On Saturday 18th July 2026 at 22:37 WhatsApp Regarding Nationalisation of Banks By M S Bhatia
सार्वजनिक बैंकिंग की विरासत और आज की चुनौतियाँ
लुधियाना से बैंकिग इंडस्ट्री से रिटायर हुए मनिंदर सिंह भाटिया की कलम से

AI image Regarding Banks Nationalisation
इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं, जो केवल किसी समय की सरकार की नीति नहीं होते, बल्कि पूरे राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक दिशा को नया मोड़ देते हैं। 19 जुलाई 1969 को देश के 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण ऐसा ही एक ऐतिहासिक निर्णय था। इसने भारतीय बैंकिंग को बड़े औद्योगिक घरानों और शहरी व्यापारिक हितों की सीमाओं से निकालकर किसानों, मज़दूरों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण जनता के विकास से जोड़ा।
1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसमें बैंकिंग सेवाएँ मुख्यतः शहरों और बड़े व्यापारिक केंद्रों तक सीमित थीं। देश की अधिकांश आबादी—किसान, खेत मज़दूर, कारीगर और छोटे व्यापारी—औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर थी। उनकी ऋण आवश्यकताएँ साहूकारों और महाजनों से पूरी होती थीं, जो अत्यधिक ब्याज वसूलकर उनकी आर्थिक मजबूरी का शोषण करते थे।
स्वतंत्र भारत के सामने इसलिए एक बुनियादी प्रश्न था—क्या बैंकिंग व्यवस्था केवल निजी लाभ कमाने के लिए काम करेगी या उसे राष्ट्रीय विकास और सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जाएगा?
सामाजिक नियंत्रण का अधूरा प्रयोग
1960 के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया था कि निजी वाणिज्यिक बैंक देश की विकास संबंधी जरूरतों के अनुरूप अपनी ऋण नीति में आवश्यक परिवर्तन नहीं कर रहे थे। कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर व्यवसायों और ग्रामीण क्षेत्रों को संस्थागत ऋण बहुत सीमित मात्रा में मिलता था, जबकि बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक ऋण का बड़ा हिस्सा प्राप्त होता था।
इस असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 1967–68 में बैंकों पर “सामाजिक नियंत्रण” की नीति लागू की। इसका उद्देश्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना नहीं, बल्कि उनकी ऋण नीतियों को राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना था।
इस नीति के अंतर्गत बैंक निदेशक मंडलों में कृषि, लघु उद्योग, सहकारिता और अन्य जनहितकारी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रयास किया गया। आशा थी कि इससे बैंक ऋण का वितरण अधिक संतुलित होगा और जनता की जमा पूँजी का उपयोग व्यापक सामाजिक हित में किया जा सकेगा।
लेकिन यह प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया। बैंकों का स्वामित्व और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति निजी हाथों में ही बनी रही। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की ओर ऋण प्रवाह में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया। इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि केवल नियम बनाकर निजी स्वामित्व वाली बैंकिंग व्यवस्था के चरित्र को नहीं बदला जा सकता।
सामाजिक नियंत्रण राष्ट्रीयकरण का विकल्प सिद्ध नहीं हुआ; बल्कि उसकी असफलता ने बैंक राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया।
राष्ट्रीयकरण की माँग और जन आंदोलन
बैंक राष्ट्रीयकरण का निर्णय अचानक नहीं लिया गया था। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा ट्रेड यूनियनों, बैंक कर्मचारियों और वामपंथी दलों का आंदोलन भी था। कम्युनिस्ट आंदोलन ने बैंकिंग संसाधनों को बड़े औद्योगिक घरानों के नियंत्रण से निकालकर राष्ट्रीय विकास के लिए इस्तेमाल करने की माँग प्रमुखता से उठाई।
सांसद और प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता ए. के. गोपालन ने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार बैंक राष्ट्रीयकरण की माँग के समर्थन में लाखों लोगों के हस्ताक्षर एकत्र किए गए। इन हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापनों के बड़े-बड़े बंडल दिल्ली लाकर संसद के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
यह कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कई महीनों तक चला व्यापक जन अभियान था। इस आंदोलन ने बैंकिंग व्यवस्था के निजी चरित्र और बड़े पूँजीपति घरानों के साथ उसके संबंधों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया।
19 जुलाई 1969 का ऐतिहासिक फैसला
19 जुलाई 1969 की मध्यरात्रि को भारत सरकार ने अध्यादेश जारी करके ₹50 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। बाद में संसद ने इस निर्णय को कानूनी स्वीकृति प्रदान की।
राष्ट्रीयकृत किए गए बैंकों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनाइटेड कमर्शियल बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, देना बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, सिंडिकेट बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र शामिल थे।
इस निर्णय ने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का चरित्र बदल दिया। पहली बार स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया गया कि बैंक केवल निजी लाभ कमाने वाली व्यावसायिक संस्थाएँ नहीं हैं। जनता की बचत को एकत्र करके उसे कृषि, लघु उद्योग, ग्रामीण विकास, स्वरोज़गार और कमजोर वर्गों की आर्थिक उन्नति की ओर ले जाना भी बैंकिंग व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
उस समय कुछ औद्योगिक घरानों और अर्थशास्त्रियों ने बैंक राष्ट्रीयकरण का विरोध किया। उनका तर्क था कि सरकारी नियंत्रण से बैंकों की कार्यकुशलता प्रभावित होगी और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। इसके विपरीत राष्ट्रीयकरण के समर्थकों का कहना था कि भारत जैसे विकासशील देश में बैंकिंग को पूरी तरह बाज़ार और निजी लाभ की शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
बैंकिंग को गाँवों और आम जनता तक पहुँचाना
राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र की प्राथमिकताएँ बदल गईं। इससे पहले बैंक मुख्य रूप से बड़े शहरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और औद्योगिक घरानों पर केंद्रित थे। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में हजारों नई बैंक शाखाएँ खोली गईं।
करोड़ों किसान, खेत मज़दूर, छोटे दुकानदार, कारीगर और स्वरोज़गार करने वाले लोग पहली बार औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। यह केवल शाखाओं की संख्या बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाने की प्रक्रिया थी।
हरित क्रांति के दौरान सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, ट्रैक्टर तथा अन्य कृषि उपकरणों के लिए बैंक ऋण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छोटे और कुटीर उद्योगों को भी संस्थागत वित्तीय सहायता मिलने लगी।
इसी दौर में प्राथमिकता क्षेत्र ऋण की नीति विकसित हुई। इसके अंतर्गत बैंकों को कृषि, लघु उद्योग, शिक्षा, आवास, स्वरोज़गार और समाज के कमजोर वर्गों को ऋण देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बैंकिंग को केवल लाभ कमाने की गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का माध्यम माना गया।
इस परिवर्तन में बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने दूर-दराज़ के इलाकों में शाखाएँ स्थापित कीं, लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित किया और बैंकिंग सेवाओं को आम नागरिकों तक पहुँचाया। आज जिस वित्तीय समावेशन की चर्चा की जाती है, उसकी वास्तविक नींव इसी दौर में रखी गई थी।
1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण
बैंक राष्ट्रीयकरण का दूसरा चरण 1980 में आया, जब ₹200 करोड़ या उससे अधिक जमा राशि वाले छह और प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इनमें आंध्रा बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, न्यू बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब एंड सिंध बैंक और विजया बैंक शामिल थे।
इसके बाद देश के लगभग 91 प्रतिशत बैंकिंग कारोबार पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण स्थापित हो गया। बैंकिंग का विस्तार शहरों से गाँवों तक हुआ और गरीब किसानों तथा छोटे व्यापारियों की साहूकारों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया गया।
राष्ट्रीयकरण की सफलता का मूल्यांकन केवल बैंकों के लाभ से नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने कितने लोगों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ा, कितने गाँवों में वित्तीय सेवाएँ पहुँचाईं और देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में कितना योगदान दिया।
उदारीकरण के बाद की बैंकिंग: नई चुनौतियाँ और सार्वजनिक बैंकों की भूमिका
1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित नई आर्थिक नीति अपनाई। बैंकिंग क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव किए गए। नए निजी बैंकों को लाइसेंस मिले, विदेशी बैंकों का विस्तार हुआ और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया।
इन परिवर्तनों से बैंकिंग तकनीक, डिजिटल भुगतान, ग्राहक सेवा और संचार व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार हुए। लेकिन इसके साथ एक पुराना प्रश्न फिर सामने आया—क्या बैंकिंग का उद्देश्य केवल अधिक लाभ कमाना है या उसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए?
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आज भी कृषि, शिक्षा, छोटे उद्योगों, स्वयं सहायता समूहों और कमजोर वर्गों को ऋण देने की प्रमुख जिम्मेदारी निभाते हैं। निजी बैंक स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों और ग्राहकों को अधिक प्राथमिकता देते हैं, जहाँ व्यावसायिक लाभ की संभावना अधिक होती है।
हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि बड़े बैंक अधिक मजबूत, पूँजी-संपन्न और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनेंगे। दूसरी ओर सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण की कोशिशों ने उनकी सामाजिक भूमिका के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं।
एनपीए और बड़े कर्जदारों का सवाल
भारतीय बैंकिंग की एक बड़ी समस्या गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की है। लेकिन इस समस्या को केवल सार्वजनिक बैंकिंग की विफलता बताना उचित नहीं होगा। बड़े औद्योगिक घरानों को दिए गए ऋणों का न लौटना, जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले बड़े कर्जदारों पर कमजोर कार्रवाई तथा कानूनी वसूली प्रक्रिया में देरी भी इस संकट के प्रमुख कारण हैं।
छोटे किसान या सामान्य ऋणधारक पर वसूली के लिए तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन हजारों करोड़ रुपये का ऋण न लौटाने वाले बड़े कर्जदार कई बार व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। इसलिए बैंकिंग सुधारों की वास्तविक दिशा बड़े कर्जदारों की जवाबदेही, पारदर्शी ऋण वितरण और प्रभावी वसूली तंत्र की स्थापना होनी चाहिए।
सार्वजनिक बैंकों की आज भी जरूरत
आज भी जनधन खाते खोलने, किसानों को ऋण देने, पेंशन और सरकारी सहायता पहुँचाने, स्वयं सहायता समूहों को वित्त उपलब्ध कराने तथा आर्थिक संकट के समय सरकारी नीतियों को लागू करने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक बैंकों ने राहत योजनाओं, ऋण सहायता और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे एक बार फिर स्पष्ट हुआ कि संकट के समय केवल लाभ आधारित बैंकिंग व्यवस्था समाज की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती।
सार्वजनिक बैंकों की कमियों को दूर करना आवश्यक है। उनमें पारदर्शिता, पेशेवर दक्षता, जवाबदेही और तकनीकी क्षमता बढ़नी चाहिए। राजनीतिक हस्तक्षेप तथा गलत ऋण वितरण पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन कमियों का समाधान निजीकरण नहीं है।
निष्कर्ष
19 जुलाई 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था। यह भारत की आर्थिक सोच में आया ऐतिहासिक परिवर्तन था, जिसने बैंकिंग व्यवस्था को बड़े व्यापारिक और औद्योगिक हितों की सीमाओं से निकालकर गाँवों, किसानों, छोटे उद्योगों और आम जनता से जोड़ा।
आज बैंकिंग क्षेत्र तकनीक, प्रतिस्पर्धा और नई आर्थिक परिस्थितियों के कारण तेजी से बदल रहा है। फिर भी सार्वजनिक बैंकों की सामाजिक जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी राष्ट्रीयकरण के समय थी।
वास्तविक चुनौती पुराने मॉडल पर आँख बंद करके लौटने या पूरी तरह निजीकरण की राह अपनाने की नहीं है। आवश्यकता ऐसी बैंकिंग व्यवस्था की है, जो कार्यकुशलता और पारदर्शिता को सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ सके।
इतिहास सिखाता है कि जब वित्तीय संस्थाएँ जनता से दूर हो जाती हैं, तो वे अपना वास्तविक उद्देश्य खो देती हैं। लेकिन जब बैंकिंग व्यवस्था समाज और उसकी आवश्यकताओं से जुड़ी रहती है, तब वह राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बनती है।

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