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Wednesday, February 4, 2026

मज़दूरों के दिल दिमाग में बसा रहता है यह नारा

बॉलीवुड से भी गहरा रिश्ता है इस नारे का 

लुधियाना: 3 फरवरी 2026: (मीडिया लिंक टीम//कामरेड स्क्रीन डेस्क)::


"हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है"
बहुत दिलचस्प कहानी है इस नारे की भी। इस नारे ने कई बार इतिहास रचा है। वास्तव में यह नारा मशहूर शायर जनाब शैलेंद्र द्वारा रचित एक क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन का नारा है। बुझ गए निराश दिलों में यह नारा एक नया जोश भर देता है। यह नारा दमन, शोषण और मँहगाई के खिलाफ एकजुटता और संघर्ष का एक ऐसा ज़ोरदार प्रतीक भी है जिसे संघर्षशील लोगों ने हमेशां याद रखा। जब जब भी आंदोलन चले और हड़तालें हुईं तब तब इस नारे को अक्सर मज़दूरों, युवाओं और राजनीतिक प्रदर्शनों में हक़ की आवाज़ उठाने के लिए बड़े उत्साह और जोशोखरोश के साथ बुलंद किया।  

इस नारे की मुख्य बातें सीधा मज़दूर हित की बात करती हैं शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करती हैं। नारे में कोई चल नहीं - -कोई भविष्य में वाली बात भी नहीं। शोषण के खिलाफ यह नारा सीधी उंगली उठा कर आंख से आंख मिलाकर बात करता है। मज़दूरों और उनकी मेहनत पर होते हमलों को बड़ी बेबाकी से बेनकाब भी करता है यह नारा।  

इसी नारे को कुछ और गहराई से देखें तो यह नारा पूंजीवादी शोषण, छँटनी, और सरकारी वादों के टूटने के खिलाफ मज़दूर वर्ग की बहुत ही ज़बरदस्त ललकार भी है। आपको हैरानी होगी कि जानेमाने शोमैन राजकपूर और जानेमाने शायर शैलेन्द्र के नज़दीक आने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। वाम विचारधारा और शोषण का विरोध इन्हें नज़दीक ले कर आया। इन्होने मिल कर फिल्म संसार को उन विचारों और गीतों से बेहद अमीर बना दिया। वाम विचारधारा का ज़ोरदार प्रचार कम्युनिस्ट वर्करों और नेताओं से ज़्यादा तो ऐसे गीतों ने किया।  इस तरह के गीतों और कहानियों के चलते ही लेफ्ट के विचारों ने उस जनता में ज़ोरदार ज़मीन पकड़ ली जहां अत्यधिक बौद्धिकता के चलते लीडरों के भाषण आम जनता के सिर के ऊपर से गुज़र जाते थे। गीतों के बोल जनता के दिल दिमाग में घर कर जाते थे। 

शैलेंद्र और राज कपूर की ऐतिहासिक जोड़ी 1940 के दशक के अंत में एक मुशायरे में बनी, जब राज कपूर ने शैलेंद्र की कविता 'जलता है पंजाब' सुनी और प्रभावित हुए। शुरू में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर शैलेंद्र ने फिल्म में लिखने से इनकार किया, लेकिन बाद में आर्थिक तंगी के कारण 'बरसात' (1949) फिल्म के लिए 'बरसात में तुमसे मिले' व 'पतली कमर है' जैसे गानों से उन्होंने करियर की शुरुआत की। 

इस प्रसिद्ध जोड़ी की कहानी के मुख्य पहलू न केवल शायरी बल्कि समाज के नवनिर्माण से जुड़े अभियान के संबंध में भी बहुत कुछ बताते हैं। विचारों का मिलना ही इस जोड़ी के लिए उम्र भर महत्वपूर्ण रहा। दबे कुचले लोगों के दर्द की बात दोनों के दिल में थी। इसके साथ ही राजकपूर साहिब के इश्क और प्रेम ने भी एक नया रंग उभारा। यहां याद आता है कि शुरुआती मुलाकात भी बहुत ख़ास थी लेकिन शैलेन्द्र ने फिल्मों के लिए गत्त लिखने से साफ़ इंकार कर दिया था। उनदिनों गंभीर लोग फिल्मों वाले काम को अच्छा नहीं समझते तहे। शैलेन्द्र साहिब के इस इनकार के बावजूद राज कपूर साहिब ने न कोशिश छोड़ी है और न ही इस सोच को का ही अपने दिमाग से निकाला। वह एक ऐतिहासिक वक़्त कहा जा सकता है जब राजकपूर साहिब ने शैलेंद्र को अपनी पहली फिल्म आग (1948) के लिए गाने लिखने का प्रस्ताव दिया था। शोमैन राजकपूर के प्रस्ताव को ठुकराना भी सबके बस में नहीं होता लेकिन शैलेन्द्र अपने आदर्श के साथ प्रतिबद्ध रहे कि फिल्मों के लिए नहीं लिखना। लेकिन प्रकृति हमें वहीं ले जाती है जहां हम नहीं जाना चाहते। 

ज़िंदगी के रंग बदलते रहते हैं। शैलेन्द्र साहिब के हालात और ज़िंदगी भी गर्दिश में आ गए। परिवार में एक बहुत बड़ी मजबूरी उनकी न टाले जा सकने वाली आर्थिक जरूरत भी बन गई। ऐसे में शैलेन्द्र को राजकपूर ही याद आए। जब शैलेंद्र को पैसों की तंगी हुई तब वह स्वयं राज कपूर साहिब के पास गए। सुना है की वह तो उधार मांगने गए थे उस समय बरसात (1949) फिल्म बन रही थी।

सफल सफर: 'बरसात' के गानों की सफलता के बाद, राज कपूर ने शैलेंद्र को अपनी फिल्मों का मुख्य गीतकार बना लिया।

सदाबहार गाने: इस जोड़ी ने आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी, और अनारी जैसी फिल्मों में 'आवारा हूं', 'प्यार हुआ इकरार हुआ', और 'मेरा जूता है जापानी' जैसे अमर गीत दिए।

गहरी दोस्ती: राज कपूर उन्हें 'कविराज' या 'पुष्किन' कहकर बुलाते थे। शैलेंद्र की मौत (14 दिसंबर 1966) पर राज कपूर ने कहा था, "मेरी आत्मा मुझसे बिछड़ गई"। 

तीसरी कसम (1966) जैसी फिल्मों में उनके बीच के रचनात्मक तालमेल का भी गहरा असर दिखा। 

ज़िंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जिसे शैलेन्द्र जी ने अपनी कलम से कवर न किया हो। यही कारण है कि उनके गीत आज भी लोगों के दिल दिमाग में बसते हैं।

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