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Thursday, May 2, 2024

"कांग्रेस न तो सांप्रदायिक राजनीति करती है और न ही क्षेत्रीय राजनीति"

 गुरुवार 2 मई 2024, शाम 6:53 बजे

राजा वड़िंग के रोड शो में गैर कांग्रेसी भी उत्साह से शामिल हुए

राजा वड़िंग का शहरवासियों ने किया जोरदार स्वागत, हजारों की संख्या में पहुंचे समर्थक 


लुधियाना: 2 मई 2024: (मीडिया लिंक//कॉमरेड स्क्रीन डेस्क)::

लुधियाना में चुनावी जंग की सरगर्मी तेज हो गई है। लोग सड़कों पर निकल चुके हैं। सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन वाली भावनाओं के खिलाफ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन भी सामने आया है। कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम लोगों में भी इस मौके पर उत्साह और जोश था। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष और लुधियाना लोकसभा क्षेत्र से पार्टी उम्मीदवार अमरेंद्र सिंह राजा वड़िंग का आज यहां हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रेड कार्पेट के उत्साह जैसा  स्वागत किया।

लुधियाना शहर में प्रवेश करते ही पार्टी के वरिष्ठ नेता भारत भूषण आशु, राकेश पांडे, कैप्टन संदीप संधू, सुरिंदर डावर, संजय तलवार, कुलदीप सिंह वैद, ईश्वरजोत सिंह चीमा आदि ने उनका स्वागत किया।

लुधियाना से पार्टी के उम्मीदवार की घोषणा के बाद पहली बार शहर में वड़िंग को सुस्वागतम कहने के लिए पार्टी के झंडे और बैनर लेकर आए कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अभूतपूर्व उत्साह और जोश देखा गया।

पार्टी और पार्टी विचारधारा के वफादार कार्यकर्ताओं ने कहा कि पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष को भाजपा में शामिल होने और पार्टी को धोखा देने वाले रवनीत बिट्टू के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए लुधियाना से पार्टी का उम्मीदवार बनाना सम्मान की बात है।

उन्होंने कहा कि बिट्टू ने न केवल पार्टी को धोखा दिया है, बल्कि उन लाखों पार्टी कार्यकर्ताओं को भी धोखा दिया है, जिन्होंने 2014 और 2019 दोनों चुनावों में उन्हें वोट दिया और लगातार उनका समर्थन किया।

इस मौके पर वड़िंग ने कहा कि वह लुधियाना में अपने पहले दिन पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा दिखाए गए प्यार और स्नेह से बहुत प्रभावित हैं। खुश नजर आ रहे वारिंग ने कार्यकर्ताओं से कहा, "आपने मुझ पर जो प्यार बरसाया है, उससे मैं बहुत आभारी और धन्य महसूस कर रहा हूं।" उन्होंने कहा, “अच्छी शुरुआत का मतलब है आधी लड़ाई हार जाना। उन्होंने आश्वासन दिया कि पार्टी कार्यकर्ता इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाएंगे।

पीपीसीसी अध्यक्ष ने कहा कि पंजाब में कोई भी पार्टी कांग्रेस पार्टी जितनी लोकप्रिय नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस बीजेपी, अकाली या आम आदमी पार्टी की तरह न तो सांप्रदायिक राजनीति करती है और न ही क्षेत्रीय राजनीति।  उन्होंने कहा, ''हम सभी को साथ लेकर चलते हैं और सभी हमारा समर्थन करते हैं।

रोड शो के दौरान पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी पंजाब की सभी 13 सीटें जीतने के अपने मिशन में पूरी तरह से एकजुट है. उन्होंने कहा कि पंजाब में कांग्रेस को कहीं भी कोई चुनौती या प्रतिस्पर्धा नजर नहीं आती.

उन्होंने कहा कि एक तरफ कांग्रेस है और दूसरी तरफ अन्य लोग हैं और अगर ये सभी एक साथ भी आ जाएं तो भी हमारा मुकाबला नहीं कर सकते. गौरतलब है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकसभा चुनाव में पार्टी का समर्थन किया है लुधियाना में पार्टी कार्यकर्ता पूरी तरह से सक्रिय हैं और कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार राजा वारिंग का भी समर्थन कर रहे हैं। 

Saturday, October 29, 2022

पार्टी को उन मूल्यों का बचाव करना है जो कांग्रेस के गठन का आधार थे

29th October 2022 at 04:11 PM

भारतीय प्रजातंत्र, चुनावी राजनीति और कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव

कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों पर श्री राम पुनियानी का विशेष लेख


जो लोग सोनिया गांधी को विदेशी बताकर प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे वे ही ऋषि सुनाक के इंग्लैंड का प्रधानमंत्री निर्वाचित होने पर खुशियां मना रहे हैं-इसी लेख में से..... 

भोपाल: 29 अक्टूबर 2022:(राम पुनियानी//कामरेड स्क्रीन)::

हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राजनीति में लंबा अनुभव रखने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे निर्वाचित घोषित किए गए। इस अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित पद पर बैठने वाले वे तीसरे दलित हैं। पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करीब 24 साल बाद हुए। यह दिलचस्प है कि कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़कर, भारत में लगभग सभी पार्टियों के पदाधिकारी नामांकित होते आए हैं। अधिकांश पार्टियों पर विशिष्ट परिवारों का कब्जा रहा है। यद्यपि भाजपा, कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करती रही है परंतु भाजपा में राजनैतिक वंशों की कोई कमी नहीं है। भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसका नियंत्रण एक दूसरी संस्था - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - के हाथों में है। कांग्रेस पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह गांधी परिवार का नियंत्रण में है। हमें यह याद रखना चाहिए कि सन् 2004 में जब सोनिया गांधी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया गया था तब अनेक व्यक्तियों और दलों ने इसका जमकर विरोध करते हुए सोनिया के विदेशी मूल का होने का हवाला दिया गया था। सोनिया गांधी उस समय कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता थीं, सांसद थीं और प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार थीं। यह दिलचस्प है कि जो लोग सोनिया गांधी को विदेशी बताकर प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे वे ही ऋषि सुनाक के इंग्लैंड का प्रधानमंत्री निर्वाचित होने पर खुशियां मना रहे हैं। 

खड़गे एक ऐसे समय कांग्रेस का नेतृत्व संभाल रहे हैं जब पार्टी के समक्ष असंख्य चुनौतियां उपस्थित हैं और राजनीति के प्रांगण में विघटनकारी ताकतों का बोलबाला है।अन्य क्षेत्रों में भी भगवा विचारधारा वालों को प्राथमिकता दी जा रही है। उदाहरण के लिए विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और शिक्षकों की भर्ती का आधार उनकी विचारधारा होती है ना कि उनकी शैक्षणिक योग्यता। यह एक ऐसा समय है जब देश में कई तबके तरह-तरह की परेशानियों से घिरे हुए हैं।

वैश्विक स्तर पर भूख, प्रेस की स्वतंत्रता, प्रजातांत्रिक आजादियां, धर्म की स्वतंत्रता आदि के सूचकांकों में भारत की स्थिति गिरती ही जा रही है. आम लोगों की आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ी है. कीमतें बढ़ रही हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है और खेती से जीवनयापन करना मुश्किल होता जा रहा है। कई अंतर्राष्ट्रीय एजेसिंयों ने अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचारों के बारे में चेतावनी दी है। नरसंहारों के अंतर्राष्ट्रीय अध्येता ग्रेगोरी स्टेंटन ने भी कहा है कि भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। 

जाहिर है कि इस पृष्ठभूमि में भारत की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के समक्ष चुनौतियों का अंबार है। पार्टी को उन मूल्यों का बचाव करना है जो कांग्रेस के गठन का आधार थे।  सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के पहले देश में कई आधुनिक संस्थाएं अस्तित्व में आ चुकीं थीं। इनमें शामिल थीं बाम्बे एसोसिएशन, मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा आदि. इन सभाओं के प्रतिनिधियों की 1883 में कलकत्ता में हुई बैठक में इस बात पर जोर दिया गया था कि देश के नागरिकों की राजनैतिक मांगों को अंग्रेजों तक पहुंचाने के लिए एक राजनैतिक मंच की आवश्यकता है। इन मांगों में शामिल थीं देश का औद्योगिकरण, भू-सुधार, आईसीएस परीक्षा  केन्द्रों की भारत में भी स्थापना और प्रशासन में भारतीयों की अधिक सहभागिता।       

लार्ड ए. ओ. ह्यूम इन विभिन्न संगठनों और उनके नेतृत्व को एकसाथ लाए और राजनीति में भारतीयों की अधिक भागीदारी के लिए प्रयास करने हेतु एक संगठन बनाया। यह संगठन धर्म, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर था। समय के साथ महिलाएं भी इसमें शामिल हुईं। कांग्रेस में अध्यक्ष का पद बहुत महत्वपूर्ण था और पार्टी के अध्यक्षों में मुस्लिम (मौलाना आजाद), ईसाई (डब्लू. सी. बनर्जी) और पारसी (दादाभाई नैरोजी) शामिल थे।  इन सबके संयुक्त प्रयासों से कांग्रेस एक समावेशी मंच बन सकी। पार्टी के शुरूआती वर्षों में लोकमान्य तिलक, एम. जी. रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले आदि ने प्रजातांत्रिक मूल्यों को स्वर दिया और औपनिवेशिक शासकों की तानाशाहीपूर्ण नीतियों के विरूद्ध याचिकाएं प्रस्तुत कीं। 

परिदृश्य पर महात्मा गांधी के उभरने के साथ ही जनांदोलन शुरू हुए जिन्होंने लोगों को एक किया। अंततः इन्हीं जनांदोलनों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। महात्मा गांधी का मंत्र था कि आखिरी पंक्ति के आखिरी मनुष्य के हितों का ध्यान रखा जाए। एक तरह से उनका यह सिद्धांत कांग्रेस की नीतियों का पथ प्रदर्शक बन गया। दुर्भाग्यवश वैश्विक हालातों के चलते कांग्रेस सरकारों को ऐसी नीतियां लागू करनी पड़ीं जो निर्धन वर्गों के हितों के अनुरूप नहीं थीं। परंतु फिर भी यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकारों की नीतियां काफी हद तक जनोन्मुखी थीं. इन्हीं सरकारों के दौर में सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार जैसे क्रांतिकारी कानून बनाए गए। इस दौर में सामाजिक आंदोलनों और प्रगतिशील ताकतों को सरकार की समाज कल्याण नीतियों को आकार देने का मौका मिला।

पहचान की राजनीति की शुरूआत ने सब कुछ उलट-पलट दिया. सन् 1980 और 1986 के आरक्षण विरोधी दंगे आने वाले समय की चेतावनी थे। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद सकारात्मक भेदभाव की नीतियों का विरोध, आडवानी की रथयात्रा और उसके बाद बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के रूप में सामने आया। धर्म के आधार पर लोगों को विभाजित किया जाने लगा। गौमांस, गाय, घर वापसी, जनसंख्या संतुलन आदि मुख्य मुद्दे बन गए जिससे हमारी सांझा संस्कृति और परंपराओं पर आधारित बंधुत्व कमजोर हुआ। 

हाल में आयोजित कांग्रेस का उदयपुर सम्मेलन एक नई शुरूआत हो सकता है। इस सम्मेलन से यह आशा जागृत होती है कि शायद हमारे देश में बंधुत्व फिर से स्थापित होगा, हमारे संविधान की उद्धेश्यिका में वर्णित मूल्यों को प्रोत्साहित किया जाएगा और प्रशासनिक तंत्र में साम्प्रदायिक तत्वों की घुसपैठ को रोकने के प्रयास होंगे।

जिस समय खड़गे को अध्यक्ष चुना गया है उस समय पार्टी के एक शीर्ष नेता राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं। यह यात्रा यदि सचमुच लोगों को जोड़ सकी तो इससे गांधी, पटेल, नेहरू, सुभाष और अम्बेडकर के सपनों के भारत के निर्माण में मदद मिलेगी। इस यात्रा में जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं वे महत्वपूर्ण हैं। हमें संविधान पर बढ़ते हमलों की ओर भी ध्यान देना होगा और संविधान की समावेशी आत्मा को बचाए रखना होगा। 

नए अध्यक्ष को सिद्धांतों के आधार पर विपक्ष की एकता कायम करने पर विचार करना चाहिए। ये सिद्धांत प्रेम, सदभाव और शांति से जुड़े हो सकते हैं। विपक्षी दलों में एकता कायम करने के लिए ऐसी आर्थिक नीतियों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक होनी चाहिए जो आम लोगों के जीवन में बेहतरी लाए। हम केवल आशा ही कर सकते हैं कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में खड़गे का चुनाव और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा, विघटनकारी राजनीति की चक्की में पिस रही भारतीय जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने वाले सिद्ध होंगे। यह विघटनकारी राजनीति केवल उद्योगपतियों और साम्प्रदायिक तत्वों का भला कर रही है।     (26 अक्टूबर 2022)

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)


Sunday, April 7, 2013

देखते ही देखते यह क्या हुआ ?

कोई भी नेता भूखा-नंगा नही है
आज़ादी आने के बाद हिन्दोस्तान की राजनीती में एक ऐसा वक्त भी आया था जब सीपीएम के वरिष्ठ नेता कामरेड ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनने वाले थे। घटनाक्रम इतनी तेज़ी से घटा की सब देखते ही रह गए।  किसी वजह से पार्टी ने  उन्हें  यह पद लेने से मना कर दिया। बस पार्टी का एक आदेश और कामरेड ज्योति बसु ने  इस पद के बहुत निकट पहुँच कर तुरंत अपने कदम पीछे हटा लिए। मुझे आज सुबह ही इसकी याद दिलाई पंजाब के वरिष्ठ वामपंथी पत्रकार कामरेरमेश कौशल ने जो आजकल दैनिक पंजाब केसरी पत्र समूह के पंजाबी दैनिक जग बाणी में कार्यरत हैं। उन्होंने सवाल भी किया कि क्या आज ऐसा सम्भव है? पार्षद पद की टिकट न मिलने पर पार्टी बदल लेने या फिर बगावत करके आज़ाद खड़े होने का सिलसिला अब आम हो चूका है। राजनीती के क्षेत्र में आई  इस नैतिक गिरावट पर चर्चा कर रहे हैं पंजाब स्क्रीन के बहुत ही पुराने स्नेही कलमकार बोद्धिसत्व कस्तूरिया। आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारीं की इंतजार बनी रहेगी। ---रेक्टर कथूरिया 
प्रजातंत्र और समाजवाद का सपना
क्या इसी प्रजातंत्र और समाजवाद का सपना गाँधी और संविधान निर्माताओं ने देखा था?
समय और सत्ता परिवर्तन के साथ ही नेताओं की सोच संकुचित होती जा रही है ! देश की आज़ादी के लिये न्यौछावर होने की सामर्थ्य रखने वाले नेताओं की कमी ने इस देश के प्रजातंत्र की जडों को खोखला कर दिया है,धर्म निर्पेछ समाज वादी समाज की अवधारणा को ध्व्स्त कर दिया है ! अब धर्म निर्पेछता की चादर ओढ जातिवाद, भाई-भतीजावाद का खूनी खेल खेला जा रहा है,परिणामतः टिकट के आवंटन से लेकर मंत्री-पद आवंटन भी इससे अछूता नही रहा है !
जान की बाजी लगाने वाले नेताओं का स्थान ऐसे नेताओं ने ले लिये है जो सी०बी०आई०और जेल जाने  के भय से सत्ता पक्ष को स्वार्थ भाव से समर्थन दे रहे है,क्यों कि अपने काले कारनामों के कारण उनमे इतना मनोबल ही नही है कि वे जनहित की सोच सही निर्णय ले सकें! समाज्वाद का बिगुल बेशक बजाते हों ,दलितों की मसीहा,धरती पुत्र बेशक कहलाते हो परन्तु उनका  समाज केवल उनका परिवार और ज़्यादा से ज़्यादा उनकी बिरादरी तक ही सीमित है! नेता इतने संकीर्ण विचार-धारा के हो गये है कि जन हित मे लगने वाले धन को किसी वर्ग विशेष मे बाँट ,किसी राज्य को विशेष पैकेज देकर घाटे का बज़ट पेश करने से भी नही डरते परिणामतः हर भारतीय पैदा होने से पहले ही हज़ारो रुपयों के कर्ज़ के तहत ही इस धरा पर अवतीर्ण होता है !राज्य सरकार का कर्ज़ अलग और केन्द्र सरकार का अलग क्योंकि संविधान मे भी तो अलग -अल्ग विषयो की अलग सूची है! हाँ राज्य सकार का कर्ज़ा रुपयों मे और केन्द्र का डालर मे हो जाता है ! अभी उ०प्र० मे क्न्या शिक्षा धन बँटा,लैप-टाप बँटा,"मेरी बेटी उसका कल"मे एक -एक मुस्लिम बालिका को ३०००० हज़ार बँटे परन्तु जन सामान्य के गले पर टैक्स की रेती चला कर ! कोई सरकार चाहे वो विकास  के लिये ,सडकों की बात करे,गरीबों के लिये सस्ते भवनों की बात करे,उसका प्रतिफ़ल नेताओं को ही मिलता है परिणामतः ४-५ वर्षों मे ही उनकी पूजी ४००-५०० गुना तक बढ जाती है और सरकार का घाटा बढ कर दूना हो जाता है ,तो फ़िर विकास कैसे हो रहा है यही चिन्तन का विषय है! अरबो रुपया तो माननीयों के भवन और सुरक्षा पर खर्च हो रहा है यदि वही समाप्त कर दिया जावे तो घाटे की राज्नीति समाप्त हो सकती है,लैकिन आज वे जन सेवक की परिभाषा भूल कर राजा भैया बन गये है! यदि वे जनता के नुमाइन्दे है तो जनता से इतने भयाक्रान्त क्यो हैकि उनकी सुरक्षा के लिये दिन रात लाखों पुलिस वाले तैनात है और प्रजातंत्र मे प्रजा के लिये अपराअधियों की धर-पकड के लिये पुलिस का अकाल पड जाता है!
सताधारी कोई भी नेता भूखा-नंगा नही है ,फ़िर उन्हे इतनी मोटी-मोटी तन्खाह, भत्ते, रेल,हवाई किरायॊ मे छूट,बसों मे फ़्री पास क्यों?क्या यह धन जनता पर लगाये जाने वाले टैक्स की बर्बादी नही है ? क्या इसी प्रजातंत्र और समाजवाद का सपना गाँधी और संविधान निर्माताओं ने देखा था?

Wednesday, February 27, 2013

...तथा 'देशाभिमानी' ने उसे तुरंत प्रकाशित कर दिया


26-फरवरी-2013 19:19 IST
संसदीय कार्य मंत्री श्री कमलनाथ द्वारा राज्‍य सभा में दिया गया वक्‍तय 
हाल ही में, माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा दिए गए निर्णय, जिसे 'सूर्यानेली' प्रकरण का नाम दिया जा रहा है, के पश्‍चात एक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया के एक वर्ग तथा कुछ राजनैतिक दलों ने इस विवाद में राज्‍य सभा के उप-सभापति प्रो. पी. जे. कुरियन का नाम घसीटने की कोशिश की है। इस संबंध में, मेरा वक्‍तव्‍य निम्‍न प्रकार है:- 

यह बात जोरदार ढंग से कह गई है कि इस प्रकरण ('सूर्यानेली' प्रकरण के नाम से ज्ञात), जिसकी अपील पर पुन: सुनवाई कराए जाने के लिए इसे माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने केरल उच्‍च न्‍यायालय को वापिस लौटा दिया है, में प्रो. पी. जे. कुरियन कभी एक अभियुक्‍त नहीं रहे। 

सूर्यानेली प्रकरण 17/01/1996 में दायर किए गए एफआईआर सं. 71/96 के आधार पर शुरू हुआ जिसमें एक लड़की ने कतिपय लोगों द्वारा उस पर किए गए बलात्‍कार की शिकायत की थी। बाद में लड़की ने खुलासा किया कि 42 लोग अभियुक्‍त के रूप में सूचीबद्ध हैं। उस समय प्रो. पी. जे. कुरियन का कोई उल्‍लेख नहीं था। 

लगभग दो महीने बाद, 1996 के आम चुनाव की पूर्व संध्‍या पर उस लड़की ने यह शिकायत तत्‍कालीन मुख्‍य मंत्री श्री ए. के. एंटोनी के पास भेजी जिसमें उसने यह आरोप लगाया कि प्रो. पी. के. कुरियन भी इस प्रकरण में संलिप्‍त हैं तथा मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के मुख पत्र 'देशाभिमानी' ने उसे तुरंत प्रकाशित कर दिया। 

प्रो. कुरियन ने तुरंत इस मामले में पुलिस महानिदेशक से जांच का अनुरोध किया। उन्‍होंने, साथ ही, उस लड़की और 'देशाभिमानी' कि तत्‍कालीन मुख्‍य संपादक श्री ई. के नयनार के विरुद्ध मानहानि का नोटिस दिया। 

आरोप की जांच, एक वरिष्‍ठ आईपीएस अधिकारी, श्री राजीवन द्वारा की गई जिन्‍होंने, 30 से भी अधिक साक्षियों, दूरभाष अभिलेखों, राज्‍य कार चालक के बयान, राज्‍य कार के लॉग बुक, दूरी कथित स्‍थान तक पहुंचने के लिए लगने वाले समय, की जांच करने के बाद इस ठोस नतीजे पर पहुंचे कि ''अपराध के कथित स्‍थान तक पहुंचना प्रो. कुरियन के लिए व्‍यावहारिक दृष्टि से असंभव था'' और इसलिए प्रो. कुरियन इस अपराध में बिल्‍कुल ही संलिप्‍त नहीं हैं। जांच से यह भी निष्‍कर्ष सामने आया कि प्रो. कुरियन के विरुद्ध आरोप ''या तो वास्‍तव में एक गलती है अथवा लड़की का उपयोग उनके राजनैतिक विरोधियों द्वारा एक हथकंडे के रूप में किया जा रहा है।'' 

उसी चुनाव के दौरान लड़की के पिता ने सीबीआई की जांच कराने की मांग करते हुए उच्‍च न्‍यायालय में एक याचिका दायर की। तथापि, लोक सभा चुनावों के बाद न तो उन्‍होंने मामले को आगे बढ़ाया और न ही वे न्‍यायालय में उपस्थित हुए और इसीलिए, इस मामले को गैर अभियोजन के कारण खारिज कर दिया गया। इस बात से स्‍वाभाविक निष्‍कर्ष यह निकलता है कि वे जांच रिपोर्ट से संतुष्‍ट थे अथवा यह याचिका सिर्फ चुनावों के दौरान इस्‍तेमाल किए जाने के मकसद से दायर की गई थी। 

वाम मोर्चा के मुख्‍यमंत्री श्री ई. के. नयनार, जिन्‍होंने प्रो. कुरियन के विरुद्ध आरोप लगाए और जो अब प्रो. कुरियन द्वारा दायर किए गए अवमानना के मुकदमें में आरोपित हैं, ने पुलिस उप-महानिरीक्षक श्री सिबी मैथ्‍यू के नेतृत्‍व में जांच दल का गठन किया। विस्‍तृत जांच और सभी साक्षियों से पुन: पूछताछ करने पर यह दल इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा कि प्रो. कुरियन संलिप्‍त नहीं हैं। 

श्री नयनार ने एक अन्‍य आईपीएस अधिकारी श्री सोम सुंदर मेनन द्वारा तीसरी जांच का आदेश दिया, जिसने पूर्ण जांच की और यहां तक कि प्रो. कुरियन से अलग हो चुके कर्मचारी से भी पूछताछ के उपरांत उसी निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि प्रो. कुरियन संलिप्‍त नहीं हैं। इस बीच निचली अदालत ने प्रो. कुरियन द्वारा दायर किये गये मानहानि के मुकदमे को उनके पक्ष में चलाने के लिए स्‍वीकार किया और श्री नयनार एवं उस लड़की ने उच्‍च न्‍यायालय में अपील दायर की। 

1999 के आम चुनाव की पूर्व संध्‍या पर इस लड़की ने पुन: इसी मुद्दे पर न्‍यायालय में एक निजी शिकायत दायर की थी, जिसको प्रो. कुरियन ने चुनौती दी और मामला उच्‍चतम न्‍यायालय तक गया। उच्‍चतम न्‍यायालय ने खारिज करने के लिए इसे उपयुक्‍त मामला समझा और प्रो. कुरियन को निचली अदालत से उन्‍मोचन के लिए याचिका दायर करने का निदेश दिया। तद्नुसार, उन्‍मोचन याचिका दायर की गई जिसे निचली अदालत में स्‍वीकार नहीं किया गया, परंतु उच्‍च न्‍यायालय ने अप्रैल, 2007 में 71 पृ‍ष्‍ठों के अपने निर्णय में शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों पर विचार करने के बाद उन्‍हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। यहां इस बात का उल्‍लेख करना होगा कि स्‍वयं वाम मोर्चा सरकार द्वारा नियुक्‍त किए गए जांच अधिकारी, श्री के. के. जोशुआ, एसपी ने न्यायालय में यह लिखित वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किया कि प्रो. कुरियन इसमें शामिल नहीं हैं। उच्‍च न्‍यायालन ने समुक्ति की थी कि- 

''मुझे पता चल रहा है कि इस मामले में पेश की गई परिस्थितियों और सबूतों से यह साबित होता है‍ कि याचिकाकर्ता पर थोपा गया मामला झूठा है। यह काफी दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता को पिछले एक दशक से भी अधिक समय से कुत्सित स्‍वरूप के इस झूठे मामले के कटु अनुभव से गुजरना पड़ा है।'' 

इस निर्णय की जांच करने पर यह पता चलेगा कि उच्‍च न्‍यायालय ने निजी शिकायत का निर्णय इसके गुणागुण आधार पर किया जो सुर्यानेली मामले, जिसमें आरोपी व्‍यक्तियों को बरी कर दिया गया था, से स्‍वतंत्र रहकर दिया गया था। 

वाम मोर्चा सरकार ने अपील दायर की, परंतु उच्‍चतम न्‍यायालय ने उसे नवम्‍बर, 2007 में खारिज कर दिया और उन्‍मोचन की पुष्टि की। उच्‍चतम न्‍यायालय के निर्णय को अब तक किसी ने चुनौती नहीं दी है। वाम मोर्चा सरकार, जो उस समय सत्‍ता में थी, ने पुनर्विलोकन याचिका भी दायर नहीं की। 

इस प्रकार की धारणा बनाने की कोशिश की गई है कि कुछ नए तथ्‍य प्रकट हुए हैं। ये सभी नए तथ्‍य, विशेषकर, दोषसिद्ध व्‍यक्ति द्वारा 17 वर्ष बाद दिए गए वक्‍तव्‍य से, जिसे जांच दल के समक्ष अथवा न्‍यायालय में देने का मौका उसके पास था, उससे प्रो. कुरियन की कथित जगह पहुंचने की असंभाव्‍यता के सिद्ध तथ्‍य को चुनौती नहीं मिलती, जो टेलीफोन रिकार्ड, राज्‍य की कार के ड्राइवर सहित मुख्‍य गवाहों, राज्‍य की कार की लॉग बुक और इसमें लगने वाले समय और दूरी के आधार पर सिद्ध हु‍आ है- उक्‍त निष्‍कर्ष उपर्युक्‍त तीन जांच दलों द्वारा निकाला गया था। 

यह मामला विपक्ष द्वारा केरल विधानसभा में उठाया गया था। अभियोजन महानिदेशक और उच्‍चतम न्‍यायालय में शिकायतकर्ता लड़की का मुकदमा लड़ने वाले उच्‍चतम न्‍यायालय के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता और केरल सरकार के विधि सचिव की ओर से केरल सरकार को प्राप्‍त कानूनी राय में यह कहा गया है कि कोई मामला नहीं बनता है। (PIB)

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वि.कासौटिया/अरुण/मनोज-723

Saturday, February 23, 2013

रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की 15-वीं कांग्रेस मास्को में शुरू

23.02.2013, 15:03
दो दिन चलनेवाली कांग्रेस में 300 से अधिक डेलिगेट और 700 मेहमान
                                                                                                           Photo: RIA Novosti
आज मास्को में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की 15-वीं, जयंती कांग्रेस शुरू हुई। दो दिन तक चलनेवाली इस कांग्रेस में 300 से अधिक डेलिगेट और 700 मेहमान भाग ले रहे हैं। इस कांग्रेस में 95 विदेशी प्रतिनिधिमंडल भी उपस्थित रहेंगे।
रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गेन्नादी ज़्युगानोव ने कांग्रेस का उद्घाटन किया। आज की बैठक में कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति की राजनीतिक रिपोर्ट पेश की जाएगी। कल, रविवार को कुछ नीतिगत प्रस्ताव पारित किए जाएंगे और पार्टी के नेता पदों के लिए चुनाव होगा। कल ही केंद्रीय समिति के नए सभापतिमंडल और इसके महासचिव का चुनाव होगा। पर्यवेक्षकों के अनुसार, गेन्नादी ज़्युगानोव को ही फिर से महासचिव पद के लिए चुन लिया जाएगा। 

रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की 15-वीं कांग्रेस मास्को में शुरू