं वहीं मजदूरों के रहनुमाई का दावा करने वाले संसदीय वामपंथी इस नंपुसक विरोध से सरकार और पूँजीपतियों का हौसला बढ़ाने का ही काम करते हैं। असल में इस रस्म अदायगी का कुल मकसद होता है मजदूर वर्ग के आक्रोश पर पानी के छींटे मारना।
दूसरा, अगर हड़ताल में सही ताकत की बात की जाये तो श्रम मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2006 में 12 केन्द्रीय यूनियन के कुल सदस्य की संख्या 2.48 करोड़ थी। इसके अलावा सेवा संघ और स्वतंत्र यूनियन के सदस्य की संख्या जोड़ दी जाये तो ये कुल श्रमबल (46करोड़) का 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं जिसका मतलब है कि भारत के 90 प्रतिशत मजदूर ट्रेड यूनियन से जुड़े ही नहीं हैं। वहीं ये 10 प्रतिशत मजदूर भी सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों तथा निजी क्षेत्रों के कुछ बड़े उद्योगों में काम करने वाले संगाठित मजदूर हैं बाकि 90 प्रतिशत से ज्यादा असंगठित मजूदर आबादी अभी भी मजदूर आन्दोलन से जुड़ नहीं पायी है जबकि ये मजदूर सबसे अमानवीय परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं, इनके लिए कागजों पर दर्ज 260 श्रम कानून का कोई मतलब नहीं रहता है। इसलिए भारत के मजदूर आन्दोलन को सही दिशा और ताकतवर बनाने के लिए असंगठित मजदूरों को ईलाकाई और पेशों के आधार पर लामबन्द करना ही सबसे जरूरी कार्यभार में से एक हैं। (हस्तक्षेप में अजय स्वामी)
लेखक अजय स्वामी खुद भी ट्रेड यूनियन नेता हैं उनका डाक पता है 
अजय स्वामी, करावल नगर, दिल्ली

Saturday, February 23, 2013

रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की 15-वीं कांग्रेस मास्को में शुरू

23.02.2013, 15:03
दो दिन चलनेवाली कांग्रेस में 300 से अधिक डेलिगेट और 700 मेहमान
                                                                                                           Photo: RIA Novosti
आज मास्को में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की 15-वीं, जयंती कांग्रेस शुरू हुई। दो दिन तक चलनेवाली इस कांग्रेस में 300 से अधिक डेलिगेट और 700 मेहमान भाग ले रहे हैं। इस कांग्रेस में 95 विदेशी प्रतिनिधिमंडल भी उपस्थित रहेंगे।
रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गेन्नादी ज़्युगानोव ने कांग्रेस का उद्घाटन किया। आज की बैठक में कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति की राजनीतिक रिपोर्ट पेश की जाएगी। कल, रविवार को कुछ नीतिगत प्रस्ताव पारित किए जाएंगे और पार्टी के नेता पदों के लिए चुनाव होगा। कल ही केंद्रीय समिति के नए सभापतिमंडल और इसके महासचिव का चुनाव होगा। पर्यवेक्षकों के अनुसार, गेन्नादी ज़्युगानोव को ही फिर से महासचिव पद के लिए चुन लिया जाएगा। 

रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की 15-वीं कांग्रेस मास्को में शुरू