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Thursday, June 17, 2021

निडरता, प्रतिबद्धता और सादगी की मूर्ती थे कामरेड डांग

 जब पंजाब के मुख्यमंत्री को हराकर मंत्री बना था एक कामरेड

जब पंजाब में गोली का राज था उन दिनों सरकारी आतंकवाद और पुलिसिया जबर की खुलकर मुखालफत करना आसान नहीं था लेकिन कामरेड सत्यपाल डांग ने लगातार यह दलेरी भरा किया। इस विरोधता को  खुल कर व्यक्त करने वाले कामरेड डांग को उनकी बरसी पे याद करते हुए साथी  रौशन सुचान ने ऐसी बातें सामने रखीं हैं जो अब कहीं नज़र ही नहीं आतीं। आखिरी सांस तक न कामरेड डांग ने सादगी छोड़ी और न ही सिद्धांत। देखिए उन्होंने कितनी बड़ी मिसाल कायम की। 

कामरेड सत्यपाल डांग का जन्म 4 अक्टूबर 1920 को गुजरांवाला, संयुक्त पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ। अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई लाहौर में पूरी की। सत्यपाल डांग भारत के स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और कम्युनिस्ट नेता थे। पंजाब राज्य विधान सभा के चार बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी CPI की ओर से विधायक चुने गए। पंजाब में संयुक्त मोर्चा की सरकार में जस्टिस गुरनाम सिंह मुख्यमंत्री बने तो कामरेड सत्यपाल खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री बने। जो लोग आतंकग्रस्त पंजाब के उस दौर के अवाम की तरफ खड़ी शख्सियतों से रत्ती भर भी वाकिफ हैं, यकीनन उन्हें कॉमरेड सतपाल डांग का नाम बिलकुल नहीं भूला होगा। 

उन्होंने फिरकपरस्ती,आतंकवाद और सरकारी आतंकवाद के बीच अडिग खड़े रहकर निर्भीकता से अथाह संघर्ष किया। बेशक वो सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के कार्ड होल्डर थे लेकिन धुर दक्षिणपंथी आरएसएस, भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के दिग्गज भी उनका गहरा सम्मान करते थे और उनके तर्कों में आस्था रखते पाए जाते थे। भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी शामिल होकर ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) का नेतृत्व किया। सन 1998 में समाज में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया। यूं तो कामरेड डांग सम्मानों  ऊंचे उठ चुके थे।  उनका एक वशिष्ठ स्थान लोगों के दिलों में बन चुका था। फिर भी पद्म भूषण का सम्मान उनके कार्यों की शासकीय एक स्वीकृति था। 

कामरेड डांग अपने छात्र जीवन के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन  में शामिल हुए। उन्होंने शुरू में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वामपंथी विंग में काम किया लेकिन बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की बॉम्बे शाखा में 1940 में  एक सक्रिय कार्यकर्ता बनकर आज़ादी आंदोलन में भी भाग लिया।  केवल 25 वर्ष की युवा आयु में मुंबई में 1943 को देश के प्रथम छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव बने और प्रथम पार्टी कांग्रेस में भाग लिया। सन 1952 में AISF की छात्रा नेत्री बिमला से शादी की। 

भारतीय स्वतंत्रता के बाद कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जब प्रतिबंध हटा लिया गया तो डांग दंपति को पार्टी ने अमृतसर क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी। सत्यपाल डांग अमृतसर के पास एक गांव छेहरटा साहिब में बस गए और 1953 में हुए पहले स्थानीय चुनाव में छेहरटा नगर पालिका के अध्यक्ष बने। लोगों के साथ जुड़ कर लोगों के लिए सत्ता के सदुपयोग का यह महत्वपूर्ण पायदान था।  

अगले डेढ़ दशक तक डांग छेहरटा साहिब की स्थानीय राजनीति से जुड़े रहे, कई बार नगरपालिका का नेतृत्व करते हुए एक मॉडल टाउन की तरह विकसित करने के लिए काम किया। सन 1967 में उन्हें पार्टी द्वारा राज्य विधानसभा के चुनावों में भाग लेने के लिए कहा गया और उन्होंने अमृतसर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से सफलतापूर्वक चुनाव लड़कर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर को भारी मतों से हराया। 

संयुक्त मोर्चे को पंजाब में बहुमत मिला और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार में शामिल हुई। जस्टिस गुरनाम सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने तो डांग खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री  बने।  उन्होंने मंत्री के बंगले का उपयोग करने से इनकार कर दिया और मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान एमएलए छात्रावास में रहना पसंद किया। उन्होंने 1969, 1972 और 1977 में हुए अगले तीन विधान सभा चुनावों में इस सीट को बरकरार रखा लेकिन 1980 के चुनाव में सेवा राम अरोड़ा से हार गए, लेकिन उनकी पत्नी बिमला डांग 1982 में फिर से सीट हासिल कर सकीं।

वर्ष 1980 के दशक में पंजाब में खालिस्तान आंदोलन हुआ तो डांग अलगाववाद और सरकारी ज़ुल्म दोनों का बराबर विरोध करते रहे। आतंकवादियों ने उन्हें अपनी हत्यारी हिटलिस्ट में शिखर पर रखा तो हुकूमत भी उनसे खौफज़दा रहती थी। ऐसे रहनुमा विरले ही हुए हैं जिनका समूचा जीवन सियासतदानों के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने दो पुस्तकें भी प्रकाशित कीं, पंजाब में आतंकवाद, राज्य धर्म और राजनीति। पंजाब और कश्मीर की राजनीति के संदर्भ में धर्म और राजनीति पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट। सतपाल डांग आतंकवाद के काले साए वाले पंजाब के सही मायनों में लोकनायक थे। साहस की अद्भुत जिंदा इबारत। 

इसी बीच सूबे में हिंसक अलगाववादियों ने पैर पसारने शुरू किए थे तो उसी वक्त सतपाल डांग ने उन्हें बेखौफ ललकारना शुरू किया था और पंजाबी समाज पर भविष्य में आने वाले खतरों से आगाह करना भी ज़रूरी समझा। वह पहले सियासतदान थे जिन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि हत्या, असहिष्णुता और सांप्रदायिकता की नीतियों पर चलने वालों को तत्काल नहीं रोका गया तो यह भस्मासुर बन जाएंगे और भारतीय राज्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती। इतिहास गवाह है कि ऐसा ही हुआ। आतंकियों ने उन्हें अपनी हिटलिस्ट में तभी शुमार कर लिया था।

खतरे के मद्देनजर पुलिस और सुरक्षाबलों ने उन्हें तगड़ी सुरक्षा-छतरी मुहैया करवाई लेकिन वह इस सबसे बेपरवाह रहे। अलबत्ता इन पंक्तियों को लिखने वाले पत्रकार से बातचीत में उन्होंने इतना जरूर कहा था कि जानबूझकर फिरकापरस्त तत्वों के हाथों मर जाना समझदारी नहीं है बल्कि ज़िंदा रह कर और मस्तिष्क का इस्तेमाल करके लोकहित में उनका मुकाबला अपरिहार्य है। 

बहुतेरे राजनेता तब भी हासिल सुरक्षाा व्यवस्था को घमंडी तमाशे तथा रौब-दाब का जरिया माना करते थे। जीवन भर कॉमरेड डांग के पास खुद का कोई वाहन नहीं रहा। कभी था तो एक साइकिल। बावजूद इसके कि पंजाब सरकार में प्रभावशाली महकमे के मंत्री रहे और दशकों नगर पालिका की अगुवाई की। पहले-पहल उनकी हिफाजत सुनिश्चित करने का ऑर्डर लेकर उनके यहां गए सुरक्षाकर्मी हैरान रह गए कि जिस शख्स को उन्हें ‘गॉर्ड’ करना है, उसके पास अपना कोई निजी वाहन तक नहीं।

बाद में उन्हें समझ आया कि कॉमरेड ‘अति विशिष्ट’ तो हैं लेकिन सरकारी अर्थों वाले ‘वीवीआइपी’ कतई नहीं। सतपाल डांग और उनकी पत्नी कॉमरेड विमला डांग पहले से अंतिम दिन तक सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी जीप में पीछे बैठते रहे। तब भी जब उन्हें रोजाना सौ के करीब जानलेवा धमकियों की चिट्ठियां मिलती थीं और बीसियों फोन आते थे। फोन के करीब होने पर हर कॉल वह खुद सुनते थे। हर धमकी के जवाब में वह कहा करते थे कि खौफजदा करके उन्हें खामोश करना नामुमकिन है। हर खत का जवाब देना उनकी फितरत थी। लेकिन धमकी-पत्रों का जवाब इसलिए नहीं दे पाते थे कि प्रेषक-पता गायब होता था। हालांकि ऐसे बेनामी पत्रों का जवाब वह अखबारों मे लेख लिखकर या सार्वजनिक मंचों से भाषणों के जरिए दिया करते थे। 
सतपाल डांग ऐसे विलक्षण नेता थे जो हर हत्याकांड के बाद मौके पर सपत्नीक पहुंचते थे। खतरा और मौसम कैसा भी हो। दिन हो या रात। यह सिलसिला नहीं टूटा। कभी-कभी एक घटनास्थल से लौटकर छर्हटा, अमृतसर स्थित अपने आवास पहुंचते तो दूसरी किसी वारदात की खबर मिल जाती। उसी वक्त उधर के लिए कूच कर देते। शेव का समय नहीं मिल पाता था, इसलिए दाढ़ी रख ली। पंजाब में आतंकवाद के दौर में सामुदायिक तनाव नहीं फैला तो इसके पीछे डांग दंपति की इन ‘शोक-यात्राओं’ का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसा कोई दूसरा सियासतदान न तब था, न अब है जो पीड़ित लोगों के बीच इतना ज्यादा विचरा हो। जख्मों पर मरहम लगाने के लिए।

उन्होंने सरकारी आतंकवाद और पुलिसिया जबर की भी खुलकर मुखालफत की। जमकर बोले और लिखा। उनका मानना था कि आतंकवाद किसी भी लिबास में हो, निंदनीय और अस्वीकार्य है। सीपीआई की एक कार्यकर्ता अमृतसर के करीब ग्रामीण इलाके के सरकारी अस्पताल में नर्स थी। पुलिस एक नौजवान की देह लेकर आई कि यह आतंकवादी है, मुठभेड़ में मारा गया, पोस्टमार्टम किया जाए। एसएचओ दो घंटे के बाद रिपोर्ट लेने आने की बात कहकर चला गया। मौके के डॉक्टर ने पाया कि नौजवान की सांसें चल रही थीं। पोस्टमार्टम की बजाए इलाज शुरू हो गया। सीपीआई कार्यकर्ता नर्स ने अस्पताल के फोन से कॉमरेड डांग को घटना की बाबत बताया।

उसी वक्त डांग साहब ने टेलीग्राम और फोन के जरिए अपनी इस आशंका के साथ राज्यपाल (पंजाब में तब राष्ट्रपति शासन था), हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अमृतसर के पुलिस- प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित किया कि कहीं पुलिस उस नौजवान को मार न दे। आधी रात का समय था। किसी ने तत्काल गौर नहीं किया और उधर थानेदार अस्पताल में पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा ‘शव’ लेने आ गया। कथित आतंकी नौजवान को जिंदा पाकर उसने उसी वक्त अपनी रिवाल्वर की तमाम गोलियां जिंदा बचे नौजवान की छाती में उतार दीं और अस्पताल स्टाफ से पोस्टमार्टम करने को कहा। यह एक हौलनाक असाधारण घटना थी। सतपाल डांग ने ‘सिस्टम’ के खिलाफ मोर्चा खोला और कई ख्यात अखबारों में इस प्रकरण पर लिखा।

अंग्रेजी दैनिक ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित उनकी टिप्पणी का हाईकोर्ट ने गंभीर संज्ञान लिया और न्यायिक आदेश की हिदायत जारी की। शायद देश में यह अपने किस्म का पहला मामला था कि किसी अखबारी लेख या रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च अदालत कार्यवाही करे। बाद में ऐसे कितने ही मामले हुए। सतपाल डांग जहां विपथगा आतंकवादियों के मुकाबिल थे वहीं सरकारी आतंकवाद का भी उन्होंने डटकर विरोध किया। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के लिए दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि, ‘एक किस्म का आतंकवाद दूसरे किस्म के आतंकवाद बल देता है।’ उन दिनों पंजाब में इतनी तार्किकता और मुखरता से बोलने वाले इक्का-दुक्का ही थे।

डांग दंपति ने लोक प्रतिबद्धता के चलते संतान उत्पत्ति नहीं की। निजी जायदाद नहीं बनाई। सतपाल डांग पंजाब की संयुक्त सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री थे। राजधानी चंडीगढ़ से अमृतसर आने-जाने के लिए बस में सफर करते थे। वह खुद और उनकी पत्नी कई बार विधायक रहीं। दोनों को जो वेतन, भत्ते और पेंशन मिलती थी, उसे वे पार्टी (सीपीआई) को दे देते थे। फिर पार्टी उस पैसे में से उन्हें गुजारा-भत्ता देती थी, जिसे वामपंथी पार्टियों में ‘मिनिमम वेज’ कहा जाता है। इस दंपति को यों ही ‘दरवेश सियासतदान’ नहीं कहा जाता!                                   

सतपाल डांग महज सियासतदान ही नहीं थे बल्कि आला दर्जे के चिंतक, विद्वान और लेखक भी थे। भारत सरकार ने उन्हें नागरिक सम्मान पद्म भूषण से 1998 में सम्मानित किया।   15 जून 2013 को 92 साल की उम्र में उनके भतीजे के अमृतसर घर में निधन हो गया

-रोशन सुचान

यदि आपके पास भी  इसी तरह की यादें संभाली हुई हों तो उन्हें आज  प्रकाशनार्थ प्रेषित करें। 

Email इस प्रकार है- medialink32@gmail.com


Friday, December 27, 2019

डिटेंशन सेंटर क्या होते हैं

National Communist Party की Wall से साभार  26 दिसंबर 2019 को सुबह 7:03 पर पोस्ट किया 
जानिए डिटेंशन सेंटर का इतिहास
यह तस्वीर Refugee History से साभार  जोड़ी गई है 
सोशल मीडिया:27 दिसंबर 2019:(नैशनल कम्युनिस्ट पार्टी की Wall ):: 
रिसर्च डेस्क. डिटेंशन सेंटर (हिरासत केंद्र) सुर्खियों में हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में दिए इंटरव्यू में कहा कि, डिटेंशन सेंटर बनाए जाना एक सतत प्रक्रिया है। अगर कोई विदेशी नागरिक पकड़ा जाता है, तो उसे डिटेंशन सेंटर में ही रखा जाता है। दुनिया में डिटेंशन सेंटर का इतिहास बहुत पुराना है। कहीं इन्हें नजरबंदी शिविर, कहीं यातना केंद्र, कहीं इमिग्रेशन डिटेंशन सेंटर तो कहीं कंसन्ट्रेशन कैंप कहा जाता है। नाजी कंसन्ट्रेशन कैंप यहूदियों को यातना देने के लिए जाने गए तो चीन के शिविर उइगर मुस्लिमों को वहां रखने से चर्चा में आए। जानिए डिटेंशन सेंटर का इतिहास। 
डिटेंशन सेंटर क्या होते हैं
डिटेंशन सेंटर (हिरासत केंद्र) ऐसे ठिकाने होते हैं, जहां अवैध विदेशी नागरिकों को रखा जाता है। भारत के दि फॉरेनर्स एक्ट के सेक्शन 3(2)(सी) के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार है कि, वह किसी भी अवैध नागरिक को देश से बाहर निकाल सकती है। देश से बाहर करने की प्रॉसेस के दौरान ऐसे लोगों को डिटेंशन सेंटर में ही रखा जाता है।
फ्रांस में शुरू हुआ दुनिया का पहला डिटेंशन सेंटर
यूएस के फ्रीडमफॉरइमिग्रेंट्स के मुताबिक, दुनिया का पहला इमिग्रेशन डिटेंशन सेंटर (जो सिर्फ अवैध नागरिकों को रखने के मकसद से ही तैयार किया गया था) 1892 में यूएस के न्यू जर्सी में शुरू किया गया। जिसका नाम एलिस आइलैंड इमिग्रेशन स्टेशन था। 
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के मुताबिक, फ्रांस में 17वीं और 18वीं सदी में बेसिले नामक जगह पर बने किले को हिरासत केंद्र के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। आठ टावरों वाला यह किला चारों तरफ से दीवार से घिरा हुआ था। फ्रांस के राजा चार्ल्स पंचम द्वारा 22 अप्रैल 1370 को इसका निर्माण कार्य शुरू करवाया गया था।
जिसमें पड़ोसी देशों से आए अप्रवासियों और युद्धबंदियों को रखा जाता था। इसे बेसिले सैंट-एंटोनी के नाम से भी जाना जाता है। 17वीं शताब्दी में कार्डिनल डे रिचर्डेल ने पहली बार बेसिले को जेल के तौर पर इस्तेमाल किया था। 
दिलचस्प बात यह है कि इस डिटेंशन को बनाने वाले वास्तुकार ह्यूगेज ऑब्रिअट को भी इसी जगह पर नजरबंद करके रखा गया था। बाद में इस सेंटर को एक जेल बना दिया गया था। विशाल किले की तरह नजर आने वाले इस सेंटर में आठ टॉवरों के नाम थे- लॉ शैपेल, ट्रेसोर, कोमे, बिजिनरे, बेर्टाडिएरे, लिबर्टे, पुटिस और कॉइन। 16वीं सदी में इस जगह को तेजी से विकास हुआ।
इसके पास ही आधुनिक पेरिस शहर की नींव पड़ी और 17वीं सदी के शुरुआत तक यहां पर ढाई लाख लोग बस गए थे जो कि उस दौर के यूरोप की सबसे घनी बसाहट में से एक बन गया था।
यूएस में सबसे ज्यादा डिटेंशन सेंटर
1892 में दुनिया का पहला इमिग्रेशन डिटेंशन केंद्र 'एलिस आइलैंड' यूएस के न्यू जर्सी में खोला गया। 
1910 में यूएस के कैलिफोर्निया में दूसरा इमिग्रेशन डिटेंशन केंद्र 'एंजल आइलैंड इमिग्रेशन स्टेशन' शुरू हुआ। 
1970 में यूरोप का पहला डिटेंशन सेंटर 'हार्डमंडवर्थ डिटेंशन सेंटर' इंग्लैंड में शुरू हुआ। 
1982 में साउथ अफ्रीका में देश का पहला इमिग्रेशन डिटेंशन सेंटर शुरू हुआ। पहले यहां जेल में ही इमिग्रेंट्स को रखा जाता था। अफ्रीका में इस तरह का यह पहला सेंटर था। 
2002 में क्यूबा में अमेरिका द्वारा अमेरिकी सैनिक अड्डे ग्वांतानामो बे को स्थापित किया गया। इस जगह को पहले पहले इमिग्रेशन डिटेंशन साइट के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता था। 
2012 में इजरायल ने 10 हजार की क्षमता वाला होलोट डिटेंशन सेंटर शुरू किया। 
2014 में यूएस में ओबामा प्रशासन ने फैमिली डिटेंशन को शुरू किया। नवंबर 2016 में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद वहां निजी जेल उद्योग के स्टॉक्स में बढ़ोत्तरी हुई। यूएस में ओबामा प्रशासन के दौरान 3 मिलियन से ज्यादा लोगों को देश से बाहर निकाला गया।
इतिहास के पन्नों से तीन यातना केंद्रों की कहानी
9 लाख से ज्यादा यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया था
नाजी कंसन्ट्रेशन कैंप यहूदियों को यातना देने के लिए स्थापित किए गए थे। यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम के मुताबिक, जर्मनी ने आश्विच कंसन्ट्रेशन कैंप में ही 9 लाख 60 हजार यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया था। इतना भयंकर नरसंहार दुनिया में कहीं नहीं हुआ। कैंप में 7 हजार भूख से तड़पते कैदी जिंदा पाए गए थे। कैंप में बंद किए गए लाखों लोगों के जूतों, कपड़ों का अंबार यहां मिला था। 6500 किलो बाल मिले थे। 2013 में सामने आए एक शोध से पता चला था कि, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में 42 हजार से ज्यादा नाजी कैंप थे। अमेरिकी इतिहासकार मार्टिन डीन ने 2013 को डॉयचे वेले को दिए इंटरव्यू में कहा था कि, पूरे यूरोप में हजारों लोगों को नाजियों ने जबरदस्ती यातना शिविरों में भेजा। बंदियों का उत्पीड़न किया जाता था। लोग भुखमरी के शिकार थे। गैस चैम्बर में दम घोंटकर सामूहिक नरसंहार के मामले भी सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 30,000 कैंप केवल बंधुआ मजदूरों के लिए थे। इनके अलावा 1,150 शिविर यहूदियों के लिए थे, 980 यातना शिविर थे, 1,000 शिविर युद्ध कैदियों के लिए और 500 कैंप ऐसी महिलाओं के लिए थे जिन्हें देह व्यापार करने पर मजबूर किया गया।
दुनिया का नर्क कही जाती है अमेरिका की बनाई ग्वांतानामो बे
क्यूबा स्थित ग्वांतनामो बे को सबसे खतरनाक जेल कहा जाता है। डायचे विले की एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्वांतानामो बे के कैदियों के लिए गर्मी के मौसम में तापमान और बढ़ा दिया जाता है, सर्दियों में खून जमा देने वाले हालत पैदा कर दिए जाते हैं और कंबल छीन लिए जाते हैं। कंटीले तारों और टूटे हुए शीशे से शरीर गोदा जाता है और कभी कभी सिगरेट से बदन दाग दिया जाता है। यातना का ऐसा स्तर कम से कम किसी जेल में नहीं देखा गया है।मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे धरती का नर्क बताते हैं और कहते हैं कि मीडिया और वकील को तो छोड़िए, वहां तक आम सैनिक भी नहीं पहुंच सकता किसी जमाने में क्यूबा और हैती से आने वाले शरणार्थियों को ग्वांतानामो बे के नौसैनिक अड्डे पर इसी डिटेंशन सेंटर में रखा जाता था। बाद में इसका इस्तेमाल अफगानिस्तान और इराक युद्ध के खतरनाक कैदियों को रखने के लिए किया जाने लगा।
चीन में 10 लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिम नजरबंद, इन पर हर तरह का प्रतिबंध
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पैनल के मुताबिक इस बात की विश्वसनीय रिपोर्ट्स हैं कि चीन ने 10 लाख उइगर मुसलमानों को खुफिया शिविरों में कैद कर रखा है। अमेरिकी सरकार का आकलन है कि अप्रैल, 2017 से चीन में उइगुर, कजाक और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों के 8 लाख से 20 लाख सदस्यों को नजरबंदी शिविरों में अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन शिविरों में नमाज सहित अन्य धार्मिक रीतियों पर प्रतिबंध है। चीन सरकार उइगरों की मस्जिदें तोड़ रही है। बच्चों को माता-पिता से अलग किया जा रहा है। कुछ शोधकर्ताओं ने इसे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ बताया है। हाल में अमेरिका ने उइगरों के साथ अमानवीयता को लेकर चीन के अधिकारियों को वीजा देने पर रोक लगा दी थी।